संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रयागस्य च माहात्म्यं क्षेत्राणामथ कीर्तनम्।
फलं च विपुलं विप्रा मार्कण्डेयस्य निर्गमः ॥ १०८ ॥
भुवनानां स्वरूपं च ज्योतिषां च निवेशनम्।
कीर्त्यन्ते चैव वर्षाणि नदीनां चैव निर्णयः ॥ १०९ ॥
पर्वतानां च कथनं स्थानानि च दिवौकसाम्।
द्वीपानां प्रविभागश्च श्वेतद्वीपोपवर्णनम् ॥ ११० ॥
शयनं केशवस्याथ माहात्म्यं च महात्मनः।
मन्वन्तराणां कथनं विष्णोर्माहात्म्यमेव च ॥ १११ ॥
वेदशाखाप्रणयनं व्यासानां कथनं ततः।
अवेदस्य च वेदानां कथनं मुनिपुंगवाः ॥ ११२ ॥
योगेश्वराणां च कथा शिष्याणां चाथ कीर्तनम्।
गीताश्च विविधा गुह्या ईश्वरस्याथ कीर्तिताः ॥ ११३ ॥
वर्णाश्रमाणामाचाराः प्रायश्चित्तविधिस्ततः।
कपालित्वं च रुद्रस्य भिक्षाचरणमेव च ॥ ११४ ॥
पतिव्रतायाश्चाख्यानं तीर्थानां च विनिर्णयः।
तथा मङ्कणकस्याथ निग्रहः कीर्त्यते द्विजाः ॥ ११५ ॥
वधश्च कथितो विप्राः कालस्य च समासतः।
देवदारुवने शम्भोः प्रवेशो माधवस्य च ॥ ११६ ॥
दर्शनं षट्कुलीयानां देवदेवस्य धीमतः।
वरदानं च देवस्य नन्दिने तु प्रकीर्तितम् ॥ ११७ ॥
नैमित्तिकस्तु कथितः प्रतिसर्गस्ततः परम्।
प्राकृतः प्रलयश्चोर्ध्वं सबीजो योग एव च ॥ ११८ ॥
एवं ज्ञात्वा पुराणस्य संक्षेपं कीर्तयेत् तु यः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ११९ ॥
एवमुक्त्वा श्रियं देवीमादाय पुरुषोत्तमः।
संत्यज्य कूर्मसंस्थानं स्वस्थानं च जगाम ह ॥ १२० ॥
देवाश्च सर्वे मुनयः स्वानि स्थानानि भेजिरे।
प्रणम्य पुरुषं विष्णुं गृहीत्वा ह्यमृतं द्विजाः ॥ १२१ ॥
एतत् पुराणं परमं भाषितं कूर्मरूपिणा।
साक्षाद् देवादिदेवेन विष्णुना विश्वयोनिना ॥ १२२ ॥
ही (देवीद्वारा वाराणसीसे व्यासके) निष्कासन और वरदान देनेका वर्णन हुआ है। ब्राह्मणो! तदनन्तर प्रयागका माहात्म्य, (पुण्य) क्षेत्रोंका वर्णन, (तीर्थोंका) महान् फल और मार्कण्डेय मुनिके निर्गमनका वर्णन है॥ १०७-१०८॥
(इसके पश्चात्) भुवनोंके स्वरूप, ग्रहों तथा नक्षत्रोंकी स्थिति और वर्षों तथा नदियोंके निर्णयका वर्णन किया गया है। पर्वतों तथा देवताओंके स्थानों, द्वीपोंके विभाग तथा श्वेतद्वीपका वर्णन किया गया है॥ १०९-११०॥
महात्मा केशवके शयन, उनके माहात्म्य, मन्वन्तरों और विष्णुके माहात्म्यका निरूपण हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर वेदकी शाखाओंका प्रणयन, व्यासोंका नाम-परिगणन और अवेद (वेदबाह्य सिद्धान्तों) तथा वेदोंका कथन किया गया है। (इसके अनन्तर) योगेश्वरोंकी कथा, (उनके) शिष्योंका वर्णन और ईश्वर-सम्बन्धी अनेक गुह्य गीताओंका उल्लेख हुआ है॥ १११-११३॥
तदनन्तर वर्णों और आश्रमोंके सदाचार, प्रायश्चित्तविधि, रुद्रके कपाली होने और (उनके) भिक्षा माँगनेका वर्णन हुआ है। द्विजो! इसके बाद पतिव्रताके आख्यान, तीर्थोंके निर्णय और मङ्कणक मुनिके निग्रह करनेका उल्लेख हुआ है॥ ११४-११५॥
ब्राह्मणो! (तदनन्तर) संक्षेपमें कालके वध और शंकर तथा विष्णुके देवदारुवनमें प्रवेश करनेका उल्लेख है। छः कुलोंमें उत्पन्न ऋषियोंद्वारा धीमान् देवाधिदेवके दर्शन करने और महादेवद्वारा नन्दीको वरदान देनेका वर्णन हुआ है। इसके बाद नैमित्तिक प्रलय कहा गया है और फिर आगे प्राकृत प्रलय एवं सबीज योग बतलाया गया है॥ ११६-११८॥
इस प्रकार संक्षेपमें (इस कूर्म) पुराणको जानकर जो उसका उपदेश करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ११९॥
इतना कहकर कूर्मरूपका परित्यागकर देवी लक्ष्मीके साथ पुरुषोत्तम (विष्णु) अपने धामको चले गये। द्विजो! सभी देवता तथा मुनिगण भी परम पुरुष विष्णुके (उपदेशरूपी) अमृतको प्राप्तकर तथा उन्हें प्रणामकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये। यह श्रेष्ठ (कूर्म-) पुराण कूर्मरूपधारी विश्वयोनि साक्षात् देवोंके आदिदेव विष्णुद्वारा कहा गया है॥ १२०-१२२॥