संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४४ * | ४९५ |
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| यः पठेत् सततं मर्त्यो नियमेन समाहितः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥ १२३॥<br><br>लिखित्वा चैव यो दद्याद् वैशाखे मासि सुव्रतः।<br>विप्राय वेदविदुषे तस्य पुण्यं निबोधत॥ १२४॥<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वैश्वर्यसमन्वितः।<br>भुक्त्वा च विपुलान् स्वर्गे भोगान् दिव्यान् सुशोभनान्॥ १२५॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो विप्राणां जायते कुले।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयात्॥ १२६॥ | जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे नियमपूर्वक इस पुराणको पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो पुरुष शास्त्रानुसार व्रतनिष्ठ होते हुए इस पुराणको लिखकर वैशाखमासमें वेदज्ञ ब्राह्मणको दान करता है, उसका पुण्य सुनो—वह सभी पापोंसे रहित और सभी ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होते हुए (मृत्युके बाद) स्वर्गमें प्रचुर मात्रामें दिव्य तथा सुन्दर भोगोंका उपभोग करता है, तत्पश्चात् स्वर्गसे इस लोकमें आकर ब्राह्मणोंके वंशमें उत्पन्न होता है और पूर्व-संस्कारोंकी महिमाके कारण ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेता है॥ १२३—१२६॥ |
| पठित्वाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>योऽर्थं विचारयेत् सम्यक् स प्राप्नोति परं पदम्॥ १२७॥<br><br>अध्येतव्यमिदं नित्यं विप्रैः पर्वणि पर्वणि।<br>श्रोतव्यं च द्विजश्रेष्ठा महापातकनाशनम्॥ १२८॥<br><br>एकतस्तु पुराणानि सेतिहासानि कृत्स्नशः।<br>एकत्र चेदं परममेतदेवातिरिच्यते॥ १२९॥<br><br>धर्मनैपुण्यकामानां ज्ञाननैपुण्यकामिनाम्।<br>इदं पुराणं मुक्त्वाैकं नास्त्यन्यत् साधनं परम्॥ १३०॥ | इस (पुराण)-के एक ही अध्यायके पाठ करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है और जो इसके अर्थपर ठीक-ठीक विचार करता है, वह परमपद प्राप्त करता है।<br>श्रेष्ठ द्विजो! ब्राह्मणोंको प्रत्येक पर्वपर महापातकोंका नाश करनेवाले इस पुराणका नित्य अध्ययन एवं श्रवण करना चाहिये। एक ओर सभी इतिहास-पुराणोंको (शास्त्रीय विचारणाकी कसौटीपर) रखा जाय और दूसरी ओर अकेले इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको रखा जाय तो यही अपेक्षाकृत अतिशय विशिष्ट सिद्ध होगा। जो व्यक्ति धर्ममें निपुणता प्राप्त करना चाहते हों, और जो ज्ञानमें निपुणता प्राप्त करनेके अभिलाषी हों उनके लिये एकमात्र इस पुराणको छोड़कर और कोई दूसरा श्रेष्ठ उपाय नहीं है॥ १२७—१३०॥ |
| यथावदत्र भगवान् देवो नारायणो हरिः।<br>कथ्यते हि यथा विष्णुर्न तथान्येषु सुव्रताः॥ १३१॥<br><br>ब्राह्मी पौराणिकी चेयं संहिता पापनाशिनी।<br>अत्र तत् परमं ब्रह्म कीर्त्यते हि यथार्थतः॥ १३२॥<br><br>तीर्थानां परमं तीर्थं तपसां च परं तपः।<br>ज्ञानानां परमं ज्ञानं व्रतानां परमं व्रतम्॥ १३३॥ | सुव्रतो! इस पुराणमें जिस प्रकारसे भगवान् हरि नारायण देव विष्णुका कीर्तन हुआ है, वैसा अन्यत्र नहीं है। यह पौराणिकी ब्राह्मीसंहिता पापोंका नाश करनेवाली है। इसमें परम ब्रह्मका यथार्थरूपमें कीर्तन किया गया है। यह तीर्थोंमें परम तीर्थ, तपोंमें परम तप, ज्ञानोंमें परम ज्ञान और व्रतोंमें परम व्रत है॥ १३१—१३३॥ |
| नाध्येतव्यमिदं शास्त्रं वृषलस्य च संनिधौ।<br>योऽधीते स तु मोहात्मा स याति नरकान् बहून्॥ १३४॥ | इस शास्त्रका अध्ययन वृषल (अधार्मिक व्यक्ति)-के समीप नहीं करना चाहिये। जो अध्ययन करता है, वह अज्ञानी है, वह बहुतसे नरकोंको प्राप्त करता है॥ १३४॥ |
| श्राद्धे वा दैविके कार्ये श्रावणीयं द्विजातिभिः।<br>यज्ञान्ते तु विशेषेण सर्वदोषविशोधनम्॥ १३५॥ | द्विजातियोंके श्राद्ध अथवा देवकार्यमें इस ब्राह्मीसंहिता (कूर्मपुराण)-को सुनाना चाहिये। यज्ञकी पूर्णतापर विशेषरूपसे (इसका पाठ करनेसे एवं) श्रवण करनेसे सभी दोषोंसे शुद्धि हो जाती है॥ १३५॥ |
| मुमुक्षूणामिदं शास्त्रमध्येतव्यं विशेषतः।<br>श्रोतव्यं चाथ मन्तव्यं वेदार्थपरिबृंहणम्॥ १३६॥ | मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवालोंको विशेषरूपसे वेदके अर्थका विस्तार करनेवाले इस शास्त्रका श्रवण, अध्ययन तथा मनन करना चाहिये। |