संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४९२ | * कूर्मपुराण * |
|---|---|
| संस्तवो देवदेवस्य ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>प्रसादो गिरिशस्याथ वरदानं तथैव च॥ ७९॥ | दृष्टि प्रदान करनेका वर्णन हुआ है। परमेष्ठी ब्रह्माद्वारा देवाधिदेव (महेश्वर)-की स्तुति, (प्रसन्न होकर) गिरिशद्वारा अनुग्रह तथा वर प्रदान करनेका भी वर्णन हुआ है। विष्णुके साथ महात्मा शंकरके संवाद, पिनाकीद्वारा वर प्रदान करने और उनके अन्तर्धान होनेका वर्णन हुआ है॥ ७८-८०॥ |
| संवादो विष्णुना सार्धं शंकरस्य महात्मनः।<br>वरदानं तथापूर्वमन्तर्धानं पिनाकिनः॥ ८०॥<br>वधश्च कथितो विप्रा मधुकैटभयोः पुरा।<br>अवतारोऽथ देवस्य ब्रह्मणो नाभिपङ्कजात्॥ ८१॥ | विप्रो! इसमें प्राचीन कालमें हुए मधुकैटभके वधका तथा देव (विष्णु)-के नाभिकमलसे ब्रह्माके अवतारका वर्णन हुआ है। तदनन्तर विष्णुसे देव ब्रह्माके एकीभावको कहा गया है और ब्रह्माका मोहित होना तदनन्तर हरिसे चेतनाप्राप्तिको बताया गया है॥ ८१-८२॥ |
| एकीभावश्च देवस्य विष्णुना कथितस्ततः।<br>विमोहो ब्रह्मणश्चाथ संज्ञालाभो हरेस्ततः॥ ८२॥<br>तपश्चरणमाख्यातं देवदेवस्य धीमतः।<br>प्रादुर्भावो महेशस्य ललाटात् कथितस्ततः॥ ८३॥ | तदुपरान्त धीमान् देवाधिदेवकी तपश्चर्याका वर्णन है और फिर उनके (ब्रह्माके) मस्तकसे महेश्वरके प्रादुर्भावका वर्णन किया गया है। रुद्रोंकी सृष्टि करनेपर ब्रह्माके द्वारा उसके प्रतिषेधका वर्णन हुआ है। देवाधिदेव (शंकर)-के ऐश्वर्य एवं ब्रह्माको वरदान और उपदेश देनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात् रुद्रके अन्तर्धान होने, ब्रह्माकी तपश्चर्या, देवाधिदेवके दर्शन और उनके नर-नारी-शरीर धारण करनेका वर्णन किया गया है॥ ८३-८५॥ |
| रुद्राणां कथिता सृष्टिर्ब्रह्मणः प्रतिषेधनम्।<br>भूतिश्च देवदेवस्य वरदानोपदेशकौ॥ ८४॥ | |
| अन्तर्धानं च रुद्रस्य तपश्चर्याण्डजस्य च।<br>दर्शनं देवदेवस्य नरनारीशरीरता॥ ८५॥<br>देव्या विभागकथनं देवदेवात् पिनाकिनः।<br>देव्यास्तु पश्चात् कथितं दक्षपुत्रीत्वमेव च॥ ८६॥ | देवाधिदेव पिनाकीसे देवी (सती)-के अलगावका कथन हुआ है और फिर देवीका दक्षपुत्रीके रूपमें जन्म लेनेका वर्णन हुआ है। देवीकी हिमवान्की पुत्री होना और उनके माहात्म्यका वर्णन किया गया है तथा (उनके) दिव्यरूपके दर्शन और विश्वरूपके दर्शनका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त स्वयं पिता हिमालयद्वारा कहे गये (देवीके) सहस्रनाम, महादेवीके द्वारा प्रदत्त उपदेश और वरदानका भी वर्णन हुआ है॥ ८६-८८॥ |
| हिमवद्दुहितृत्वं च देव्या माहात्म्यमेव च।<br>दर्शनं दिव्यरूपस्य वैश्वरूपस्य दर्शनम्॥ ८७॥ | |
| नाम्नां सहस्रं कथितं पित्रा हिमवता स्वयम्।<br>उपदेशो महादेव्या वरदानं तथैव च॥ ८८॥<br>भृग्वादीनां प्रजासर्गो राज्ञां वंशस्य विस्तरः।<br>प्राचेतसत्वं दक्षस्य दक्षयज्ञविमर्दनम्॥ ८९॥<br>दधीचस्य च दक्षस्य विवादः कथितस्तदा।<br>ततश्च शापः कथितो मुनीनां मुनिपुंगवाः॥ ९०॥ | भृगु आदि ऋषियोंका प्रजासर्ग, राजाओंके वंशका विस्तार, दक्षके प्रचेताके पुत्र होने और दक्षयज्ञ-विध्वंसका वर्णन हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर दधीच और दक्षके विवादको बतलाया गया है, फिर मुनियोंके शापका वर्णन हुआ है॥ ८९-९०॥ |
| रुद्रागतिः प्रसादश्च अन्तर्धानं पिनाकिनः।<br>पितामहस्योपदेशः कीर्त्यते रक्षणाय तु॥ ९१॥<br>दक्षस्य च प्रजासर्गः कश्यपस्य महात्मनः।<br>हिरण्यकशिपोर्नाशो हिरण्याक्षवधस्तथा॥ ९२॥ | तदुपरान्त रुद्रके आगमन एवं अनुग्रह और उन पिनाकी रुद्रके अन्तर्धान होने तथा (दक्षकी) रक्षाके लिये पितामहद्वारा उपदेश करनेका वर्णन हुआ है॥ ९१॥<br>तदुपरान्त दक्षके तथा महात्मा कश्यपसे होनेवाली प्रजासृष्टिका वर्णन है। हिरण्यकशिपुके नष्ट होने तथा हिरण्याक्षके वधका वर्णन हुआ है। इसके बाद देवदारुवनमें निवास करनेवाले मुनियोंकी शापप्राप्तिका कथन है, अन्धकके निग्रह और उसको श्रेष्ठ गाणपत्यपद प्रदान करनेका वर्णन हुआ है॥ ९२-९३॥ |
| ततश्च शापः कथितो देवदारुवनौकसाम्।<br>निग्रहश्चान्धकस्याथ गाणपत्यमनुत्तमम्॥ ९३॥ |
- अध्याय ४४ * | ४९३ ---|--- प्रह्लादनिग्रहश्चाथ बलेः संयमनं ततः।<br>बाणस्य निग्रहश्चाथ प्रसादस्तस्य शूलिनः॥ ९४ ॥<br><br>ऋषीणां वंशविस्तारो राज्ञां वंशाः प्रकीर्तिताः।<br>वसुदेवात् ततो विष्णोरुत्पत्तिः स्वेच्छया हरेः ॥ ९५ ॥<br>दर्शनं चोपमन्योर्वै तपश्चरणमेव च।<br>वरलाभो महादेवं दृष्ट्वा साम्बं त्रिलोचनम्॥ ९६ ॥<br><br>कैलासगमनं चाथ निवासस्तत्र शार्ङ्गिणः।<br>ततश्च कथ्यते भीतिर्द्वारवत्या निवासिनाम् ॥ ९७ ॥<br><br>रक्षणं गरुडेनाथ जित्वा शत्रून् महाबलान्।<br>नारदागमनं चैव यात्रा चैव गरुत्मतः॥ ९८ ॥<br>ततश्च कृष्णागमनं मुनीनामागतिस्ततः।<br>नैत्यकं वासुदेवस्य शिवलिङ्गार्चनं तथा ॥ ९९ ॥<br><br>मार्कण्डेयस्य च मुनेः प्रश्नः प्रोक्तस्ततः परम्।<br>लिङ्गार्चननिमित्तं च लिङ्गस्यापि सलिङ्गिनः ॥ १०० ॥<br>याथात्म्यकथनं चाथ लिङ्गाविर्भाव एव च।<br>ब्रह्मविष्ण्वोस्तथा मध्ये कीर्तितो मुनिपुंगवाः ॥ १०१ ॥<br><br>मोहस्तयोस्तु कथितो गमनं चोर्ध्वतोऽप्यधः।<br>संस्तवो देवदेवस्य प्रसादः परमेष्ठिनः॥ १०२॥<br>अन्तर्धानं च लिङ्गस्य साम्बोत्पत्तिस्ततः परम्।<br>कीर्तिता चानिरुद्धस्य समुत्पत्तिर्द्विजोत्तमाः ॥ १०३ ॥<br><br>कृष्णस्य गमने बुद्धिर्ऋषीणामागतिस्तथा।<br>अनुशासितं च कृष्णेन वरदानं महात्मनः ॥ १०४ ॥<br>गमनं चैव कृष्णस्य पार्थस्यापि च दर्शनम्।<br>कृष्णद्वैपायनस्योक्ता युगधर्माः सनातनाः॥ १०५ ॥<br>अनुग्रहोऽथ पार्थस्य वाराणसीगतिस्ततः।<br>पाराशर्यस्य च मुनेर्व्यासस्याद्भुतकर्मणः॥ १०६ ॥<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं तीर्थानां चैव वर्णनम्।<br>तीर्थयात्रा च व्यासस्य देव्याश्चैवाथ दर्शनम्।<br>उद्वासनं च कथितं वरदानं तथैव च ॥ १०७ ॥ | तदनन्तर प्रह्लादके निग्रह, बलिके बाँधे जाने, त्रिशूली (शंकर)-द्वारा बाणासुरके निग्रह और फिर उसपर कृपा करनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात् ऋषियोंके वंशका विस्तार तथा राजाओंके वंशका वर्णन हुआ है और फिर स्वेच्छासे वसुदेवके पुत्रके रूपमें हरिविष्णुकी उत्पत्तिका वर्णन है॥ ९४-९५॥<br>उपमन्युका दर्शन करने और तपश्चर्या करनेका वर्णन है। तत्पश्चात् अम्बासहित त्रिलोचन महादेवका दर्शनकर वर प्राप्त करनेका वर्णन हुआ है। तदनन्तर शार्ङ्गी (कृष्ण)-का कैलासपर जाने और वहाँ निवास करनेका वर्णन है फिर द्वारवती-निवासियोंके भयभीत होनेका वर्णन है। इसके बाद महाबलशाली शत्रुओंको जीतकर गरुडके द्वारा (द्वारकावासियोंकी) रक्षा करने, नारद-आगमन और गरुडकी यात्राका वर्णन हुआ है ॥ ९६-९८॥<br>तदनन्तर कृष्णके आगमन, मुनियोंके आने और वासुदेव (विष्णु)-द्वारा नित्य किये जानेवाले शिव-लिङ्गार्चनका वर्णन है। तदुपरान्त मुनि मार्कण्डेयजीद्वारा (लिङ्गके विषयमें) प्रश्न करने तथा (वासुदेवद्वारा) लिङ्गार्चनके प्रयोजन और लिङ्गी (शंकर)-के लिङ्गके स्वरूपका निरूपण हुआ है ॥ ९९-१०० ॥<br>मुनिश्रेष्ठो ! फिर ब्रह्मा तथा विष्णुके मध्य ज्योतिर्लिङ्गके आविर्भाव तथा उसके वास्तविक स्वरूपका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त उन दोनोंके मोहित होने तथा (लिङ्गका परिमाण जाननेके लिये) ऊर्ध्वलोक एवं अधोलोकमें जाने, पुनः परमेष्ठी देवाधिदेव (महादेव)-की स्तुति करने और उनके द्वारा अनुग्रह प्रदान करनेका वर्णन हुआ है ॥ १०१-१०२॥<br>द्विजोत्तमो ! तदनन्तर लिङ्गके अन्तर्धान होने और फिर साम्ब तथा अनिरुद्धकी उत्पत्तिका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त महात्मा कृष्णका (अपने लोक) जानेका निश्चय, ऋषियोंका (द्वारकामें) आगमन, कृष्णद्वारा उन्हें उपदेश तथा वरदान देनेका वर्णन किया गया है ॥ १०३-१०४॥<br>इसके अनन्तर कृष्णका (स्वधाम) गमन, अर्जुनद्वारा कृष्णद्वैपायनका दर्शन एवं उनके द्वारा कहे गये सनातन युगधर्मोंका वर्णन हुआ है। आगे अर्जुनके ऊपर (व्यासद्वारा) अनुग्रह और पराशरपुत्र अद्भुतकर्मा व्यास मुनिका वाराणसीमें जानेका वर्णन है ॥ १०५-१०६॥<br>तदुपरान्त वाराणसीका माहात्म्य, तीर्थोंका वर्णन, व्यासकी तीर्थयात्रा और देवीके दर्शन करनेका वर्णन है। साथ
४९४ * कूर्मपुराण *
प्रयागस्य च माहात्म्यं क्षेत्राणामथ कीर्तनम्।
फलं च विपुलं विप्रा मार्कण्डेयस्य निर्गमः ॥ १०८ ॥
भुवनानां स्वरूपं च ज्योतिषां च निवेशनम्।
कीर्त्यन्ते चैव वर्षाणि नदीनां चैव निर्णयः ॥ १०९ ॥
पर्वतानां च कथनं स्थानानि च दिवौकसाम्।
द्वीपानां प्रविभागश्च श्वेतद्वीपोपवर्णनम् ॥ ११० ॥
शयनं केशवस्याथ माहात्म्यं च महात्मनः।
मन्वन्तराणां कथनं विष्णोर्माहात्म्यमेव च ॥ १११ ॥
वेदशाखाप्रणयनं व्यासानां कथनं ततः।
अवेदस्य च वेदानां कथनं मुनिपुंगवाः ॥ ११२ ॥
योगेश्वराणां च कथा शिष्याणां चाथ कीर्तनम्।
गीताश्च विविधा गुह्या ईश्वरस्याथ कीर्तिताः ॥ ११३ ॥
वर्णाश्रमाणामाचाराः प्रायश्चित्तविधिस्ततः।
कपालित्वं च रुद्रस्य भिक्षाचरणमेव च ॥ ११४ ॥
पतिव्रतायाश्चाख्यानं तीर्थानां च विनिर्णयः।
तथा मङ्कणकस्याथ निग्रहः कीर्त्यते द्विजाः ॥ ११५ ॥
वधश्च कथितो विप्राः कालस्य च समासतः।
देवदारुवने शम्भोः प्रवेशो माधवस्य च ॥ ११६ ॥
दर्शनं षट्कुलीयानां देवदेवस्य धीमतः।
वरदानं च देवस्य नन्दिने तु प्रकीर्तितम् ॥ ११७ ॥
नैमित्तिकस्तु कथितः प्रतिसर्गस्ततः परम्।
प्राकृतः प्रलयश्चोर्ध्वं सबीजो योग एव च ॥ ११८ ॥
एवं ज्ञात्वा पुराणस्य संक्षेपं कीर्तयेत् तु यः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ११९ ॥
एवमुक्त्वा श्रियं देवीमादाय पुरुषोत्तमः।
संत्यज्य कूर्मसंस्थानं स्वस्थानं च जगाम ह ॥ १२० ॥
देवाश्च सर्वे मुनयः स्वानि स्थानानि भेजिरे।
प्रणम्य पुरुषं विष्णुं गृहीत्वा ह्यमृतं द्विजाः ॥ १२१ ॥
एतत् पुराणं परमं भाषितं कूर्मरूपिणा।
साक्षाद् देवादिदेवेन विष्णुना विश्वयोनिना ॥ १२२ ॥
ही (देवीद्वारा वाराणसीसे व्यासके) निष्कासन और वरदान देनेका वर्णन हुआ है। ब्राह्मणो! तदनन्तर प्रयागका माहात्म्य, (पुण्य) क्षेत्रोंका वर्णन, (तीर्थोंका) महान् फल और मार्कण्डेय मुनिके निर्गमनका वर्णन है॥ १०७-१०८॥
(इसके पश्चात्) भुवनोंके स्वरूप, ग्रहों तथा नक्षत्रोंकी स्थिति और वर्षों तथा नदियोंके निर्णयका वर्णन किया गया है। पर्वतों तथा देवताओंके स्थानों, द्वीपोंके विभाग तथा श्वेतद्वीपका वर्णन किया गया है॥ १०९-११०॥
महात्मा केशवके शयन, उनके माहात्म्य, मन्वन्तरों और विष्णुके माहात्म्यका निरूपण हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर वेदकी शाखाओंका प्रणयन, व्यासोंका नाम-परिगणन और अवेद (वेदबाह्य सिद्धान्तों) तथा वेदोंका कथन किया गया है। (इसके अनन्तर) योगेश्वरोंकी कथा, (उनके) शिष्योंका वर्णन और ईश्वर-सम्बन्धी अनेक गुह्य गीताओंका उल्लेख हुआ है॥ १११-११३॥
तदनन्तर वर्णों और आश्रमोंके सदाचार, प्रायश्चित्तविधि, रुद्रके कपाली होने और (उनके) भिक्षा माँगनेका वर्णन हुआ है। द्विजो! इसके बाद पतिव्रताके आख्यान, तीर्थोंके निर्णय और मङ्कणक मुनिके निग्रह करनेका उल्लेख हुआ है॥ ११४-११५॥
ब्राह्मणो! (तदनन्तर) संक्षेपमें कालके वध और शंकर तथा विष्णुके देवदारुवनमें प्रवेश करनेका उल्लेख है। छः कुलोंमें उत्पन्न ऋषियोंद्वारा धीमान् देवाधिदेवके दर्शन करने और महादेवद्वारा नन्दीको वरदान देनेका वर्णन हुआ है। इसके बाद नैमित्तिक प्रलय कहा गया है और फिर आगे प्राकृत प्रलय एवं सबीज योग बतलाया गया है॥ ११६-११८॥
इस प्रकार संक्षेपमें (इस कूर्म) पुराणको जानकर जो उसका उपदेश करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ११९॥
इतना कहकर कूर्मरूपका परित्यागकर देवी लक्ष्मीके साथ पुरुषोत्तम (विष्णु) अपने धामको चले गये। द्विजो! सभी देवता तथा मुनिगण भी परम पुरुष विष्णुके (उपदेशरूपी) अमृतको प्राप्तकर तथा उन्हें प्रणामकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये। यह श्रेष्ठ (कूर्म-) पुराण कूर्मरूपधारी विश्वयोनि साक्षात् देवोंके आदिदेव विष्णुद्वारा कहा गया है॥ १२०-१२२॥
| * अध्याय ४४ * | ४९५ |
|---|
| यः पठेत् सततं मर्त्यो नियमेन समाहितः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥ १२३॥<br><br>लिखित्वा चैव यो दद्याद् वैशाखे मासि सुव्रतः।<br>विप्राय वेदविदुषे तस्य पुण्यं निबोधत॥ १२४॥<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वैश्वर्यसमन्वितः।<br>भुक्त्वा च विपुलान् स्वर्गे भोगान् दिव्यान् सुशोभनान्॥ १२५॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो विप्राणां जायते कुले।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयात्॥ १२६॥ | जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे नियमपूर्वक इस पुराणको पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो पुरुष शास्त्रानुसार व्रतनिष्ठ होते हुए इस पुराणको लिखकर वैशाखमासमें वेदज्ञ ब्राह्मणको दान करता है, उसका पुण्य सुनो—वह सभी पापोंसे रहित और सभी ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होते हुए (मृत्युके बाद) स्वर्गमें प्रचुर मात्रामें दिव्य तथा सुन्दर भोगोंका उपभोग करता है, तत्पश्चात् स्वर्गसे इस लोकमें आकर ब्राह्मणोंके वंशमें उत्पन्न होता है और पूर्व-संस्कारोंकी महिमाके कारण ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेता है॥ १२३—१२६॥ |
| पठित्वाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>योऽर्थं विचारयेत् सम्यक् स प्राप्नोति परं पदम्॥ १२७॥<br><br>अध्येतव्यमिदं नित्यं विप्रैः पर्वणि पर्वणि।<br>श्रोतव्यं च द्विजश्रेष्ठा महापातकनाशनम्॥ १२८॥<br><br>एकतस्तु पुराणानि सेतिहासानि कृत्स्नशः।<br>एकत्र चेदं परममेतदेवातिरिच्यते॥ १२९॥<br><br>धर्मनैपुण्यकामानां ज्ञाननैपुण्यकामिनाम्।<br>इदं पुराणं मुक्त्वाैकं नास्त्यन्यत् साधनं परम्॥ १३०॥ | इस (पुराण)-के एक ही अध्यायके पाठ करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है और जो इसके अर्थपर ठीक-ठीक विचार करता है, वह परमपद प्राप्त करता है।<br>श्रेष्ठ द्विजो! ब्राह्मणोंको प्रत्येक पर्वपर महापातकोंका नाश करनेवाले इस पुराणका नित्य अध्ययन एवं श्रवण करना चाहिये। एक ओर सभी इतिहास-पुराणोंको (शास्त्रीय विचारणाकी कसौटीपर) रखा जाय और दूसरी ओर अकेले इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको रखा जाय तो यही अपेक्षाकृत अतिशय विशिष्ट सिद्ध होगा। जो व्यक्ति धर्ममें निपुणता प्राप्त करना चाहते हों, और जो ज्ञानमें निपुणता प्राप्त करनेके अभिलाषी हों उनके लिये एकमात्र इस पुराणको छोड़कर और कोई दूसरा श्रेष्ठ उपाय नहीं है॥ १२७—१३०॥ |
| यथावदत्र भगवान् देवो नारायणो हरिः।<br>कथ्यते हि यथा विष्णुर्न तथान्येषु सुव्रताः॥ १३१॥<br><br>ब्राह्मी पौराणिकी चेयं संहिता पापनाशिनी।<br>अत्र तत् परमं ब्रह्म कीर्त्यते हि यथार्थतः॥ १३२॥<br><br>तीर्थानां परमं तीर्थं तपसां च परं तपः।<br>ज्ञानानां परमं ज्ञानं व्रतानां परमं व्रतम्॥ १३३॥ | सुव्रतो! इस पुराणमें जिस प्रकारसे भगवान् हरि नारायण देव विष्णुका कीर्तन हुआ है, वैसा अन्यत्र नहीं है। यह पौराणिकी ब्राह्मीसंहिता पापोंका नाश करनेवाली है। इसमें परम ब्रह्मका यथार्थरूपमें कीर्तन किया गया है। यह तीर्थोंमें परम तीर्थ, तपोंमें परम तप, ज्ञानोंमें परम ज्ञान और व्रतोंमें परम व्रत है॥ १३१—१३३॥ |
| नाध्येतव्यमिदं शास्त्रं वृषलस्य च संनिधौ।<br>योऽधीते स तु मोहात्मा स याति नरकान् बहून्॥ १३४॥ | इस शास्त्रका अध्ययन वृषल (अधार्मिक व्यक्ति)-के समीप नहीं करना चाहिये। जो अध्ययन करता है, वह अज्ञानी है, वह बहुतसे नरकोंको प्राप्त करता है॥ १३४॥ |
| श्राद्धे वा दैविके कार्ये श्रावणीयं द्विजातिभिः।<br>यज्ञान्ते तु विशेषेण सर्वदोषविशोधनम्॥ १३५॥ | द्विजातियोंके श्राद्ध अथवा देवकार्यमें इस ब्राह्मीसंहिता (कूर्मपुराण)-को सुनाना चाहिये। यज्ञकी पूर्णतापर विशेषरूपसे (इसका पाठ करनेसे एवं) श्रवण करनेसे सभी दोषोंसे शुद्धि हो जाती है॥ १३५॥ |
| मुमुक्षूणामिदं शास्त्रमध्येतव्यं विशेषतः।<br>श्रोतव्यं चाथ मन्तव्यं वेदार्थपरिबृंहणम्॥ १३६॥ | मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवालोंको विशेषरूपसे वेदके अर्थका विस्तार करनेवाले इस शास्त्रका श्रवण, अध्ययन तथा मनन करना चाहिये। |
४९६ * कूर्मपुराण *
| ज्ञात्वा यथावद् विप्रेन्द्रान् श्रावयेद् भक्तिसंयुतान्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १३७॥<br>योऽश्रद्दधाने पुरुषे दद्याच्चाधार्मिके तथा।<br>स प्रेत्य गत्वा निरयान् शुनां योनिं व्रजत्यधः ॥ १३८॥ | इसका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्तकर भक्तियुक्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इसे (सबको) सुनाना चाहिये। इससे वह व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्म-सायुज्य प्राप्त करता है। जो (व्यक्ति) श्रद्धारहित तथा अधार्मिक पुरुषको इसका उपदेश देता है, वह परलोकमें जाकर नरकोंका भोग भोगकर पुनः मृत्युलोकमें कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है। 'संसारके मूल कारण सनातन हरि विष्णु तथा कृष्णद्वैपायन व्यासजीको नमस्कार करके इस शास्त्र (पुराण)-का अध्ययन करना चाहिये'—अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णु और पराशरके पुत्र महात्मा विप्रर्षि व्यासकी ऐसी आज्ञा है॥ १३६-१४०॥ |
| नमस्कृत्य हरिं विष्णुं जगद्योनिं सनातनम्।<br>अध्येतव्यमिदं शास्त्रं कृष्णद्वैपायनं तथा ॥ १३९॥ | |
| इत्याज्ञा देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।<br>पाराशर्यस्य विप्रर्षेर्व्यासस्य च महात्मनः ॥ १४०॥ | |
| श्रुत्वा नारायणाद् दिव्यां नारदो भगवानृषिः।<br>गौतमाय ददौ पूर्वं तस्माच्चैव पराशरः ॥ १४१॥<br>पाराशरोऽपि भगवान् गङ्गाद्वारे मुनीश्वराः।<br>मुनिभ्यः कथयामास धर्मकामार्थमोक्षदम् ॥ १४२॥<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं सनकाय च धीमते।<br>सनत्कुमाराय तथा सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १४३॥<br>सनकाद् भगवान् साक्षाद् देवलो योगवित्तमः।<br>अवाप्तवान् पञ्चशिखो देवलादिदमुत्तमम् ॥ १४४॥<br>सनत्कुमाराद् भगवान् मुनिः सत्यवतीसुतः।<br>लेभे पुराणं परमं व्यासः सर्वार्थसंचयम् ॥ १४५॥ | नारायणसे इस दिव्य संहिताको सुनकर भगवान् नारद ऋषि पूर्वकालमें गौतमको इसका उपदेश दिया था और उनसे पराशरको यह (शास्त्र) प्राप्त हुआ। मुनीश्वरो! भगवान् पराशरने भी गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षरूप चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाले इस पुराणको मुनियोंसे कहा। पूर्वकालमें धीमान् सनक और सनत्कुमारको सभी पापोंका नाश करनेवाले इस शास्त्रका उपदेश ब्रह्माने दिया था। सनकसे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ साक्षात् भगवान् देवलने और देवलसे पञ्चशिखने इस उत्तम शास्त्रको प्राप्त किया। सत्यवतीके पुत्र भगवान् व्यास मुनिने सभी अर्थोंका संचय करनेवाले इस श्रेष्ठ पुराणको सनत्कुमारसे प्राप्त किया। १४१-१४५॥ |
| तस्माद् व्यासादहं श्रुत्वा भवतां पापनाशनम्।<br>ऊचिवान् वै भवद्भिश्च दातव्यं धार्मिके जने ॥ १४६॥ | उन व्याससे सुनकर मैंने आप लोगोंसे पापोंका नाश करनेवाले इस पुराणको कहा है। आप लोगोंको भी धार्मिक व्यक्तिको (इसका उपदेश) प्रदान करना चाहिये॥ १४६॥ |
| तस्मै व्यासाय गुरवे सर्वज्ञाय महर्षये।<br>पाराशर्याय शान्ताय नमो नारायणात्मने ॥ १४७॥ | पराशरके पुत्र सर्वज्ञ, गुरु, शान्त तथा नारायणस्वरूप महर्षि व्यासको नमस्कार है। जिनसे सम्पूर्ण संसारकी उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब लीन हो जाता है, उन देवताओंके स्वामी कूर्मरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीविष्णुको नमस्कार है॥ १४७-१४८॥ |
| यस्मात् संजायते कृत्स्नं यत्र चैव प्रलीयते।<br>नमस्तस्मै सुरेशाय विष्णवे कूर्मरूपिणे ॥ १४८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
(उपरिविभागः समाप्तः)
॥ इति श्रीकूर्मपुराणं समाप्तम् ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४४॥
(उपरिविभाग समाप्त)