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संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 506स्थायी लिंक
४९६ * कूर्मपुराण *
| ज्ञात्वा यथावद् विप्रेन्द्रान् श्रावयेद् भक्तिसंयुतान्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १३७॥<br>योऽश्रद्दधाने पुरुषे दद्याच्चाधार्मिके तथा।<br>स प्रेत्य गत्वा निरयान् शुनां योनिं व्रजत्यधः ॥ १३८॥ | इसका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्तकर भक्तियुक्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इसे (सबको) सुनाना चाहिये। इससे वह व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्म-सायुज्य प्राप्त करता है। जो (व्यक्ति) श्रद्धारहित तथा अधार्मिक पुरुषको इसका उपदेश देता है, वह परलोकमें जाकर नरकोंका भोग भोगकर पुनः मृत्युलोकमें कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है। 'संसारके मूल कारण सनातन हरि विष्णु तथा कृष्णद्वैपायन व्यासजीको नमस्कार करके इस शास्त्र (पुराण)-का अध्ययन करना चाहिये'—अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णु और पराशरके पुत्र महात्मा विप्रर्षि व्यासकी ऐसी आज्ञा है॥ १३६-१४०॥ |
| नमस्कृत्य हरिं विष्णुं जगद्योनिं सनातनम्।<br>अध्येतव्यमिदं शास्त्रं कृष्णद्वैपायनं तथा ॥ १३९॥ | |
| इत्याज्ञा देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।<br>पाराशर्यस्य विप्रर्षेर्व्यासस्य च महात्मनः ॥ १४०॥ | |
| श्रुत्वा नारायणाद् दिव्यां नारदो भगवानृषिः।<br>गौतमाय ददौ पूर्वं तस्माच्चैव पराशरः ॥ १४१॥<br>पाराशरोऽपि भगवान् गङ्गाद्वारे मुनीश्वराः।<br>मुनिभ्यः कथयामास धर्मकामार्थमोक्षदम् ॥ १४२॥<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं सनकाय च धीमते।<br>सनत्कुमाराय तथा सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १४३॥<br>सनकाद् भगवान् साक्षाद् देवलो योगवित्तमः।<br>अवाप्तवान् पञ्चशिखो देवलादिदमुत्तमम् ॥ १४४॥<br>सनत्कुमाराद् भगवान् मुनिः सत्यवतीसुतः।<br>लेभे पुराणं परमं व्यासः सर्वार्थसंचयम् ॥ १४५॥ | नारायणसे इस दिव्य संहिताको सुनकर भगवान् नारद ऋषि पूर्वकालमें गौतमको इसका उपदेश दिया था और उनसे पराशरको यह (शास्त्र) प्राप्त हुआ। मुनीश्वरो! भगवान् पराशरने भी गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षरूप चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाले इस पुराणको मुनियोंसे कहा। पूर्वकालमें धीमान् सनक और सनत्कुमारको सभी पापोंका नाश करनेवाले इस शास्त्रका उपदेश ब्रह्माने दिया था। सनकसे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ साक्षात् भगवान् देवलने और देवलसे पञ्चशिखने इस उत्तम शास्त्रको प्राप्त किया। सत्यवतीके पुत्र भगवान् व्यास मुनिने सभी अर्थोंका संचय करनेवाले इस श्रेष्ठ पुराणको सनत्कुमारसे प्राप्त किया। १४१-१४५॥ |
| तस्माद् व्यासादहं श्रुत्वा भवतां पापनाशनम्।<br>ऊचिवान् वै भवद्भिश्च दातव्यं धार्मिके जने ॥ १४६॥ | उन व्याससे सुनकर मैंने आप लोगोंसे पापोंका नाश करनेवाले इस पुराणको कहा है। आप लोगोंको भी धार्मिक व्यक्तिको (इसका उपदेश) प्रदान करना चाहिये॥ १४६॥ |
| तस्मै व्यासाय गुरवे सर्वज्ञाय महर्षये।<br>पाराशर्याय शान्ताय नमो नारायणात्मने ॥ १४७॥ | पराशरके पुत्र सर्वज्ञ, गुरु, शान्त तथा नारायणस्वरूप महर्षि व्यासको नमस्कार है। जिनसे सम्पूर्ण संसारकी उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब लीन हो जाता है, उन देवताओंके स्वामी कूर्मरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीविष्णुको नमस्कार है॥ १४७-१४८॥ |
| यस्मात् संजायते कृत्स्नं यत्र चैव प्रलीयते।<br>नमस्तस्मै सुरेशाय विष्णवे कूर्मरूपिणे ॥ १४८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
(उपरिविभागः समाप्तः)
॥ इति श्रीकूर्मपुराणं समाप्तम् ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४४॥
(उपरिविभाग समाप्त)