संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४७६ | * कूर्मपुराण * |
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| अन्यच्च तीर्थप्रवरं जाप्येश्वरमितिश्रुतम्।<br>जजाप रुद्रमनिशं यत्र नन्दी महागणः ॥ १६ ॥<br><br>प्रीतस्तस्य महादेवो देव्या सह पिनाकधृक् ।<br>ददावात्मसमानत्वं मृत्युवञ्चनमेव च ॥ १७ ॥<br>अभूदृषिः स धर्मात्मा शिलादो नाम धर्मवित्।<br>आराधयन्महादेवं पुत्रार्थं वृषभध्वजम् ॥ १८ ॥<br><br>तस्य वर्षसहस्रान्ते तप्यमानस्य विश्वकृत्।<br>शर्वः सोमो गणवृतो वरदोऽस्मीत्यभाषत ॥ १९ ॥<br><br>स वव्रे वरमीशानं वरेण्यं गिरिजापतिम्।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं देहि पुत्रं त्वया समम् ॥ २० ॥<br><br>तथास्त्वित्याह भगवान् देव्या सह महेश्वरः ।<br>पश्यतस्तस्य विप्रर्षेरन्तर्धानं गतो हरः ॥ २१ ॥<br>ततो यियक्षुः स्वां भूमिं शिलादो धर्मवित्तमः ।<br>चकर्ष लाङ्गलेनोर्वीं भित्त्वादृश्यत शोभनः ॥ २२ ॥<br><br>संवर्तकानलप्रख्यः कुमारः प्रहसन्निव ।<br>रूपलावण्यसम्पन्नस्तेजसा भासयन् दिशः ॥ २३ ॥<br><br>कुमारतुल्योऽप्रतिमो मेघगम्भीरया गिरा।<br>शिलादं तात तातेति प्राह नन्दी पुनः पुनः ॥ २४ ॥<br><br>तं दृष्ट्वः नन्दनं जातं शिलादः परिषस्वजे।<br>मुनिभ्यो दर्शयामास ये तदाश्रमवासिनः ॥ २५ ॥<br>जातकर्मादिकाः सर्वाः क्रियास्तस्य चकार ह।<br>उपनीय यथाशास्त्रं वेदमध्यापयत् सुतम् ॥ २६ ॥<br><br>अधीतवेदो भगवान् नन्दी मतिमनुत्तमाम्।<br>चक्रे महेश्वरं द्रष्टुं जेष्ये मृत्युमिति प्रभुम् ॥ २७ ॥<br><br>स गत्वा सरितं पुण्यामेकाग्रश्रद्धयान्वितः ।<br>जजाप रुद्रमनिशं महेशासक्तमानसः ॥ २८ ॥<br><br>तस्य कोट्यां तु पूर्णायां शंकरो भक्तवत्सलः ।<br>आगत्य साम्बः सगणो वरदोऽस्मीत्युवाच ह ॥ २९ ॥ | एक दूसरा तीर्थोंमें श्रेष्ठ तीर्थ है, जो जाप्येश्वर नामसे प्रसिद्ध है। जहाँ महान् गण नन्दीने निरन्तर रुद्रका जप किया था और पिनाक धारण करनेवाले रुद्र-महादेव देवीके साथ उनपर प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें (नन्दीको) अपनी समानता तथा मृत्युसे बचनेका वर प्रदान किया था॥ १६-१७॥<br><br>(इन नन्दीके प्रादुर्भावकी कथा इस प्रकार है—) शिलाद नामके एक धर्मज्ञ धर्मात्मा ऋषि हुए, उन्होंने पुत्रप्राप्तिके लिये वृषभध्वज महादेवकी आराधना की। तप करते हुए उन्होंने जब हजार वर्षका समय व्यतीत कर दिया, तब गणोंसे आवृत विश्वकर्ता सोम शर्वने 'मैं वर दूँगा' इस प्रकार कहा। उन्होंने (शिलाद ऋषिने) वरेण्य गिरिजापति ईशानसे वर माँगा कि मुझे आप मृत्युसे रहित अपने ही समान अयोनिज पुत्र प्रदान करें। देवीके साथ भगवान् महेश्वरने—'ऐसा ही हो' कहा और उन विप्रर्षिके देखते-देखते वे अन्तर्धान हो गये॥ १८-२१॥<br><br>तदनन्तर धर्मज्ञ शिलादने अपनी भूमिमें यज्ञ करनेकी इच्छासे हलद्वारा पृथ्वीको जोता। पृथ्वीका भेदन करनेपर उन्होंने संवर्तक नामक अग्निके समान, रूप तथा लावण्यसे सम्पन्न और अपने तेजसे दिशाओंको प्रकाशित करते हुए, हँसते हुए एक सुन्दर कुमारको देखा। कुमार (कार्तिकेय)-के समान उन अतुलनीय नन्दी (नामक कुमार)-ने मेघ-सदृश गम्भीर वाणीमें शिलादको बार-बार 'तात' 'तात' इस प्रकारसे कहा। आविर्भूत हुए उस पुत्रको देखकर शिलादने उसका आलिंगन किया और उस आश्रममें रहनेवाले जो मुनि थे, उन्हें भी उसे दिखाया॥ २२-२५॥<br><br>अनन्तर उन्होंने (शिलाद ऋषिने) उन नन्दीके जातकर्म आदि सभी संस्कार किये और शास्त्रविधिसे उपनयन-संस्कार कर वेद पढ़ाया। वेदका अध्ययन कर भगवान् नन्दीने यह श्रेष्ठ विचार किया कि प्रभु महेश्वरका दर्शन कर मैं मृत्युको जीतूँगा। उन्होंने पवित्र नदीके तटपर जाकर एकाग्र तथा श्रद्धायुक्त होकर महेश्वरमें अपने मनको आसक्तकर निरन्तर रुद्रका जप करना प्रारम्भ कर दिया। उनके द्वारा एक करोड़ जपकी संख्या पूर्ण होनेपर भक्तवत्सल शंकरने अपने गणों तथा पार्वतीके साथ वहाँ आकर 'मैं वर दूँगा' इस प्रकार कहा॥ २६-२९॥ |
* अध्याय ४१ *
| स वव्रे पुनरेवाहं जपेयं कोटिमीश्वरम्।<br>तावदायुर्र्महादेव देहीति वरमीश्वर ॥ ३० ॥ | नन्दीने वर माँगते हुए कहा—ईश्वर! मैं पुनः ईश्वरका एक करोड़ जप करना चाहता हूँ, अतः महादेव! आप मुझे उतनी ही लम्बी आयु प्रदान करें। 'ऐसा ही हो' यह कहकर वे देव अन्तर्धान हो गये। भगवान् नन्दीने पुनः उनमें मन लगाते हुए एक करोड़ जप किया। |
| एवमस्त्विति सम्प्रोच्य देवोऽप्यन्तरधीयत।<br>जजाप कोटिं भगवान् भूयस्तद्गतमानसः ॥ ३१ ॥ | दो करोड़ जप पूरा होनेपर पुनः भूतगणोंसे आवृत वृषध्वज (शंकर)-ने आकर 'मैं वर प्रदान करूँगा' ऐसा कहा। (तब नन्दीने कहा—) प्रभु शंकर! मैं पुनः तीसरी बार एक करोड़ जप करना चाहता हूँ। 'ऐसा ही हो' कहकर विश्वात्मा देव पुनः अन्तर्धान हो गये। |
| द्वितीयायां च कोट्यां वै सम्पूर्णायां वृषध्वजः।<br>आगत्य वरदोऽस्मीति प्राह भूतगणैर्वृतः ॥ ३२ ॥ | तीन करोड़ जप पूरा होनेपर भूतगणोंसे आवृत, अत्यन्त प्रसन्न-मन, देव (शंकर)-ने वहाँ आकर कहा—'मैं वर प्रदान करूँगा।' (इसपर नन्दीने कहा—) मैं पुनः आपके तेजसे सम्पन्न होकर करोड़की संख्यामें जप करना चाहता हूँ। ऐसा कहे जानेपर भगवान्ने कहा—अब तुम्हें आगे जप नहीं करना है॥ ३०-३५॥ |
| तृतीयां जप्तुमिच्छामि कोटिं भूयोऽपि शंकर।<br>तथास्त्वित्याह विश्वात्मा देवोऽप्यन्तरधीयत ॥ ३३ ॥ | तुम जरासे (वृद्धावस्थासे) मुक्त और अमर होकर सदा मेरे समीपमें स्थित रहोगे। तुम देवी (पार्वती)-के पुत्र, महागणपति (मेरे गणके अधिपति) एवं महेश्वर होओगे! तुम योगीश्वर, योगनेता, गणोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर, सभी लोकोंके अधिपति, श्रीमान् सर्वज्ञ और मेरे बलसे सम्पन्न रहोगे। मेरा दिव्य ज्ञान तुम्हें हस्तामलकवत् प्राप्त रहेगा। तुम महाप्रलयपर्यन्त (गणेश्वर एवं नन्दीके रूपमें) स्थित रहोगे और उसके बाद मेरे पदको प्राप्त करोगे॥ ३६-३८॥ |
| कोटित्रयेऽथ सम्पूर्णे देवः प्रीतमना भृशम्।<br>आगत्य वरदोऽस्मीति प्राह भूतगणैर्वृतः ॥ ३४ ॥ | ऐसा कहकर महादेव शंकरने गणोंको बुलाकर उन नन्दीश्वरको गणोंके अधिपति के पदपर अत्यन्त उपयुक्त अभिषेक-विधिसे नियुक्त कर दिया। पिनाक धारण करनेवाले शंकरने स्वयं ही मरुद्गणोंकी शुभ कन्या जो 'सुयशा' इस नामसे विख्यात थी, उसके साथ इनका विवाह कर दिया॥ ३९-४०॥ |
| जपेयं कोटिमन्यां वै भूयोऽपि तव तेजसा।<br>इत्युक्ते भगवानाह न जप्तव्यं त्वया पुनः ॥ ३५ ॥<br>अमरो जरया त्यक्तो मम पार्श्वगतः सदा।<br>महागणपतिर्देव्याः पुत्रो भव महेश्वरः ॥ ३६ ॥ | यह जप्येश्वर नामक स्थान देवाधिदेव शूली शंकरका स्थान है। यहाँ जहाँ कहीं भी शरीर त्याग करनेवाला रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ४१॥ |
| योगीश्वरो योगनेता गणानामीश्वरेश्वरः।<br>सर्वलोकाधिपः श्रीमान् सर्वज्ञो मद्बलान्वितः ॥ ३७ ॥ | |
| ज्ञानं तन्मामकं दिव्यं हस्तामलकवत् तव।<br>आभूतसम्प्लवस्थायी ततो यास्यसि मत्पदम् ॥ ३८ ॥ | |
| एतदुक्त्वा महादेवो गणानाहूय शंकरः।<br>अभिषेकेण युक्तेन नन्दीश्वरमयोजयत् ॥ ३९ ॥ | |
| उद्वाहयामास च तं स्वयमेव पिनाकधृक्।<br>मरुतां च शुभां कन्यां सुयशेति च विश्रुताम् ॥ ४० ॥ | |
| एतज्जप्येश्वरं स्थानं देवदेवस्य शूलिनः।<br>यत्र तत्र मृतो मर्त्यो रुद्रलोके महीयते ॥ ४१ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें एकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४१॥
| ४७८ | * कूर्मपुराण * |
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बयालीसवाँ अध्याय
विविध शैव-तीर्थोंके माहात्म्यका निरूपण, तीर्थोंके अधिकारी तथा तीर्थ-माहात्म्यका उपसंहार
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— ज्येष्ठेश्वरके समीपमें ही पञ्चनद नामका एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो पवित्र तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ तीन रात्रिपर्यन्त उपवासकर महेश्वरकी पूजा करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अमित तेजस्वी शंकरका एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है जो महाभैरव नामसे कहा गया है, वह महापातकोंका नाश करनेवाला है। वितस्ता नामक श्रेष्ठ नदी तीर्थोंमें परम तीर्थ है, वह सभी पापोंको हरनेवाली, पवित्र और साक्षात् पार्वतीरूप ही है॥ १-४॥ | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं ज्येष्ठेश्वरसमीपतः।<br>नाम्ना पञ्चनदं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ १ ॥ | | | त्रिरात्रोपोषितस्तत्र पूजयित्वा महेश्वरम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोके महीयते॥ २ ॥ | | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं शंकरस्यामितौजसः।<br>महाभैरवमित्युक्तं महापातकनाशनम्॥ ३ ॥ | | | तीर्थानां च परं तीर्थं वितस्ता परमा नदी।<br>सर्वपापहरा पुण्या स्वयमेव गिरीन्द्रजा॥ ४ ॥ | | | तीर्थं पञ्चतपं नाम शम्भोरमिततेजसः।<br>यत्र देवादिदेवेन चक्रार्थं पूजितो भवः॥ ५ ॥ | अमित तेजस्वी शम्भुका पञ्चतप नामका एक तीर्थ है, जहाँ देवोंके आदिदेव (विष्णु)-ने चक्र-प्राप्तिके लिये शंकरकी पूजा की थी। वहाँ (पञ्चनद तीर्थमें) किया गया पिण्डदान आदि कर्म परलोकमें अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है। वहाँ संकल्पपूर्वक नियमसे निवास करते हुए यथासमय प्राण-त्याग करनेवाला ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है॥ ५-६॥ | | पिण्डदानादिकं तत्र प्रेत्यानन्तफलप्रदम्।<br>मृतस्तत्रापि नियमाद् ब्रह्मलोके महीयते॥ ६ ॥ | | | कायावरोहणं नाम महादेवालयं शुभम्।<br>यत्र माहेश्वरा धर्मा मुनिभिः सम्प्रवर्तिताः॥ ७ ॥ | कायावरोहण नामक महादेवका एक शुभ स्थान (तीर्थ) है, जहाँ मुनियोंने माहेश्वर धर्मोंका प्रवर्तन किया था। वहाँ किया गया श्राद्ध, दान, तप, होम तथा उपवास अक्षय (फल प्रदान करनेवाला) होता है। वहाँ जो प्राण परित्याग करता है, वह रुद्रलोकमें जाता है। एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो कन्यातीर्थ इस नामसे विख्यात है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे शाश्वत लोकोंकी प्राप्ति होती है। जमदग्निके पुत्र अक्लिष्टकर्मा परशुरामका भी एक शुभ तीर्थ है। उस तीर्थ-श्रेष्ठमें स्नान करनेसे हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। महाकाल इस नामसे विख्यात तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे गाणपत्य-पद प्राप्त होता है। श्रेष्ठ नकुलीश्वर तीर्थ गुह्यस्थानोंमें भी अत्यन्त गुह्य है। वहाँ श्रीमान् भगवान् नकुलीश्वर विराजमान रहते हैं॥ ७-१२॥ | | श्राद्धं दानं तपो होम उपवासस्तथाक्षयः।<br>परित्यजति यः प्राणान् रुद्रलोकं स गच्छति॥ ८ ॥ | | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं कन्यातीर्थमिति श्रुतम्।<br>तत्र गत्वा त्यजेत् प्राणाँल्लोकान् प्राप्नोति शाश्वतान्॥ ९ ॥ | | | जामदग्न्यस्य तु शुभं रामस्याक्लिष्टकर्मणः।<br>तत्र स्नात्वा तीर्थवरे गोसहस्रफलं लभेत्॥ १० ॥ | | | महाकालमिति ख्यातं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>गत्वा प्राणान् परित्यज्य गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ ११ ॥ | | | गुह्याद् गुह्यतमं तीर्थं नकुलीश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र संनिहितः श्रीमान् भगवान् नकुलीश्वरः॥ १२ ॥ | |
- अध्याय ४२ * ४७९
| हिमवच्छिखरे रम्ये गङ्गाद्वारे सुशोभने।<br>देव्या सह महादेवो नित्यं शिष्यैश्च संवृतः ॥ १३॥<br><br>तत्र स्नात्वा महादेवं पूजयित्वा वृषध्वजम्।<br>सर्वपापैर्विमुच्येत मृतस्तज्ज्ञानमाप्नुयात् ॥ १४॥<br>अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं पुण्यतमं शुभम्।<br>भीमेश्वरमिति ख्यातं गत्वा मुञ्चति पातकम्॥ १५॥<br><br>तथान्यच्चण्डवेगायाः सम्भेदः पापनाशनः।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ १६॥<br>सर्वेषामपि चैतेषां तीर्थानां परमा पुरी।<br>नाम्ना वाराणसी दिव्या कोटिकोट्ययुताधिका ॥ १७॥<br><br>तस्याः पुरस्तान्माहात्म्यं भाषितं वो मया त्विह।<br>नान्यत्र लभ्यते मुक्तिर्योगिनाप्येकजन्मना ॥ १८॥<br>एते प्राधान्यतः प्रोक्ता देशाः पापहरा नृणाम्।<br>गत्वा संक्षालयेत् पापं जन्मान्तरशतैः कृतम् ॥ १९॥<br><br>यः स्वधर्मान् परित्यज्य तीर्थसेवां करोति हि।<br>न तस्य फलते तीर्थमिह लोके परत्र च ॥ २०॥<br>प्रायश्चित्ती च विधुरस्तथा पापचरो गृही।<br>प्रकुर्यात् तीर्थसंसेवां ये चान्ये तादृशा जनाः ॥ २१॥<br><br>सहाग्निर्वा सपत्नीको गच्छेत् तीर्थानि यत्नतः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो यथोक्तां गतिमाप्नुयात् ॥ २२॥<br><br>ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य कुर्याद् वा तीर्थसेवनम्।<br>विधाय वृत्तिं पुत्राणां भार्या तेषु निधाय च ॥ २३॥ | हिमालयके रमणीय शिखरपर स्थित अत्यन्त सुन्दर गङ्गाद्वारमें शिष्योंसे घिरे हुए महादेव देवीके साथ नित्य निवास करते हैं। वहाँ स्नानकर वृषध्वज महादेवकी पूजा करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है और मृत्युके बाद परम ज्ञान प्राप्त होता है॥ १३-१४॥<br><br>देवाधिदेव (शंकर)-का एक दूसरा शुभ तथा पवित्रतम स्थान है जो भीमेश्वर इस नामसे विख्यात है। वहाँ जानेसे व्यक्ति पापसे मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार चण्डवेगा नदीका उद्गम-स्थान भी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करने तथा जलका पान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥ १५-१६॥<br><br>इन सभी तीर्थोंमें भी श्रेष्ठ तथा दिव्य वाराणसी नामकी पुरी हजारों कोटिगुना अधिक फलप्रदा है। पूर्वमें मैंने आप लोगोंसे उसके माहात्म्यका वर्णन किया था। योगीको भी (वाराणसीके अतिरिक्त) अन्यत्र एक जन्ममें मुक्ति नहीं मिलती॥ १७-१८॥<br><br>मनुष्योंके पापोंको हरनेवाले ये प्रधान-प्रधान देश (तीर्थ) बतलाये गये हैं। यहाँ जाकर सैकड़ों जन्मोंमें किये पापोंका प्रक्षालन करना चाहिये। जो अपने धर्मोंका परित्यागकर तीर्थोंका सेवन करता है, उसके लिये तीर्थ न इस लोकमें फलदायी होते हैं न परलोकमें॥ १९-२०॥<br><br>प्रायश्चित्ती, पत्नीसे रहित विधुर पुरुष तथा जिनके द्वारा पाप हो गया है ऐसे गृहस्थ एवं इसी प्रकारके जो अन्य लोग हैं, उन्हें (पश्चात्तापपूर्वक यथाशास्त्र) तीर्थोंका सेवन करना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक अग्नि* अथवा पत्नीके साथ तीर्थोंमें जाना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त होकर यथोक्त गति (उत्तम गति) प्राप्त करता है। अथवा तीनों ऋणोंसे मुक्त होनेके बाद पुत्रोंके लिये जीविका-सम्बन्धी वृत्तिकी व्यवस्थाकर और अपनी पत्नीको उन्हें सौंपकर तीर्थका सेवन करना चाहिये॥ २१-२३॥ |
* अग्निहोत्री वानप्रस्थ-आश्रम स्वीकारकर अपनी अग्नि तथा धर्मपत्नीके साथ तीर्थमें निवास करता है।
४८० | * कूर्मपुराण *
| प्रायश्चित्तप्रसङ्गेन तीर्थमाहात्म्यमीरितम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि मुच्यते सर्वपातकैः ॥ २४॥ | प्रायश्चित्तके प्रसंगवश तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन किया गया। इसे पढ़नेवाला अथवा सुननेवाला भी सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ २४॥ |
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इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४२ ॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
चतुर्विध प्रलयका प्रतिपादन, नैमित्तिक प्रलयका विशेष वर्णन, विष्णुद्वारा अपने माहात्म्यका निरूपण
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
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| एतदाकर्ण्य विज्ञानं नारायणमुखेरितम्।<br>कूर्मरूपधरं देवं पप्रच्छुर्मुनयः प्रभुम् ॥ १॥ | नारायणके मुखसे कहे गये इस विशिष्ट ज्ञानको सुनकर मुनियोंने कूर्मरूप धारण करनेवाले प्रभु देवसे पूछा—॥ १॥ |
| मुनय ऊचुः | मुनियोंने कहा— |
| कथिता भवता धर्मा मोक्षज्ञानं सविस्तरम्।<br>लोकानां सर्गविस्तारं वंशमन्वन्तराणि च ॥ २॥ | (सूतजी!) आपने विस्तारपूर्वक धर्म, मोक्ष, ज्ञान, लोकोंकी सृष्टिके विस्तार, वंश और मन्वन्तरोंको हमें बतलाया। माधव! भूतभव्येश! जैसा आपने पूर्वमें (पुराण-लक्षणके प्रसंगसे प्रतिसर्गके विषयमें) बतलाया है, तदनुसार अब हमें प्राणियोंके प्रतिसर्गके विषयमें बतलायें ॥ २-३॥ |
| प्रतिसर्गमिदानीं नो वक्तुमर्हसि माधव।<br>भूतानां भूतभव्येश यथा पूर्वं त्वयोदितम् ॥ ३॥ | |
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
| श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् कूर्मरूपधृक्।<br>व्याजहार महायोगी भूतानां प्रतिसंचरम् ॥ ४॥ | तब उनके उस वचनको सुनकर कूर्मरूपधारी महायोगी भगवान्ने भूतोंके प्रतिसंचर अर्थात् प्रलयका वर्णन किया ॥ ४॥ |
| कूर्म उवाच | कूर्म बोले— |
| नित्यो नैमित्तिकश्चैव प्राकृतात्यन्तिकौ तथा।<br>चतुर्धायं पुराणेऽस्मिन् प्रोच्यते प्रतिसंचरः ॥ ५॥ | इस पुराणमें नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत तथा आत्यन्तिक—इस प्रकारसे चार प्रकारका प्रतिसंचर (प्रलय) कहा गया है। लोकमें यहाँ जो प्राणियोंका नित्य क्षय दिखलायी देता है, उसे मुनियोंने नित्य-प्रलयके नामसे कहा है। कल्पान्तमें ब्रह्मा (की निद्रा)-के निमित्तसे होनेवाले तीनों लोकोंके प्रतिसर्ग—प्रलयको विद्वानोंने (नैमित्तिक प्रलय) कहा है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका जो क्षय हो जाता है, उसे कालचिन्तकोंने प्राकृत प्रतिसर्ग कहा है और ज्ञानद्वारा परमात्मामें होनेवाले योगियोंके आत्यन्तिक प्रलयको* कालचिन्तक द्विज आत्यन्तिक प्रतिसर्ग (प्रलय) कहते हैं ॥ ५-९॥ |
| योऽयं संदृश्यते नित्यं लोके भूतक्षयस्त्विह।<br>नित्यः संकीर्त्यते नाम्ना मुनिभिः प्रतिसंचरः ॥ ६॥ | |
| ब्राह्मो नैमित्तिको नाम कल्पान्ते यो भविष्यति।<br>त्रैलोक्यस्यास्य कथितः प्रतिसर्गो मनीषिभिः ॥ ७॥ | |
| महदाद्यं विशेषान्तं यदा संयाति संक्षयम्।<br>प्राकृतः प्रतिसर्गोऽयं प्रोच्यते कालचिन्तकैः ॥ ८॥ | |
| ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।<br>प्रलयः प्रतिसर्गोऽयं कालचिन्तापरैर्द्विजैः ॥ ९॥ |
* यहाँ 'प्रलय' का तात्पर्य परमात्मतत्त्वके साथ एकरूपतामें है।
- अध्याय ४३ * / ४८१
| आत्यन्तिकश्च कथितः प्रलयोऽत्र ससाधनः ।<br>नैमित्तिकमिदानीं वः कथयिष्ये समासतः ॥ १० ॥ | यहाँ साधनसहित आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मोक्षका वर्णन किया गया है। अब मैं संक्षेपमें आप लोगोंको नैमित्तिक प्रलयके विषयमें बतलाऊँगा ॥ १० ॥ |
| चतुर्युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे।<br>स्वात्मसंस्थाः प्रजाः कर्तुं प्रतिपेदे प्रजापतिः ॥ ११ ॥ | एक हजार चतुर्युग (सत्य-त्रेता-द्वापर तथा कलियुग)-के अन्तमें प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रजापति समस्त प्रजाको आत्मस्थ करनेकी इच्छा करते हैं। इसके बाद सौ वर्षोंतक तीव्र अनावृष्टि होती है, वह भूतों एवं सभी प्राणियोंका विनाश करनेवाली तथा अत्यन्त भयंकर होती है। तदनन्तर भूमिपर जो अल्पसार अर्थात् निर्बल प्राणी होते हैं, सबसे पहले उनका लय होता है और वे भूमिमें मिल जाते हैं। तब सात रश्मियोंवाले रथपर आरूढ़ होकर सूर्य उदित होते हैं। उनकी किरणें असह्य हो जाती हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जल पीने लगते हैं। उनकी वे सातों रश्मियाँ महासमुद्रमें स्थित जलको पीती हैं। उस आहारसे उद्दीप्त होकर वे (सात) रश्मियाँ पुनः सात सूर्य बन जाती हैं। तदनन्तर सूर्यरूप वे सातों रश्मियाँ चारों दिशाओं तथा सम्पूर्ण इस चतुर्लोकको अग्निके समान दग्ध करने लगती हैं ॥ ११–१६ ॥ |
| ततो भवत्यनावृष्टिस्तीव्रा सा शतवार्षिकी।<br>भूतक्षयकरी घोरा सर्वभूतक्षयंकारी ॥ १२ ॥ | |
| ततो यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले।<br>तानि चाग्रे प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥ १३ ॥ | |
| सप्तरश्मिरथो भूत्वा समुत्तिष्ठन् दिवाकरः।<br>असह्यरश्मिर्भवति पिबन्नम्भो गभस्तिभिः ॥ १४ ॥ | |
| तस्य ते रश्मयः सप्त पिबन्त्यम्बु महार्णवे।<br>तेनाहारेण ता दीप्ताः सूर्याः सप्त भवन्त्युत ॥ १५ ॥ | |
| ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्या भूत्वा चतुर्दिशम्।<br>चतुर्लोकमिदं सर्वं दहन्ति शिखिनस्तथा ॥ १६ ॥ | |
| व्याप्नुवन्तश्च ते विप्रास्तूर्ध्वं चाधश्च रश्मिभिः।<br>दीप्यन्ते भास्कराः सप्त युगान्ताग्निप्रतापिनः ॥ १७ ॥ | ब्राह्मणो ! प्रलयकालीन अग्निके तेजसे युक्त वे सातों सूर्य अपनी-अपनी रश्मियोंके द्वारा ऊर्ध्व तथा अधोभागको व्याप्तकर अतिशय उद्दीप्त हो जाते हैं। जलसे प्रदीप्त अनेक सहस्र रश्मियोंवाले वे सूर्य आकाशको आवृत्तकर स्थित रहते हैं और पृथिवीको जलाने लगते हैं। तदनन्तर उनके तेजसे जलती हुई पृथ्वी पर्वतों, नदियों, समुद्रों तथा द्वीपोंके साथ स्नेह (द्रवभाव)-से रहित हो जाती है अर्थात् अत्यन्त सूख जाती है। सतत प्रदीप्त रहनेवाली वे रश्मियाँ ऊपर-नीचे तथा आड़े-तिरछे सभी ओर व्याप्त हो जाती हैं ॥ १७–२० ॥ |
| ते सूर्या वारिणा दीप्ता बहुसाहस्ररश्मयः।<br>खं समावृत्य तिष्ठन्ति निर्दहन्तो वसुंधराम् ॥ १८ ॥ | |
| ततस्तेषां प्रतापेन दह्यमाना वसुंधरा।<br>साद्रिनद्यर्णवद्वीपा निस्नेहा समपद्यत ॥ १९ ॥ | |
| दीप्ताभिः संतताभिश्च रश्मिभिर्वै समन्ततः।<br>अधश्चोर्ध्वं च लग्नाभिस्तिर्यक् चैव समावृतम् ॥ २० ॥ | |
| सूर्याग्निना प्रमृष्टानां संसृष्टानां परस्परम्।<br>एकत्वमुपयातानामेकज्वालं भवत्युत ॥ २१ ॥ | सूर्यरूप अग्निके द्वारा प्रकृष्टरूपसे शोधित और परस्पर संसृष्ट संसारके समस्त पदार्थ एक ज्वालाके रूपमें एकाकार हो जाते हैं। सभी लोकोंको नष्ट करनेवाली वह सूर्यरूप अग्नि एक मण्डलके रूपमें होकर अपने तेजसे इस सम्पूर्ण चतुर्लोकको दग्ध करने लगती है ॥ २१-२२ ॥ |
| सर्वलोकप्रणाशश्च सोऽग्निर्भूत्वा सुकुण्डली।<br>चतुर्लोकमिदं सर्वं निर्दहत्यात्मतेजसा ॥ २२ ॥ |
| ४८२ | * कूर्मपुराण * |
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| ततः प्रलीने सर्वस्मिञ्जङ्गमे स्थावरे तथा।<br>निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिः कूर्मपृष्ठा प्रकाशते॥ २३॥ | तब सम्पूर्ण स्थावर एवं जंगम पदार्थोंके लीन हो जानेपर वृक्षों तथा तृणोंसे रहित भूमि कछुएके पीठके समान दिखलायी देती है। (किरणोंसे) व्याप्त समस्त जगत् अम्बरीष (भड़-भूजेकी कड़ाही)-के सदृश वर्णवाला दिखलायी देता है। उन ज्वालाओंके द्वारा सभी कुछ पूर्णरूपसे प्रज्वलित होने लगता है॥ २३-२४॥ |
| अम्बरीषमिवाभाति सर्वमापूरितं जगत्।<br>सर्वमेव तदर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते पुनः॥ २४॥<br>पाताले यानि सत्त्वानि महोदधिगतानि च।<br>ततस्तानि प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च॥ २५॥<br><br>द्वीपांश्च पर्वतांश्चैव वर्षाण्यथ महोदधीन्।<br>तान् सर्वान् भस्मसात् कृत्वा सप्तात्मा पावकः प्रभुः॥ २६॥<br><br>समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वशः।<br>पिबन्नपः समिद्धोऽग्निः पृथिवीमाश्रितो ज्वलन्॥ २७॥ | तदनन्तर पातालमें तथा महासमुद्रोंमें जो प्राणी रहते हैं, उनका लय होता है और वे सभी भूमिके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं। सात (सूर्यों)-के रूपमें प्रदीप्त हो रहे प्रभु पावक (अग्निदेव) उन सभी द्वीपों, पर्वतों, वर्षों तथा महासमुद्रोंको भस्मसात् कर देते हैं। समुद्रों, नदियों तथा पातालोंके सम्पूर्ण जलका शोषण करती हुई प्रदीप्त अग्नि (सूर्यकी ज्वाला) पृथ्वीपर प्रज्वलित होने लगती है अर्थात् पृथ्वीको जलाने लगती है॥ २५-२७॥ |
| ततः संवर्तकः शैलानतिक्रम्य महांस्तथा।<br>लोकान् दहति दीप्तात्मा रुद्रतेजोविजृम्भितः॥ २८॥<br><br>स दग्ध्वा पृथिवीं देवो रसातलमशोषयत्।<br>अधस्तात् पृथिवीं दग्ध्वा दिवमूर्ध्वं दहिष्यति॥ २९॥<br><br>योजनानां शतानीह सहस्राण्ययुतानि च।<br>उत्तिष्ठन्ति शिखास्तस्य वह्नेः संवर्तकस्य तु॥ ३०॥ | तदनन्तर महान् संवर्तक नामक अग्नि पर्वतोंका अतिक्रमण करते हुए रुद्रके तेजसे पुष्ट होनेके कारण दीप्त आत्मावाला होकर लोकोंको जलाने लगती है। (सम्पूर्ण) पृथ्वीको दग्धकर वे अग्निदेव रसातलको शोषित करते हैं। पृथ्वीके नीचेके भागको जलाकर ऊपरके द्युलोकको जलाने लगते हैं। उस संवर्तक अग्निकी शिखाएँ सैकड़ों, हजारों तथा दस हजार योजन ऊपरतक उठने लगती हैं॥ २८-३०॥ |
| गन्धर्वांश्च पिशाचांश्च सयक्षोरगराक्षसान्।<br>तदा दहत्यसौ दीप्तः कालरुद्रप्रचोदितः॥ ३१॥<br><br>भूर्लोकं च भुवर्लोकं स्वर्लोकं च तथा महः।<br>दहेदशेषं कालाग्निः कालो विश्वतनुः स्वयम्॥ ३२॥<br><br>व्याप्तेष्वेतेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना।<br>तत् तेजः समनुप्राप्य कृत्स्नं जगदिदं शनैः।<br>अयोगुडनिभं सर्वं तदा चैकं प्रकाशते॥ ३३॥ | तब कालरुद्रद्वारा प्रेरित होकर यह उद्दीप्त अग्नि गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंको जलाती है। कालाग्निस্বরূপ विश्वात्मा स्वयं काल भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोकको सम्पूर्णरूपसे जला देता है। इन लोकोंमें तिरछे तथा ऊँचे सब जगह अग्निके द्वारा व्याप्त कर दिये जानेपर यह सम्पूर्ण जगत् उस तेजसे धीरे-धीरे पूरित होकर (जलते हुए) एक अयःपिण्ड (लोहपिण्ड)-के समान प्रकाशित होने लगता है॥ ३१-३३॥ |
| ततो गजकुलोन्नादास्तडिद्भिः समलंकृताः।<br>उत्तिष्ठन्ति तदा व्योम्नि घोराः संवर्तका घनाः॥ ३४॥ | तदनन्तर हाथियोंके समूहके समान नाद करनेवाले विद्युत्से अलंकृत संवर्तक नामक भयंकर मेघ आकाशमें प्रकट होते हैं॥ ३४॥ |
- अध्याय ४३ * | ४८३ ---|---
| केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः ।<br>धूम्रवर्णास्तथा केचित् केचित् पीताः पयोधराः ॥ ३५ ॥<br><br>केचिद् रासभवर्णास्तु लाक्षारसनिभास्तथा ।<br>शङ्खकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यञ्जननिभाः परे ॥ ३६ ॥<br><br>मनःशिलाभास्त्वन्ये च कपोतसदृशाः परे ।<br>इन्द्रगोपनिभाः केचिद्धरितालनिभास्तथा ।<br>इन्द्रचापनिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ति घना दिवि ॥ ३७ ॥<br>केचित् पर्वतसंकाशाः केचिद् गजकुलोपमाः ।<br>कूटाङ्गारनिभाश्चान्ये केचिन्मीनकुलोद्वहाः ।<br>बहुरूपा घोररूपा घोरस्वरनिनादिनः ॥ ३८ ॥<br><br>तदा जलधराः सर्वे पूरयन्ति नभःस्थलम् ।<br>ततस्ते जलदा घोरा राविणो भास्करात्मजाः ।<br>सप्तधा संवृतात्मानस्तमग्निं शमयन्त्युत ॥ ३९ ॥<br>ततस्ते जलदा वर्षं मुञ्चन्तीह महौघवत् ।<br>सुघोरमशिवं सर्वं नाशयन्ति च पावकम् ॥ ४० ॥<br><br>प्रवृष्टे च तदात्यर्थमम्भसा पूर्यते जगत् ।<br>अद्भिस्तेजोऽभिभूतत्वात् तदग्निः प्रविशत्यपः ॥ ४१ ॥<br>नष्टे चाग्नौ वर्षशतैः पयोदाः क्षयसम्भवाः ।<br>प्लावयन्तोऽथ भुवनं महाजलपरिस्त्रवैः ॥ ४२ ॥<br><br>धाराभिः पूरयन्तीदं चोद्यमानाः स्वयम्भुवा ।<br>अत्यन्तसलिलौघैश्च वेला इव महोदधिः ॥ ४३ ॥<br>साद्रिद्वीपा तथा पृथ्वी जलैः संच्छाद्यते शनैः ।<br>आदित्यरश्मिभिः पीतं जलमभ्रेषु तिष्ठति ।<br>पुनः पतति तद् भूमौ पूर्यन्ते तेन चार्णवाः ॥ ४४ ॥<br><br>ततः समुद्राः स्वां वेलामतिक्रान्तास्तु कृत्स्नशः ।<br>पर्वताश्च विलीयन्ते मही चाप्सु निमज्जति ॥ ४५ ॥ | उन मेघोंमेंसे कुछ नीलकमलके समान श्यामवर्णके, कुछ कुमुदके समान श्वेत वर्णके, कुछ धूम्रवर्णके, कुछ पीतवर्णके, कुछ रासभ (धूसर) वर्णके, कुछ लाक्षारसके समान, कुछ दूसरे शंख तथा कुन्द (पुष्प)-के समान रंगवाले, कुछ जाती पुष्प (चमेली)-के तथा अञ्जन (काजल)-के समान, कुछ मनःशिला (मैनसिल)-के समान रंगवाले और कुछ दूसरे कपोतके समान वर्णवाले, कुछ इन्द्रगोप (बीरबहूटी कीट)-के समान, कुछ हरतालके समान और कुछ इन्द्रधनुषके समान वर्णवाले मेघ आकाशमें प्रकट होते हैं ॥ ३५-३७ ॥<br><br>कुछ मेघ पर्वतके तुल्य, कुछ हाथियोंके समूहके समान, कुछ कूटाङ्गारके समान और कुछ मछलियोंके समूहके आकारके होते हैं। वे मेघ अनेक रूप धारण करनेवाले, भयंकर आकारवाले तथा घोर गर्जना-जैसी ध्वनि करनेवाले होते हैं। उस समय वे सभी बादल आकाशको व्याप्त कर लेते हैं, तदनन्तर भास्करसे उत्पन्न गर्जना करनेवाले वे सात प्रकारके भयंकर बादल एकत्रित होकर उस अग्निको शान्त करते हैं ॥ ३८-३९ ॥<br><br>तदुपरान्त वे मेघ महान् बाढ़के समान जलकी वर्षा करते हैं और अत्यन्त भयंकर, अकल्याणकारी उस सम्पूर्ण अग्निको नष्ट कर देते हैं। अतिशय वृष्टि होनेके कारण जगत् जलसे परिपूर्ण हो जाता है। जलके द्वारा तेज (अग्नि)-के अभिभूत होनेके कारण उस समय वह अग्नि जलमें प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४०-४१ ॥<br><br>इस तरह अग्निके शान्त हो जानेपर स्वयम्भू-ब्रह्माके द्वारा प्रेरित मेघ अत्यधिक जलके प्रवाहोंसे समस्त भुवनको आप्लावित करते हुए वैसे ही अपनी जलधाराओंसे इस भुवनको परिपूर्ण कर देते हैं, जैसे समुद्र अत्यधिक जलोंके प्रवाहोंसे अपने तटोंको आप्लावित कर देता है। ये मेघ इतने जलसे भरपूर हैं कि इनका क्षय दिव्य सैकड़ों वर्षोंमें कदाचित् सम्भव है ॥ ४२-४३ ॥<br><br>धीरे-धीरे पर्वतों तथा द्वीपोंवाली पृथ्वी जलसे ढक जाती है और सूर्यकी रश्मियोंद्वारा गृहीत वह जल बादलोंमें स्थित रहता है। पुनः वह जल पृथ्वीपर गिरता है और उससे समुद्र इतने आपूरित हो जाते हैं कि सर्वत्र अपने तटोंका अतिक्रमण कर वे जलमय हो जाते हैं, पर्वत जलमें विलीन हो जाते हैं और पृथ्वी भी जलमें डूब जाती है ॥ ४४-४५ ॥ |
४८४ * कूर्मपुराण *
| तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>योगनिद्रां समास्थाय शेते देवः प्रजापतिः॥ ४६॥ | उस भयंकर एकार्णव (महासमुद्र)-में स्थावर-जंगम सभीके लीन हो जानेपर योगनिद्राका आश्रय ग्रहणकर देव प्रजापति शयन करते हैं॥ ४६॥ |
| चतुर्युगसहस्रान्तं कल्पमाहुर्महर्षयः।<br>वाराहो वर्तते कल्पो यस्य विस्तार ईरितः॥ ४७॥ | महर्षियोंने एक हजार चतुर्युगीका एक कल्प कहा है। अभी जिसका विस्तार बतलाया गया है, वह वाराह कल्प इस समय चल रहा है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवात्मक असंख्य कल्प हैं। पुराणोंमें काल-चिन्तक मुनियोंने उनका वर्णन किया है। सात्त्विक (सत्त्वप्रधान) कल्पोंमें हरिका अधिक माहात्म्य होता है। तामस (तमःप्रधान) कल्पोंमें शंकरका और राजस (रजः-प्रधान) कल्पोंमें प्रजापति ब्रह्माका अधिक माहात्म्य होता है। इस समय प्रवर्तमान वाराह कल्प सात्त्विक कल्प है। अन्य भी सात्त्विक कल्प हैं, उनमें मुझे कूर्मभगवान्का आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥ ४७–५०॥ |
| असंख्यातास्तथा कल्पा ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाः।<br>कथिता हि पुराणेषु मुनिभिः कालचिन्तकैः॥ ४८॥ | |
| सात्त्विकेष्वथ कल्पेषु माहात्म्यमधिकं हरेः।<br>तामसेषु हरस्योक्तं राजसेषु प्रजापतेः॥ ४९॥ | |
| योऽयं प्रवर्तते कल्पो वाराहः सात्त्विको मतः।<br>अन्ये च सात्त्विकाः कल्पा मम तेषु परिग्रहः॥ ५०॥ | |
| ध्यानं तपस्तथा ज्ञानं लब्ध्वा तेष्वेव योगिनः।<br>आराध्य गिरिशं मां च यान्ति तत् परमं पदम्॥ ५१॥ | उन कल्पोंमें योगीजन ध्यान, तप तथा ज्ञान प्राप्तकर उनके द्वारा शंकरकी तथा मेरी आराधना करके परमपदको प्राप्त करते हैं। जगत्के एकार्णव हो जानेपर मायाका अधिष्ठाता मैं सत्त्वका आश्रय ग्रहणकर मायामय योगनिद्रामें स्थित हो जाता हूँ। उस समय जनलोकमें विद्यमान महात्मा, महर्षिगण तपस्या तथा योगरूपी नेत्रोंके द्वारा निद्रालीन कालस्वरूप मेरा दर्शन करते हैं॥ ५१–५३॥ |
| सोऽहं सत्त्वं समास्थाय मायी मायामयीं स्वयम्।<br>एकार्णवे जगत्यस्मिन् योगनिद्रां व्रजामि तु॥ ५२॥ | |
| मां पश्यन्ति महात्मानः सुप्तं कालं महर्षयः।<br>जनलोके वर्तमानास्तपसा योगचक्षुषा॥ ५३॥ | |
| अहं पुराणपुरुषो भूर्भुवः प्रभवो विभुः।<br>सहस्रचरणः श्रीमान् सहस्रांशुः सहस्रदृक्॥ ५४॥ | मैं पुराणपुरुष, भूर्भुवः, प्रभव तथा विभु हूँ, मैं हजारों चरणोंवाला, श्रीसम्पन्न, हजारों किरणोंवाला तथा हजारों नेत्रोंवाला हूँ। मैं ही मन्त्र, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, कुश एवं समिधा हूँ और प्रोक्षणी, स्रुव (यज्ञीय पात्र) सोम तथा घृत भी मैं ही हूँ। मैं ही संवर्तक (अग्नि), महान् आत्मा, पवित्र तथा परम यश हूँ। वेद-वेद्य (जिसे जाना जाता है), प्रभु, गोप्ता (रक्षक), गोपति (इन्द्रियों एवं वाणीके स्वामी) और ब्रह्माका मुख (आविर्भावस्थल) भी मैं ही हूँ। मैं अनन्त, तारक, योगी, गति, गतिशीलोंमें श्रेष्ठ, हंस, प्राण, कपिल, विश्वमूर्ति, सनातन, क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, काल, जगद्बीज और अमृतरूप हूँ। मैं ही माता, पिता तथा महादेव हूँ, मुझसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है॥ ५४–५८॥ |
| मन्त्रोऽग्निर्ब्राह्मणा गावः कुशाश्च समिधो ह्यहम्।<br>प्रोक्षणी च स्रुवश्चैव सोमो घृतमथास्यहम्॥ ५५॥ | |
| संवर्तको महानात्मा पवित्रं परमं यशः।<br>वेदो वेद्यं प्रभुर्गोप्ता गोपतिर्ब्रह्मणो मुखम्॥ ५६॥ | |
| अनन्तस्तारको योगी गतिर्गतिमतां वरः।<br>हंसः प्राणोऽथ कपिलो विश्वमूर्तिः सनातनः॥ ५७॥ | |
| क्षेत्रज्ञः प्रकृतिः कालो जगद्बीजमथामृतम्।<br>माता पिता महादेवो मत्तो ह्यान्यन्न विद्यते॥ ५८॥ |
- अध्याय ४४ * ४८५
आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता नारायणः पुरुषो योगमूर्तिः। मां पश्यन्ति यतयो योगनिष्ठा ज्ञात्वात्मानममृतत्वं व्रजन्ति॥ ५९॥
मैं आदित्यके समान वर्णवाला, भुवनोंका रक्षक, नारायण पुरुष तथा योगमूर्ति हूँ। योगपरायण यतिजन मेरा दर्शन करते हैं और अपनी आत्माका ज्ञान प्राप्तकर अमृतत्व (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं॥ ५९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
प्राकृत प्रलयका वर्णन, शिवके विविध रूपों और विविध शक्तियोंका वर्णन, शिवकी आराधनाकी विधि, मुनियोंद्वारा कूर्मरूपधारी विष्णुकी स्तुति, कूर्मपुराणकी विषयानुक्रमणिकाका वर्णन, कूर्मपुराणकी फलश्रुति तथा इस पुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्पराका प्रतिपादन, महर्षि व्यास तथा नारायणकी वन्दनाके साथ पुराणकी पूर्णताका कथन
कूर्म उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिसर्गमनुत्तमम्। प्राकृतं हि समासेन शृणुध्वं गदतो मम॥ १॥
गते परार्द्धद्वितये कालो लोकप्रकालनः। कालाग्निर्भस्मसात् कर्तुं करोति निखिलं मतिम्॥ २॥
स्वात्मन्यात्मानमावेश्य भूत्वा देवो महेश्वरः। दहेदशेषं ब्रह्माण्डं सदेवासुरमानुषम्॥ ३॥
तमाविश्य महादेवो भगवान्नीललोहितः। करोति लोकसंहारं भीषणं रूपमाश्रितः॥ ४॥
प्रविश्य मण्डलं सौरं कृत्वासौ बहुधा पुनः। निर्दहत्यखिलं लोकं सप्तसप्तिस्वरूपधृक्॥ ५॥
स दग्ध्वा सकलं सत्त्वमस्त्रं ब्रह्मशिरो महत्। देवतानां शरीरेषु क्षिपत्यखिलदाहकम्॥ ६॥
दग्धेष्वशेषदेवेषु देवी गिरिवरात्मजा। एका सा साक्षिणी शम्भोस्तिष्ठते वैदिकी श्रुतिः॥ ७॥
**(भगवान्) कूर्मने कहा—**इसके अनन्तर अब मैं उत्तम प्राकृत प्रलयका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। उसे आप सब श्रवण करें॥ १॥
द्वितीय* परार्ध (अर्थात् ब्रह्माजीकी परमायु—दिव्य १०० वर्षका समय)-के बीत जानेपर समस्त लोकोंका लय करनेवाला कालरूप कालाग्नि सम्पूर्ण जगत्को भस्मसात् करनेका निश्चय करता है। महेश्वर देव अपनी आत्मामें आत्मा (जीवात्मा)-को आविष्टकर देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध करते हैं। भगवान् नीललोहित महादेव भीषण रूप धारणकर उस अग्निमें प्रविष्ट होकर अर्थात् महाकालरूप होकर लोकका संहार करते हैं। सौर-मण्डलमें प्रविष्ट होकर उसे पुनः अनेक रूपवाला बनाकर सात-सात किरणोंवाले सूर्यरूपधारी वे महेश्वर सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करते हैं॥ २—५॥
समस्त सत्त्व (पदार्थों)-को दग्ध करके वे महेश्वर देवताओंके शरीरपर सभीको जलानेमें समर्थ ब्रह्मशिर नामक महान् अस्त्रको छोड़ते हैं। सम्पूर्ण देवताओंके दग्ध हो जानेपर श्रेष्ठ पर्वत (हिमवान्)-की पुत्री देवी पार्वती अकेली ही साक्षीके रूपमें उन (शिव)-के पास स्थित रहती हैं—ऐसी वैदिकी श्रुति है॥ ६-७॥
* ब्रह्माकी आयु दिव्य सौ वर्षकी है। इस कालको 'पर' कहते हैं। इसका आधा भाग 'परार्ध' होता है। (कूर्म० पूर्वविभाग अ० ५) शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत।
| ४८६ | * कूर्मपुराण * |
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| शिरःकपालैर्देवानां कृतस्रग्वरभूषणः।<br>आदित्यचन्द्रादिगणैः पूरयन् व्योममण्डलम्॥ ८ ॥<br>सहस्रनयनो देवः सहस्राकृतिरीश्वरः।<br>सहस्रहस्तचरणः सहस्रार्चिर्महाभुजः॥ ९ ॥<br>दंष्ट्राकरालवदनः प्रदीप्तानललोचनः।<br>त्रिशूली कृत्तिवसनो योगमैश्वरमास्थितः॥ १०॥<br>पीत्वा तत्परमानन्दं प्रभूतममृतं स्वयम्।<br>करोति ताण्डवं देवीमालोक्य परमेश्वरः॥ ११ ॥<br>पीत्वा नृत्तामृतं देवी भर्तुः परममङ्गला।<br>योगमास्थाय देवस्य देहमायाति शूलिनः॥ १२॥<br><br>संत्यक्त्वा ताण्डवरसं स्वेच्छयैव पिनाकधृक्।<br>ज्योतिः स्वभावं भगवान् दग्ध्वा ब्रह्माण्डमण्डलम्॥ १३॥<br><br>संस्थितेष्वथ देवेषु ब्रह्मविष्णुपिनाकिषु।<br>गुणैरशेषैः पृथिवी विलयं याति वारिषु॥ १४॥<br><br>सवारितत्त्वं सगुणं ग्रसते हव्यवाहनः।<br>तेजस्तु गुणसंयुक्तं वायौ संयाति संक्षयम्॥ १५॥<br>आकाशे सगुणो वायुः प्रलयं याति विश्वभृत्।<br>भूतादौ च तथाकाशं लीयते गुणसंयुक्तम्॥ १६ ॥<br><br>इन्द्रियाणि च सर्वाणि तैजसे यान्ति संक्षयम्।<br>वैकारिके देवगणाः प्रलयं यान्ति सत्तमाः॥ १७॥<br><br>वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चेति सत्तमाः।<br>त्रिविधोऽयमहंकारो महति प्रलयं व्रजेत्॥ १८॥<br>महान्त्मेभिः सहितं ब्रह्माणमतितेजसम्।<br>अव्यक्तं जगतो योनिः संहरेदेकमव्ययम्॥ १९॥<br><br>एवं संहृत्य भूतानि तत्त्वानि च महेश्वरः।<br>वियोजयति चान्योन्यं प्रधानं पुरुषं परम्॥ २०॥ | देवताओंके मस्तकके कपालसे निर्मित मालाको आभूषणरूपमें धारण करनेवाले, हजारों नेत्रवाले, हजारों आकृतिवाले, हजारों हाथ-पैरवाले, हजारों किरणोंवाले, भीषण दंष्ट्रा (दाढ़)-के कारण भयंकर मुखोंवाले, प्रदीप्त अग्निके समान नेत्रोंवाले, त्रिशूली चर्माम्बरधारी वे देव महेश्वर अनन्त सूर्य एवं चन्द्रके समूहोंसे समस्त आकाशमण्डलको व्याप्तकर ऐश्वर्ययोगमें स्थित हो जाते हैं और भगवती पार्वतीको देखते हुए परमानन्दमय अमृतका पानकर स्वयं ताण्डव नृत्य करते हैं॥ ८-११॥<br><br>पतिके नृत्यरूपी अमृतका पानकर परम कल्याणरूपिणी देवी (पार्वती) योगका आश्रय लेते हुए त्रिशूली शिवके शरीरमें प्रविष्ट हो जाती हैं। ब्रह्माण्डमण्डलको दग्ध करनेके अनन्तर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् (शिव) अपनी इच्छासे ही ताण्डव (-के आनन्द)-रसका परित्यागकर ज्योतिःस्वरूप अपने भावमें स्थित हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा पिनाकी शिवके इस प्रकार स्थित हो जानेपर अपने सम्पूर्ण गुणोंके साथ पृथ्वी जलमें विलीन हो जाती है। अपने गुणोंसहित उस जल-तत्त्वको हव्यवाहन अग्नि ग्रहण कर लेता है और अपने गुणोंसहित वह तेज (अग्नि) वायुमें विलीन हो जाता है॥ १२-१५॥<br><br>विश्वका भरण-पोषण करनेवाला वायु अपने गुणोंके साथ आकाश (तत्त्व)-में लीन हो जाता है और अपने गुणसहित वह आकाश भूतादि अर्थात् तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। सत्तमो! सभी इन्द्रियाँ तैजस अर्थात् राजस अहंकारमें विलीन हो जाती हैं और (इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवगण वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहंकारमें प्रलीन हो जाते हैं। श्रेष्ठो! वैकारिक, तैजस तथा भूतादि (तामस) नामक तीन प्रकारका अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ १६-१८॥<br><br>यह महत्तत्त्व पृथ्वीसे अहंकारपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका मूल होनेके कारण एक प्रकारसे अमित तेजस्वी ब्रह्मा ही हैं। अतः ब्रह्मारूप तथा अपनेमें पृथ्वी आदि समस्त तत्त्वोंको समाविष्ट कर लेनेवाले इस अद्वितीय महत्तत्त्वका संहार वह प्रकृति कर देती है, जो अव्यक्त है एवं समस्त जगत्का मूल कारण है। इस प्रकार (पञ्च) भूतों तथा तत्त्वोंका संहारकर महेश्वर प्रधान-प्रकृति और पुरुषको परस्पर वियुक्त कर देते हैं॥ १९-२०॥ |
- अध्याय ४४ * | ४८७ ---|---
प्रधानपुंसोरजयोरेष संहार ईरितः।
महेश्वरेच्छाजनितो न स्वयं विद्यते लयः॥ २१॥
गुणसाम्यं तदव्यक्तं प्रकृतिः परिगीयते।
प्रधानं जगतो योनिर्मायातत्त्वमचेतनम्॥ २२॥
कूटस्थश्चिन्मयो ह्यात्मा केवलः पञ्चविंशकः।
गीयते मुनिभिः साक्षी महानेकः पितामहः ॥ २३॥
एवं संहारकरणी शक्तिर्माहेश्वरी ध्रुवा।
प्रधानाद्यं विशेषान्तं दहेद् रुद्र इति श्रुतिः॥ २४॥
योगिनामथ सर्वेषां ज्ञानविन्यस्तचेतसाम्।
आत्यन्तिकं चैव लयं विदधातीह शंकरः॥ २५॥
इत्येष भगवान् रुद्रः संहारं कुरुते वशी।
स्थापिका मोहनी शक्तिर्नारायण इति श्रुतिः॥ २६॥
हिरण्यगर्भो भगवान् जगत् सदसदात्मकम्।
सृजेदशेषं प्रकृतेस्तन्मयः पञ्चविंशकः॥ २७॥
सर्वज्ञाः सर्वगाः शान्ताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः।
शक्तयो ब्रह्मविष्ण्वीशा भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः ॥ २८॥
सर्वेश्वराः सर्ववन्द्याः शाश्वतानन्तभोगिनः।
एकमेवाक्षरं तत्त्वं पुंप्रधानेश्वरात्मकम् ॥ २९॥
अन्याश्च शक्तयो दिव्याः सन्ति तत्र सहस्रशः।
इज्यन्ते विविधैर्यज्ञैः शक्रादित्यादयोऽमराः ॥ ३०॥
एकैकस्य सहस्राणि देहानां वै शतानि च।
कथ्यन्ते चैव माहात्म्याच्छक्तिरेकैव निर्गुणा ॥ ३१॥ | इस (प्रकृति-पुरुष वियोगको) ही अनादि प्रकृति और पुरुषका संहार कहा जाता है (क्योंकि सांख्यशास्त्रके अनुसार इन दोनोंके नित्य होनेसे इनका लय कहीं नहीं हो सकता)। यह (वियोगरूप) लय भी महेश्वरकी इच्छासे ही होनेवाला है, स्वयं नहीं हो सकता। गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है और अव्यक्त है। जगत्का मूल कारण प्रधान है। वह अचेतन है, इसे मायाके रूपमें समझना चाहिये॥ २१-२२॥
कूटस्थ, अद्वितीय पचीसवाँ तत्त्वरूप आत्मा चिन्मय-चेतन होता है। मुनिगण इसे साक्षी, महान् तथा पितामह कहते हैं। इतनेसे यह स्पष्ट है कि महेश्वरकी शाश्वत शक्ति ही संहार करती है। श्रुतिका भी यही कथन है कि रुद्र प्रधान अर्थात् प्रकृतिसे विशेष अर्थात् स्थूल-भूतपर्यन्त सभी तत्त्वोंको दग्ध करते हैं। ज्ञानपरायण सभी योगियोंका आत्यन्तिक प्रलय भी शंकर ही करते हैं॥ २३-२५॥
इस प्रकार सबको अपने वशमें रखनेवाले ये भगवान् रुद्र ही संहार करते हैं। श्रुतिके अनुसार (जगत्की) स्थापना करनेवाली (रुद्रकी) मोहनी शक्तिको ही नारायण कहते हैं। पचीसवें तत्त्व अर्थात् पुरुषस्वरूप भगवान् हिरण्यगर्भ प्रकृतिसे तन्मय (संयुक्त) होकर सम्पूर्ण सत्-असदात्मक जगत्की सृष्टि करते हैं॥ २६-२७॥
अपनी आत्मामें ही व्यवस्थित रहनेवाली (अर्थात् स्वयंमें ही अधिष्ठित वस्तुतः निरधिष्ठान) ब्रह्मा, विष्णु तथा ईश (महेश्वर) नामक सर्वज्ञ, सर्वव्यापी तथा शान्त तीन शक्तियाँ भोग तथा मोक्षरूप फलको देनेवाली हैं। ये शक्तियाँ सर्वेश्वरस्वरूप, सभीके द्वारा वन्दनीय, शाश्वत और अनन्त भोगोंसे सम्पन्न हैं। अद्वितीय अक्षर तत्त्व ही पुरुष, प्रधान और ईश्वररूप है॥ २८-२९॥
उस परमात्मा (अव्यक्त अक्षर-तत्त्व)-में अन्य भी इन्द्र, सूर्य आदि हजारों दिव्य शक्तियाँ हैं। इनकी भी विविध यज्ञोंके द्वारा आराधना की जाती है। इन इन्द्र, सूर्य आदि एक-एक देवका भी ऐसा माहात्म्य है कि इनके सैकड़ों-हजारों अर्थात् अनन्त शरीर हैं और इन शरीरोंमें लोक-कल्याणके लिये अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वस्तुतः इन सबका मूल एक ही निर्गुण शक्ति है-॥ ३०-३१॥
४८८ * कूर्मपुराण *
| तां तां शक्तिं समाधाय स्वयं देवो महेश्वरः।<br>करोति देहान् विविधान् ग्रसते चैव लीलया ॥ ३२ ॥<br><br>इज्यते सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणैर्वेदवादिभिः।<br>सर्वकामप्रदो रुद्र इत्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥ ३३ ॥<br><br>सर्वासामेव शक्तीनां ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>प्राधान्येन स्मृता देवाः शक्तयः परमात्मनः ॥ ३४ ॥<br>आद्यः परस्ताद् भगवान् परमात्मा सनातनः।<br>गीयते सर्वशक्त्यात्मा शूलपाणिर्महेश्वरः ॥ ३५ ॥<br><br>एनमेके वदन्त्यग्निं नारायणमथापरे।<br>इन्द्रमेके परे विश्वान् ब्रह्माणमपरे जगुः ॥ ३६ ॥<br>ब्रह्मविष्ण्वग्निवरुणाः सर्वे देवास्तथर्षयः।<br>एकस्यैवाथ रुद्रस्य भेदास्ते परिकीर्तिताः ॥ ३७ ॥<br><br>यं यं भेदं समाश्रित्य यजन्ति परमेश्वरम्।<br>तत् तद् रूपं समास्थाय प्रददाति फलं शिवः ॥ ३८ ॥<br><br>तस्मादेकतरं भेदं समाश्रित्यापि शाश्वतम्।<br>आराधयन्महादेवं याति तत्परमं पदम् ॥ ३९ ॥<br><br>किन्तु देवं महादेवं सर्वशक्तिं सनातनम्।<br>आराधयेद् वै गिरिशं सगुणं वाथ निर्गुणम् ॥ ४० ॥<br>मया प्रोक्तो हि भवतां योगः प्रागेव निर्गुणः।<br>आरुरुक्षुस्तु सगुणं पूजयेत् परमेश्वरम् ॥ ४१ ॥<br><br>पिनाकिनं त्रिनयनं जटिलं कृत्तवाससम्।<br>पद्मासनस्थं रुक्माभं चिन्तयेद् वैदिकी श्रुतिः ॥ ४२ ॥ | अव्यक्त अक्षर अद्वितीय तत्त्व। उन-उन शक्तियोंका आश्रयण कर महेश्वरदेव स्वयं लीलापूर्वक विविध देहोंकी सृष्टि करते हैं और उनका संहार भी करते हैं। वेदवादी (वेदज्ञ) ब्राह्मणोंके द्वारा समस्त यज्ञोंमें उन (महेश्वर)-का पूजन किया जाता है। ये ही रुद्र हैं तथा सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले हैं—ऐसा वेदका कथन है। परमात्माकी सभी शक्तियोंमें ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर-देव प्रधान शक्तिके रूपमें माने गये हैं॥ ३२—३४ ॥<br>शूलपाणि¹ महेश्वर (कारणब्रह्म-तुरीय तत्त्व) तो आद्य, सबसे परे, भगवान्, परमात्मा, सनातन एवं सर्वशक्त्यात्मा (समस्त शक्तियोंके मूल उद्गम एवं अधिष्ठान)-के रूपमें वेदोंमें वर्णित हैं। इसलिये कुछ लोग इन्हें अग्नि तथा कुछ लोग नारायण कहते हैं। ऐसे ही कोई इन्हें इन्द्र, कोई विश्वेदेव तथा कोई ब्रह्मा कहते हैं॥ ३५-३६ ॥<br>ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि, वरुण तथा अन्य सभी देवता और महर्षिगण एक ही रुद्र (महेश्वर)-के विभिन्न स्वरूप कहे गये हैं। मनुष्य इन स्वरूपोंमेंसे जिस भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर परमेश्वरकी आराधना करते हैं, शिव (महेश्वर) उसी स्वरूपको ग्रहणकर फल प्रदान करते हैं। अतः इनमेंसे किसी एक भी भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर सनातन महादेवकी आराधना करनेवालेको उस परम (शिव) पदकी प्राप्ति होती है। निष्कर्ष यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न सनातन, देव, गिरिश महादेवकी सगुण अथवा निर्गुण किसी भी रूपमें आराधना अवश्य करनी चाहिये ॥ ३७—४० ॥<br>मैंने आप लोगोंको निर्गुण-योग (निर्बीज समाधि²) पहले ही बता दिया है। सगुणरूप (-की उपासना)-में आरूढ़ होनेकी इच्छा करनेवालेको भी परमेश्वरकी पूजा (आराधना) करनी चाहिये। वेदके कथनके अनुसार पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, तीन नेत्रवाले, जटाधारी, चर्माम्बरधारी, पद्मासनमें स्थित तथा स्वर्णिम आभावाले (शंकर)-का ध्यान करना चाहिये॥ ४१-४२ ॥ |
१-महेश्वर कार्यब्रह्म एवं कारणब्रह्म-रूपमें शास्त्रोंमें वर्णित हैं। अव्यक्ततत्त्वकी शक्तिरूपमें जिन महेश्वरकी चर्चा अभी ऊपर की गयी है, वे कार्यब्रह्म हैं। अव्यक्त अक्षर-तत्त्व कारणब्रह्म महेश्वरको समझना चाहिये। इन्हीं कारणब्रह्मको तुरीय (चतुर्थ) अद्वैत या तत्त्व कहा जाता है।
२-'निर्बीज समाधि' साधककी वह अवस्था है, जिसमें कोई भी संस्कार शेष नहीं रहता। इसीलिये इस अवस्थामें किसी भी प्रकारकी चित्तवृत्तिका अस्तित्व नहीं रहता। इसी कारण इस निर्बीज समाधिको कैवल्यावस्था कहते हैं।
| * अध्याय ४४ * | ४८९ |
|---|
| एष योगः समुद्दिष्टः सबीजो मुनिसत्तमाः।<br>तस्मात् सर्वान् परित्यज्य देवान् ब्रह्मपुरोगमान्।<br>आराधयेद् विरूपाक्षमादिमध्यान्तसंस्थितम्॥ ४३ ॥<br><br>भक्तियोगसमायुक्तः स्वधर्मनिरतः शुचिः।<br>तादृशं रूपमास्थाय समायात्यन्तिकं शिवम्॥ ४४॥<br><br>एष योगः समुद्दिष्टः सबीजोऽत्यन्तभावने।<br>यथाविधि प्रकुर्वाणः प्राप्नुयादैश्वरं पदम्॥ ४५ ॥<br>अत्राप्यशक्तोऽथ हरं विष्णुं ब्रह्माणमर्चयेत्।<br>अथ चेदसमर्थः स्यात् तत्रापि मुनिपुंगवाः।<br>ततो वाग्वग्निशक्रादीन् पूजयेद् भक्तिसंयुतः॥ ४६ ॥<br><br>ये चान्ये भावने शुद्धे प्रागुक्ते भवतामिह।<br>अथापि कथितो योगो निर्बीजश्च सबीजकः॥ ४७॥<br><br>ज्ञानं तदुक्तं निर्बीजं पूर्वं हि भवतां मया।<br>विष्णुं रुद्रं विरिञ्चिं च सबीजं भावयेद् बुधः।<br>अथवाग्न्यादिकान् देवांस्तत्परः संयतेन्द्रियः॥ ४८॥<br><br>पूजयेत् पुरुषं विष्णुं चतुर्मूर्तिधरं हरिम्।<br>अनादिनिधनं देवं वासुदेवं सनातनम्॥ ४९॥<br><br>नारायणं जगद्योनिमाकाशं परमं पदम्।<br>तल्लिङ्गधारी नियतं तद्भक्तस्तदपाश्रयः।<br>एष एव विधिर्ब्राह्मे भावने चान्तिके मतः॥ ५०॥ | मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार इस सबीज* योगका वर्णन किया गया। (इस संक्षिप्त वर्णनसे यह स्पष्ट है कि महेश्वरतत्त्व ही सर्वस्व, परम ध्येय है) इसलिये ब्रह्मा आदि प्रधान सभी देवोंको छोड़कर आदि, मध्य तथा अन्तमें रहनेवाले (शाश्वत तत्त्व) विरूपाक्ष (शंकर)-की आराधना करनी चाहिये। अपने धर्ममें निरत रहनेवाला, पवित्र तथा भक्तियोग-परायण व्यक्ति वैसा ही (शंकरके समान) रूप धारणकर शिवके समीप आता है। अत्यन्त भावना—ध्येयाकार चित्तवृत्तिवाले इस सबीज योगका वर्णन किया गया। इसका यथाविधि अनुष्ठान करता हुआ व्यक्ति ऐश्वर (ईश्वर)-पदको प्राप्त करता है॥ ४३—४५॥<br><br>मुनिश्रेष्ठो! यदि मनुष्य इसमें भी असमर्थ हो तो उसे हर, विष्णु एवं ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये और उसमें भी असमर्थ होनेपर भक्तियुक्त होकर (कार्यब्रह्माकी शक्ति) वायु, अग्नि तथा इन्द्र आदि देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वमें आप लोगोंको जो दो शुद्ध भावनाएँ बतायी गयी हैं (वे भी कल्याणकर हैं)। साथ ही निर्बीज तथा सबीज योगका भी वर्णन किया गया है (ये भी परम उपादेय हैं)। मैंने पूर्वमें भी यह निर्बीज ज्ञान (योग) आप लोगोंको बताया था। बुद्धिमान् व्यक्तिको सर्वप्रथम सबीज (साकाररूपमें) ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी भावना करनी चाहिये अथवा प्रारम्भमें जितेन्द्रिय होकर अग्नि आदि देवताओंकी तत्परतापूर्वक (इन देवताओंको ही परम ध्येय मानकर) आराधना करनी चाहिये। विष्णुके भक्त एवं विष्णुपरायण पुरुषको वैष्णव चिह्न (शंख-चक्रादि) धारणकर नियमपूर्वक (नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धरूप) चार मूर्ति धारण करनेवाले, अनादिनिधन, जगद्योनि, आकाशरूप, परमपदरूप सनातन देव वासुदेव पुरुष विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मी भावना (विष्णुको ही ब्रह्म माननेकी भावना)-में भी यही विधि श्रीविष्णुका सामीप्य प्राप्त करनेके लिये मान्य है॥ ४६—५०॥ |
* 'सबीज योग' का अर्थ है—सबीज समाधि। वह समाधि सबीज है, जिसमें बीज रहता है। बीजका अर्थ है—ध्येयाकार चित्तवृत्ति। इसका आशय यह है कि स्वयंसे पृथक् ध्येय तत्त्वको समझकर उसका अनुसंधान यदि साधक कर रहा है तो ध्येयाकार चित्तवृत्तिका अस्तित्व रहनेसे साधककी यह समाधि-अवस्था सबीज ही है। (इसे कैवल्यावस्था नहीं कह सकते, क्योंकि चित्तवृत्तिका पृथक् अस्तित्व रहनेसे साधकमें कैवल्य भाव नहीं है।)
४९० * कूर्मपुराण *
| इत्येतत् कथितं ज्ञानं भावनासंश्रयं परम्।<br>इन्द्रद्युम्नाय मुनये कथितं यन्मया पुरा॥ ५१ ॥<br><br>अव्यक्तात्मकमवेदं चेतनाचेतनं जगत्।<br>तदीश्वरः परं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्ममयं जगत्॥ ५२ ॥ | इस प्रकार यह पवित्र भावनापर आश्रित परम ज्ञान बतलाया गया। प्राचीन कालमें मैंने इस ज्ञानको इन्द्रद्युम्न मुनिसे कहा था। यह चेतनात्मक एवं अचेतनात्मक जगत् अव्यक्त (अक्षर अद्वितीय तत्त्व महेश्वर)-स्वरूप ही है। वह ईश्वर (महेश्वर) ही परम ब्रह्म है, इसलिये यह जगत् ब्रह्ममय है॥ ५१-५२ ॥ | | सूत उवाच<br>एतावदुक्त्वा भगवान् विरराम जनार्दनः।<br>तुष्टुवुर्मुनयो विष्णुं शक्रेण सह माधवम्॥ ५३ ॥ | सूतजीने कहा—इतना कहकर भगवान् जनार्दन (कूर्म) चुप हो गये। तब इन्द्रके साथ मुनिगण माधव विष्णु (कूर्म)-की स्तुति करने लगे— ॥ ५३ ॥ | | मुनय ऊचुः<br>नमस्ते कूर्मरूपाय विष्णवे परमात्मने।<br>नारायणाय विश्वाय वासुदेवाय ते नमः॥ ५४ ॥<br>नमो नमस्ते कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः।<br>माधवाय नमस्तुभ्यं नमो यज्ञेश्वराय च॥ ५५ ॥<br>सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः।<br>नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च॥ ५६ ॥<br><br>ॐ नमो ज्ञानरूपाय परमात्मस्वरूपिणे।<br>आनन्दाय नमस्तुभ्यं मायातीताय ते नमः॥ ५७ ॥<br><br>नमो गूढशरीराय निर्गुणाय नमोऽस्तु ते।<br>पुरुषाय पुराणाय सत्तामात्रस्वरूपिणे॥ ५८ ॥<br><br>नमः सांख्याय योगाय केवलfilterाय नमोऽस्तु ते।<br>धर्मज्ञानाधिगम्याय निष्कलाय नमो नमः॥ ५९ ॥<br><br>नमोऽस्तु व्योमतत्त्वाय महायोगेश्वराय च।<br>परावराणां प्रभवे वेदवेद्याय ते नमः॥ ६० ॥ | मुनियोंने कहा—कूर्मरूपधारी परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। विश्वरूप नारायण वासुदेव! आपको नमस्कार है। कृष्णको बार-बार नमस्कार है। गोविन्दको बारम्बार नमस्कार है। माधव! आपको नमस्कार है। यज्ञेश्वरको नमस्कार है॥ ५४-५५ ॥<br><br>हजारों सिरवाले तथा हजारों नेत्रवाले आपको नमस्कार है। हजारों हाथ तथा हजारों चरणवाले आपको नमस्कार है। प्रणवस्वरूप-ज्ञानरूप परमात्माको नमस्कार है। आनन्दरूप आपको नमस्कार है। आप मायातीतको नमस्कार है। गूढ (रहस्यमय) शरीरवाले आपको नमस्कार है। आप निर्गुणको नमस्कार है। पुराणपुरुष तथा सत्तामात्र स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। सांख्य तथा योगरूप आपको नमस्कार है। अद्वितीय (तत्त्वरूप) आपको नमस्कार है। धर्म तथा ज्ञानद्वारा प्राप्त होनेवाले आपको तथा निष्कल आपको बार-बार नमस्कार है। व्योमतत्त्वरूप महायोगेश्वरको नमस्कार है। पर तथा अवर पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाले वेदद्वारा वेद्य आपको नमस्कार है॥ ५६-६० ॥ | | नमो बुद्धाय शुद्धाय नमो युक्ताय हेतवे।<br>नमो नमो नमस्तुभ्यं मायिने वेधसे नमः॥ ६१ ॥ | शुद्ध (निराकारस्वरूप) आपको नमस्कार है, बुद्ध (ज्ञानस्वरूप) आपको नमस्कार है। योगयुक्त तथा हेतु (अनन्त प्रपञ्चके मूल कारण)-रूपको नमस्कार है। आपको बार-बार नमस्कार है। मायावी (मायाके नियन्त्रक) वेधा (विश्व-प्रपञ्चके स्रष्टा)-को नमस्कार है॥ ६१ ॥ | | नमोऽस्तु ते वराहाय नारसिंहाय ते नमः।<br>वामनाय नमस्तुभ्यं हृषीकेशाय ते नमः॥ ६२ ॥<br><br>नमोऽस्तु कालरुद्राय कालरूपाय ते नमः।<br>स्वर्गापवर्गदात्रे च नमोऽप्रतिहतात्मने॥ ६३ ॥ | वराहरूप आपको नमस्कार है। आप नरसिंह-रूपधारीको नमस्कार है। वामनरूप आपको नमस्कार है। आप हृषीकेश (इन्द्रियके ईश)-को नमस्कार है। कालरुद्रको नमस्कार है। कालरूप आपको नमस्कार है। स्वर्ग तथा अपवर्ग प्रदान करनेवाले और अप्रतिहत आत्मा (शाश्वत अद्वितीय)-को नमस्कार है॥ ६२-६३ ॥ |
| * अध्याय ४४ * | ४९१ |
|---|---|
| नमो योगाधिगम्याय योगिने योगदायिने।<br>देवानां पतये तुभ्यं देवार्तिशमनाय ते॥ ६४॥ | योगाधिगम्य, योगी और योगदाताको नमस्कार है। देवताओंके स्वामी तथा देवताओंके कष्टका शमन करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ६४॥ |
| भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वसंसारनाशनम्।<br>अस्माभिर्विदितं ज्ञानं यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥ ६५॥ | भगवन्! आपकी कृपासे समस्त संसार (भवबन्धन)-का नाश हो जाता है। हमें आपसे वह ज्ञान प्राप्त हुआ है, जिसे जानकर अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। हम लोगोंने विविध धर्म, वंश, मन्वन्तर, सर्ग, प्रतिसर्ग तथा इस ब्रह्माण्डके विस्तारके विषयमें आपसे सुना। आप ही सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, विश्वरूप और परम नारायण हैं। अनन्तात्मन्! आप ही हम लोगोंकी शरण और गति हैं। आप हमारी रक्षा करें॥ ६५-६७॥ |
| श्रुतास्तु विविधा धर्मा वंशा मन्वन्तराणि च।<br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च ब्रह्माण्डस्यास्य विस्तरः॥ ६६॥ | |
| त्वं हि सर्वजगत्साक्षी विश्वो नारायणः परः।<br>त्रातुमर्हस्यनन्तात्मंस्त्वमेव शरणं गतिः॥ ६७॥ | |
| सूत उवाच | सूतजीने कहा—विप्रो! योग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले उस सम्पूर्ण कूर्मपुराणको मैंने आप लोगोंको बतलाया, जिसे गदाधर (कूर्मभगवान्)-ने कहा था। पहले इस पुराणमें सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेके लिये लक्ष्मीकी उत्पत्ति तथा वासुदेवके साथ उनके संयोगका वर्णन किया गया है। तदनन्तर प्रजापतियोंकी सृष्टि, वर्णोंके धर्मों और उनकी वृत्तियोंका वर्णन तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षके शुभ लक्षणोंका यथावत् वर्णन किया गया है। इसमें पितामह (ब्रह्मा), विष्णु तथा धीमान् महेश्वरके एकत्व, पृथक्त्व और वैशिष्ट्यका वर्णन हुआ है। भक्तोंके लक्षण तथा सुन्दर सदाचारको कहा गया है। साथ ही वर्णों तथा आश्रमोंके लक्षणोंको शास्त्रानुसार बतलाया गया है॥ ६८-७२॥ |
| एतद् वः कथितं विप्रा योगमोक्षप्रदायकम्।<br>कौर्मं पुराणमखिलं यज्जगाद गदाधरः॥ ६८॥ | |
| अस्मिन् पुराणे लक्ष्म्यास्तु सम्भवः कथितः पुरा।<br>मोहायाशेषभूतानां वासुदेवेन योजनम्॥ ६९॥ | |
| प्रजापतीनां सर्गस्तु वर्णधर्माश्च वृत्तयः।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां यथावल्लक्षणं शुभम्॥ ७०॥ | |
| पितामहस्य विष्णोश्च महेशस्य च धीमतः।<br>एकत्वं च पृथक्त्वं च विशेषश्चोपवर्णितः॥ ७१॥ | |
| भक्तानां लक्षणं प्रोक्तं समाचारश्च शोभनः।<br>वर्णाश्रमाणां कथितं यथावदिह लक्षणम्॥ ७२॥ | |
| आदिसर्गतस्तः पश्चादण्डावरणसप्तकम्।<br>हिरण्यगर्भसर्गश्च कीर्तितो मुनिपुंगवाः॥ ७३॥ | तदनन्तर आदिसर्ग पुनः सात आवरणयुक्त ब्रह्माण्डका वर्णन हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! फिर हिरण्यगर्भसर्ग कहा गया है। काल-गणनाका विवरण, ईश्वरका माहात्म्य, ब्रह्माका जलमें शयन तथा भगवान्के नामोंकी निरुक्तिका वर्णन हुआ है। (विष्णुद्वारा) वराह-शरीर धारणकर भूमि (पृथ्वी)-के उद्धार करनेका भी इसमें वर्णन हुआ है। तदनन्तर पहले मुख्यसर्ग आदि और पुनः मुनिसर्ग बताया गया है। (इस पुराणमें) रुद्रसर्ग, ऋषिसर्ग, तापससर्ग और तामससर्गसे पहले धर्मका प्रजासर्ग बताया गया है॥ ७३-७६॥ |
| कालसंख्याप्रकथनं माहात्म्यं चेश्वरस्य च।<br>ब्रह्मणः शयनं चाप्सु नामनिर्वचनं तथा॥ ७४॥ | |
| वराहवपुषा भूयो भूमेरुद्धरणं पुनः।<br>मुख्यादिसर्गकथनं मुनिसर्गस्तथापरः॥ ७५॥ | |
| व्याख्यातो रुद्रसर्गश्च ऋषिसर्गश्च तापसः।<br>धर्मस्य च प्रजासर्गस्तामसात् पूर्वमेव तु॥ ७६॥ | |
| ब्रह्मविष्णुविवादः स्यादन्तर्देहप्रवेशनम्।<br>पद्मोद्भवत्वं देवस्य मोहस्तस्य च धीमतः॥ ७७॥ | ब्रह्मा एवं विष्णुके विवाद और (परस्पर) एक-दूसरेके देहके अन्तर्गत प्रविष्ट होने, ब्रह्माके कमलसे उत्पन्न होने और धीमान् देव (ब्रह्मा)-के मोहका (इस पुराणमें) वर्णन हुआ है॥ ७७॥ |
| दर्शनं च महेशस्य माहात्म्यं विष्णुनेरितम्।<br>दिव्यदृष्टिप्रदानं च ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ७८॥ | तत्पश्चात् (ब्रह्माद्वारा) महेशका दर्शन करने, विष्णु-द्वारा कहे गये उनके माहात्म्य और परमेष्ठी ब्रह्माको दिव्य |
| ४९२ | * कूर्मपुराण * |
|---|---|
| संस्तवो देवदेवस्य ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>प्रसादो गिरिशस्याथ वरदानं तथैव च॥ ७९॥ | दृष्टि प्रदान करनेका वर्णन हुआ है। परमेष्ठी ब्रह्माद्वारा देवाधिदेव (महेश्वर)-की स्तुति, (प्रसन्न होकर) गिरिशद्वारा अनुग्रह तथा वर प्रदान करनेका भी वर्णन हुआ है। विष्णुके साथ महात्मा शंकरके संवाद, पिनाकीद्वारा वर प्रदान करने और उनके अन्तर्धान होनेका वर्णन हुआ है॥ ७८-८०॥ |
| संवादो विष्णुना सार्धं शंकरस्य महात्मनः।<br>वरदानं तथापूर्वमन्तर्धानं पिनाकिनः॥ ८०॥<br>वधश्च कथितो विप्रा मधुकैटभयोः पुरा।<br>अवतारोऽथ देवस्य ब्रह्मणो नाभिपङ्कजात्॥ ८१॥ | विप्रो! इसमें प्राचीन कालमें हुए मधुकैटभके वधका तथा देव (विष्णु)-के नाभिकमलसे ब्रह्माके अवतारका वर्णन हुआ है। तदनन्तर विष्णुसे देव ब्रह्माके एकीभावको कहा गया है और ब्रह्माका मोहित होना तदनन्तर हरिसे चेतनाप्राप्तिको बताया गया है॥ ८१-८२॥ |
| एकीभावश्च देवस्य विष्णुना कथितस्ततः।<br>विमोहो ब्रह्मणश्चाथ संज्ञालाभो हरेस्ततः॥ ८२॥<br>तपश्चरणमाख्यातं देवदेवस्य धीमतः।<br>प्रादुर्भावो महेशस्य ललाटात् कथितस्ततः॥ ८३॥ | तदुपरान्त धीमान् देवाधिदेवकी तपश्चर्याका वर्णन है और फिर उनके (ब्रह्माके) मस्तकसे महेश्वरके प्रादुर्भावका वर्णन किया गया है। रुद्रोंकी सृष्टि करनेपर ब्रह्माके द्वारा उसके प्रतिषेधका वर्णन हुआ है। देवाधिदेव (शंकर)-के ऐश्वर्य एवं ब्रह्माको वरदान और उपदेश देनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात् रुद्रके अन्तर्धान होने, ब्रह्माकी तपश्चर्या, देवाधिदेवके दर्शन और उनके नर-नारी-शरीर धारण करनेका वर्णन किया गया है॥ ८३-८५॥ |
| रुद्राणां कथिता सृष्टिर्ब्रह्मणः प्रतिषेधनम्।<br>भूतिश्च देवदेवस्य वरदानोपदेशकौ॥ ८४॥ | |
| अन्तर्धानं च रुद्रस्य तपश्चर्याण्डजस्य च।<br>दर्शनं देवदेवस्य नरनारीशरीरता॥ ८५॥<br>देव्या विभागकथनं देवदेवात् पिनाकिनः।<br>देव्यास्तु पश्चात् कथितं दक्षपुत्रीत्वमेव च॥ ८६॥ | देवाधिदेव पिनाकीसे देवी (सती)-के अलगावका कथन हुआ है और फिर देवीका दक्षपुत्रीके रूपमें जन्म लेनेका वर्णन हुआ है। देवीकी हिमवान्की पुत्री होना और उनके माहात्म्यका वर्णन किया गया है तथा (उनके) दिव्यरूपके दर्शन और विश्वरूपके दर्शनका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त स्वयं पिता हिमालयद्वारा कहे गये (देवीके) सहस्रनाम, महादेवीके द्वारा प्रदत्त उपदेश और वरदानका भी वर्णन हुआ है॥ ८६-८८॥ |
| हिमवद्दुहितृत्वं च देव्या माहात्म्यमेव च।<br>दर्शनं दिव्यरूपस्य वैश्वरूपस्य दर्शनम्॥ ८७॥ | |
| नाम्नां सहस्रं कथितं पित्रा हिमवता स्वयम्।<br>उपदेशो महादेव्या वरदानं तथैव च॥ ८८॥<br>भृग्वादीनां प्रजासर्गो राज्ञां वंशस्य विस्तरः।<br>प्राचेतसत्वं दक्षस्य दक्षयज्ञविमर्दनम्॥ ८९॥<br>दधीचस्य च दक्षस्य विवादः कथितस्तदा।<br>ततश्च शापः कथितो मुनीनां मुनिपुंगवाः॥ ९०॥ | भृगु आदि ऋषियोंका प्रजासर्ग, राजाओंके वंशका विस्तार, दक्षके प्रचेताके पुत्र होने और दक्षयज्ञ-विध्वंसका वर्णन हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर दधीच और दक्षके विवादको बतलाया गया है, फिर मुनियोंके शापका वर्णन हुआ है॥ ८९-९०॥ |
| रुद्रागतिः प्रसादश्च अन्तर्धानं पिनाकिनः।<br>पितामहस्योपदेशः कीर्त्यते रक्षणाय तु॥ ९१॥<br>दक्षस्य च प्रजासर्गः कश्यपस्य महात्मनः।<br>हिरण्यकशिपोर्नाशो हिरण्याक्षवधस्तथा॥ ९२॥ | तदुपरान्त रुद्रके आगमन एवं अनुग्रह और उन पिनाकी रुद्रके अन्तर्धान होने तथा (दक्षकी) रक्षाके लिये पितामहद्वारा उपदेश करनेका वर्णन हुआ है॥ ९१॥<br>तदुपरान्त दक्षके तथा महात्मा कश्यपसे होनेवाली प्रजासृष्टिका वर्णन है। हिरण्यकशिपुके नष्ट होने तथा हिरण्याक्षके वधका वर्णन हुआ है। इसके बाद देवदारुवनमें निवास करनेवाले मुनियोंकी शापप्राप्तिका कथन है, अन्धकके निग्रह और उसको श्रेष्ठ गाणपत्यपद प्रदान करनेका वर्णन हुआ है॥ ९२-९३॥ |
| ततश्च शापः कथितो देवदारुवनौकसाम्।<br>निग्रहश्चान्धकस्याथ गाणपत्यमनुत्तमम्॥ ९३॥ |
- अध्याय ४४ * | ४९३ ---|--- प्रह्लादनिग्रहश्चाथ बलेः संयमनं ततः।<br>बाणस्य निग्रहश्चाथ प्रसादस्तस्य शूलिनः॥ ९४ ॥<br><br>ऋषीणां वंशविस्तारो राज्ञां वंशाः प्रकीर्तिताः।<br>वसुदेवात् ततो विष्णोरुत्पत्तिः स्वेच्छया हरेः ॥ ९५ ॥<br>दर्शनं चोपमन्योर्वै तपश्चरणमेव च।<br>वरलाभो महादेवं दृष्ट्वा साम्बं त्रिलोचनम्॥ ९६ ॥<br><br>कैलासगमनं चाथ निवासस्तत्र शार्ङ्गिणः।<br>ततश्च कथ्यते भीतिर्द्वारवत्या निवासिनाम् ॥ ९७ ॥<br><br>रक्षणं गरुडेनाथ जित्वा शत्रून् महाबलान्।<br>नारदागमनं चैव यात्रा चैव गरुत्मतः॥ ९८ ॥<br>ततश्च कृष्णागमनं मुनीनामागतिस्ततः।<br>नैत्यकं वासुदेवस्य शिवलिङ्गार्चनं तथा ॥ ९९ ॥<br><br>मार्कण्डेयस्य च मुनेः प्रश्नः प्रोक्तस्ततः परम्।<br>लिङ्गार्चननिमित्तं च लिङ्गस्यापि सलिङ्गिनः ॥ १०० ॥<br>याथात्म्यकथनं चाथ लिङ्गाविर्भाव एव च।<br>ब्रह्मविष्ण्वोस्तथा मध्ये कीर्तितो मुनिपुंगवाः ॥ १०१ ॥<br><br>मोहस्तयोस्तु कथितो गमनं चोर्ध्वतोऽप्यधः।<br>संस्तवो देवदेवस्य प्रसादः परमेष्ठिनः॥ १०२॥<br>अन्तर्धानं च लिङ्गस्य साम्बोत्पत्तिस्ततः परम्।<br>कीर्तिता चानिरुद्धस्य समुत्पत्तिर्द्विजोत्तमाः ॥ १०३ ॥<br><br>कृष्णस्य गमने बुद्धिर्ऋषीणामागतिस्तथा।<br>अनुशासितं च कृष्णेन वरदानं महात्मनः ॥ १०४ ॥<br>गमनं चैव कृष्णस्य पार्थस्यापि च दर्शनम्।<br>कृष्णद्वैपायनस्योक्ता युगधर्माः सनातनाः॥ १०५ ॥<br>अनुग्रहोऽथ पार्थस्य वाराणसीगतिस्ततः।<br>पाराशर्यस्य च मुनेर्व्यासस्याद्भुतकर्मणः॥ १०६ ॥<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं तीर्थानां चैव वर्णनम्।<br>तीर्थयात्रा च व्यासस्य देव्याश्चैवाथ दर्शनम्।<br>उद्वासनं च कथितं वरदानं तथैव च ॥ १०७ ॥ | तदनन्तर प्रह्लादके निग्रह, बलिके बाँधे जाने, त्रिशूली (शंकर)-द्वारा बाणासुरके निग्रह और फिर उसपर कृपा करनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात् ऋषियोंके वंशका विस्तार तथा राजाओंके वंशका वर्णन हुआ है और फिर स्वेच्छासे वसुदेवके पुत्रके रूपमें हरिविष्णुकी उत्पत्तिका वर्णन है॥ ९४-९५॥<br>उपमन्युका दर्शन करने और तपश्चर्या करनेका वर्णन है। तत्पश्चात् अम्बासहित त्रिलोचन महादेवका दर्शनकर वर प्राप्त करनेका वर्णन हुआ है। तदनन्तर शार्ङ्गी (कृष्ण)-का कैलासपर जाने और वहाँ निवास करनेका वर्णन है फिर द्वारवती-निवासियोंके भयभीत होनेका वर्णन है। इसके बाद महाबलशाली शत्रुओंको जीतकर गरुडके द्वारा (द्वारकावासियोंकी) रक्षा करने, नारद-आगमन और गरुडकी यात्राका वर्णन हुआ है ॥ ९६-९८॥<br>तदनन्तर कृष्णके आगमन, मुनियोंके आने और वासुदेव (विष्णु)-द्वारा नित्य किये जानेवाले शिव-लिङ्गार्चनका वर्णन है। तदुपरान्त मुनि मार्कण्डेयजीद्वारा (लिङ्गके विषयमें) प्रश्न करने तथा (वासुदेवद्वारा) लिङ्गार्चनके प्रयोजन और लिङ्गी (शंकर)-के लिङ्गके स्वरूपका निरूपण हुआ है ॥ ९९-१०० ॥<br>मुनिश्रेष्ठो ! फिर ब्रह्मा तथा विष्णुके मध्य ज्योतिर्लिङ्गके आविर्भाव तथा उसके वास्तविक स्वरूपका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त उन दोनोंके मोहित होने तथा (लिङ्गका परिमाण जाननेके लिये) ऊर्ध्वलोक एवं अधोलोकमें जाने, पुनः परमेष्ठी देवाधिदेव (महादेव)-की स्तुति करने और उनके द्वारा अनुग्रह प्रदान करनेका वर्णन हुआ है ॥ १०१-१०२॥<br>द्विजोत्तमो ! तदनन्तर लिङ्गके अन्तर्धान होने और फिर साम्ब तथा अनिरुद्धकी उत्पत्तिका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त महात्मा कृष्णका (अपने लोक) जानेका निश्चय, ऋषियोंका (द्वारकामें) आगमन, कृष्णद्वारा उन्हें उपदेश तथा वरदान देनेका वर्णन किया गया है ॥ १०३-१०४॥<br>इसके अनन्तर कृष्णका (स्वधाम) गमन, अर्जुनद्वारा कृष्णद्वैपायनका दर्शन एवं उनके द्वारा कहे गये सनातन युगधर्मोंका वर्णन हुआ है। आगे अर्जुनके ऊपर (व्यासद्वारा) अनुग्रह और पराशरपुत्र अद्भुतकर्मा व्यास मुनिका वाराणसीमें जानेका वर्णन है ॥ १०५-१०६॥<br>तदुपरान्त वाराणसीका माहात्म्य, तीर्थोंका वर्णन, व्यासकी तीर्थयात्रा और देवीके दर्शन करनेका वर्णन है। साथ
४९४ * कूर्मपुराण *
प्रयागस्य च माहात्म्यं क्षेत्राणामथ कीर्तनम्।
फलं च विपुलं विप्रा मार्कण्डेयस्य निर्गमः ॥ १०८ ॥
भुवनानां स्वरूपं च ज्योतिषां च निवेशनम्।
कीर्त्यन्ते चैव वर्षाणि नदीनां चैव निर्णयः ॥ १०९ ॥
पर्वतानां च कथनं स्थानानि च दिवौकसाम्।
द्वीपानां प्रविभागश्च श्वेतद्वीपोपवर्णनम् ॥ ११० ॥
शयनं केशवस्याथ माहात्म्यं च महात्मनः।
मन्वन्तराणां कथनं विष्णोर्माहात्म्यमेव च ॥ १११ ॥
वेदशाखाप्रणयनं व्यासानां कथनं ततः।
अवेदस्य च वेदानां कथनं मुनिपुंगवाः ॥ ११२ ॥
योगेश्वराणां च कथा शिष्याणां चाथ कीर्तनम्।
गीताश्च विविधा गुह्या ईश्वरस्याथ कीर्तिताः ॥ ११३ ॥
वर्णाश्रमाणामाचाराः प्रायश्चित्तविधिस्ततः।
कपालित्वं च रुद्रस्य भिक्षाचरणमेव च ॥ ११४ ॥
पतिव्रतायाश्चाख्यानं तीर्थानां च विनिर्णयः।
तथा मङ्कणकस्याथ निग्रहः कीर्त्यते द्विजाः ॥ ११५ ॥
वधश्च कथितो विप्राः कालस्य च समासतः।
देवदारुवने शम्भोः प्रवेशो माधवस्य च ॥ ११६ ॥
दर्शनं षट्कुलीयानां देवदेवस्य धीमतः।
वरदानं च देवस्य नन्दिने तु प्रकीर्तितम् ॥ ११७ ॥
नैमित्तिकस्तु कथितः प्रतिसर्गस्ततः परम्।
प्राकृतः प्रलयश्चोर्ध्वं सबीजो योग एव च ॥ ११८ ॥
एवं ज्ञात्वा पुराणस्य संक्षेपं कीर्तयेत् तु यः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ११९ ॥
एवमुक्त्वा श्रियं देवीमादाय पुरुषोत्तमः।
संत्यज्य कूर्मसंस्थानं स्वस्थानं च जगाम ह ॥ १२० ॥
देवाश्च सर्वे मुनयः स्वानि स्थानानि भेजिरे।
प्रणम्य पुरुषं विष्णुं गृहीत्वा ह्यमृतं द्विजाः ॥ १२१ ॥
एतत् पुराणं परमं भाषितं कूर्मरूपिणा।
साक्षाद् देवादिदेवेन विष्णुना विश्वयोनिना ॥ १२२ ॥
ही (देवीद्वारा वाराणसीसे व्यासके) निष्कासन और वरदान देनेका वर्णन हुआ है। ब्राह्मणो! तदनन्तर प्रयागका माहात्म्य, (पुण्य) क्षेत्रोंका वर्णन, (तीर्थोंका) महान् फल और मार्कण्डेय मुनिके निर्गमनका वर्णन है॥ १०७-१०८॥
(इसके पश्चात्) भुवनोंके स्वरूप, ग्रहों तथा नक्षत्रोंकी स्थिति और वर्षों तथा नदियोंके निर्णयका वर्णन किया गया है। पर्वतों तथा देवताओंके स्थानों, द्वीपोंके विभाग तथा श्वेतद्वीपका वर्णन किया गया है॥ १०९-११०॥
महात्मा केशवके शयन, उनके माहात्म्य, मन्वन्तरों और विष्णुके माहात्म्यका निरूपण हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर वेदकी शाखाओंका प्रणयन, व्यासोंका नाम-परिगणन और अवेद (वेदबाह्य सिद्धान्तों) तथा वेदोंका कथन किया गया है। (इसके अनन्तर) योगेश्वरोंकी कथा, (उनके) शिष्योंका वर्णन और ईश्वर-सम्बन्धी अनेक गुह्य गीताओंका उल्लेख हुआ है॥ १११-११३॥
तदनन्तर वर्णों और आश्रमोंके सदाचार, प्रायश्चित्तविधि, रुद्रके कपाली होने और (उनके) भिक्षा माँगनेका वर्णन हुआ है। द्विजो! इसके बाद पतिव्रताके आख्यान, तीर्थोंके निर्णय और मङ्कणक मुनिके निग्रह करनेका उल्लेख हुआ है॥ ११४-११५॥
ब्राह्मणो! (तदनन्तर) संक्षेपमें कालके वध और शंकर तथा विष्णुके देवदारुवनमें प्रवेश करनेका उल्लेख है। छः कुलोंमें उत्पन्न ऋषियोंद्वारा धीमान् देवाधिदेवके दर्शन करने और महादेवद्वारा नन्दीको वरदान देनेका वर्णन हुआ है। इसके बाद नैमित्तिक प्रलय कहा गया है और फिर आगे प्राकृत प्रलय एवं सबीज योग बतलाया गया है॥ ११६-११८॥
इस प्रकार संक्षेपमें (इस कूर्म) पुराणको जानकर जो उसका उपदेश करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ११९॥
इतना कहकर कूर्मरूपका परित्यागकर देवी लक्ष्मीके साथ पुरुषोत्तम (विष्णु) अपने धामको चले गये। द्विजो! सभी देवता तथा मुनिगण भी परम पुरुष विष्णुके (उपदेशरूपी) अमृतको प्राप्तकर तथा उन्हें प्रणामकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये। यह श्रेष्ठ (कूर्म-) पुराण कूर्मरूपधारी विश्वयोनि साक्षात् देवोंके आदिदेव विष्णुद्वारा कहा गया है॥ १२०-१२२॥
| * अध्याय ४४ * | ४९५ |
|---|
| यः पठेत् सततं मर्त्यो नियमेन समाहितः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥ १२३॥<br><br>लिखित्वा चैव यो दद्याद् वैशाखे मासि सुव्रतः।<br>विप्राय वेदविदुषे तस्य पुण्यं निबोधत॥ १२४॥<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वैश्वर्यसमन्वितः।<br>भुक्त्वा च विपुलान् स्वर्गे भोगान् दिव्यान् सुशोभनान्॥ १२५॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो विप्राणां जायते कुले।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयात्॥ १२६॥ | जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे नियमपूर्वक इस पुराणको पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो पुरुष शास्त्रानुसार व्रतनिष्ठ होते हुए इस पुराणको लिखकर वैशाखमासमें वेदज्ञ ब्राह्मणको दान करता है, उसका पुण्य सुनो—वह सभी पापोंसे रहित और सभी ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होते हुए (मृत्युके बाद) स्वर्गमें प्रचुर मात्रामें दिव्य तथा सुन्दर भोगोंका उपभोग करता है, तत्पश्चात् स्वर्गसे इस लोकमें आकर ब्राह्मणोंके वंशमें उत्पन्न होता है और पूर्व-संस्कारोंकी महिमाके कारण ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेता है॥ १२३—१२६॥ |
| पठित्वाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>योऽर्थं विचारयेत् सम्यक् स प्राप्नोति परं पदम्॥ १२७॥<br><br>अध्येतव्यमिदं नित्यं विप्रैः पर्वणि पर्वणि।<br>श्रोतव्यं च द्विजश्रेष्ठा महापातकनाशनम्॥ १२८॥<br><br>एकतस्तु पुराणानि सेतिहासानि कृत्स्नशः।<br>एकत्र चेदं परममेतदेवातिरिच्यते॥ १२९॥<br><br>धर्मनैपुण्यकामानां ज्ञाननैपुण्यकामिनाम्।<br>इदं पुराणं मुक्त्वाैकं नास्त्यन्यत् साधनं परम्॥ १३०॥ | इस (पुराण)-के एक ही अध्यायके पाठ करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है और जो इसके अर्थपर ठीक-ठीक विचार करता है, वह परमपद प्राप्त करता है।<br>श्रेष्ठ द्विजो! ब्राह्मणोंको प्रत्येक पर्वपर महापातकोंका नाश करनेवाले इस पुराणका नित्य अध्ययन एवं श्रवण करना चाहिये। एक ओर सभी इतिहास-पुराणोंको (शास्त्रीय विचारणाकी कसौटीपर) रखा जाय और दूसरी ओर अकेले इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको रखा जाय तो यही अपेक्षाकृत अतिशय विशिष्ट सिद्ध होगा। जो व्यक्ति धर्ममें निपुणता प्राप्त करना चाहते हों, और जो ज्ञानमें निपुणता प्राप्त करनेके अभिलाषी हों उनके लिये एकमात्र इस पुराणको छोड़कर और कोई दूसरा श्रेष्ठ उपाय नहीं है॥ १२७—१३०॥ |
| यथावदत्र भगवान् देवो नारायणो हरिः।<br>कथ्यते हि यथा विष्णुर्न तथान्येषु सुव्रताः॥ १३१॥<br><br>ब्राह्मी पौराणिकी चेयं संहिता पापनाशिनी।<br>अत्र तत् परमं ब्रह्म कीर्त्यते हि यथार्थतः॥ १३२॥<br><br>तीर्थानां परमं तीर्थं तपसां च परं तपः।<br>ज्ञानानां परमं ज्ञानं व्रतानां परमं व्रतम्॥ १३३॥ | सुव्रतो! इस पुराणमें जिस प्रकारसे भगवान् हरि नारायण देव विष्णुका कीर्तन हुआ है, वैसा अन्यत्र नहीं है। यह पौराणिकी ब्राह्मीसंहिता पापोंका नाश करनेवाली है। इसमें परम ब्रह्मका यथार्थरूपमें कीर्तन किया गया है। यह तीर्थोंमें परम तीर्थ, तपोंमें परम तप, ज्ञानोंमें परम ज्ञान और व्रतोंमें परम व्रत है॥ १३१—१३३॥ |
| नाध्येतव्यमिदं शास्त्रं वृषलस्य च संनिधौ।<br>योऽधीते स तु मोहात्मा स याति नरकान् बहून्॥ १३४॥ | इस शास्त्रका अध्ययन वृषल (अधार्मिक व्यक्ति)-के समीप नहीं करना चाहिये। जो अध्ययन करता है, वह अज्ञानी है, वह बहुतसे नरकोंको प्राप्त करता है॥ १३४॥ |
| श्राद्धे वा दैविके कार्ये श्रावणीयं द्विजातिभिः।<br>यज्ञान्ते तु विशेषेण सर्वदोषविशोधनम्॥ १३५॥ | द्विजातियोंके श्राद्ध अथवा देवकार्यमें इस ब्राह्मीसंहिता (कूर्मपुराण)-को सुनाना चाहिये। यज्ञकी पूर्णतापर विशेषरूपसे (इसका पाठ करनेसे एवं) श्रवण करनेसे सभी दोषोंसे शुद्धि हो जाती है॥ १३५॥ |
| मुमुक्षूणामिदं शास्त्रमध्येतव्यं विशेषतः।<br>श्रोतव्यं चाथ मन्तव्यं वेदार्थपरिबृंहणम्॥ १३६॥ | मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवालोंको विशेषरूपसे वेदके अर्थका विस्तार करनेवाले इस शास्त्रका श्रवण, अध्ययन तथा मनन करना चाहिये। |