भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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३०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'गौरी + औ' में पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, उस का दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से निषेध हो जाता है। तब इको यणचि (१५) से यण् आदेश हो कर 'गौर्यौ' रूप बनता है। ध्यान रहे कि 'गौर्यौ' आदि में अचो रहाभ्यां द्वे (६०) सूत्र द्वारा यकार यर् को द्वित्व हो कर पक्ष में 'गौर्य्यौ' प्रभृति रूप भी बनते हैं। जस् में भी पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो यण् करने पर—'गौर्यः'। 'गौरी + अम् = गौरीम्। अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो जाता है। 'गौरी + शस्' यहां शस् में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को रुत्व-विसर्ग करने से 'गौरीः' रूप बनता है। स्त्रीलिङ्ग होने से सकार को नत्व नहीं होता। टा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्या' रूप सिद्ध होता है। 'गौरी + ङे' (ङे)। यहां यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा हो कर आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम, आठश्च (१६७) से वृद्धि और इको यणचि (१५) से यण् यकार करने से 'गौर्यै' रूप बनता है। 'गौरी + ङस्' (ङसिं वा ङस्) इस दशा में नदीसञ्ज्ञा, आट् आगम, वृद्धि और यण् यकार हो कर 'गौर्याः' रूप सिद्ध होता है। ओस् में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्योः' बनता है। षष्ठी के बहुवचन आम् में नदीसञ्ज्ञा हो कर नदीमूलक नुट्, अनुबन्धलोप और नकार को णकार करने से 'गौरीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। सप्तमी के एकवचन ङि में 'गौरी + ङि' इस दशा में ङेराम्० (१६८) से ङि को आम्, आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम, आठश्च (१६७) से वृद्धि तथा इको यणचि (१५) से यण् करने पर 'गौर्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। सम्बुद्धि में नदीसञ्ज्ञा होने से अम्बार्थ० (१६५) से ह्रस्व हो कर एङ्ह्रस्वात्० (१३४) से सकार का लोप हो जाता है—'हे गौरि!'। रूपमाला यथा— प्र० गौरी गौर्यौ गौर्यः | प० गौर्याः गौरीभ्याम् गौरीभ्यः द्वि० गौरीम् 〃 गौरीः | ष० 〃 गौर्योः गौरीणाम् तृ० गौर्या गौरीभ्याम् गौरीभिः | स० गौर्याम् 〃 गौरीषु च० गौर्यै 〃 गौरीभ्यः | सं० हे गौरि! हे गौर्यौ! हे गौर्यः! [लघु०] एव नद्यादयः ॥ अर्थ—इसी प्रकार नदी आदि ईकारान्त स्त्रीलिङ्गशब्दों के रूप बनेंगे। व्याख्या—बालकों के लिये गौरीवत् कुछ उपयोगी शब्दों का सङ्ग्रह यहां दे रहे हैं। '' इस चिह्न वाले स्थानों में षत्वविधि जाननी चाहिये। शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अक्षौहिणी = सेनाविशेष | अनीकिनी = सेना | अमरावती = इन्द्रपुरी अङ्गुली = अङ्गुल | अनुक्रमणी = सूची | अरण्यानी = बड़ा जङ्गल अटवी = जङ्गल | अनुचरी = दासी | अवाची = दक्षिण दिशा