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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण

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लघु-सिद्धान्त-कौमुदी भैमीव्याख्या प्रथम भाग ( पूर्वार्धम् ) भीमसेन शास्त्री एम्० ए०, पीएच्० डी०, साहित्यरत्न भैमी प्रकाशन ५३७, लाजपतराय मार्केट, दिल्ली-११०००६

प्रकाशक— भैमी प्रकाशन ५३७, लाजपतराय मार्केट, दिल्ली—११०००६ LAGHU SIDDHANTA KAUMUDĪ BHAIMĪVYĀKHYA Part I Revised & Enlarged Second Edition 1983 © BHIM SEN SHASTRI भीमसेन शास्त्री मूल्य एक सौ रुपये Price Rs One Hundred Only संशोधित एव परिवर्धित द्वितीय सस्करण १९८३ बी. के कम्पोजिंग एजेंसी दिल्ली द्वारा कम्पोज करवा कर राधा प्रेस, मेन रोड, गांधी नगर, दिल्ली में मुद्रित । i

तस्मै पाणिनये नमः (१) येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः। तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः॥ (२) अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः॥ (३) प्रमाणभूत आचार्यो दर्भपवित्रपाणिः शुचाववकाशे प्राङ्मुख उपविश्य महता यत्नेन सूत्रं प्रणयति स्म। तत्राशक्यं वर्णेना- प्यनर्थकेन भवितुं किं पुनरियता सूत्रेण। (४) तदनल्पमतेर्वचनं स्मरत। (५) तदाचार्यः सुहृद् भूत्वाऽन्वाचष्टे। (६) शोभना खलु पाणिनेः सूत्रस्य कृतिः। (७) आकुमारं यशः पाणिनेः। (८) महती सूक्ष्मेक्षिका वर्त्तते सूत्रकारस्य। (६) सर्ववेदपारिषदं हीदं शास्त्रम्। (१०) यच्छन्द आह तदस्माकं प्रमाणम्। १. पाणिनीयशिक्षा (५८)। २. पाणिनीयशिक्षा (५६)। ३. महाभाष्य (१.१.१)। ४. महाभाष्य (१.४.५१)। ५. महाभाष्य (१.२.३२)। ६. महाभाष्य (२.३.६६)। ७. महाभाष्य (१.४.८६)। ८. काशिका (४.२.७४)। ६. महाभाष्य (२.१.५८)। ०. महाभाष्य (२.१.१)।

विषय-सूची

(१) तस्मै पाणिनये नमः ... ... ... [३] (२) आत्म-निवेदनम् ... ... ... [५]—[१६] (३) व्याख्याकारस्य मङ्गलाचरणम् ... ... ... १ — १ (४) सञ्ज्ञा-प्रकरणम् .. ... ... २ — ३३ (५) अच्सन्धि-प्रकरणम् . ... ... ... ३४ — ६७ (६) हल्सन्धि-प्रकरणम् . ... ... ६८—१४२ (७) विसर्गसन्धि-प्रकरणम् ... ... ... १४३—१५८ (८) षड्‌लिङ्ग्याम्— [१] अजन्तपुंलिङ्ग-प्रकरणम् ... ... १५६—२८५ [२] अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ... .. २८५—३२० [३] अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ... ... ३२१—३४६ [४] हलन्त-पुंलिङ्ग-प्रकरणम् .. . ३४६—४७६ [५] हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ... ... ४८०—४६३ [६] हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् . ... ४६४—५१४ (६) अव्यय-प्रकरणम् ... ... ... ५१५—५८४ (१०) परिशिष्टे— [१] विशेष-स्मरणीय-पद्यतालिका ... ... ५८५—५८६ [२] ग्रन्थ-सङ्केत-तालिका ... .. ५८७—५८७ [३] अव्यय-तालिका . ... ५८८—५६२ [४] पूर्वार्धगताष्टाध्यायीसूत्र-तालिका ... ५६३—५६७ [५] पूर्वार्धगतवार्त्तिकादि-तालिका ... ... ५६७—५६७ [६] सुबन्त-शब्द-तालिका ... ... ५६७—५६६ [७] परिभाषा-न्यायादि-तालिका .. ... ६००—६०२ ———×———

आत्म-निवेदनम् संस्कृतभाषा अनेक भाषाओं की जननी तथा विश्व की एक अत्यन्त प्राचीन समृद्ध भाषा है। विश्व का अद्यावत् ज्ञात प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद इसी भाषा में ही निबद्ध है। यदि कोई संस्कृतभाषा पर अधिकार कर ले तो विश्व की अनेक भाषाओं पर उस का आधिपत्य अल्प आयास से ही सिद्ध हो सकता है। इस के अतिरिक्त संस्कृता- ध्ययन का एक और भी बड़ा प्रयोजन है। क्योंकि विश्व के अनेक देशों की सांस्कृतिक परम्पराओं वा कलाकौशल आदि विद्याओं का आधार या उत्प्रेरक भारत और तत्कालीन भाषा संस्कृत ही रही है अतः संस्कृत के ज्ञान से ही उन का ज्ञान सम्भव है। आजकल के नवप्रसूत भाषाविज्ञान जैसे अपूर्वशास्त्र का भी एक प्रमुख आधार- स्तम्भ संस्कृतभाषा का अध्ययन ही रहा है। हिन्दू-आर्यों के लिए संस्कृतभाषा का जानना तो और भी आवश्यक है क्योंकि उन की निखिल धार्मिक वा सांस्कृतिक परम्पराएं संस्कृतभाषा में ही निबद्ध हैं। संस्कृतभाषा में केवल भारत का ही नहीं अपितु विश्व और मानव जाति के हज़ारों वर्ष पूर्व का इतिहास अब इस जीर्ण अवस्था में भी सुरक्षित है। अतः इतिहास ज्ञान की दृष्टि से भी यह भाषा कम उपादेय नहीं है। संस्कृतभाषा यद्यपि हजारों वर्षों तक लोकव्यवहार वा बोलचाल की भाषा रह चुकी है और उस में यह उपयोगी गुण संसार की किसी भी भाषा से कम नहीं है तथापि विधिवशात् लोकव्यवहार वा बोलचाल से सर्वथा उठ जाने के कारण वह आज मृतभाषा (Dead Language) कही जाती है। अतः आज के युग में उस का अध्ययन बिना व्याकरणज्ञान के होना सम्भव नहीं। इस के साथ ही यह भी ध्यातव्य है कि संसार में केवल संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जिस के व्याकरण सर्वाङ्गीण और पूर्ण परिष्कृत कहे जा सकते हैं। संस्कृतभाषा के इन व्याकरणों में महामुनिपाणिनि- प्रणीत पाणिनीयव्याकरण ही इस समय तक के बने व्याकरणों में सर्वश्रेष्ठ, अत्यन्त परिष्कृत, वेदाङ्गों में गणनीय, प्राचीन तथा लब्धप्रतिष्ठ है। व्याख्योपव्याख्याओं तथा टीकाटिप्पण के रूप में जितना इस का विस्तार हुआ है उतना शायद भारत में किसी अन्य व्याकरण वा विषय का नहीं हुआ। आज भी लगभग एक हजार से अधिक ग्रन्थ पाणिनीयव्याकरण पर उपलब्ध हैं। महामुनि पाणिनि का काल अभी तक ठीक तरह से निश्चित नहीं हुआ। परन्तु अनेक विद्वानों का कहना है कि उन का आविर्भाव भगवान् बुद्ध (५४३ ई० पूर्व) से बहुत पूर्व हो चुका था। कारण कि भगवान् बुद्ध के काल में जहां पाली और प्राकृत भाषाएं जनसाधारण की भाषाएं थीं वहां पाणिनि के काल में उदात्तादिस्वरयुक्त संस्कृतभाषा

[ ६ ] का ही जनभाषा होना अष्टाध्यायी के अनेक साक्ष्यों से सुतरां सिद्ध होता है¹। पाणिनि ने स्वयं भी लोकभाषा को अष्टाध्यायी में 'भाषा' के नाम से अनेकशः प्रयुक्त किया है²। जो लोग अष्टाध्यायी में आये श्रमण, यवन, मस्करिन्³ आदि शब्दों को देख कर पाणिनि को बुद्ध और सिकन्दर से अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं वे भ्रान्त हैं, क्योंकि ये शब्द तो बुद्ध से बहुत पूर्व ही भारतीयों को परिचित थे। संन्यासी अर्थ में श्रमण शब्द ब्राह्मणग्रन्थों में प्रयुक्त है। मस्करिन् शब्द दण्डधारण करने के कारण साधारण परिव्राजकमात्र का वाचक है बुद्धकालीन मखली गोसाल नामक आचार्य का नहीं⁴। यवनजाति से तो भारतीय लोग यूनानी सम्राट् सिकन्दर के भारत पर आक्रमण करने से बहुत पहले ही परिचित थे। महाभारत में अनेक स्थानों पर यवनजाति का उल्लेख १. पाणिनि ने उस समय की जनभाषा में व्यवहृत अत्यन्त सूक्ष्मभेदों को भी अपनी अष्टाध्यायी में सुचारुरूप में संकलित किया है। यथा—विपाश् (व्यास) नदी के उत्तर की ओर वर्त्तमान कूपों के लिए आद्युदात्त 'दात्त' शब्द तथा दक्षिण की ओर वर्त्तमान कूपों के लिये अन्तोदात्त 'दात्त' शब्द का व्यवहार किया है, देखें पाणि- निसूत्र—उदक् च विपाशः (४.२.७४)। पाणिनि ने तत्कालीन लोकभाषा में प्रचलित अनेक मुहावरों का भी प्रचुर प्रयोग दर्शाया है, यथा—वणेहत्य पयः पिबति, मनोहत्य पयः पिबति (१.४.६५), शय्योत्थाय धावति (३.४.५२), यष्टिग्राहं युध्यन्ते (३.४.५३), केशग्राहं युध्यन्ते (३.४.५०), स्वादुङ्कारं भुङ्क्ते (३.२.२७)। केशाकेशि, दण्डादण्डि (२.२.२७), तीर्थेध्वाङ्क्ष (२.१.४२), मूलकपणः (मूली की गड्डी), शाकपण (शाक की गड्डी—३.३.६६), गोपुच्छिकः (गाय की पूंछ को पकड़ कर नदी पार करने वाला—४.४.६), नाविक, घटिकः, बाहूका (४.४.७), माञ्जिष्ठम् (मजीठ से रंगा गया वस्त्र—४.२.१) इत्यादि सैकड़ों लोकभाषा में प्रचलित शब्दों का अन्वाख्यान अष्टाध्यायी में उपलब्ध होता है। २. यथा—भाषायां सदवसश्रुवः (३.२.१०८), प्रथमापाञ्च द्विवचने भाषायाम् (७. २.८८), सय्यशिश्वीति भाषायाम् (४.१.६२), स्थे च भाषायाम् (६.३.२०), पूर्वे तु भाषायाम् (८.२.६८), विभाषा भाषायाम् (६.१.१८१) इत्यादि। ३. कुमारः श्रमणादिभिः (२.१.७०), इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवन- मातुलाचार्याणामानुकू (४.१.४६), मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः (६.१. १५४)। ४. यदि यह मखली गोसाल—परिव्राजकविशेष के लिये ही प्रयुक्त हुआ होता तो उस के अर्थनिर्देश के लिये पाणिनि सामान्य परिव्राजक पद का निर्देश न करते।

[७]

आया है¹। भगवान् कृष्ण का भी कालयवन से युद्ध हुआ था²। इसके अतिरिक्त अष्टा- ध्यायी में निर्वाणोऽवाते (८.२.५०) सूत्र में प्रतिपादित 'निर्वाण' पद बौद्धकालिक (मोक्ष) अर्थ की ओर संकेत नहीं करता अपितु 'निर्वाणः प्रदीपः' (दीपक बुझ गया) अर्थ की ओर संकेत करता है, इस से भी पाणिनि का बुद्ध से पूर्वभावी होना निश्चित होता है अन्यथा वे निर्वाण शब्द के बौद्धकाल में अत्यन्त प्रसिद्ध मोक्ष अर्थ का कभी भी अपलाप न कर पाते । गोल्डस्टूकर तथा रामकृष्ण गोपाल भाण्डारकर आदि ने पाणिनि का समय सातवीं ईसापूर्व शताब्दी माना है। वासुदेवशरण अग्रवाल ने पाणिनि को ईसा से ४५० वर्ष पूर्व का सिद्ध किया है। इन सब से हटकर नये भारतीय ढंग के विवेचक श्रीयुधिष्ठिर मीमांसक अपनी अनेक युक्तियों से पाणिनि का काल विक्रम से २६०० वर्ष पूर्व सिद्ध करते हैं³। इस तरह पाणिनि का काल अभी विवादास्पद ही समझना चाहिये । पाणिनि का इतिवृत्त उन के काल से भी अधिक अज्ञात है। भाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार इन की माता का नाम दाक्षी था⁴। न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि, काव्यालङ्कार- कार भामह तथा गणरत्नमहोदधिकार वर्धमान ने पाणिनि के पूर्वजों का निवासस्थान शलातुर नामक ग्राम माना है⁵। पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार यह स्थान इस समय पाकिस्तान के उत्तरपश्चिमीसीमाप्रान्त के निकट अटक के पास लहूर नाम से (जो शलातुर का अपभ्रंश है) अभी तक प्रसिद्ध है। चीनी यात्री थ्यूआन् चुआङ् (प्रसिद्ध नाम ह्वेनत्साङ्ग) सप्तम शताब्दी के आरम्भ में मध्यएशिया से स्थलमार्गद्वारा भारत आता हुआ इसी स्थान पर ठहरा था। उस ने लिखा है कि—"उद्भाण्ड (ओहिन्द) से लगभग चार मील दूर शलातुर स्थान है। यह वही स्थान है जहां ऋषि पाणिनि का जन्म हुआ था। यहां के लोगों ने पाणिनि की स्मृति में एक मूर्ति बनाई है जो अब तक मौजूद है।६" कथासरित्सागर के अनुसार पाणिनि बचपन में जड़बुद्धि थे।


१. तुर्वसु की सन्तान यवन कहलाई—(महाभारत० १.८५.३४); सहदेव ने दिग्विजय के समय इन के नगर को जीता था—(महाभारत० सभा० ३१.७३); नकुल ने यवनों को परास्त किया था—(महाभारत० २.३२.१७); काम्बोजराज एक लाख यवनों की सेना ले कर दुर्योधन के पास आया—(महाभारत० उद्योग० १६. २१-२२); यवन पहले क्षत्रिय थे परन्तु ब्राह्मणों के साथ द्वेष के कारण शूद्रभाव को प्राप्त हो गये—(महाभारत० अनुशासन० ३५.१८)। २. देखें—महाभारत० २.३८.२६ दाक्षिणात्यपाठ । ३. देखें—संस्कृतव्याकरणशास्त्र का इतिहास, प्रथमभाग, पृष्ठ २०५। ४. सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः—(महाभाष्य १.१.२०) । ५. देखें—मैमीप्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित न्यास-पर्यालोचन (पृष्ठ ४५—४६) । ६. देखें—ह्वएन्त्साङ्ग का भारतभ्रमण, इण्डियनप्रेस प्रयाग (पृष्ठ १०८) ।

[ ८ ] इन के गुरु का नाम 'वर्ष' था। गुरुपत्नी की प्रेरणा से इन्होंने हिमालय पर जा कर तपस्या से विद्या प्राप्त की। १ कतिपय विद्वानों का कथन है कि छन्द-सूत्र के निर्माता पिङ्गल मुनि इन के कनिष्ठ भ्राता थे। २ कुछ अन्य विद्वान् पाणिनि पिङ्गल और निरुक्तकार यास्क को लगभग समकालिक ही मानते हैं ३ । श्रीयुधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार पाणिनि के मामा का नाम व्याडि था। इन्होंने पाणिनीय व्याकरण के दार्श- निकपक्ष पर एक लाख श्लोकों में 'संग्रह' नामक ग्रन्थ रचा था जो अब बहुत काल से सर्वथा लुप्त हो चुका है। महाभाष्य और काशिका के अनुसार पाणिनि ने अपना ग्रन्थ अनेक शिष्यों को कई बार पढ़ाया था। ४ भाष्य में इन के एक शिष्य कौत्स का उल्लेख भी मिलता है। ५ राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में एक जनश्रुति का उल्लेख किया है जिस के अनुसार पाणिनि की विद्वत्ता की परीक्षा पाटलिपुत्र में हुई थी और उस के बाद ही उन्हें प्रसिद्धि प्राप्त हुई। ६ महामुनि पाणिनि जैसा वैयाकरण संसार में फिर आज तक उत्पन्न नहीं १. अथ कालेन वर्षस्य शिष्यवर्गो महानभूत्, तत्रैकः पाणिनिर्नाम जड़बुद्धितरोऽभवत् । स शुश्रूषापरिक्लिष्टः प्रेषितो वर्षभार्यया, अगच्छत्तपसे खिन्नो विद्याकामो हिमालयम् ॥ (कथासरित्सागर, निर्णयसागर, पृष्ठ ८) २. ऋक्सर्वानुक्रमणी के वृत्तिकार षड्गुरुशिष्य अपनी वेदार्थदीपिका में लिखते हैं— तथा च सूत्र्यते भगवता पिङ्गलेन पाणिन्यनुजेन—क्वचिन्नवकाश्चत्वारः (पिङ्गल- सूत्र ३.३३) इति परिभाषा। ३. यास्क ने निरुक्त १.१७ पर पाणिनि का परः संनिकर्षः संहिता (१.४.१०८) सूत्र उद्धृत किया है। पिङ्गल उरोबृहतीति यास्कस्य (छन्द-सूत्र ३.३०) में यास्क का स्मरण करते हैं। पाणिनि ने ६.२.८५ के गण में पिङ्गल का तथा ४.३.७३ के गण में पिङ्गलकृत छन्दोविचिति का स्मरण किया है। यस्कादिभ्यो गोत्रे (२.४.६३) में यास्क का भी उल्लेख किया है। अतः इन प्रमाणों के आलोक में श्रीयुधिष्ठिर मीमांसक आदि इन तीनों की समकालिकता का प्रतिपादन करते हैं। देखें— संस्कृतव्याकरणशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग (पृष्ठ २०४)। ४. उभयथा ह्याचार्येण शिष्याः सूत्रं प्रतिपादिताः। केचिदाकडारादेका संज्ञा इति, केचित् प्राक्कडारात् परं कार्यमिति—(महाभाष्य १.४.१)। पूर्वपाणिनीयाः, अपरपाणिनीयाः—(काशिका ६.२.१०४) । ५ उपसेदिवान् कौत्सः पाणिनिम्—(महाभाष्य ३.२.१०८)। अनूचान् कौत्सः पाणिनिम्, उपशुश्रुवान् कौत्सः पाणिनिम्—(काशिका ३.२.१०८) । ६. श्रूयते च पाटलिपुत्रे शास्त्रकारपरीक्षा । अत्रोपवर्षवर्षाविह पाणिनिपिङ्गलाविह व्याडिः । वररुचिपतञ्जली इह परीक्षिताः ख्यातिमुपजग्मुः ।

[६]

हुआ। साङ्गोपाङ्ग वेद, उस की अनेकविध शाखाएं, ब्राह्मण साहित्य, उपनिषत्, कल्प, ज्योतिष्, इतिहास, कोष, विविधकलात्मक ग्रन्थ, काव्यनाटक, नानाविध देशीय वा प्रान्तीय लोकभाषाओं के सूक्ष्मप्रभेदक प्रवन्ध—इस प्रकार न जाने अन्य भी कितना विशाल वाङ्मय उन के अध्ययन और मनन का विषय रहा होगा इस की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती । उन का निःसन्देह लोक एवं वेद पर समानरूप से अधिकार था। वे अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ अष्टाध्यायी में प्रत्यक्षतः वा अप्रत्यक्षतः सैकड़ों व्यक्तियों, ग्रन्थों, ग्रामों, जनपदों और स्थानों का स्मरण करते हैं¹ जिन से तत्कालीन संस्कृति, इतिहास, समाजव्यवस्था तथा राजनैतिक अवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस में कुछ सन्देह नहीं कि उन्हें तत्कालीन इतिहासपरम्परा, साहित्य, कला, दर्शन आदि का पूर्ण ज्ञान था। सचमुच वे अलौकिकप्रतिभाशाली व्यक्ति थे।² उन जैसे व्यक्ति को जन्म दे कर भारत का मुख चिरकाल तक उज्ज्वल रहेगा। इस प्रकार के व्यक्ति सृष्टि में बार बार उत्पन्न नहीं होते। एक सुभाषित के अनुसार उन का निधन एक जङ्गली सिंह के कारण हुआ माना जाता है³। वैयाकरणों में प्रसिद्धि है कि उन का निधन त्रयोदशी के दिन हुआ था। मास और पक्ष ज्ञात न होने से प्राचीन परिपाटी के पण्डित अब भी प्रत्येक त्रयोदशी के दिन व्याकरण का अनध्याय मनाते हैं। पाणिनि के व्याकरण का सम्भवतः उस की विशेषताओं के कारण बहुत शीघ्र प्रचार वा प्रसार हुआ। लोगों ने पाणिनीयव्याकरण के आगे पूर्वप्रचलित ऐन्द्र आदि सब व्याकरणों को तुच्छ वा हेय समझा। पाणिनि से कतिपय शताब्दी बाद कात्यायन ने अपने वार्त्तिकों द्वारा पाणिनि के सूत्रार्थों वा गुप्त आशयों को भली-भांति प्रकट


१. निदर्शनार्थ यथा — वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन् (४.३.९८) ; कठचरकाल्लुक् (४.३.१०७) ; पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः (४.३.११०) ; तित्तिरिचरतन्तुखण्डिको- खाच्छण् (४.३.१०२) ; काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यां णिनिः (४.३.१०३) ; पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु (४.३.१०५) ; शौनकादिभ्यश्छन्दसि (४.३.१०६) ; कर्मन्दकृशाश्वादिनिः (४.३.१११) ; सिन्धुतक्षशिलादिभ्योऽणञौ (४.३.९३) ; लोपः शाकल्यस्य (८.३.१९) ; लङः शाकटायनस्यैव (३.४.१११) ; ऋतो भारद्वाजस्य (७.२.६३) ; अङ् गार्ग्यगालवयोः (७.३.९९) इत्यादि । २. पाणिनीयव्याकरण मानवीय मस्तिष्क की सब से बड़ी रचनाओं में से एक है— (लेनिनग्राड के प्रो० टी० शेरवात्सकी) । संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है। यह मानवीय मस्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आविष्कार है—(सर W. W. हण्टर) । पाणिनीयव्याकरण उस मानवमस्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा—(मोनियर विलियम्स) । ३. सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत् प्राणान् प्रियान् पाणिनेः—(पञ्चतन्त्र २.३६) ।

[१०]

किया। सूत्रकारद्वारा विस्मृत या अदृष्ट विषयों पर भी उन्होंने पर्याप्त प्रकाश डाला।१ कात्यायन को वार्त्तिककार वा वाक्यकार भी कहा जाता है। कुछ लोगों का विश्वास है कि वार्त्तिककार एक नहीं अनेक हुए हैं, कात्यायन उन सब में अन्तिम थे। कात्या- यन के कुछ शताब्दी बाद महामुनि पतञ्जलि ने पाणिनीयव्याकरण को परिष्कृत करने का अपूर्व कार्य कर इस व्याकरण की कीर्तिपताका चहु दिशाओं में फहरा दी। पाणि- नीयव्याकरण पर पतञ्जलि का लिखा महाभाष्य नामक ग्रन्थ अत्यन्त प्रामाणिक और अपनी प्रवाहपूर्ण सरलतम शैली का अपूर्व भाष्य है। पतञ्जलि का समय पाश्चात्यों की दृष्टि में ईसापूर्व १५० के लगभग बहुसम्मत है। पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि ये तीनों पाणिनीय व्याकरण के प्रमुख आचार्य या मुनित्रय कहलाते हैं। इस व्याकरण में इन का ही प्रामाण्य स्वीकार किया जाता है। इन में भी उत्तरोत्तर मुनि पूर्वपूर्व से अधिक प्रामाणिक माना जाता है। अत एव कहा जाता है—उत्तरोत्तर मुनीनां प्रामाण्यम्। इस प्रकार सैकड़ों वर्षों तक पाणिनीयव्याकरण अपने असली रूप अर्थात् अष्टाध्यायीसूत्रपाठ के क्रमानुसार पठनपाठन में प्रचलित रहा। परन्तु जब संस्कृत का स्थान अपभ्रंश वा प्राकृत आदि भाषाओं ने लेना शुरू किया और संस्कृत केवल साहित्य में ही प्रयुक्त होने वाली शिष्टभाषा मात्र रह गई तब लोगों को ज़रा असु- गमता का भास हुआ। तब सूत्रक्रम के साथ प्रक्रियाक्रम का भी प्रचलन आरम्भ हुआ। इस के फलस्वरूप पाणिनिसूत्रों का आश्रय करते हुए रूपावतार, प्रक्रियाकौमुदी, प्रक्रियासर्वस्व, सिद्धान्तकौमुदी आदि अनेक ग्रन्थ बने। परन्तु जिस प्रकार पाणिनि का व्याकरण अपने से पूर्ववर्त्ती सब व्याकरणों में मूर्द्धस्थानीय बन पड़ा था, ठीक उसी प्रकार भट्टोजिदीक्षित की सिद्धान्तकौमुदी भी प्रक्रियामार्ग का सर्वोत्तम ग्रन्थ बनी। दीक्षितजी की यह कृति प्रक्रियामार्ग की पराकाष्ठा वा चरमसीमा समझनी चाहिये। इस में अष्टाध्यायी के समस्त सूत्रों का प्रक्रियानुसार भिन्न क्रम से समावेश है। अत एव भारत में उन के ग्रन्थ का महान् आदर हुआ और वह पठनपाठन में शीघ्र प्रच- लित हो गया। दीक्षितजी पाणिनीयव्याकरण में कृतभूरिपरिश्रम थे। अष्टाध्यायी- सूत्रक्रमानुसार लिखा गया उन का शब्दकौस्तुभ नामक ग्रन्थ उन के पाण्डित्य का परि- चायक है। भट्टोजिदीक्षित का काल ईसा की सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। ये महाराष्ट्र ब्राह्मण थे परन्तु इन का निवास काशी में था। इन के पिता का नाम लक्ष्मीधर पण्डित तथा गुरु का नाम शेषकृष्ण था। दीक्षितजी के पुत्र भानु- जिदीक्षित की अमरकोष पर व्याख्यासुधा नामक व्याख्या अत्यन्त प्रसिद्ध है। इन के १. यद् विस्मृतमदृष्टं वा सूत्रकारेण तत्स्फुटम्। वाक्यकारो ब्रवीत्येष तेनादृष्टं च भाष्यकृत् ॥ उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्त्तते । तं ग्रन्थं वार्त्तिकम्प्राहुर्वार्त्तिकज्ञा विचक्षणाः ॥

पौत्र हरिदीक्षित सुप्रसिद्ध वैयाकरण नागेशभट्ट के गुरु थे। दीक्षितजी केवल वैयाकरण ही न थे किन्तु धर्मशास्त्र, कर्मकाण्ड आदि के भी महापण्डित थे। इन के बनाये ग्रन्थों की संख्या ३१ बताई जाती है। इन्ही दीक्षितजी के शिष्य वरदराज ने¹ आरम्भ से ही सिद्धान्तकौमुदी के अध्ययन मे विद्यार्थियो की असमर्थता को देखते हुए मध्यसिद्धान्तकौमुदी (मध्यकौमुदी) और लघुसिद्धान्तकौमुदी (लघुकौमुदी) नामक दो ग्रन्थ सिद्धान्तकौमुदी को संक्षिप्त कर के लिखे। इन्हें सिद्धान्तकौमुदी का संक्षिप्त संस्करण भी कहा जा सकता है। सिद्धान्तकौमुदी मे जहां पाणिनि के समस्त ३६६५ सूत्र व्याख्यात हैं वहां मध्यकौमुदी में २३१५ तथा लघुकौमुदी मे १२७२ सूत्र गुम्फित किये गये हैं। वरदराज का ध्येय पाणिनीयव्याकरण में बालकों को सरलता से प्रवेश कराना था। यह बात दोनों ग्रन्थों के आरम्भ में स्वयं उन्होंने स्वीकार की है²। इन दोनों संक्षिप्त संस्करणों में लघु- सिद्धान्तकौमुदी (लघुकौमुदी) नामक ग्रन्थ विशेषरूप से प्रचलित हुआ है। इस ग्रन्थ से पाणिनीयव्याकरणरूप महाप्रासाद के प्रत्येक अङ्ग का संक्षिप्त पर पर्याप्त उपयोगी परिचय छात्र को प्राप्त हो जाता है। प्रायः विद्यार्थी प्रारम्भ में एक-दो वर्षों में इसे पढ़ कर तदनन्तर सिद्धान्तकौमुदी के अध्ययन मे प्रवृत्त हुआ करते हैं। १. वरदराज का काल भी दीक्षितजी वाला काल है। वरदराज दाक्षिणात्य थे। इन के पिता का नाम दुर्गातनय था। इन्होंने मध्यकौमुदी और लघुकौमुदी के अतिरिक्त सारकौमुदी और गीर्वाणपदमञ्जरी नामक अन्य दो ग्रन्थ भी लिखे हैं। वरदराज ने यद्यपि सिद्धान्तकौमुदी का संक्षिप्त संस्करण ही लघु- कौमुदी बनाया है तथापि प्रकरणों की दृष्टि से लघुकौमुदी का क्रम सिद्धान्त- कौमुदी के क्रम से बहुत श्रेष्ठ है। सिद्धान्तकौमुदी में अव्ययप्रकरण के बाद स्त्री- प्रत्ययप्रकरण प्रारम्भ होता है, पर लघुकौमुदी में स्त्रीप्रत्ययप्रकरण सब प्रकरणों के अन्त में रखा गया है—और यह उचित भी है, क्योंकि बिना कृत्, तद्धित और समास आदि का ज्ञान प्राप्त किये स्त्रीप्रत्ययप्रकरण के—टिङ्ढाणञ्०, ऋन्निकारा- दक्तिनः, द्विगोः, प्राचां ष्फस्तद्धितः, बहुव्रीहेरूथसो ङीप् आदि सूत्रों का समझना अतीव दुष्कर है। इसी प्रकार कारकप्रकरण के विषय में भी समझना चाहिये। कारकप्रकरणगत कर्तृकरणयोस्तृतीया, अकथितञ्च आदि सूत्र तथा अभिहित अन- भिहित आदि की व्यवस्था बिना तिङन्त और कृदन्त प्रकरणों के ज्ञान के सम- झनी कठिन है। अतः वरदराज ने तिङन्त और कृदन्त प्रकरणों के अनन्तर ही कारकप्रकरण को रखा है। २. नत्वा वरदराजः श्रीगुरून् भट्टोजिदीक्षितान्। करोति पाणिनीयानां मध्य-सिद्धान्त-कौमुदीम् ॥ (म०कौ०) नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्। पाणिनीयप्रवेशाय लघु-सिद्धान्त-कौमुदीम् ॥ (ल०कौ०)

[१२] लघुकौमुदी वा सिद्धान्तकौमुदी पर—जहाँ तक मेरा विचार है—अभी तक कोई आधुनिक ढंग पर विश्लेषणात्मक मर्म समझाने वाली परिष्कृत वैज्ञानिक ढंग से विस्तृत हिन्दीव्याख्या नहीं निकली, जो थोड़ी बहुत हिन्दीव्याख्याएं मिलती भी हैं वे प्राय सब पुरानी शैली की केवल संस्कृतशब्दों के स्थान पर हिन्दी-पर्याय रख देने मात्र में ही सन्तोष प्रकट करने वाली हैं। ग्रन्थकार के एक एक शब्द वा विचार का विस्फोरण कर पाठकों के हृदयों पर उसे अङ्कित कर देने का तो किसी को विचार ही उपस्थित नहीं हुआ। उदाहरणार्थ आप—स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था; नप्तादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्; अष्टभ्य इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसो- विषय आत्वं ज्ञापयति—इत्यादि स्थलों को उन टीकाओं में देखें, आप सन्तुष्ट नहीं हो सकेंगे। आज भारत स्वतन्त्र है। इस की राष्ट्रभाषा प्रधानतया हिन्दी है। परन्तु हिन्दी अपने शब्दभण्डार के लिये संस्कृत से ही सदा अनुप्राणित होती चली आ रही है। अतः बिना संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त किये हिन्दी में प्रौढता प्राप्त करना दुष्कर ही नहीं वरन् असम्भव सा है। इसलिये संस्कृत के प्रचारार्थ हिन्दी में मुख्यतया संस्कृतव्याकरण के ऊंचे से ऊंचे ज्ञानवर्धक वा शोधपूर्ण ग्रन्थ सरल से सरल भाषा में प्रकाशित करने चाहियें। यह व्याख्या इसी ध्येय को सामने रखते हुए लिखी गई है। इस में मुख्यदृष्टि पदे पदे भावाशयविस्फोरण और शोध पर ही केन्द्रित रही है। ग्रन्थकार के अन्तस्तल तक पाठकों को पहुंचाना इस व्याख्या का मुख्य उद्देश्य रहा है। मूल में जहां जहां कोई कठिन स्थल आया है वहां वहां ग्रन्थविस्तार का भय छोड़ कर उसका पूरा पूरा विवरण प्रस्तुत किया गया है। ऊपर के उद्धृत स्थलों को आप इस व्याख्या में देख कर अनुभव करेंगे कि अब इस विषय पर कुछ भी कहना शेष नहीं रहा। यह व्याख्या सार्वजनीन अर्थात् सब लोगों के लिये उपयोगी है। इसे अत्यल्प- मति विद्यार्थी, प्रौढ विद्यार्थी, व्युत्पन्न छात्र, व्याकरणप्रेमी, अध्यापक, शोधरत विद्वज्जन—जो भी देखेंगे अपने अपने सामर्थ्यानुकूल पूर्ण उपयोगी पाएंगे। अध्यापक यदि इस का स्वयं सम्यगवलोकन कर विद्यार्थियों को पाठ पढ़ायेंगे तो वे ग्रन्थकार का आशय अपने छात्रों के हृदयपटल पर अतिशीघ्र अङ्कित करने में पूर्ण समर्थ हो सकेंगे। इसी प्रकार यदि छात्र अपने अध्यापकों से ग्रन्थ का पाठ पढ़ कर इस व्या- ख्या का अवलोकन करेंगे तो उन्हें निश्चय ही अपूर्व लाभ होगा। एवं शोधप्रिय विदेशी वा स्वदेशी विद्वानों के लिये भी यह समानरूपेण उपयुक्त सिद्ध होगी। इस व्याख्या में व्याकरण जैसे कठिन विषय को सरल से सरल बना कर प्रस्तुत करने का पूरा पूरा प्रयास किया गया है। अनेक विवादास्पद स्थलों का स्पष्टी- करण करते हुए भिन्न भिन्न विद्वानों की सम्मति भलीभांति दे कर अपनी सम्मति भी स्पष्टरूपेण अङ्कित कर दी है। कई कठिन स्थल अत्यन्त सरल रीति से लौकिक

[१३] उदाहरण दे कर स्पष्ट किये गये हैं । यथा—न लुमताङ्गस्य की अनित्यता वाला स्थल, स्थानिवद्भाव मे अनल्विधौ वाला अंश, अन्वादेशव्याख्या आदि । इस भैमीव्याख्या की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नस्थ हैं— (१) सूत्रार्थ; (२) अभ्यास; (३) शब्दसूचियां; (४) अव्ययप्रकरण । (१) सूत्रार्थ— जहां तक हमें ज्ञात है कि लघुकौमुदी के किसी टीकाकार ने सूत्र से अर्थ कैसे उत्पन्न होता है—इस पर कुछ भी विचार नहीं किया । लघुकौमुदी तो क्या सिद्धान्तकौमुदी तक के कुछ टीकाकारों को छोड़ कर प्रायः सब व्याख्याताओं ने इस विशेषता की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया । तीन अक्षरों के सूत्र का पैंतीस अक्षरों वाला अर्थ कैसे हो गया—यह वे नहीं बताते । केवल वृत्ति को घोट कर सूत्रार्थ का स्मरण करना महान् दोषवह है । अनेक अच्छे-अच्छे व्युत्पन्न विद्यार्थी देखे जाते हैं जो प्रत्येक सूत्र का अर्थ तो बता सकते हैं परन्तु सूत्र का पदच्छेद तक नहीं कर सकते । यह सारा दोष केवलमात्र वृत्ति घोटने (रटने) का है । हमारे विचार में तो प्रत्येक विद्यार्थी को व्याकरण अध्ययन करने से पूर्व पाणिनि का अष्टाध्यायीसूत्रपाठ क्रम- पूर्वक कण्ठस्थ करना चाहिये । इस से वृत्ति रटने की आवश्यकता ही नहीं रहती, केवल- मात्र वृत्ति को समझ लेना ही पर्याप्त होता है, क्योंकि सूत्रों का पौर्वापर्य तो विदित होता ही है । यदि अष्टाध्यायीसूत्रपाठ कण्ठस्थ न भी हो तो भी उसे पास अवश्य रखना चाहिये और कौमुदी का प्रत्येक सूत्र उस में देख लेना चाहिये । हमारी यह निश्चित धारणा है कि बिना अष्टाध्यायीसूत्रक्रम जाने प्रक्रियामार्ग से पूर्वत्रासिद्धम्, एक- सञ्ज्ञाधिकार, एकदेशाधिकार, भसंज्ञा, पदसंज्ञा, तद्धितश्चासर्वविभक्तिः वाला परिगणन आदि अनेक सूत्र वा स्थल कौमुदी-अध्येता को ठीक-ठीक रीति से कदापि हृदयंगम नहीं हो सकते । इस के अतिरिक्त अष्टाध्यायी में दर्जनों प्रकरण अपने अपने स्थान पर एकत्र अवस्थित हैं । आप को यदि प्रक्रिया में कोई सूत्र भूल जाये या सन्देह पड़ जाये तो आप अष्टाध्यायी का वह सम्पूर्ण प्रकरण मन में पढ़ सकते या ग्रन्थ में देख सकते हैं, तुरन्त सन्देह मिट जायेगा और वह विस्मृत सूत्र याद आ जायेगा । यथा आप को कहीं प्रक्रिया में इत्सञ्ज्ञक सूत्र के विषय में सन्देह है तो आप अष्टाध्यायी का वह प्रकरण मन ही मन पढ़ कर अपना सन्देह निवारण कर सकते हैं । अष्टाध्यायी का इत्सञ्ज्ञक- प्रकरण प्रथमाध्याय के तृतीयपाद के आरम्भ में निम्नप्रकारेण पढ़ा गया है— ⎧ उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२) ⎪ हलन्त्यम् (१.३.३) ⎪ न विभक्तौ तुस्माः (१.३.४) ⎨ आदिर्ञिटुडवः (१.३.५) ⎪ षः प्रत्ययस्य (१.३.६) ⎪ चुटू (१.३.७) ⎪ लशक्वतद्धिते (१.३.८) ⎩ तस्य लोपः (१.३.६)

[१४]

इस स्थान के अतिरिक्त इत्सञ्ज्ञाविषयक सूत्र आपको अन्यत्र कही भी अष्टाध्यायी मे नही मिलेगा। यह विशेषता प्रक्रियामार्गगामी कौमुदी आदि ग्रन्थो मे उत्पन्न नही की जा सकती। इसी प्रकार-णत्व, षत्व, क्त्वि, पित्व, प्रगृह्यसञ्ज्ञा, आत्मनेपदप्रक्रिया, परस्मैपदप्रक्रिया, समासान्त, एकसञ्ज्ञाधिकार, एकादेशाधिकार, इड्विधान आदि दर्जनो प्रकरण आपको अष्टाध्यायी म एव ही स्थान पर मिल सकेंगे । अत एव पटना कालेज के व्याकरणशास्त्र के प्रधानाध्यापक श्रीपण्डित हरिशङ्करशर्मा पाण्डेय स्वनिर्मित आर्ष पाणिनीय व्याकरणम् म इस विषय पर अत्यन्त मार्मिक लेखनी उठाते हुए लिखते हैं— यच्छास्त्रं षड्भिर्दिनैः कतिपयैः क्रीडामनस्कैरपि स्वाचार्याश्रमवासिभिः सरलया रीत्या पुराऽधीयते । गुर्वर्थं परिपूर्णमुत्तमधिया सङ्क्षिप्तकायञ्च यत् तत्कीदृग्विपरितरूपमधुना हा हन्त ! जोघुष्यते ॥ तदिदानीं महाकाय भीमरूप गृहीतवत् । यद् दृष्ट्वा प्रपलायन्ते बालाः कोमलबुद्धयः ॥ योऽप्याग्रहेण पठति पाणिनिश्रमवर्जितम् । तदवश्य स सम्पूर्ण यापयत्यत्र जीवितम् ॥ अपि विद्वद्वरा धीरा निजशिष्यायुषः क्षयम् । रात्रिन्दिव जायमान मनागपि न पश्यथ ! ॥ तस्मात्क्रमेण सूत्राणि पठनीयानि यत्नतः । अनुवृत्त्यादिसौकर्यात्तदर्थोऽपि न दुर्ग्रहः ॥ पाणिनीयपठनाय पाणिनेर्यः श्रमः स न कदापि हीयताम् । वृत्तिघोषममहापरिश्रमान्मुक्तिरेव फलमस्य दृश्यताम् ॥ तो हम ने इस व्याख्या मे लघुकौमुदी के प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, पदो का विभक्तिवचन, पिछले सूत्रो से आ रहे अनुवर्त्तित पद और उन का विभक्ति-वचन, समास और आवश्यक प्रत्यय तथा परिभाषाओ के कारण होने वाले परिवर्त्तनो का पूरा-पूरा वर्णन किया है । इस के पढने से विद्यार्थियो के हृदय मे सूत्रार्थ के प्रति तनिक भी सन्देह शेष नही रह जाता—वह सूत्र के अन्दर तक घुस कर स्वय ही वृत्ति वाला अर्थ निकाल सकता है। हमारे ध्यान मे आज तक इस प्रकार का प्रयत्न लघुकौमुदी पर कही नही किया गया ।१


१ सन् १६५० म इस भैमीव्याख्या के प्रथमसस्करण के प्रकाशित होने के बाद कई लोगो ने इस व्याख्या की नकल करने की बहुविध चेष्टाए की, जिन मे वे बुरी तरह से असफल हुए। कारण यह है कि अष्टाध्यायी तो उन्हें कण्ठस्थ थी नही तथा आर्षपाठ- विधि मे भी वे सर्वथा अनभिज्ञ थे। बनारस से प्रकाशित लघुकोमुदी के एक टीकाकार ने तो हमारी व्याख्या की शतश पङ्क्तियो को चुरा कर अपनी टीका को सजाया

[१५] (२) अभ्यास— इस ग्रन्थ की दूसरी बड़ी विशेषता अभ्यास हैं। प्रायः प्रत्येक प्रकरण वा अवान्तर-प्राकरणिक विषय के अन्त में 'अभ्यास' जोड़ दिया गया है। ये अभ्यास साधारण पुस्तकों के अभ्यासों की तरह नहीं हैं, किन्तु महान् परिश्रम से जुटाए गये अभ्यास हैं। सन्धिप्रकरण के अभ्यासों में आप ऐसे अनेक उदाहरण पाएगे—जो अन्यत्र मिलने दुर्लभ हैं। इसी प्रकार अन्य अभ्यासों में भी विद्यार्थियों की ज्ञानवृद्धि के लिये अनेक भ्रमोत्पादक रूप भ्रमोच्छेदपूर्वक बड़े परिश्रम से सङ्गृहीत किये गये है, इन्हें देख कर विद्वत्समाज को निश्चय ही सन्तोष होगा। हमारी यह धारणा है कि यदि इन अभ्यासों को कोई छात्र युक्तरीत्या अभ्यस्त (हल) कर ले तो वह साधारण सिद्धान्तकौमुदी पढ़े-लिखे छात्र से कहीं अधिक व्युत्पन्न होगा। विद्यार्थियों को इन अभ्यासों का पुनः-पुनः मनन करना चाहिये। व्याख्यागत सभी विशिष्ट बातें प्रायः इन अभ्यासों में प्रश्नरूप से पूछ ली गई है। (३) शब्दसूची— इस व्याख्या की तीसरी असाधारण विशेषता है—शब्दसूची। आपको आज तक के मुद्रित व्याकरणग्रन्थों में इस प्रकार का प्रयत्न कहीं भी किया गया नहीं मिलेगा। इन शब्दसूचियों का उद्देश्य विद्यार्थियों को अनुवादादि के लिये अत्यन्त उपयोगिशब्दसङ्ग्रह प्रदान करना है। इन सूचियों में प्रायः दो हजार (२०००) चुने हुए शब्दों का सार्थ सङ्ग्रह किया गया है। इन में से कई सूचियां तो अत्यन्त कठोर परिश्रम से सङ्ग्रह की गई हैं। शब्दों के प्रायः लोकप्रचलित प्रसिद्ध अर्थ ही दिये गये हैं। विशेष विशेष स्थानों पर काव्य-कोष आदि के वचन भी टिप्पणरूपेण दे दिये हैं। विद्यार्थियों के सुभीते के लिये णत्वप्रक्रियानिर्देशक चिह्न भी सर्वत्र लगा दिये हैं। (४) अव्ययप्रकरण— इस व्याख्या की चौथी बड़ी तथा सब से अधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है— अव्ययप्रकरण। आप को कहीं भी इस प्रकार की व्याख्या सहित यह प्रकरण देखने को नहीं मिलेगा। प्रत्येक अव्यय का विस्तृत अर्थ उस का साहित्यगत उदाहरण [जहां तक हो सका है किसी प्रसिद्ध सूक्ति वा सुभाषित को ही चुना गया है] तथा तद्विषयक विस्तृत शोधपूर्ण टिप्पण आप इस प्रकरण में देख सकेंगे। लघुकौमुदी के डेढ़ पृष्ठ का यह प्रकरण इस व्याख्या के ७८ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। प्रथमसंस्करण में जहां इस व्याख्या में तीन सौ अव्ययों का संकलन था वहां अब द्वितीयसंस्करण में सवा पांच सौ अव्ययों का व्याख्यान किया गया है। इस प्रकरण के कई अव्यय तो बड़े विवाद का विषय बने हुए हैं—उन सब का भी यथास्थान पूर्णरीत्या स्पष्टीकरण किया गया है। और चाटुकारिता से राजकीय सम्मान भी पा लिया पर उन्हें ज़रा भी लज्जा नहीं आई कि जिस का माल चुरा रहा हूं उस का कहीं परोक्ष रूप से नामनिर्देश तो कर दूं—यह है आज के युग के लेखकों की नैतिकता।

[१६] इन में कतिपय अव्ययों पर कई कई मास तक सोच विचार किया गया है और कई आदरणीय विद्वानों की सम्मति भी ली गई है। इस प्रकरण को लिखने में सब से बड़ी सहायता हमारे विशाल संस्कृत पुस्तकालय की है जिस में हम ने प्रायः पञ्च सहस्र संस्कृतग्रन्थ अपना सम्पूर्ण जीवन लगा कर संगृहीत किये हैं। इन विशेषताओं के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की छोटी-मोटी विशेषताओं का भी यह ग्रन्थ आगार है। जैसे लघुकौमुदी में आये प्रत्येक शब्द की पूरी पूरी रूप- माला इस में दी गई है, किसी शब्द पर तद्वत् नहीं लिखा गया। प्रत्येक स्थान पर ढेरों उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं ताकि विद्यार्थियों को विषय हृदयंगम हो सके। अकेले इको यणचि सूत्र पर ही पचास उदाहरण दिये गये हैं। सन्धिप्रकरण में इस तरह एक हजार नये उदाहरण अभ्यासार्थ दिये गये हैं। अव्ययप्रकरण में उदाहृत लगभग पन्द्रह सौ सुभाषितों वा विशेष वचनों के मूलग्रन्थ और पते पूरी तरह ढूंढ ढूंढ कर निर्दिष्ट किये गये हैं। कठिन सुभाषितों के हिन्दी में अर्थ भी दिये गये हैं। सूत्र, वार्त्तिक तथा परिभाषा आदियों की सूची के साथ साथ तीन सौ सुबन्त शब्दों और सवा पाच सौ अव्ययों की भी वर्णानुक्रमणी इस संस्करण में उद्दृङ्कित की गई है ताकि विद्यार्थियों को किसी अव्यय या सुबन्त के ढूंढने में कठिनाई न हो। भैमीव्याख्या के प्रथम भाग का यह द्वितीयसंस्करण है। इस संस्करण में प्रथमसंस्करण की अपेक्षा लगभग डेढ सौ पृष्ठों की ठोस सामग्री अधिक है। दो सौ के करीब शोधपूर्ण नये टिप्पण वा फुटनोट्स और जोड़े गये हैं। इस ग्रन्थ के शोधन में भी विशेष प्रयत्न किया गया है। कतिपय अनिवार्य मानव-सुलभ भूलों को छोड़ कर प्राय यह ग्रन्थ लेखक के अपने तत्त्वावधान में अतीव शुद्ध छपा है। ग्रन्थमुद्रापण में लेखक को अपने दो पुत्रों— पतञ्जलिकुमार भाटिया शास्त्री तथा अश्विनोकुमार शास्त्री —से विशेष सहायता मिली है। इस ग्रन्थ का प्रथमसंस्करण श्री पं० दीनानाथजी शास्त्री सारस्वत भूतपूर्व प्रिंसिपल सनातनधर्मकालेज मुलतान के तत्त्वावधान में छपा था। हमें बड़ा दुःख है कि आदरणीय शास्त्रीजी अब इस द्वितीयसंस्करण के समय अपनी इहलीला समाप्त कर परलोक सिधार चुके हैं। अतः अब उन से साहाय्य नहीं लिया जा सका। पर उन की प्रेरणा और शुभ कामनाएं हमेशा हमारे साथ रही हैं और रहेंगी—इस में तनिक भी सन्देह नहीं। यह है हमारा आत्मनिवेदन। अब आगे पाठकों का काम है कि लेखक को उत्साहित कर आगे सेवा करने का अवसर दें या न दें। मुख्यों स्ट्रीट सुरभारती-समुपासक गांधीनगर, दिल्ली-११००३१ भीमसेन शास्त्री विजयदशमी (१६.१०.१९८३)

ॐ श्रीमद्वरदराजाचार्यप्रणीता लघु-सिद्धान्त-कौमुदी श्रीभीमसेनशास्त्रिनिर्मितया भैमीव्याख्ययोद्भासिता [ पूर्वार्धम् ] --: :०: :-- (व्याख्याकर्तृमङ्गलाचरणम्) प्राप्यतेऽन्विष्यमाणो न यः कुत्रचिद् योगिविद्वज्जनैर्हा कुतोऽन्यैर्नरैः। आदिमध्यान्तशून्यं प्रभुं निर्गुणं स्वस्य चित्तोपशान्त्यै तमेवाश्रये ॥ १ ॥ सर्वाऽभिलाप - दातारं शरणाऽगत - तारकम् । अभिलाषशतं त्यक्त्वा प्रपन्नोऽस्मि जगद्गुरुम् ॥ २ ॥ व्याख्याता सूरिभिः कामं, लघुसिद्धान्तकौमुदी । भाषाटीका तथाप्यस्या बोधदा नैव दृश्यते ॥ ३ ॥ अक्षरार्थपराः सर्वे विमुखा भाववर्णनात् । वृथाऽनपेक्षं जल्पन्तः पाण्डित्यमदगर्विताः ॥ ४ ॥ तेभ्यः खिन्नो विनोदाय बालानामुपकारिणीम् । स्वाधीतस्य प्रचाराय टीकामेतां करोम्यहम् ॥ ५ ॥ सुस्पष्टपदलालित्यं सुष्ठु भावस्य कीर्तनम् । वटून् दृष्ट्वा कृतं सर्वं न च पाण्डित्यगर्वतः ॥ ६ ॥ टीकामेतां जगद् दृष्ट्वा गदिष्यत्येकया गिरा । बालानामुपकारोऽभूद् यः कृतो नैव केनचित् ॥ ७ ॥ कृपा स्याज्जगदीशस्य यत्नो मे सफलो भवेत् । यतो मौर्ख्याभिभूतस्य को देवादपरोऽस्ति मे ॥ ८ ॥

२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम् । पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम् ॥ १ ॥ अन्वय —अहम् (वरदराज ) शुद्धां गुण्यां सरस्वतीं देवीं नत्वा पाणिनीय- प्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीं करोमि । अर्थ --मैं (वरदराज) शुद्ध तथा गुणों से युक्त सरस्वती देवी को नमस्कार कर पाणिनि के बनाये व्याकरणशास्त्र में (बालकों के) प्रवेश के लिये लघुसिद्धान्त- कौमुदी को बनाता हूं। व्याख्या—ज्ञान की अधिष्ठात्री (स्वामिनी) एक देवी मानी जाती है, जिसे सरस्वती कहते हैं। ग्रन्थकार ने आदि में उसे इसलिये नमस्कार किया है कि वह प्रसन्न होकर मेरे ऊपर कृपा करे जिस से मैं ग्रन्थ बनाने में समर्थ हो सकूं । इस ग्रन्थ के बनाने वाले वरदराज नामक पण्डित हैं। इन का सम्पूर्ण वृत्तान्त भूमिका में लिखा है देख लें । जिस से किसी भाषा के शुद्ध अशुद्ध होने का ज्ञान हो उसे उस भाषा का व्याकरण कहते हैं। संस्कृतभाषा के अनेक व्याकरण हैं। यथा—पाणिनीय, कातन्त्र, चान्द्र, मुग्धबोध, सारस्वत आदि । संस्कृतभाषा के सम्पूर्ण व्याकरणों में पाणिनिमुनि का बनाया व्याकरण ही सब से श्रेष्ठ और प्रचलित है। इस के अध्ययन में कठिनता का अनुभव कर वरदराज ने यह लघुसिद्धान्तकौमुदी बनाई है। 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' शब्द का अर्थ कुछ व्याकरण-सिद्धान्तों को चांदनी के समान प्रकाशित करने वाली है। टिप्पणी—गुण्याम् = प्रशस्ता गुणाः सन्त्यस्या इति गुण्या । ताम् = गुण्याम् । [रूपादाहतप्रशंसयोर्यप् (५।२।१२०) इति सूत्रस्थेन अन्येभ्योऽपि दृश्यते इति वार्त्तिकेन यप् ] । पाणिनीयप्रवेशाय— पाणिनिना प्रोक्तम् = पाणिनीयम्, तस्मिन् प्रवेशः =पाणिनीयप्रवेशस्तस्मै = पाणिनीयप्रवेशाय । लघुसिद्धान्तकौमुदी—लघवः = असमग्रा ये सिद्धान्ताः = ऊहापोहकृतनिश्चितविचारास्तेषां कौमुदी = कौमुदीव = चन्द्रिकेव । [अत्रत्यः कौमुदीशब्दः कौमुदीवेत्यर्थे लाक्षणिकः ] । यथा हि ज्योत्स्ना तमो निरस्य सकलभावान् प्रकाशयति, दिनकरकिरणजनितं तापमुपशमयति, तथेयमप्यज्ञानन्दूरीकृत्य महाभाष्यादिदुरुहग्रन्थजनितं तापमुपशमय्य व्याकरणसिद्धान्तान् मानसे प्रकटीकरोतीति सादृश्यम् । अथ संज्ञाप्रकरणम् [लघु०] अइउण् ॥१॥ ऋऌक् ॥२॥ एओङ् ॥३॥ ऐऔच् ॥४॥ हयवरट् ॥५॥ लँण् ॥६॥ ञमङणनम् ॥७॥ झभञ् ॥८॥ घढधष् ॥९॥ जबगडदश् ॥१०॥ खफछठथचटतव् ॥११॥ कपय् ॥१२॥ शषसर् ॥१३॥ हल् ॥१४॥

संज्ञा-प्रकरणम् ३ । इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसञ्ज्ञार्थानि। एषामन्त्या इतः। हकारा- दिष्वकार उच्चारणार्थः। लँण्मध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः॥ अर्थ:—ये चौदह सूत्र माहेश्वर अर्थात् महादेव से आये हुए हैं। इन का प्रयोजन अण् आदि संज्ञा करना है। इन के अन्त्य वर्ण इत्सञ्ज्ञक हैं। हकार आदियों में अकार उच्चारण के लिये है। परन्तु 'लँण्' सूत्र में वह इत्सञ्ज्ञक है। व्याख्या—कहते हैं कि महामुनि पाणिनि विद्यार्थि-अवस्था में अत्यन्त मन्दमति थे। जब इन्हें पढ़ने से भी कुछ ज्ञान न हुआ, तब ये खिन्न हो गुरुकुल छोड़ तपस्या करने के लिये हिमाचल पर चले गये। वहां इन्होंने शिवजी की आराधना की। शिव- जी ने प्रसन्न हो, चौदह बार डमरू बजाया। उस से पाणिनि ने अइउण् आदि चौदह सूत्र प्राप्त किये। इस लिये इन सूत्रों को माहेश्वर अर्थात् महादेव से प्राप्त हुआ कहते हैं। परन्तु कई एक इस बात को प्रमाण-शून्य होने से गलत मानते हैं। उन का कथन है कि इन सूत्रों को बनाने वाले पाणिनि ही हैं¹। परन्तु चाहे कुछ भी क्यों न हो, इतना तो निर्विवाद सिद्ध है कि ये सूत्र पाणिनीय-व्याकरण के प्राण हैं। इन के बिना पाणिनीय-व्याकरण चल ही नहीं सकता। इन का उपयोग आगे चल 'अण्' आदि संज्ञाओं के करने में किया जावेगा। हम वहीं पर इन्हें स्पष्ट करेंगे। जो अन्त में रहे उसे अन्त्य या अन्तिम कहते हैं। इन चौदह सूत्रों के 'ण्, क्, ङ्, च्, ट्, ण्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र्, ल्' ये चौदह वर्ण अन्त्य हैं। इन की इत्संज्ञा है अर्थात् ये इत् नाम वाले हैं। ध्यान रहे कि इस शास्त्र में संज्ञा, संज्ञक और संज्ञी शब्दों का बहुत व्यवहार होता है। जो नाम हो वह संज्ञा और जिसका नाम हो वह संज्ञक या संज्ञी होता है। जैसे 'इस का नाम देवदत्त है' यहां 'देवदत्त' यह शब्द संज्ञा और सामने खड़ा हुआ हाड मांस वाला लम्बा चौड़ा मनुष्य संज्ञक या संज्ञी है। इसी प्रकार यहां ण्, क् आदि संज्ञक या संज्ञी होंगे और 'इत्' यह संज्ञा होगी। प्रत्येक वस्तु की संज्ञा व्यवहार की आसानी के लिये ही होती है; यथा मेरी संज्ञा 'भीमसेन' है। इस से यह होगा कि लोग मुझे व्यवहार में आसानी से ला सकेंगे। कोई मुझे बुलाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! आओ'; कोई मुझे पढ़ाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! पढ़ो'; कोई खिलाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! खाओ'; कोई मेरा पता पूछेगा तो कहेगा 'भीमसेन कहां हैं ?' अब कल्पना करें कि यदि मेरा कोई नाम न होता तो जिस ने मुझे बुलाना होता वह दूसरे के प्रति क्या कहता ? कि 'उस दुबले पतले मनुष्य को जिस का रङ्ग ऐसा २ है, सिर पर अमुक २ रङ्ग की टोपी है, पैर में फलां प्रकार का जूता है, लाओ'। तब सम्भव है कि सुनने वाला पुरुष उसे न समझ पाता। अथवा मेरी जगह किसी अन्य को ला खड़ा करता; तो कहने का तात्पर्य यह है कि नाम अर्थात् संज्ञा के बिना न तो जगत् का व्यवहार और न ही शास्त्र का व्यवहार चल १. इस विषय पर प्रत्याहार-सूत्रों का निर्माता कौन ? नामक हमारा लघुशोधनिबन्ध देखें, जो भैमी प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हो चुका है।