लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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किया। सूत्रकारद्वारा विस्मृत या अदृष्ट विषयों पर भी उन्होंने पर्याप्त प्रकाश डाला।१ कात्यायन को वार्त्तिककार वा वाक्यकार भी कहा जाता है। कुछ लोगों का विश्वास है कि वार्त्तिककार एक नहीं अनेक हुए हैं, कात्यायन उन सब में अन्तिम थे। कात्या- यन के कुछ शताब्दी बाद महामुनि पतञ्जलि ने पाणिनीयव्याकरण को परिष्कृत करने का अपूर्व कार्य कर इस व्याकरण की कीर्तिपताका चहु दिशाओं में फहरा दी। पाणि- नीयव्याकरण पर पतञ्जलि का लिखा महाभाष्य नामक ग्रन्थ अत्यन्त प्रामाणिक और अपनी प्रवाहपूर्ण सरलतम शैली का अपूर्व भाष्य है। पतञ्जलि का समय पाश्चात्यों की दृष्टि में ईसापूर्व १५० के लगभग बहुसम्मत है। पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि ये तीनों पाणिनीय व्याकरण के प्रमुख आचार्य या मुनित्रय कहलाते हैं। इस व्याकरण में इन का ही प्रामाण्य स्वीकार किया जाता है। इन में भी उत्तरोत्तर मुनि पूर्वपूर्व से अधिक प्रामाणिक माना जाता है। अत एव कहा जाता है—उत्तरोत्तर मुनीनां प्रामाण्यम्। इस प्रकार सैकड़ों वर्षों तक पाणिनीयव्याकरण अपने असली रूप अर्थात् अष्टाध्यायीसूत्रपाठ के क्रमानुसार पठनपाठन में प्रचलित रहा। परन्तु जब संस्कृत का स्थान अपभ्रंश वा प्राकृत आदि भाषाओं ने लेना शुरू किया और संस्कृत केवल साहित्य में ही प्रयुक्त होने वाली शिष्टभाषा मात्र रह गई तब लोगों को ज़रा असु- गमता का भास हुआ। तब सूत्रक्रम के साथ प्रक्रियाक्रम का भी प्रचलन आरम्भ हुआ। इस के फलस्वरूप पाणिनिसूत्रों का आश्रय करते हुए रूपावतार, प्रक्रियाकौमुदी, प्रक्रियासर्वस्व, सिद्धान्तकौमुदी आदि अनेक ग्रन्थ बने। परन्तु जिस प्रकार पाणिनि का व्याकरण अपने से पूर्ववर्त्ती सब व्याकरणों में मूर्द्धस्थानीय बन पड़ा था, ठीक उसी प्रकार भट्टोजिदीक्षित की सिद्धान्तकौमुदी भी प्रक्रियामार्ग का सर्वोत्तम ग्रन्थ बनी। दीक्षितजी की यह कृति प्रक्रियामार्ग की पराकाष्ठा वा चरमसीमा समझनी चाहिये। इस में अष्टाध्यायी के समस्त सूत्रों का प्रक्रियानुसार भिन्न क्रम से समावेश है। अत एव भारत में उन के ग्रन्थ का महान् आदर हुआ और वह पठनपाठन में शीघ्र प्रच- लित हो गया। दीक्षितजी पाणिनीयव्याकरण में कृतभूरिपरिश्रम थे। अष्टाध्यायी- सूत्रक्रमानुसार लिखा गया उन का शब्दकौस्तुभ नामक ग्रन्थ उन के पाण्डित्य का परि- चायक है। भट्टोजिदीक्षित का काल ईसा की सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। ये महाराष्ट्र ब्राह्मण थे परन्तु इन का निवास काशी में था। इन के पिता का नाम लक्ष्मीधर पण्डित तथा गुरु का नाम शेषकृष्ण था। दीक्षितजी के पुत्र भानु- जिदीक्षित की अमरकोष पर व्याख्यासुधा नामक व्याख्या अत्यन्त प्रसिद्ध है। इन के १. यद् विस्मृतमदृष्टं वा सूत्रकारेण तत्स्फुटम्। वाक्यकारो ब्रवीत्येष तेनादृष्टं च भाष्यकृत् ॥ उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्त्तते । तं ग्रन्थं वार्त्तिकम्प्राहुर्वार्त्तिकज्ञा विचक्षणाः ॥