लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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हुआ। साङ्गोपाङ्ग वेद, उस की अनेकविध शाखाएं, ब्राह्मण साहित्य, उपनिषत्, कल्प, ज्योतिष्, इतिहास, कोष, विविधकलात्मक ग्रन्थ, काव्यनाटक, नानाविध देशीय वा प्रान्तीय लोकभाषाओं के सूक्ष्मप्रभेदक प्रवन्ध—इस प्रकार न जाने अन्य भी कितना विशाल वाङ्मय उन के अध्ययन और मनन का विषय रहा होगा इस की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती । उन का निःसन्देह लोक एवं वेद पर समानरूप से अधिकार था। वे अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ अष्टाध्यायी में प्रत्यक्षतः वा अप्रत्यक्षतः सैकड़ों व्यक्तियों, ग्रन्थों, ग्रामों, जनपदों और स्थानों का स्मरण करते हैं¹ जिन से तत्कालीन संस्कृति, इतिहास, समाजव्यवस्था तथा राजनैतिक अवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस में कुछ सन्देह नहीं कि उन्हें तत्कालीन इतिहासपरम्परा, साहित्य, कला, दर्शन आदि का पूर्ण ज्ञान था। सचमुच वे अलौकिकप्रतिभाशाली व्यक्ति थे।² उन जैसे व्यक्ति को जन्म दे कर भारत का मुख चिरकाल तक उज्ज्वल रहेगा। इस प्रकार के व्यक्ति सृष्टि में बार बार उत्पन्न नहीं होते। एक सुभाषित के अनुसार उन का निधन एक जङ्गली सिंह के कारण हुआ माना जाता है³। वैयाकरणों में प्रसिद्धि है कि उन का निधन त्रयोदशी के दिन हुआ था। मास और पक्ष ज्ञात न होने से प्राचीन परिपाटी के पण्डित अब भी प्रत्येक त्रयोदशी के दिन व्याकरण का अनध्याय मनाते हैं। पाणिनि के व्याकरण का सम्भवतः उस की विशेषताओं के कारण बहुत शीघ्र प्रचार वा प्रसार हुआ। लोगों ने पाणिनीयव्याकरण के आगे पूर्वप्रचलित ऐन्द्र आदि सब व्याकरणों को तुच्छ वा हेय समझा। पाणिनि से कतिपय शताब्दी बाद कात्यायन ने अपने वार्त्तिकों द्वारा पाणिनि के सूत्रार्थों वा गुप्त आशयों को भली-भांति प्रकट
१. निदर्शनार्थ यथा — वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन् (४.३.९८) ; कठचरकाल्लुक् (४.३.१०७) ; पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः (४.३.११०) ; तित्तिरिचरतन्तुखण्डिको- खाच्छण् (४.३.१०२) ; काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यां णिनिः (४.३.१०३) ; पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु (४.३.१०५) ; शौनकादिभ्यश्छन्दसि (४.३.१०६) ; कर्मन्दकृशाश्वादिनिः (४.३.१११) ; सिन्धुतक्षशिलादिभ्योऽणञौ (४.३.९३) ; लोपः शाकल्यस्य (८.३.१९) ; लङः शाकटायनस्यैव (३.४.१११) ; ऋतो भारद्वाजस्य (७.२.६३) ; अङ् गार्ग्यगालवयोः (७.३.९९) इत्यादि । २. पाणिनीयव्याकरण मानवीय मस्तिष्क की सब से बड़ी रचनाओं में से एक है— (लेनिनग्राड के प्रो० टी० शेरवात्सकी) । संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है। यह मानवीय मस्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आविष्कार है—(सर W. W. हण्टर) । पाणिनीयव्याकरण उस मानवमस्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा—(मोनियर विलियम्स) । ३. सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत् प्राणान् प्रियान् पाणिनेः—(पञ्चतन्त्र २.३६) ।