लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ८ ] इन के गुरु का नाम 'वर्ष' था। गुरुपत्नी की प्रेरणा से इन्होंने हिमालय पर जा कर तपस्या से विद्या प्राप्त की। १ कतिपय विद्वानों का कथन है कि छन्द-सूत्र के निर्माता पिङ्गल मुनि इन के कनिष्ठ भ्राता थे। २ कुछ अन्य विद्वान् पाणिनि पिङ्गल और निरुक्तकार यास्क को लगभग समकालिक ही मानते हैं ३ । श्रीयुधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार पाणिनि के मामा का नाम व्याडि था। इन्होंने पाणिनीय व्याकरण के दार्श- निकपक्ष पर एक लाख श्लोकों में 'संग्रह' नामक ग्रन्थ रचा था जो अब बहुत काल से सर्वथा लुप्त हो चुका है। महाभाष्य और काशिका के अनुसार पाणिनि ने अपना ग्रन्थ अनेक शिष्यों को कई बार पढ़ाया था। ४ भाष्य में इन के एक शिष्य कौत्स का उल्लेख भी मिलता है। ५ राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में एक जनश्रुति का उल्लेख किया है जिस के अनुसार पाणिनि की विद्वत्ता की परीक्षा पाटलिपुत्र में हुई थी और उस के बाद ही उन्हें प्रसिद्धि प्राप्त हुई। ६ महामुनि पाणिनि जैसा वैयाकरण संसार में फिर आज तक उत्पन्न नहीं १. अथ कालेन वर्षस्य शिष्यवर्गो महानभूत्, तत्रैकः पाणिनिर्नाम जड़बुद्धितरोऽभवत् । स शुश्रूषापरिक्लिष्टः प्रेषितो वर्षभार्यया, अगच्छत्तपसे खिन्नो विद्याकामो हिमालयम् ॥ (कथासरित्सागर, निर्णयसागर, पृष्ठ ८) २. ऋक्सर्वानुक्रमणी के वृत्तिकार षड्गुरुशिष्य अपनी वेदार्थदीपिका में लिखते हैं— तथा च सूत्र्यते भगवता पिङ्गलेन पाणिन्यनुजेन—क्वचिन्नवकाश्चत्वारः (पिङ्गल- सूत्र ३.३३) इति परिभाषा। ३. यास्क ने निरुक्त १.१७ पर पाणिनि का परः संनिकर्षः संहिता (१.४.१०८) सूत्र उद्धृत किया है। पिङ्गल उरोबृहतीति यास्कस्य (छन्द-सूत्र ३.३०) में यास्क का स्मरण करते हैं। पाणिनि ने ६.२.८५ के गण में पिङ्गल का तथा ४.३.७३ के गण में पिङ्गलकृत छन्दोविचिति का स्मरण किया है। यस्कादिभ्यो गोत्रे (२.४.६३) में यास्क का भी उल्लेख किया है। अतः इन प्रमाणों के आलोक में श्रीयुधिष्ठिर मीमांसक आदि इन तीनों की समकालिकता का प्रतिपादन करते हैं। देखें— संस्कृतव्याकरणशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग (पृष्ठ २०४)। ४. उभयथा ह्याचार्येण शिष्याः सूत्रं प्रतिपादिताः। केचिदाकडारादेका संज्ञा इति, केचित् प्राक्कडारात् परं कार्यमिति—(महाभाष्य १.४.१)। पूर्वपाणिनीयाः, अपरपाणिनीयाः—(काशिका ६.२.१०४) । ५ उपसेदिवान् कौत्सः पाणिनिम्—(महाभाष्य ३.२.१०८)। अनूचान् कौत्सः पाणिनिम्, उपशुश्रुवान् कौत्सः पाणिनिम्—(काशिका ३.२.१०८) । ६. श्रूयते च पाटलिपुत्रे शास्त्रकारपरीक्षा । अत्रोपवर्षवर्षाविह पाणिनिपिङ्गलाविह व्याडिः । वररुचिपतञ्जली इह परीक्षिताः ख्यातिमुपजग्मुः ।