लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[७]
आया है¹। भगवान् कृष्ण का भी कालयवन से युद्ध हुआ था²। इसके अतिरिक्त अष्टा- ध्यायी में निर्वाणोऽवाते (८.२.५०) सूत्र में प्रतिपादित 'निर्वाण' पद बौद्धकालिक (मोक्ष) अर्थ की ओर संकेत नहीं करता अपितु 'निर्वाणः प्रदीपः' (दीपक बुझ गया) अर्थ की ओर संकेत करता है, इस से भी पाणिनि का बुद्ध से पूर्वभावी होना निश्चित होता है अन्यथा वे निर्वाण शब्द के बौद्धकाल में अत्यन्त प्रसिद्ध मोक्ष अर्थ का कभी भी अपलाप न कर पाते । गोल्डस्टूकर तथा रामकृष्ण गोपाल भाण्डारकर आदि ने पाणिनि का समय सातवीं ईसापूर्व शताब्दी माना है। वासुदेवशरण अग्रवाल ने पाणिनि को ईसा से ४५० वर्ष पूर्व का सिद्ध किया है। इन सब से हटकर नये भारतीय ढंग के विवेचक श्रीयुधिष्ठिर मीमांसक अपनी अनेक युक्तियों से पाणिनि का काल विक्रम से २६०० वर्ष पूर्व सिद्ध करते हैं³। इस तरह पाणिनि का काल अभी विवादास्पद ही समझना चाहिये । पाणिनि का इतिवृत्त उन के काल से भी अधिक अज्ञात है। भाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार इन की माता का नाम दाक्षी था⁴। न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि, काव्यालङ्कार- कार भामह तथा गणरत्नमहोदधिकार वर्धमान ने पाणिनि के पूर्वजों का निवासस्थान शलातुर नामक ग्राम माना है⁵। पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार यह स्थान इस समय पाकिस्तान के उत्तरपश्चिमीसीमाप्रान्त के निकट अटक के पास लहूर नाम से (जो शलातुर का अपभ्रंश है) अभी तक प्रसिद्ध है। चीनी यात्री थ्यूआन् चुआङ् (प्रसिद्ध नाम ह्वेनत्साङ्ग) सप्तम शताब्दी के आरम्भ में मध्यएशिया से स्थलमार्गद्वारा भारत आता हुआ इसी स्थान पर ठहरा था। उस ने लिखा है कि—"उद्भाण्ड (ओहिन्द) से लगभग चार मील दूर शलातुर स्थान है। यह वही स्थान है जहां ऋषि पाणिनि का जन्म हुआ था। यहां के लोगों ने पाणिनि की स्मृति में एक मूर्ति बनाई है जो अब तक मौजूद है।६" कथासरित्सागर के अनुसार पाणिनि बचपन में जड़बुद्धि थे।
१. तुर्वसु की सन्तान यवन कहलाई—(महाभारत० १.८५.३४); सहदेव ने दिग्विजय के समय इन के नगर को जीता था—(महाभारत० सभा० ३१.७३); नकुल ने यवनों को परास्त किया था—(महाभारत० २.३२.१७); काम्बोजराज एक लाख यवनों की सेना ले कर दुर्योधन के पास आया—(महाभारत० उद्योग० १६. २१-२२); यवन पहले क्षत्रिय थे परन्तु ब्राह्मणों के साथ द्वेष के कारण शूद्रभाव को प्राप्त हो गये—(महाभारत० अनुशासन० ३५.१८)। २. देखें—महाभारत० २.३८.२६ दाक्षिणात्यपाठ । ३. देखें—संस्कृतव्याकरणशास्त्र का इतिहास, प्रथमभाग, पृष्ठ २०५। ४. सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः—(महाभाष्य १.१.२०) । ५. देखें—मैमीप्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित न्यास-पर्यालोचन (पृष्ठ ४५—४६) । ६. देखें—ह्वएन्त्साङ्ग का भारतभ्रमण, इण्डियनप्रेस प्रयाग (पृष्ठ १०८) ।