लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६ ] का ही जनभाषा होना अष्टाध्यायी के अनेक साक्ष्यों से सुतरां सिद्ध होता है¹। पाणिनि ने स्वयं भी लोकभाषा को अष्टाध्यायी में 'भाषा' के नाम से अनेकशः प्रयुक्त किया है²। जो लोग अष्टाध्यायी में आये श्रमण, यवन, मस्करिन्³ आदि शब्दों को देख कर पाणिनि को बुद्ध और सिकन्दर से अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं वे भ्रान्त हैं, क्योंकि ये शब्द तो बुद्ध से बहुत पूर्व ही भारतीयों को परिचित थे। संन्यासी अर्थ में श्रमण शब्द ब्राह्मणग्रन्थों में प्रयुक्त है। मस्करिन् शब्द दण्डधारण करने के कारण साधारण परिव्राजकमात्र का वाचक है बुद्धकालीन मखली गोसाल नामक आचार्य का नहीं⁴। यवनजाति से तो भारतीय लोग यूनानी सम्राट् सिकन्दर के भारत पर आक्रमण करने से बहुत पहले ही परिचित थे। महाभारत में अनेक स्थानों पर यवनजाति का उल्लेख १. पाणिनि ने उस समय की जनभाषा में व्यवहृत अत्यन्त सूक्ष्मभेदों को भी अपनी अष्टाध्यायी में सुचारुरूप में संकलित किया है। यथा—विपाश् (व्यास) नदी के उत्तर की ओर वर्त्तमान कूपों के लिए आद्युदात्त 'दात्त' शब्द तथा दक्षिण की ओर वर्त्तमान कूपों के लिये अन्तोदात्त 'दात्त' शब्द का व्यवहार किया है, देखें पाणि- निसूत्र—उदक् च विपाशः (४.२.७४)। पाणिनि ने तत्कालीन लोकभाषा में प्रचलित अनेक मुहावरों का भी प्रचुर प्रयोग दर्शाया है, यथा—वणेहत्य पयः पिबति, मनोहत्य पयः पिबति (१.४.६५), शय्योत्थाय धावति (३.४.५२), यष्टिग्राहं युध्यन्ते (३.४.५३), केशग्राहं युध्यन्ते (३.४.५०), स्वादुङ्कारं भुङ्क्ते (३.२.२७)। केशाकेशि, दण्डादण्डि (२.२.२७), तीर्थेध्वाङ्क्ष (२.१.४२), मूलकपणः (मूली की गड्डी), शाकपण (शाक की गड्डी—३.३.६६), गोपुच्छिकः (गाय की पूंछ को पकड़ कर नदी पार करने वाला—४.४.६), नाविक, घटिकः, बाहूका (४.४.७), माञ्जिष्ठम् (मजीठ से रंगा गया वस्त्र—४.२.१) इत्यादि सैकड़ों लोकभाषा में प्रचलित शब्दों का अन्वाख्यान अष्टाध्यायी में उपलब्ध होता है। २. यथा—भाषायां सदवसश्रुवः (३.२.१०८), प्रथमापाञ्च द्विवचने भाषायाम् (७. २.८८), सय्यशिश्वीति भाषायाम् (४.१.६२), स्थे च भाषायाम् (६.३.२०), पूर्वे तु भाषायाम् (८.२.६८), विभाषा भाषायाम् (६.१.१८१) इत्यादि। ३. कुमारः श्रमणादिभिः (२.१.७०), इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवन- मातुलाचार्याणामानुकू (४.१.४६), मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः (६.१. १५४)। ४. यदि यह मखली गोसाल—परिव्राजकविशेष के लिये ही प्रयुक्त हुआ होता तो उस के अर्थनिर्देश के लिये पाणिनि सामान्य परिव्राजक पद का निर्देश न करते।