भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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आत्म-निवेदनम् संस्कृतभाषा अनेक भाषाओं की जननी तथा विश्व की एक अत्यन्त प्राचीन समृद्ध भाषा है। विश्व का अद्यावत् ज्ञात प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद इसी भाषा में ही निबद्ध है। यदि कोई संस्कृतभाषा पर अधिकार कर ले तो विश्व की अनेक भाषाओं पर उस का आधिपत्य अल्प आयास से ही सिद्ध हो सकता है। इस के अतिरिक्त संस्कृता- ध्ययन का एक और भी बड़ा प्रयोजन है। क्योंकि विश्व के अनेक देशों की सांस्कृतिक परम्पराओं वा कलाकौशल आदि विद्याओं का आधार या उत्प्रेरक भारत और तत्कालीन भाषा संस्कृत ही रही है अतः संस्कृत के ज्ञान से ही उन का ज्ञान सम्भव है। आजकल के नवप्रसूत भाषाविज्ञान जैसे अपूर्वशास्त्र का भी एक प्रमुख आधार- स्तम्भ संस्कृतभाषा का अध्ययन ही रहा है। हिन्दू-आर्यों के लिए संस्कृतभाषा का जानना तो और भी आवश्यक है क्योंकि उन की निखिल धार्मिक वा सांस्कृतिक परम्पराएं संस्कृतभाषा में ही निबद्ध हैं। संस्कृतभाषा में केवल भारत का ही नहीं अपितु विश्व और मानव जाति के हज़ारों वर्ष पूर्व का इतिहास अब इस जीर्ण अवस्था में भी सुरक्षित है। अतः इतिहास ज्ञान की दृष्टि से भी यह भाषा कम उपादेय नहीं है। संस्कृतभाषा यद्यपि हजारों वर्षों तक लोकव्यवहार वा बोलचाल की भाषा रह चुकी है और उस में यह उपयोगी गुण संसार की किसी भी भाषा से कम नहीं है तथापि विधिवशात् लोकव्यवहार वा बोलचाल से सर्वथा उठ जाने के कारण वह आज मृतभाषा (Dead Language) कही जाती है। अतः आज के युग में उस का अध्ययन बिना व्याकरणज्ञान के होना सम्भव नहीं। इस के साथ ही यह भी ध्यातव्य है कि संसार में केवल संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जिस के व्याकरण सर्वाङ्गीण और पूर्ण परिष्कृत कहे जा सकते हैं। संस्कृतभाषा के इन व्याकरणों में महामुनिपाणिनि- प्रणीत पाणिनीयव्याकरण ही इस समय तक के बने व्याकरणों में सर्वश्रेष्ठ, अत्यन्त परिष्कृत, वेदाङ्गों में गणनीय, प्राचीन तथा लब्धप्रतिष्ठ है। व्याख्योपव्याख्याओं तथा टीकाटिप्पण के रूप में जितना इस का विस्तार हुआ है उतना शायद भारत में किसी अन्य व्याकरण वा विषय का नहीं हुआ। आज भी लगभग एक हजार से अधिक ग्रन्थ पाणिनीयव्याकरण पर उपलब्ध हैं। महामुनि पाणिनि का काल अभी तक ठीक तरह से निश्चित नहीं हुआ। परन्तु अनेक विद्वानों का कहना है कि उन का आविर्भाव भगवान् बुद्ध (५४३ ई० पूर्व) से बहुत पूर्व हो चुका था। कारण कि भगवान् बुद्ध के काल में जहां पाली और प्राकृत भाषाएं जनसाधारण की भाषाएं थीं वहां पाणिनि के काल में उदात्तादिस्वरयुक्त संस्कृतभाषा