लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपौत्र हरिदीक्षित सुप्रसिद्ध वैयाकरण नागेशभट्ट के गुरु थे। दीक्षितजी केवल वैयाकरण ही न थे किन्तु धर्मशास्त्र, कर्मकाण्ड आदि के भी महापण्डित थे। इन के बनाये ग्रन्थों की संख्या ३१ बताई जाती है। इन्ही दीक्षितजी के शिष्य वरदराज ने¹ आरम्भ से ही सिद्धान्तकौमुदी के अध्ययन मे विद्यार्थियो की असमर्थता को देखते हुए मध्यसिद्धान्तकौमुदी (मध्यकौमुदी) और लघुसिद्धान्तकौमुदी (लघुकौमुदी) नामक दो ग्रन्थ सिद्धान्तकौमुदी को संक्षिप्त कर के लिखे। इन्हें सिद्धान्तकौमुदी का संक्षिप्त संस्करण भी कहा जा सकता है। सिद्धान्तकौमुदी मे जहां पाणिनि के समस्त ३६६५ सूत्र व्याख्यात हैं वहां मध्यकौमुदी में २३१५ तथा लघुकौमुदी मे १२७२ सूत्र गुम्फित किये गये हैं। वरदराज का ध्येय पाणिनीयव्याकरण में बालकों को सरलता से प्रवेश कराना था। यह बात दोनों ग्रन्थों के आरम्भ में स्वयं उन्होंने स्वीकार की है²। इन दोनों संक्षिप्त संस्करणों में लघु- सिद्धान्तकौमुदी (लघुकौमुदी) नामक ग्रन्थ विशेषरूप से प्रचलित हुआ है। इस ग्रन्थ से पाणिनीयव्याकरणरूप महाप्रासाद के प्रत्येक अङ्ग का संक्षिप्त पर पर्याप्त उपयोगी परिचय छात्र को प्राप्त हो जाता है। प्रायः विद्यार्थी प्रारम्भ में एक-दो वर्षों में इसे पढ़ कर तदनन्तर सिद्धान्तकौमुदी के अध्ययन मे प्रवृत्त हुआ करते हैं। १. वरदराज का काल भी दीक्षितजी वाला काल है। वरदराज दाक्षिणात्य थे। इन के पिता का नाम दुर्गातनय था। इन्होंने मध्यकौमुदी और लघुकौमुदी के अतिरिक्त सारकौमुदी और गीर्वाणपदमञ्जरी नामक अन्य दो ग्रन्थ भी लिखे हैं। वरदराज ने यद्यपि सिद्धान्तकौमुदी का संक्षिप्त संस्करण ही लघु- कौमुदी बनाया है तथापि प्रकरणों की दृष्टि से लघुकौमुदी का क्रम सिद्धान्त- कौमुदी के क्रम से बहुत श्रेष्ठ है। सिद्धान्तकौमुदी में अव्ययप्रकरण के बाद स्त्री- प्रत्ययप्रकरण प्रारम्भ होता है, पर लघुकौमुदी में स्त्रीप्रत्ययप्रकरण सब प्रकरणों के अन्त में रखा गया है—और यह उचित भी है, क्योंकि बिना कृत्, तद्धित और समास आदि का ज्ञान प्राप्त किये स्त्रीप्रत्ययप्रकरण के—टिङ्ढाणञ्०, ऋन्निकारा- दक्तिनः, द्विगोः, प्राचां ष्फस्तद्धितः, बहुव्रीहेरूथसो ङीप् आदि सूत्रों का समझना अतीव दुष्कर है। इसी प्रकार कारकप्रकरण के विषय में भी समझना चाहिये। कारकप्रकरणगत कर्तृकरणयोस्तृतीया, अकथितञ्च आदि सूत्र तथा अभिहित अन- भिहित आदि की व्यवस्था बिना तिङन्त और कृदन्त प्रकरणों के ज्ञान के सम- झनी कठिन है। अतः वरदराज ने तिङन्त और कृदन्त प्रकरणों के अनन्तर ही कारकप्रकरण को रखा है। २. नत्वा वरदराजः श्रीगुरून् भट्टोजिदीक्षितान्। करोति पाणिनीयानां मध्य-सिद्धान्त-कौमुदीम् ॥ (म०कौ०) नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्। पाणिनीयप्रवेशाय लघु-सिद्धान्त-कौमुदीम् ॥ (ल०कौ०)