भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

[१२] लघुकौमुदी वा सिद्धान्तकौमुदी पर—जहाँ तक मेरा विचार है—अभी तक कोई आधुनिक ढंग पर विश्लेषणात्मक मर्म समझाने वाली परिष्कृत वैज्ञानिक ढंग से विस्तृत हिन्दीव्याख्या नहीं निकली, जो थोड़ी बहुत हिन्दीव्याख्याएं मिलती भी हैं वे प्राय सब पुरानी शैली की केवल संस्कृतशब्दों के स्थान पर हिन्दी-पर्याय रख देने मात्र में ही सन्तोष प्रकट करने वाली हैं। ग्रन्थकार के एक एक शब्द वा विचार का विस्फोरण कर पाठकों के हृदयों पर उसे अङ्कित कर देने का तो किसी को विचार ही उपस्थित नहीं हुआ। उदाहरणार्थ आप—स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था; नप्तादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्; अष्टभ्य इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसो- विषय आत्वं ज्ञापयति—इत्यादि स्थलों को उन टीकाओं में देखें, आप सन्तुष्ट नहीं हो सकेंगे। आज भारत स्वतन्त्र है। इस की राष्ट्रभाषा प्रधानतया हिन्दी है। परन्तु हिन्दी अपने शब्दभण्डार के लिये संस्कृत से ही सदा अनुप्राणित होती चली आ रही है। अतः बिना संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त किये हिन्दी में प्रौढता प्राप्त करना दुष्कर ही नहीं वरन् असम्भव सा है। इसलिये संस्कृत के प्रचारार्थ हिन्दी में मुख्यतया संस्कृतव्याकरण के ऊंचे से ऊंचे ज्ञानवर्धक वा शोधपूर्ण ग्रन्थ सरल से सरल भाषा में प्रकाशित करने चाहियें। यह व्याख्या इसी ध्येय को सामने रखते हुए लिखी गई है। इस में मुख्यदृष्टि पदे पदे भावाशयविस्फोरण और शोध पर ही केन्द्रित रही है। ग्रन्थकार के अन्तस्तल तक पाठकों को पहुंचाना इस व्याख्या का मुख्य उद्देश्य रहा है। मूल में जहां जहां कोई कठिन स्थल आया है वहां वहां ग्रन्थविस्तार का भय छोड़ कर उसका पूरा पूरा विवरण प्रस्तुत किया गया है। ऊपर के उद्धृत स्थलों को आप इस व्याख्या में देख कर अनुभव करेंगे कि अब इस विषय पर कुछ भी कहना शेष नहीं रहा। यह व्याख्या सार्वजनीन अर्थात् सब लोगों के लिये उपयोगी है। इसे अत्यल्प- मति विद्यार्थी, प्रौढ विद्यार्थी, व्युत्पन्न छात्र, व्याकरणप्रेमी, अध्यापक, शोधरत विद्वज्जन—जो भी देखेंगे अपने अपने सामर्थ्यानुकूल पूर्ण उपयोगी पाएंगे। अध्यापक यदि इस का स्वयं सम्यगवलोकन कर विद्यार्थियों को पाठ पढ़ायेंगे तो वे ग्रन्थकार का आशय अपने छात्रों के हृदयपटल पर अतिशीघ्र अङ्कित करने में पूर्ण समर्थ हो सकेंगे। इसी प्रकार यदि छात्र अपने अध्यापकों से ग्रन्थ का पाठ पढ़ कर इस व्या- ख्या का अवलोकन करेंगे तो उन्हें निश्चय ही अपूर्व लाभ होगा। एवं शोधप्रिय विदेशी वा स्वदेशी विद्वानों के लिये भी यह समानरूपेण उपयुक्त सिद्ध होगी। इस व्याख्या में व्याकरण जैसे कठिन विषय को सरल से सरल बना कर प्रस्तुत करने का पूरा पूरा प्रयास किया गया है। अनेक विवादास्पद स्थलों का स्पष्टी- करण करते हुए भिन्न भिन्न विद्वानों की सम्मति भलीभांति दे कर अपनी सम्मति भी स्पष्टरूपेण अङ्कित कर दी है। कई कठिन स्थल अत्यन्त सरल रीति से लौकिक

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 13, कुल 633 में से · BharatKosha