भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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[१३] उदाहरण दे कर स्पष्ट किये गये हैं । यथा—न लुमताङ्गस्य की अनित्यता वाला स्थल, स्थानिवद्भाव मे अनल्विधौ वाला अंश, अन्वादेशव्याख्या आदि । इस भैमीव्याख्या की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नस्थ हैं— (१) सूत्रार्थ; (२) अभ्यास; (३) शब्दसूचियां; (४) अव्ययप्रकरण । (१) सूत्रार्थ— जहां तक हमें ज्ञात है कि लघुकौमुदी के किसी टीकाकार ने सूत्र से अर्थ कैसे उत्पन्न होता है—इस पर कुछ भी विचार नहीं किया । लघुकौमुदी तो क्या सिद्धान्तकौमुदी तक के कुछ टीकाकारों को छोड़ कर प्रायः सब व्याख्याताओं ने इस विशेषता की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया । तीन अक्षरों के सूत्र का पैंतीस अक्षरों वाला अर्थ कैसे हो गया—यह वे नहीं बताते । केवल वृत्ति को घोट कर सूत्रार्थ का स्मरण करना महान् दोषवह है । अनेक अच्छे-अच्छे व्युत्पन्न विद्यार्थी देखे जाते हैं जो प्रत्येक सूत्र का अर्थ तो बता सकते हैं परन्तु सूत्र का पदच्छेद तक नहीं कर सकते । यह सारा दोष केवलमात्र वृत्ति घोटने (रटने) का है । हमारे विचार में तो प्रत्येक विद्यार्थी को व्याकरण अध्ययन करने से पूर्व पाणिनि का अष्टाध्यायीसूत्रपाठ क्रम- पूर्वक कण्ठस्थ करना चाहिये । इस से वृत्ति रटने की आवश्यकता ही नहीं रहती, केवल- मात्र वृत्ति को समझ लेना ही पर्याप्त होता है, क्योंकि सूत्रों का पौर्वापर्य तो विदित होता ही है । यदि अष्टाध्यायीसूत्रपाठ कण्ठस्थ न भी हो तो भी उसे पास अवश्य रखना चाहिये और कौमुदी का प्रत्येक सूत्र उस में देख लेना चाहिये । हमारी यह निश्चित धारणा है कि बिना अष्टाध्यायीसूत्रक्रम जाने प्रक्रियामार्ग से पूर्वत्रासिद्धम्, एक- सञ्ज्ञाधिकार, एकदेशाधिकार, भसंज्ञा, पदसंज्ञा, तद्धितश्चासर्वविभक्तिः वाला परिगणन आदि अनेक सूत्र वा स्थल कौमुदी-अध्येता को ठीक-ठीक रीति से कदापि हृदयंगम नहीं हो सकते । इस के अतिरिक्त अष्टाध्यायी में दर्जनों प्रकरण अपने अपने स्थान पर एकत्र अवस्थित हैं । आप को यदि प्रक्रिया में कोई सूत्र भूल जाये या सन्देह पड़ जाये तो आप अष्टाध्यायी का वह सम्पूर्ण प्रकरण मन में पढ़ सकते या ग्रन्थ में देख सकते हैं, तुरन्त सन्देह मिट जायेगा और वह विस्मृत सूत्र याद आ जायेगा । यथा आप को कहीं प्रक्रिया में इत्सञ्ज्ञक सूत्र के विषय में सन्देह है तो आप अष्टाध्यायी का वह प्रकरण मन ही मन पढ़ कर अपना सन्देह निवारण कर सकते हैं । अष्टाध्यायी का इत्सञ्ज्ञक- प्रकरण प्रथमाध्याय के तृतीयपाद के आरम्भ में निम्नप्रकारेण पढ़ा गया है— ⎧ उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२) ⎪ हलन्त्यम् (१.३.३) ⎪ न विभक्तौ तुस्माः (१.३.४) ⎨ आदिर्ञिटुडवः (१.३.५) ⎪ षः प्रत्ययस्य (१.३.६) ⎪ चुटू (१.३.७) ⎪ लशक्वतद्धिते (१.३.८) ⎩ तस्य लोपः (१.३.६)