भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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इस स्थान के अतिरिक्त इत्सञ्ज्ञाविषयक सूत्र आपको अन्यत्र कही भी अष्टाध्यायी मे नही मिलेगा। यह विशेषता प्रक्रियामार्गगामी कौमुदी आदि ग्रन्थो मे उत्पन्न नही की जा सकती। इसी प्रकार-णत्व, षत्व, क्त्वि, पित्व, प्रगृह्यसञ्ज्ञा, आत्मनेपदप्रक्रिया, परस्मैपदप्रक्रिया, समासान्त, एकसञ्ज्ञाधिकार, एकादेशाधिकार, इड्विधान आदि दर्जनो प्रकरण आपको अष्टाध्यायी म एव ही स्थान पर मिल सकेंगे । अत एव पटना कालेज के व्याकरणशास्त्र के प्रधानाध्यापक श्रीपण्डित हरिशङ्करशर्मा पाण्डेय स्वनिर्मित आर्ष पाणिनीय व्याकरणम् म इस विषय पर अत्यन्त मार्मिक लेखनी उठाते हुए लिखते हैं— यच्छास्त्रं षड्भिर्दिनैः कतिपयैः क्रीडामनस्कैरपि स्वाचार्याश्रमवासिभिः सरलया रीत्या पुराऽधीयते । गुर्वर्थं परिपूर्णमुत्तमधिया सङ्क्षिप्तकायञ्च यत् तत्कीदृग्विपरितरूपमधुना हा हन्त ! जोघुष्यते ॥ तदिदानीं महाकाय भीमरूप गृहीतवत् । यद् दृष्ट्वा प्रपलायन्ते बालाः कोमलबुद्धयः ॥ योऽप्याग्रहेण पठति पाणिनिश्रमवर्जितम् । तदवश्य स सम्पूर्ण यापयत्यत्र जीवितम् ॥ अपि विद्वद्वरा धीरा निजशिष्यायुषः क्षयम् । रात्रिन्दिव जायमान मनागपि न पश्यथ ! ॥ तस्मात्क्रमेण सूत्राणि पठनीयानि यत्नतः । अनुवृत्त्यादिसौकर्यात्तदर्थोऽपि न दुर्ग्रहः ॥ पाणिनीयपठनाय पाणिनेर्यः श्रमः स न कदापि हीयताम् । वृत्तिघोषममहापरिश्रमान्मुक्तिरेव फलमस्य दृश्यताम् ॥ तो हम ने इस व्याख्या मे लघुकौमुदी के प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, पदो का विभक्तिवचन, पिछले सूत्रो से आ रहे अनुवर्त्तित पद और उन का विभक्ति-वचन, समास और आवश्यक प्रत्यय तथा परिभाषाओ के कारण होने वाले परिवर्त्तनो का पूरा-पूरा वर्णन किया है । इस के पढने से विद्यार्थियो के हृदय मे सूत्रार्थ के प्रति तनिक भी सन्देह शेष नही रह जाता—वह सूत्र के अन्दर तक घुस कर स्वय ही वृत्ति वाला अर्थ निकाल सकता है। हमारे ध्यान मे आज तक इस प्रकार का प्रयत्न लघुकौमुदी पर कही नही किया गया ।१


१ सन् १६५० म इस भैमीव्याख्या के प्रथमसस्करण के प्रकाशित होने के बाद कई लोगो ने इस व्याख्या की नकल करने की बहुविध चेष्टाए की, जिन मे वे बुरी तरह से असफल हुए। कारण यह है कि अष्टाध्यायी तो उन्हें कण्ठस्थ थी नही तथा आर्षपाठ- विधि मे भी वे सर्वथा अनभिज्ञ थे। बनारस से प्रकाशित लघुकोमुदी के एक टीकाकार ने तो हमारी व्याख्या की शतश पङ्क्तियो को चुरा कर अपनी टीका को सजाया