भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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[१५] (२) अभ्यास— इस ग्रन्थ की दूसरी बड़ी विशेषता अभ्यास हैं। प्रायः प्रत्येक प्रकरण वा अवान्तर-प्राकरणिक विषय के अन्त में 'अभ्यास' जोड़ दिया गया है। ये अभ्यास साधारण पुस्तकों के अभ्यासों की तरह नहीं हैं, किन्तु महान् परिश्रम से जुटाए गये अभ्यास हैं। सन्धिप्रकरण के अभ्यासों में आप ऐसे अनेक उदाहरण पाएगे—जो अन्यत्र मिलने दुर्लभ हैं। इसी प्रकार अन्य अभ्यासों में भी विद्यार्थियों की ज्ञानवृद्धि के लिये अनेक भ्रमोत्पादक रूप भ्रमोच्छेदपूर्वक बड़े परिश्रम से सङ्गृहीत किये गये है, इन्हें देख कर विद्वत्समाज को निश्चय ही सन्तोष होगा। हमारी यह धारणा है कि यदि इन अभ्यासों को कोई छात्र युक्तरीत्या अभ्यस्त (हल) कर ले तो वह साधारण सिद्धान्तकौमुदी पढ़े-लिखे छात्र से कहीं अधिक व्युत्पन्न होगा। विद्यार्थियों को इन अभ्यासों का पुनः-पुनः मनन करना चाहिये। व्याख्यागत सभी विशिष्ट बातें प्रायः इन अभ्यासों में प्रश्नरूप से पूछ ली गई है। (३) शब्दसूची— इस व्याख्या की तीसरी असाधारण विशेषता है—शब्दसूची। आपको आज तक के मुद्रित व्याकरणग्रन्थों में इस प्रकार का प्रयत्न कहीं भी किया गया नहीं मिलेगा। इन शब्दसूचियों का उद्देश्य विद्यार्थियों को अनुवादादि के लिये अत्यन्त उपयोगिशब्दसङ्ग्रह प्रदान करना है। इन सूचियों में प्रायः दो हजार (२०००) चुने हुए शब्दों का सार्थ सङ्ग्रह किया गया है। इन में से कई सूचियां तो अत्यन्त कठोर परिश्रम से सङ्ग्रह की गई हैं। शब्दों के प्रायः लोकप्रचलित प्रसिद्ध अर्थ ही दिये गये हैं। विशेष विशेष स्थानों पर काव्य-कोष आदि के वचन भी टिप्पणरूपेण दे दिये हैं। विद्यार्थियों के सुभीते के लिये णत्वप्रक्रियानिर्देशक चिह्न भी सर्वत्र लगा दिये हैं। (४) अव्ययप्रकरण— इस व्याख्या की चौथी बड़ी तथा सब से अधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है— अव्ययप्रकरण। आप को कहीं भी इस प्रकार की व्याख्या सहित यह प्रकरण देखने को नहीं मिलेगा। प्रत्येक अव्यय का विस्तृत अर्थ उस का साहित्यगत उदाहरण [जहां तक हो सका है किसी प्रसिद्ध सूक्ति वा सुभाषित को ही चुना गया है] तथा तद्विषयक विस्तृत शोधपूर्ण टिप्पण आप इस प्रकरण में देख सकेंगे। लघुकौमुदी के डेढ़ पृष्ठ का यह प्रकरण इस व्याख्या के ७८ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। प्रथमसंस्करण में जहां इस व्याख्या में तीन सौ अव्ययों का संकलन था वहां अब द्वितीयसंस्करण में सवा पांच सौ अव्ययों का व्याख्यान किया गया है। इस प्रकरण के कई अव्यय तो बड़े विवाद का विषय बने हुए हैं—उन सब का भी यथास्थान पूर्णरीत्या स्पष्टीकरण किया गया है। और चाटुकारिता से राजकीय सम्मान भी पा लिया पर उन्हें ज़रा भी लज्जा नहीं आई कि जिस का माल चुरा रहा हूं उस का कहीं परोक्ष रूप से नामनिर्देश तो कर दूं—यह है आज के युग के लेखकों की नैतिकता।