भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

[१६] इन में कतिपय अव्ययों पर कई कई मास तक सोच विचार किया गया है और कई आदरणीय विद्वानों की सम्मति भी ली गई है। इस प्रकरण को लिखने में सब से बड़ी सहायता हमारे विशाल संस्कृत पुस्तकालय की है जिस में हम ने प्रायः पञ्च सहस्र संस्कृतग्रन्थ अपना सम्पूर्ण जीवन लगा कर संगृहीत किये हैं। इन विशेषताओं के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की छोटी-मोटी विशेषताओं का भी यह ग्रन्थ आगार है। जैसे लघुकौमुदी में आये प्रत्येक शब्द की पूरी पूरी रूप- माला इस में दी गई है, किसी शब्द पर तद्वत् नहीं लिखा गया। प्रत्येक स्थान पर ढेरों उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं ताकि विद्यार्थियों को विषय हृदयंगम हो सके। अकेले इको यणचि सूत्र पर ही पचास उदाहरण दिये गये हैं। सन्धिप्रकरण में इस तरह एक हजार नये उदाहरण अभ्यासार्थ दिये गये हैं। अव्ययप्रकरण में उदाहृत लगभग पन्द्रह सौ सुभाषितों वा विशेष वचनों के मूलग्रन्थ और पते पूरी तरह ढूंढ ढूंढ कर निर्दिष्ट किये गये हैं। कठिन सुभाषितों के हिन्दी में अर्थ भी दिये गये हैं। सूत्र, वार्त्तिक तथा परिभाषा आदियों की सूची के साथ साथ तीन सौ सुबन्त शब्दों और सवा पाच सौ अव्ययों की भी वर्णानुक्रमणी इस संस्करण में उद्दृङ्कित की गई है ताकि विद्यार्थियों को किसी अव्यय या सुबन्त के ढूंढने में कठिनाई न हो। भैमीव्याख्या के प्रथम भाग का यह द्वितीयसंस्करण है। इस संस्करण में प्रथमसंस्करण की अपेक्षा लगभग डेढ सौ पृष्ठों की ठोस सामग्री अधिक है। दो सौ के करीब शोधपूर्ण नये टिप्पण वा फुटनोट्स और जोड़े गये हैं। इस ग्रन्थ के शोधन में भी विशेष प्रयत्न किया गया है। कतिपय अनिवार्य मानव-सुलभ भूलों को छोड़ कर प्राय यह ग्रन्थ लेखक के अपने तत्त्वावधान में अतीव शुद्ध छपा है। ग्रन्थमुद्रापण में लेखक को अपने दो पुत्रों— पतञ्जलिकुमार भाटिया शास्त्री तथा अश्विनोकुमार शास्त्री —से विशेष सहायता मिली है। इस ग्रन्थ का प्रथमसंस्करण श्री पं० दीनानाथजी शास्त्री सारस्वत भूतपूर्व प्रिंसिपल सनातनधर्मकालेज मुलतान के तत्त्वावधान में छपा था। हमें बड़ा दुःख है कि आदरणीय शास्त्रीजी अब इस द्वितीयसंस्करण के समय अपनी इहलीला समाप्त कर परलोक सिधार चुके हैं। अतः अब उन से साहाय्य नहीं लिया जा सका। पर उन की प्रेरणा और शुभ कामनाएं हमेशा हमारे साथ रही हैं और रहेंगी—इस में तनिक भी सन्देह नहीं। यह है हमारा आत्मनिवेदन। अब आगे पाठकों का काम है कि लेखक को उत्साहित कर आगे सेवा करने का अवसर दें या न दें। मुख्यों स्ट्रीट सुरभारती-समुपासक गांधीनगर, दिल्ली-११००३१ भीमसेन शास्त्री विजयदशमी (१६.१०.१९८३)