लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
[१६] इन में कतिपय अव्ययों पर कई कई मास तक सोच विचार किया गया है और कई आदरणीय विद्वानों की सम्मति भी ली गई है। इस प्रकरण को लिखने में सब से बड़ी सहायता हमारे विशाल संस्कृत पुस्तकालय की है जिस में हम ने प्रायः पञ्च सहस्र संस्कृतग्रन्थ अपना सम्पूर्ण जीवन लगा कर संगृहीत किये हैं। इन विशेषताओं के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की छोटी-मोटी विशेषताओं का भी यह ग्रन्थ आगार है। जैसे लघुकौमुदी में आये प्रत्येक शब्द की पूरी पूरी रूप- माला इस में दी गई है, किसी शब्द पर तद्वत् नहीं लिखा गया। प्रत्येक स्थान पर ढेरों उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं ताकि विद्यार्थियों को विषय हृदयंगम हो सके। अकेले इको यणचि सूत्र पर ही पचास उदाहरण दिये गये हैं। सन्धिप्रकरण में इस तरह एक हजार नये उदाहरण अभ्यासार्थ दिये गये हैं। अव्ययप्रकरण में उदाहृत लगभग पन्द्रह सौ सुभाषितों वा विशेष वचनों के मूलग्रन्थ और पते पूरी तरह ढूंढ ढूंढ कर निर्दिष्ट किये गये हैं। कठिन सुभाषितों के हिन्दी में अर्थ भी दिये गये हैं। सूत्र, वार्त्तिक तथा परिभाषा आदियों की सूची के साथ साथ तीन सौ सुबन्त शब्दों और सवा पाच सौ अव्ययों की भी वर्णानुक्रमणी इस संस्करण में उद्दृङ्कित की गई है ताकि विद्यार्थियों को किसी अव्यय या सुबन्त के ढूंढने में कठिनाई न हो। भैमीव्याख्या के प्रथम भाग का यह द्वितीयसंस्करण है। इस संस्करण में प्रथमसंस्करण की अपेक्षा लगभग डेढ सौ पृष्ठों की ठोस सामग्री अधिक है। दो सौ के करीब शोधपूर्ण नये टिप्पण वा फुटनोट्स और जोड़े गये हैं। इस ग्रन्थ के शोधन में भी विशेष प्रयत्न किया गया है। कतिपय अनिवार्य मानव-सुलभ भूलों को छोड़ कर प्राय यह ग्रन्थ लेखक के अपने तत्त्वावधान में अतीव शुद्ध छपा है। ग्रन्थमुद्रापण में लेखक को अपने दो पुत्रों— पतञ्जलिकुमार भाटिया शास्त्री तथा अश्विनोकुमार शास्त्री —से विशेष सहायता मिली है। इस ग्रन्थ का प्रथमसंस्करण श्री पं० दीनानाथजी शास्त्री सारस्वत भूतपूर्व प्रिंसिपल सनातनधर्मकालेज मुलतान के तत्त्वावधान में छपा था। हमें बड़ा दुःख है कि आदरणीय शास्त्रीजी अब इस द्वितीयसंस्करण के समय अपनी इहलीला समाप्त कर परलोक सिधार चुके हैं। अतः अब उन से साहाय्य नहीं लिया जा सका। पर उन की प्रेरणा और शुभ कामनाएं हमेशा हमारे साथ रही हैं और रहेंगी—इस में तनिक भी सन्देह नहीं। यह है हमारा आत्मनिवेदन। अब आगे पाठकों का काम है कि लेखक को उत्साहित कर आगे सेवा करने का अवसर दें या न दें। मुख्यों स्ट्रीट सुरभारती-समुपासक गांधीनगर, दिल्ली-११००३१ भीमसेन शास्त्री विजयदशमी (१६.१०.१९८३)
ॐ श्रीमद्वरदराजाचार्यप्रणीता लघु-सिद्धान्त-कौमुदी श्रीभीमसेनशास्त्रिनिर्मितया भैमीव्याख्ययोद्भासिता [ पूर्वार्धम् ] --: :०: :-- (व्याख्याकर्तृमङ्गलाचरणम्) प्राप्यतेऽन्विष्यमाणो न यः कुत्रचिद् योगिविद्वज्जनैर्हा कुतोऽन्यैर्नरैः। आदिमध्यान्तशून्यं प्रभुं निर्गुणं स्वस्य चित्तोपशान्त्यै तमेवाश्रये ॥ १ ॥ सर्वाऽभिलाप - दातारं शरणाऽगत - तारकम् । अभिलाषशतं त्यक्त्वा प्रपन्नोऽस्मि जगद्गुरुम् ॥ २ ॥ व्याख्याता सूरिभिः कामं, लघुसिद्धान्तकौमुदी । भाषाटीका तथाप्यस्या बोधदा नैव दृश्यते ॥ ३ ॥ अक्षरार्थपराः सर्वे विमुखा भाववर्णनात् । वृथाऽनपेक्षं जल्पन्तः पाण्डित्यमदगर्विताः ॥ ४ ॥ तेभ्यः खिन्नो विनोदाय बालानामुपकारिणीम् । स्वाधीतस्य प्रचाराय टीकामेतां करोम्यहम् ॥ ५ ॥ सुस्पष्टपदलालित्यं सुष्ठु भावस्य कीर्तनम् । वटून् दृष्ट्वा कृतं सर्वं न च पाण्डित्यगर्वतः ॥ ६ ॥ टीकामेतां जगद् दृष्ट्वा गदिष्यत्येकया गिरा । बालानामुपकारोऽभूद् यः कृतो नैव केनचित् ॥ ७ ॥ कृपा स्याज्जगदीशस्य यत्नो मे सफलो भवेत् । यतो मौर्ख्याभिभूतस्य को देवादपरोऽस्ति मे ॥ ८ ॥
२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम् । पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम् ॥ १ ॥ अन्वय —अहम् (वरदराज ) शुद्धां गुण्यां सरस्वतीं देवीं नत्वा पाणिनीय- प्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीं करोमि । अर्थ --मैं (वरदराज) शुद्ध तथा गुणों से युक्त सरस्वती देवी को नमस्कार कर पाणिनि के बनाये व्याकरणशास्त्र में (बालकों के) प्रवेश के लिये लघुसिद्धान्त- कौमुदी को बनाता हूं। व्याख्या—ज्ञान की अधिष्ठात्री (स्वामिनी) एक देवी मानी जाती है, जिसे सरस्वती कहते हैं। ग्रन्थकार ने आदि में उसे इसलिये नमस्कार किया है कि वह प्रसन्न होकर मेरे ऊपर कृपा करे जिस से मैं ग्रन्थ बनाने में समर्थ हो सकूं । इस ग्रन्थ के बनाने वाले वरदराज नामक पण्डित हैं। इन का सम्पूर्ण वृत्तान्त भूमिका में लिखा है देख लें । जिस से किसी भाषा के शुद्ध अशुद्ध होने का ज्ञान हो उसे उस भाषा का व्याकरण कहते हैं। संस्कृतभाषा के अनेक व्याकरण हैं। यथा—पाणिनीय, कातन्त्र, चान्द्र, मुग्धबोध, सारस्वत आदि । संस्कृतभाषा के सम्पूर्ण व्याकरणों में पाणिनिमुनि का बनाया व्याकरण ही सब से श्रेष्ठ और प्रचलित है। इस के अध्ययन में कठिनता का अनुभव कर वरदराज ने यह लघुसिद्धान्तकौमुदी बनाई है। 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' शब्द का अर्थ कुछ व्याकरण-सिद्धान्तों को चांदनी के समान प्रकाशित करने वाली है। टिप्पणी—गुण्याम् = प्रशस्ता गुणाः सन्त्यस्या इति गुण्या । ताम् = गुण्याम् । [रूपादाहतप्रशंसयोर्यप् (५।२।१२०) इति सूत्रस्थेन अन्येभ्योऽपि दृश्यते इति वार्त्तिकेन यप् ] । पाणिनीयप्रवेशाय— पाणिनिना प्रोक्तम् = पाणिनीयम्, तस्मिन् प्रवेशः =पाणिनीयप्रवेशस्तस्मै = पाणिनीयप्रवेशाय । लघुसिद्धान्तकौमुदी—लघवः = असमग्रा ये सिद्धान्ताः = ऊहापोहकृतनिश्चितविचारास्तेषां कौमुदी = कौमुदीव = चन्द्रिकेव । [अत्रत्यः कौमुदीशब्दः कौमुदीवेत्यर्थे लाक्षणिकः ] । यथा हि ज्योत्स्ना तमो निरस्य सकलभावान् प्रकाशयति, दिनकरकिरणजनितं तापमुपशमयति, तथेयमप्यज्ञानन्दूरीकृत्य महाभाष्यादिदुरुहग्रन्थजनितं तापमुपशमय्य व्याकरणसिद्धान्तान् मानसे प्रकटीकरोतीति सादृश्यम् । अथ संज्ञाप्रकरणम् [लघु०] अइउण् ॥१॥ ऋऌक् ॥२॥ एओङ् ॥३॥ ऐऔच् ॥४॥ हयवरट् ॥५॥ लँण् ॥६॥ ञमङणनम् ॥७॥ झभञ् ॥८॥ घढधष् ॥९॥ जबगडदश् ॥१०॥ खफछठथचटतव् ॥११॥ कपय् ॥१२॥ शषसर् ॥१३॥ हल् ॥१४॥
संज्ञा-प्रकरणम् ३ । इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसञ्ज्ञार्थानि। एषामन्त्या इतः। हकारा- दिष्वकार उच्चारणार्थः। लँण्मध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः॥ अर्थ:—ये चौदह सूत्र माहेश्वर अर्थात् महादेव से आये हुए हैं। इन का प्रयोजन अण् आदि संज्ञा करना है। इन के अन्त्य वर्ण इत्सञ्ज्ञक हैं। हकार आदियों में अकार उच्चारण के लिये है। परन्तु 'लँण्' सूत्र में वह इत्सञ्ज्ञक है। व्याख्या—कहते हैं कि महामुनि पाणिनि विद्यार्थि-अवस्था में अत्यन्त मन्दमति थे। जब इन्हें पढ़ने से भी कुछ ज्ञान न हुआ, तब ये खिन्न हो गुरुकुल छोड़ तपस्या करने के लिये हिमाचल पर चले गये। वहां इन्होंने शिवजी की आराधना की। शिव- जी ने प्रसन्न हो, चौदह बार डमरू बजाया। उस से पाणिनि ने अइउण् आदि चौदह सूत्र प्राप्त किये। इस लिये इन सूत्रों को माहेश्वर अर्थात् महादेव से प्राप्त हुआ कहते हैं। परन्तु कई एक इस बात को प्रमाण-शून्य होने से गलत मानते हैं। उन का कथन है कि इन सूत्रों को बनाने वाले पाणिनि ही हैं¹। परन्तु चाहे कुछ भी क्यों न हो, इतना तो निर्विवाद सिद्ध है कि ये सूत्र पाणिनीय-व्याकरण के प्राण हैं। इन के बिना पाणिनीय-व्याकरण चल ही नहीं सकता। इन का उपयोग आगे चल 'अण्' आदि संज्ञाओं के करने में किया जावेगा। हम वहीं पर इन्हें स्पष्ट करेंगे। जो अन्त में रहे उसे अन्त्य या अन्तिम कहते हैं। इन चौदह सूत्रों के 'ण्, क्, ङ्, च्, ट्, ण्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र्, ल्' ये चौदह वर्ण अन्त्य हैं। इन की इत्संज्ञा है अर्थात् ये इत् नाम वाले हैं। ध्यान रहे कि इस शास्त्र में संज्ञा, संज्ञक और संज्ञी शब्दों का बहुत व्यवहार होता है। जो नाम हो वह संज्ञा और जिसका नाम हो वह संज्ञक या संज्ञी होता है। जैसे 'इस का नाम देवदत्त है' यहां 'देवदत्त' यह शब्द संज्ञा और सामने खड़ा हुआ हाड मांस वाला लम्बा चौड़ा मनुष्य संज्ञक या संज्ञी है। इसी प्रकार यहां ण्, क् आदि संज्ञक या संज्ञी होंगे और 'इत्' यह संज्ञा होगी। प्रत्येक वस्तु की संज्ञा व्यवहार की आसानी के लिये ही होती है; यथा मेरी संज्ञा 'भीमसेन' है। इस से यह होगा कि लोग मुझे व्यवहार में आसानी से ला सकेंगे। कोई मुझे बुलाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! आओ'; कोई मुझे पढ़ाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! पढ़ो'; कोई खिलाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! खाओ'; कोई मेरा पता पूछेगा तो कहेगा 'भीमसेन कहां हैं ?' अब कल्पना करें कि यदि मेरा कोई नाम न होता तो जिस ने मुझे बुलाना होता वह दूसरे के प्रति क्या कहता ? कि 'उस दुबले पतले मनुष्य को जिस का रङ्ग ऐसा २ है, सिर पर अमुक २ रङ्ग की टोपी है, पैर में फलां प्रकार का जूता है, लाओ'। तब सम्भव है कि सुनने वाला पुरुष उसे न समझ पाता। अथवा मेरी जगह किसी अन्य को ला खड़ा करता; तो कहने का तात्पर्य यह है कि नाम अर्थात् संज्ञा के बिना न तो जगत् का व्यवहार और न ही शास्त्र का व्यवहार चल १. इस विषय पर प्रत्याहार-सूत्रों का निर्माता कौन ? नामक हमारा लघुशोधनिबन्ध देखें, जो भैमी प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हो चुका है।
४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां सकता है। व्यवहार के लिये आवश्यक है कि जिसका हम व्यवहार करना चाहें उस की कोई न कोई संज्ञा अवश्य करें। बिना संज्ञा के कभी व्यवहार नहीं चल सकता। यहां आगे आदिरन्त्येन सहेता (४) आदि सूत्रों में इन ण्, य् आदि अक्षरों का व्यव- हार करना है, अतः इन की 'इत्' यह संज्ञा की जाती है। हमारी लिपि अर्थात् वर्णमाला में दो प्रकार के अक्षर हैं। एक तो 'अ, इ, उ' आदि स्वर, दूसरे 'क्, ख्, ग्, घ्' आदि व्यञ्जन या हल्। व्यञ्जनों का उच्चारण स्वरों के मिलाये बिना नहीं हो सकता। इसलिये आजकल की वर्णमाला की छोटी २ पुस्तको में भी 'क, ख, ग, घ, ङ' इत्यादि प्रकार से अकार-युक्त व्यञ्जन देखने में आते हैं।¹ इन चौदह सूत्रों में 'हयवरट्' सूत्र के हकार से व्यञ्जन आरम्भ होते हैं। इन में भी अकार केवल इसीलिये है कि इन का उच्चारण हो सके, क्योंकि अकार के बिना 'ह्, य्, व्, र्, ट्' इस प्रकार उच्चारण नहीं हो सकता। अतः अकार का इन में ग्रहण नहीं करना चाहिये। यदि अलग २ अकार ग्रहण के लिये होता तो उस का बार २ उच्चारण न होता। क्योंकि ग्रहण तो एक बार के उच्चारण से भी हो जाता, तो पुनः ग्रन्थ क्यों बढ़ाते ? लँण् इस सूत्र में ल्कारस्थ (लकार में ठहरा हुआ) अकार उच्चारण के लिये नहीं किन्तु प्रयोजन वशात् इत्संज्ञक है। उसका प्रयोजन 'रँ' प्रत्याहार सिद्ध करना है जो आगे उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र पर मूल में ही स्पष्ट हो जावेगा। हम भी इस की वहीं व्याख्या करेंगे। टिप्पणी—महेश्वरादागतानि = माहेश्वराणि, तत आगत (१०६५) इत्यण्। अण् आदिर्यासां ता अणादयः, अणादयश्च ता संज्ञा = अणादिसंज्ञा। अणादिसंज्ञा अर्थः प्रयोजनं येषान्तानीमानि = अणादिसंज्ञार्थानि। अन्त्या वर्णा इतो ज्ञेयाः, प्रत्याहारोपयोगिनः । अकारो मुखसौख्याय हकारादौ प्रकीर्तितः ॥१॥ परमेतं बुधाः प्राहुर् इत्त्वमेव गतं लणि। रेत्यपूर्वंस्ततस्तेन प्रत्याहारः प्रजायते ॥२॥ १ व्यञ्जनों के साथ स्वर मिलाने का प्रकार यथा— क्+अ=क, क्+आ=का, क्+इ=कि, क्+ई=की, क्+उ=कु, क्+ऊ=कू, क्+ऋ=कृ, क्+ॠ=कॄ, क्+ऌ=कॢ, क्+ए=के, क्+ ऐ=कै, क्+ओ=को, क्+औ=कौ, क्+अं=कं, क्+अः=कः। इसी प्रकार अन्य व्यञ्जनों के साथ भी संयोग कर लेना चाहिये। इन में से 'कि' पर विशेष ध्यान देना चाहिये। प्राय कई बालक 'कि' में 'इ' को प्रथम और क् को पश्चात् लिखा माना करते हैं, उन्हें उपर्युक्त प्रकार से अपनी भ्रान्ति दूर कर लेनी चाहिये। ध्यान रहे कि बिना स्वर व्यञ्जन का संयोग जान कदाचित् इस ग्रन्थ में प्रवेश ही नहीं हो सकता।
संज्ञा-प्रकरणम् ५ [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१) हलन्त्यम् ।१।३।३॥ उपदेशेऽन्त्यं हलित् स्यात् । उपदेश आद्योच्चारणम् । सूत्रेष्वदृष्टम्पदं सूत्रान्तरादनुवर्त्तनीयं सर्वत्र ॥ अर्थ:—उपदेश में वर्त्तमान अन्त्य हल् इत्संज्ञक हो । उपदेश:—आद्यों के उच्चारण को अथवा धातु आदि के आद्य उच्चारण को उपदेश कहते हैं । सूत्रेषु—सूत्रों में जो पद न हो (पर वृत्ति में दिखाई दे) वह पद सर्वत्र पिछले (या कहीं २ अगले) सूत्रों में ले लेना चाहिये । व्याख्या—इस व्याकरण के प्रथम कर्त्ता महामुनि पाणिनि हैं । इन्होंने 'अष्टा- ध्यायी' नामक जगत्प्रसिद्ध ग्रन्थ रचा है । इस ग्रन्थ में आठ अध्याय और प्रत्येक अध्याय में चार २ पाद हैं । अर्थात् सब मिला कर बत्तीस पाद अष्टाध्यायी में हैं । हर एक पाद में भिन्न भिन्न सङ्ख्याओं में सूत्र हैं । इन सब की तालिका निम्न प्रकार से समझनी चाहिये । | अध्यायनाम | प्रथमपाद | द्वितीयपाद | तृतीयपाद | चतुर्थपाद | सम्पूर्णसंख्या | | प्रथमाध्याय | ७४ | ७३ | ६३ | १०६ | ३४६ | | द्वितीयाध्याय | ७१ | ३८ | ७३ | ८५ | २६७ | | तृतीयाध्याय | १५० | १८८ | १७६ | ११७ | ६३१ | | चतुर्थाध्याय | १७६ | १४४ | १६६ | १४४ | ६३० | | पञ्चमाध्याय | १३५ | १४० | ११६ | १६० | ५५४ | | षष्ठाध्याय | २१७ | १६८ | १३८ | १५५ | ७२८ | | सप्तमाध्याय | १०३ | ११८ | ११६ | ६७ | ४३७ | | अष्टमाध्याय | ७४ | १०८ | ११६ | ६८ | ३६६ | | समग्र अष्टाध्यायी की सूत्रसंख्या— | | | | | ३९६५ | प्राचीन काल में यह सम्पूर्ण अष्टाध्यायी कण्ठस्थ की जाती थी । तदनन्तर व्याकरण पढ़ा जाता था । तभी तो काशिकाकार जयादित्य, पदमञ्जरीकार हरदत्त, शेखरकार नागेशभट्ट सरीखे विद्वान् उत्पन्न होते थे । परन्तु अब इस परिपाटी के मन्द
६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां हों जाने से वैसे विद्वान् उत्पन्न नहीं होते । अब भी यदि इस परिपाटी का पुनरुद्धार हो जावे तो पुनः वैसे विद्वान् निकलने लग पड़ेंगे । कर्त्तव्योऽत्र यत्न । इस ग्रन्थ में अष्टाध्यायी के सूत्र बिखरे हुए हैं। इन सूत्रों के आगे तीन अङ्क लिखे हैं। इन में से पहला अष्टाध्यायी के अध्याय का सूचक, दूसरा पादसूचक तथा तीसरा सूत्रसूचक समझना चाहिये । यथा — हलन्त्यम् ।१।३।३॥ यहां ‘१’ से तात्पर्य प्रथमाध्याय, ‘३’ से तात्पर्य तृतीयपाद और अन्तिम ३ से तात्पर्य तीसरे सूत्र से है । तो इस प्रकार यह सूत्र प्रथमाध्याय के तृतीय पाद का तीसरा है ऐसा ज्ञात होता है । एवम् आगे भी सर्वत्र समझ लेना । पाणिनि के सूत्रपाठ के अर्थ करने का विचित्र ढंग है । कई पदों का सूत्रों में नामोनिशान नहीं होता, परन्तु अर्थ करते समय वे आ जाया करते हैं । अतः सूत्रों के अर्थ करने के ढंग पर कुछ थोड़ा विचार करते हैं । (१) सब से प्रथम सूत्र का पदच्छेद करना चाहिये । जैसे— हलन्त्यम् ।१।३।३।। हल् । अन्त्यम् । आदिरन्त्येन सहेता ।१।१।७०॥ आदि । अन्त्येन । सह । इता । इको यणचि ।६।१।७६।। इक । यण् । अचि । अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय । ।१।१।६८॥ अण् । उदित् । सवर्णस्य । च । अप्रत्यय । कई स्थानों पर पिछले सूत्रों से तथा कहीं २ अग्रिम सूत्रों से भी¹ पद ले लिये जाते हैं । महामुनि पाणिनि ने यद्यपि इन की स्वरित के चिह्न से व्यवस्था की थी, परन्तु अब वह व्यवस्था बिगड़ गई है । अब तो गुरुपरम्परा में जो जो पद पीछे से या आगे से लिया जाता है लिया जाना चाहिये । इस में अपनी ओर से कोई गड़बड़ नहीं करनी चाहिये । यथा— हलन्त्यम् यहां पिछले उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से ‘उपदेशे’ और ‘इत्’ ये दो पद आते हैं । इन पदों को भी पदच्छेद में लिखना चाहिये और कोष्ठ में बता देना चाहिये कि ये पद कहां से आते हैं² । यथा—उपदेशे (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । हल् । अन्त्यम् । इत् (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । (२) पदच्छेद के बाद उन पदों की विभक्तियां जाननी चाहियें । यथा— हलन्त्यम् । उपदेशे ।७।१। अन्त्यम् ।१।१। हल् ।१।१। इत् ।१।१। (यहा पहले अङ्क से विभक्ति तथा दूसरे अङ्क से वचन समझना चाहिये) । आदिरन्त्येन सहेता । आदि ।१।१। अन्त्येन ।३।१। सह इत्यव्ययपदम् । इता ।३।१। इको यणचि । इक ।६।१। यण् ।१।१। अचि ।७।१। अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय । अण् ।१।१। उदित् ।१।१। सवर्णस्य १ यथा ईस से (७ २ ७७) सूत्र मे अगले सूत्र से 'ध्वे' पद लाया जाता है । २ इस अनुवृत्ति का व्यवहार लोक मे भी देखा जाता है, जैसे किसी ने कहा 'भरत को चार आम दो' 'राम को तीन' । अब यहां 'राम को तीन' यह वाक्य अपूर्ण है, इस की पूर्णता 'आम दो' इतने पद मिलाकर 'राम को तीन आम दो' इस प्रकार हो जाती है, तो यहां 'आम दो' इन दो पदों की अनुवृत्ति समझनी चाहिये । इस प्रकार इस का लोक मे सर्वत्र अतीव प्रयोग देखा जाना है ।
संज्ञा-प्रकरणम् ७ ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अप्रत्ययः ।१।१। स्मरण रहे कि कई स्थानों पर विभक्ति का लुक् तथा अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति भी लगी रहती है । इसे सूत्रकार की गलती नहीं समझी जाती क्योंकि छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति अर्थात् सूत्र वेद की नाईं होते हैं । जैसे वेद में विभक्ति का लुक् तथा अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति लगी रहती है, वैसे सूत्रों में भी होता है । विभक्ति का लुक् यथा— न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१=०) यहां ‘न’ और ‘प्रातिपदिक’ शब्दों से परे षष्ठी- विभक्ति का लुक् हुआ है । अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति लगे रहने के उदाहरण आगे यत्र तत्र बहुत आएंगे । (३) पदच्छेद और विभक्ति जानने के पश्चात् समास जानना चाहिये । समास कहीं होता है और कहीं नहीं भी होता । यथा—तस्य लोपः (३) इस सूत्र में कोई समास नही । तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१०) इत्यादि सूत्रों में समास है। आवश्यक तद्धितादि का समावेश भी हम ने समास में कर दिया है । अर्थात् समास के जानने के साथ २ आवश्यक तद्धित आदि प्रत्यय भी जान लेने चाहियें । (४) इतना जान लेने के पश्चात् महामुनि पाणिनि के अर्थ करने के नियमों का ध्यान रख कर सूत्र का अर्थ करना चाहिये । वे नियम प्रायः ये हैं— (१) षष्ठी स्थानेयोगा (१.१.४८) | (६) इको गुणवृद्धी (१.१.३) (२) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य | (७) अचश्च (१.२.२८) (१.१.६५) | (८) येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) (३) तस्मादित्युत्तरस्य (१.१.६६) | (६) यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे (४) अलोऽन्त्यस्य (१.१.५१) | (वा०) (५) आदेः परस्य (१.१.५३) | (१०) प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् (प०) इन सब को हम यथास्थान स्पष्ट करेंगे । पीछे ‘एषामन्त्या इतः’ कह कर ण् क् आदियों को ‘इत्’ कह आये हैं । अब वह सूत्रों से सिद्ध करते हैं । हलन्त्यम् । उपदेशे ।७।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । हल् ।१।१। अन्त्यम् ।१।१। इत् ।१।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । अर्थः—(उपदेशे) उपदेश में विद्यमान (अन्त्यम्) अन्तिम (हल्) हल् = व्यञ्जन (इत्) इत्सञ्ज्ञक होता है । यदि उपदेश में कहीं हमें अन्त्य हल् मिलेगा तो वह इत्सञ्ज्ञक होगा । अब प्रश्न यह पैदा होता है कि उपदेश क्या है ? इसका उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि उपदेश आद्योच्चारणम् आद्योच्चारण उपदेश होता है । इस शब्द पर शेखरादि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में बहुत विवाद है । हम उस विवाद के निकट नहीं जाते, क्योंकि वह प्रपञ्च बालकों की समझ में नहीं आ सकता । यहां सरल मार्ग यह है कि यहां षष्ठीतत्पुरुषसमास है—आद्यानाम् उच्चारणम् आद्यो- च्चारणम् । जो आद्यों अर्थात् शिव, पाणिनि, कात्यायन तथा पतञ्जलि का उच्चारण
८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां है, उसे 'उपदेश' कहते हैं। भाष्यकार ने सब स्थल नियत कर दिये हैं; उन का कथन है कि प्रत्याहार-सूत्र, धातुपाठ, गणपाठ, प्रत्यय, आगम और आदेश ये सब उपदेश हैं¹। उन में अन्त्य हल् इत्सञ्ज्ञक होता है। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२) अदर्शनं लोपः ।१।१।५६॥ प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थ:—विद्यमान का अदर्शन लोपसञ्ज्ञक होता है। व्याख्या-स्थानस्य ।६।१। (स्थानेऽन्तरतम सूत्र से 'स्थाने' पद आकर विभक्तिविपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है)। अदर्शनम् ।१।१। लोप ।१।१। अर्थ — (स्थानस्य) विद्यमान का (अदर्शनम्) न सुनाई देना (लोप ) लोप होता है। यहां अदर्शन सञ्ज्ञी तथा लोप सञ्ज्ञा है। हम ने 'अदर्शन' का अर्थ 'न सुनाई देना' किया है। इस का यह कारण है कि यह 'शब्दानुशासन' अर्थात् शब्द-शास्त्र है। इस में शब्दों के साधु (ठीक) असाधु (गलत) होने का विवेचन है। शब्द कान से सुने जाते हैं, आंख से देखे नहीं जाते अतः यहां पर 'अदर्शन' का अर्थ 'न दिखाई देना' की अपेक्षा 'न सुनाई देना' ही युक्त है। ऐसा अर्थ करने पर 'दृश्' धातु को ज्ञानार्थक मानना चाहिये। ज्ञान —आंख, कान, नाक आदि सब से हो सकता है। 'शब्दानुशासन' का अधिकार होने से हम यहां ज्ञान कान-विषयक ही मानेंगे। यहां स्थानेऽन्तरतम (१७) से स्थान शब्द लाने का तात्पर्य यह है कि विद्यमान का अदर्शन ही लोपसञ्ज्ञक हो, अविद्यमान का अदर्शन लोपसञ्ज्ञक न हो। यथा —'दधि, मधु' यहां 'क्विप्' प्रत्यय कभी नहीं हुआ अतः उस का अदर्शन है। यदि पीछे से स्थान शब्द न लावें तो यहां क्विप् प्रत्यय का अदर्शन होने से प्रत्ययलक्षण द्वारा ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् (७७७) से तुक् प्राप्त होगा जो कि अनिष्ट है; अतः 'स्थान' शब्द की अनुवृत्ति लाकर विद्यमान के अदर्शन की ही लोपसञ्ज्ञा करनी युक्त है। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३) तस्य लोपः ।१।३।६॥ तस्येतो लोपः स्यात् । णादयोऽणाद्यर्थाः ॥ अर्थ —उस इत्सञ्ज्ञक का लोप होता है। ण् आदि 'अण्' आदियों के लिये हैं। १. प्रत्याहारसूत्र यथा—अइउण् आदि। धातुपाठ यथा—डुपचष् पाके आदि। गणपाठ यथा—नडट्, देवट् आदि। प्रत्यय यथा—तृच्, तृन्, तसिल् आदि। आगम यथा—कुक्, तुक्, इट् आदि। आदेश यथा—अर्वणस्त्रसावनञः (२६२) द्वारा 'तृ' आदेश आदि। प्रत्यया शिवसूत्राणि, आदेशा आगमास्तथा। धातुपाठो गणो पाठः, उपदेशाः प्रकीर्त्तिताः ॥
१. संज्ञा एवं परिभाषा प्रकरण (माहेश्वर सूत्र, सवर्ण-संज्ञा व यत्न)
संज्ञा-प्रकरणम् ६ व्याख्या—तस्य ।६।१। इतः ।६।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से प्रथमान्त 'इत्' पद आकर विभक्ति-विपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है) । लोपः ।१।१। अर्थः- (तस्य) उस (इतः) इत्सञ्ज्ञक का (लोपः) लोप होता है । अब यहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि यदि इस सूत्र में 'तस्य' पद न लेते तो भी अर्थ में कोई हानि नहीं हो सकती थी, क्योंकि 'इतः' पद की अनुवृत्ति तो आ ही रही थी । इस का समाधान यह है कि यदि 'तस्य' पद ग्रहण न करते तो इत्सञ्ज्ञक के अन्त्य वर्ण का लोप होता, सम्पूर्ण इत्सञ्ज्ञक का लोप न होता । तथाहि—ञिमिदाँ स्नेहने, टुनदिँ समृद्धौ, डुकृञ् करणे यहां आदिरञिटुडवः (४६२) सूत्र द्वारा ञि, टु, डु, की इत्सञ्ज्ञा हो कर लोप प्राप्त होने पर अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र द्वारा अन्त्य इकार, उकार का लोप प्रसक्त होता है जो कि अनिष्ट है । अब यदि सूत्र में तस्य पद ग्रहण करते हैं तो यह दोष नहीं आता क्योंकि आचार्य का 'तस्य' यह कहना बतलाता है कि आचार्य सारे इत् का लोप चाहते हैं केवल अन्त्य का नहीं । अब इस सूत्र से ण्, क्, ङ्, च् आदि इतो का लोप प्राप्त होता है । उस पर कहते हैं कि इन का लोप नहीं करना, क्योंकि इन से अण् आदि प्रत्याहार बनाये जायेंगे । यदि इन का लोप करना होता तो इन का ग्रहण किस लिये करते ? अतः इन का लोप नहीं करना चाहिये । अब इत्सञ्ज्ञकों से प्रत्याहार बनाने के लिए अग्रिमसूत्र लिखते हैं :— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(४) आदिरन्त्येन सहेता ।१।१।७०॥ अन्त्येनेता सहित आदिर्मध्यगानां स्वस्य च सञ्ज्ञा स्यात् । यथाऽण् इति 'अ इ उ' वर्णानां सञ्ज्ञा । एवमक्, अच्, हल्, अल् इत्यादयः ॥ अर्थ.—अन्त्य इत् से युक्त आदिवर्ण, मध्यगत वर्णों की तथा अपनी सञ्ज्ञा हो । यथाण्— जैसे अण् यह अ इ उ वर्णों की सञ्ज्ञा है । इसी प्रकार अक्, अच्, हल्, अल् आदि भी जान लेने चाहियें । व्याख्या—आदिः ।१।१। अन्त्येन ।३।१। सह इत्यव्ययपदम् । इता ।३।१। स्वस्य ।६।१। (स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसञ्ज्ञा से 'स्वम्' यह प्रथमान्त पद आकर विभक्ति- विपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है) । यह सूत्र सञ्ज्ञाधिकार के बीच पढ़ा जाने से सञ्ज्ञासूत्र है । यहां 'अन्त्येनेता सहादिः' अर्थात् 'अन्त्य इत् से युक्त आदि' यह सञ्ज्ञा है । अब सञ्ज्ञी का निर्णय करना है कि सञ्ज्ञी कौन हो ? क्योंकि सूत्र में तो किसी का निर्देश है ही नहीं । आदि और अन्त्य अवयव शब्द हैं । अवयवों से अवयवी लाया जाता है । अतः यहां अवयवी ही सञ्ज्ञी होगा । उस अवयवी (समुदाय) से आदि और अन्त्य सञ्ज्ञा होने के कारण निकल जायेंगे । शेष मध्यगत वर्ण ही सञ्ज्ञी ठहरेंगे । पुनः 'स्वस्य' पद की अनुवृत्ति आकर आदि भी सञ्ज्ञी हो जायेगा । इस प्रकार आदि तथा मध्यगत वर्ण सञ्ज्ञी बनेंगे । तो अब इस सूत्र का अर्थ यह हुआ —
१० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ — (अन्त्येन) अन्त्य (इता) इत् से (सह) युक्त (आदि ) आदि वर्ण (स्वस्य) अपनी तथा मध्यगत वर्णों की सञ्ज्ञा होता है। यहां हमने 'स्वस्य' पद से आदि का ग्रहण किया है, पर कोई पूछ सकता है कि 'स्वस्य' पद से अन्त्य का ग्रहण कर 'अन्त्य इत् से युक्त आदि अन्त्य तथा मध्यगत वर्णों की सञ्ज्ञा हो' ऐसा अर्थ क्यों न किया जाये ? इसका उत्तर यह है कि 'स्व' यह सर्वनाम है। सर्वनाम प्रधान का ही निर्देश कराने वाले होते हैं, अप्रधान का नहीं। 'अन्त्येनेता सहादि' यहां प्रधान आदि है, अन्त्य नहीं। क्योंकि सहयुक्तेऽप्रधाने (२ ३ १९) से अप्रधान में ही तृतीया होती है, अतः 'स्व' यह सर्वनाम प्रधान = आदि का ही ग्रहण करायेगा, अप्रधान अन्त्य का नहीं। अ इ उ ण् यहां अन्त्य इत् = ण् है। आदि 'अ' है। अतः अन्त्य इत् से युक्त आदि 'अण्' हुआ। यह सञ्ज्ञा है। 'इ उ' मध्यगत तथा 'अ' आदि ये तीन सञ्ज्ञी हैं। इसी प्रकार अच्, अक्, हल्, अल् आदि भी जानने चाहियें। इन अण् आदि सञ्ज्ञाओं को पूर्ववर्ती आचार्य 'प्रत्याहार' कहते चले आ रहे हैं। यहां इस शास्त्र में भी इन के लिये प्रत्याहार शब्द व्यवहृत होता है। प्रत्याह्रियन्ते = सङ्क्षिप्यन्ते वर्णा अत्रेति प्रत्याहार। यहां अन्त्य और आदि अ इ उ ण् आदि सूत्रों की अपेक्षा से नहीं लेने, किन्तु मन में रखे समुदाय की अपेक्षा से लेने हैं। यथा—इ उ ण् ऋ लृ क् इस समुदाय का आदि 'इ' और अन्त्य 'क्' है। अन्त्य युक्त आदि = इक् सञ्ज्ञा होगा। इ उ ऋ लृ-- ये सञ्ज्ञी होंगे। 'रट्लँ' यहां उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) में लकारस्थ अकार इत् है। समुदाय का आदि 'र्' है। अन्त्य अँ है। अन्त्य युक्त आदि र्+अँ = 'रँ' यह सञ्ज्ञा होगा। इस सञ्ज्ञा में 'र्' और 'ल्' दो ही सञ्ज्ञी हैं। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अण् आदि प्रत्याहारों में आदि और मध्य- गत वर्ण सञ्ज्ञी होते हैं तो इक् प्रत्याहार में 'क्' भले ही न आये, पर ण् तो आना चाहिये; क्योंकि वह मध्यगत वर्ण है। इस का उत्तर यह है कि आचार्य पाणिनि की शैली से यह प्रतीत होता है कि मध्यगत वर्ण यदि इतसञ्ज्ञक होंगे तो उन का प्रत्या- हारों के सञ्ज्ञियों में ग्रहण न होगा। तथाहि—यदि वे सञ्ज्ञी होते तो 'अच्' प्रत्या- हार में 'क्' का भी ग्रहण होता क्योंकि यह मध्यवर्ण है। 'क्' के ग्रहण होने से उपदेशे- ऽजनुनासिक इत् (२८) इस सूत्र के 'अनुनासिक.' इस पद में 'क्' इस अच् के परे होने पर सकारस्थ इकार को इको यणचि (१५) से यण् तथा यण् का लोपो व्योर्वलि (४२६) से लोप होकर 'अनुनास्क' हुआ होता; पर आचार्य पाणिनि ने ऐसा नहीं किया। इस से यह विदित होता है कि इतसञ्ज्ञक मध्यवर्ती होने पर भी सञ्ज्ञी नहीं होते। अ इ उ ण् आदि चौदह सूत्रों से यद्यपि अनेक प्रत्याहार बन सकते हैं तथापि इस व्याकरणशास्त्र में जिन का व्यवहार किया गया है उन की सङ्ख्या चवालीस
(४४) है। कई लोग 'रँ' प्रत्याहार को नहीं मानते उन के मत में तैंतालीस (४३) प्रत्याहार होते हैं। इन में से बयालीस ('रँ' प्रत्याहार न मानने वालों के मत में इक्ता- लीस ४१) प्रत्याहार तो मुनिवर पाणिनि ने स्वयं सूत्रों में व्यवहृत किये हैं। शेष दो में से एक 'वम्' उणादि सूत्रों का तथा दूसरा 'चय्' वार्त्तिकपाठ का है। हम इन प्रत्या- हारों के लिखने से पूर्व यह बता देना आवश्यक समझते हैं कि प्रत्याहारगत वर्णों के जानने का सुगम उपाय क्या है ? प्रत्याहारगत वर्णों के जानने का सुगम उपाय यह है कि निम्नलिखित बातों को अच्छी तरह से बुद्धि में बिठा लिया जाये— (क) वर्गों के पञ्चवें वर्ण ञमङणनम् सूत्र में हैं। (ख) वर्गों के चौथे वर्ण झभञ्, घढधष् सूत्रों में हैं। (ग) वर्गों के तीसरे वर्ण जबगडदश् सूत्र में है। (घ) वर्गों के दूसरे वर्ण खफछठथ तक हैं। (ङ) वर्गों के प्रथम वर्ण चटतव्, कपय् सूत्रों में है। (च) ऊष्मवर्ण शषसर्, हल् सूत्रों में हैं। (छ) अन्तःस्थवर्ण यवरट्, लँण् सूत्रों में हैं। (ज) स्वरवर्ण अइउण्, ऋऌक्, एओङ्, ऐऔच् सूत्रों में हैं। इस के अतिरिक्त जिन सूत्रों के बीच से कटाव हो कर प्रत्याहार बनते हैं उन सूत्रों के स्थान भी याद रखने योग्य हैं। वे स्थान निम्नलिखित हैं— अइउण् । यहां 'इ' से कटाव होकर इक्, इच् तथा 'उ' से कटाव हो कर उक् प्रत्याहार बनता है। हयवरट् । यहां 'य' से कटाव हो कर यण्, यञ्, यम्, यय्, यर् प्रत्याहार 'व' से कटाव होकर वल् प्रत्याहार तथा 'र्' से कटाव हो कर रँ प्रत्याहार बनता है। ञमङणनम् । यहां 'म' से कटाव होकर मय् तथा 'ङ' से कटाव होकर ङम् प्रत्याहार बनता है। झभञ् । यहां 'भ' से कटाव होकर भष् प्रत्याहार बनता है। जबगडदश् । यहां 'ब' से कटाव होकर बश् प्रत्याहार बनता है। खफछठथचटतव् । यहां 'छ' से कटाव हो कर छव् तथा 'च' से कटाव हो कर चय् प्रत्याहार बनता है। इस व्याकरण में प्रयुक्त होने वाले प्रत्याहारों का दो श्लोकों में संग्रह यथा— ङणटञ्च्वात् स्मृतो ह्येकः, चत्वारश्च चमान्मताः । शलाभ्यां षड् यरातपञ्च, पाद् द्वौ च कणतस्त्रयः ॥१॥ केषाञ्चिच्च मते रोऽपि, प्रत्याहारोऽपरो मतः । लस्याऽवर्णेन वाञ्छन्त्यनुनासिकवलादिह ॥२॥
१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां समास —उश्च ऊश्च ऊ३श्च =व । इतरेतरद्वन्द्व । व कालो यस्य स =ऊकाल । बहुव्रीहि-समास । (एकमात्रिक उकार द्विमात्रिक उकार तथा त्रिमात्रिक उकार का द्वन्द्व करने से 'जस्' विभक्ति मे 'व' रूप निष्पन्न होता है। यहां सब उकार लक्षणा- शक्ति मे अपने २ उच्चारणकाल के सदृश अर्थ वाले हैं)। ह्रस्वश्च दीर्घश्च प्लुतश्च = ह्रस्वदीर्घप्लुत । इतरेतरद्वन्द्व । (यहा इतरेतरद्वन्द्व होने से यद्यपि बहुवचन होना चाहिये था तथापि सौत्र होने के कारण एकवचन हो गया है) । अर्थ —(ऊकाल ) एकमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला, द्विमात्रिक उकार के सदृश उच्चारण- काल वाला तथा त्रिमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला (अच् ) अच्, क्रमशः (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत ) ह्रस्व दीर्घ तथा प्लुत संज्ञक होता है। भाव --यदि एकमात्रिक¹ उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल होगा तो वह ह्रस्व, यदि द्विमात्रिक उकार के उच्चारण-काल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल होगा तो वह दीर्घ और यदि त्रिमात्रिक उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल होगा तो वह प्लुत संज्ञक होगा । कुक्कुट के 'कु कू कू३' शब्द मे क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत उकार का उच्चारण स्पष्ट प्रतीत होता है अतः यहां दृष्टान्त के लिये उकार को उपयुक्त समझा गया है वरन् 'आकाल' आदि भी कहा जा सकता था । इस प्रकार अचों के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत ये तीन २ भेद हो जाते हैं (ध्यान रहे कि यहां सामान्यतः कथन किया गया है, सब अचों के तीन तीन भेद नही होते, पर हां यह तीनों भेद अचों के ही होते हैं अन्य वर्णों के नही) । अब अग्रिम तीन सूत्रो से प्रत्येक के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन २ भेद कहे जाते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(६) उच्चैरुदात्तः ।१।२।२६॥ (ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेषूर्ध्वभागे निष्पन्नोऽजुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥) संज्ञा-सूत्रम्—(७) नीचैरनुदात्तः ।१।२।३०॥ (ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेष्वधोभागे निष्पन्नोऽजनुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥) अर्थ — भागो वाले तालु आदि स्थानो मे जो अच् ऊपरले भाग में बोला जाय वह उदात्त होता है ॥६॥ १. कई लोग -जितनी देर मे आंख झपकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । कुछ लोग— जितनी देर में बिजली चमकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । अन्य लोग —जितनी देर मे झरोखे के बीच कण दिखाई देता है उसे 'मात्रा' कहते हैं । इतर लोग— चाष—नीलकण्ठ पक्षी जितनी देर में बोलता है उसे 'मात्रा' मानते हैं। ये सब प्राचीन शिक्षाकार आचार्यों के मत हैं । परन्तु आजकल एक सैकेण्ड के समय को मात्रा-समय मानना सरल प्रतीत होता है । ह्रस्व के बोलने में एक सैकेण्ड,
संज्ञा-प्रकरणम् १५ भागों वाले तालु आदि स्थानों में जो अच् निचले भाग में बोला जाय वह अनुदात्त होता है ॥७॥ व्याख्या—उच्चैः इत्यव्ययपदम् । उदात्तः ।१।१। अच् ।१।१। (ऊकालोऽज्झ्र- स्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥६॥ नीचैः इत्यव्ययपदम् । अनुदात्तः ।१।१। अच् ।१।१। (ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥७॥ 'उच्चैस्' शब्द का अर्थ ऊँचा तथा 'नीचैस्' शब्द का अर्थ नीचा है । भाष्य के प्रमाणानुसार वर्णों का अपने २ स्थानों में ही ऊँचा या नीचापन समझना चाहिये । यदि स्थान अखण्ड हों अर्थात् उन के भाग न हो सकते हों तो ऊँचापन या नीचापन नहीं बन सकता । अतः स्थानों के दो भाग मानने पड़ेंगे एक ऊँचा भाग दूसरा नीचा भाग । वृत्ति में इसीलिये 'सभाग' शब्द लिखा गया है ; अर्थः—(उच्चैः) अपने स्थान के ऊपर वाले भाग में उच्चार्यमाण (अच्) अच् (उदात्तः) उदात्तसंज्ञक होता है ॥६॥ (नीचैः) अपने स्थान के नीचे वाले भाग में उच्चार्यमाण (अच्) अच् (अनुदात्त) अनुदात्तसंज्ञक होता है ॥७॥ यथा अकार का 'कण्ठ' स्थान है । यदि अकार कण्ठ में ऊपरले भाग से बोला जायेगा तो उदात्त और यदि निचले भाग में बोला जायेगा तो अनुदात्त संज्ञक होगा । एवम् आगे इकार आदियों के विषय में भी जान लेना चाहिये । कुछ लोग 'जो ऊँची स्वर से बोला जाय वह उदात्त होता है' ऐसा अनर्थ किया करते हैं । उनके अनर्गल-प्रलाप से सावधान रहना चाहिये; क्योंकि तब मानसिक जप में उदात्तत्व आदि न माना जा सकेगा, पर यह अनिष्ट है । नोटः---इन सूत्रों की तथा अगले सूत्र की वृत्ति 'लघुकौमुदी' में नहीं दी गई । हम ने सुगमता के लिये 'सिद्धान्तकौमुदी' से ले कर कोष्ठ में दे दी है । [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (८) समाहारः स्वरितः ।१।२।३१॥ (उदात्तानुदात्तत्वे वर्णधर्मौ समाह्रियेते यस्मिन् सोऽच् स्वरितसंज्ञः स्यात्) । स नवविधोऽपि प्रत्येकम्अनुनासिकाननुनासिकत्वाभ्यां द्विधा ॥ अर्थः—उदात्त और अनुदात्त वर्णों के धर्म जो उदात्तत्व और अनुदात्तत्व ये दोनों जिस अच् में विद्यमान हों वह अच् 'स्वरित' संज्ञक होता है। स नवविधोऽपि-- इस तरह नौ प्रकार का वह अच् पुनः अनुनासिक तथा अननुनासिकधर्मों के कारण दो प्रकार का हो जाता है । व्याख्या—उदात्तस्य ।६।१। अनुदात्तस्य ।६।१। (उच्चैरुदात्तः से 'उदात्तः' तथा नीचैरनुदात्तः से 'अनुदात्तः' पद का अनुवर्त्तन होता है । इन दोनों का यहां षष्ठी- विभक्ति में विपरिणाम हो जाता है । ये दोनों पद भाष्य के प्रमाणानुसार धर्मप्रधान हैं, अर्थात् इन का अर्थ उदात्तत्व और अनुदात्तत्व है। समाहारः ।१।१। [समाहरणम् =समाहारः, भावे घञ् । समाहारोऽस्त्यस्मिन्निति समाहारः, अर्शआदिभ्योऽच् दीर्घ के बोलने में दो सकेण्ड तथा प्लुत के बोलने में तीन सैकेण्ड का समय लगाना चाहिये ।
१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (१।१६१) इति मत्वर्थीयोऽच् प्रत्यय ] । स्वरितः १।१। अर्थ -(उदात्तस्य = उदा- त्तत्वस्य) उदात्तपन (अनुदात्तस्य = अनुदात्तत्वस्य) और अनुदात्तपने के (समाहारः ) मेल वाला (अच्) अच् (स्वरितः ) स्वरितसञ्ज्ञक होता है। पूर्व-सूत्रों में स्थानी के दो भाग कह आये हैं एक ऊपर वाला भाग और दूसरा नीचे वाला भाग । जो अच् इन दोनों भागों में बोला जाय उसे 'स्वरित' कहते हैं। यथा अकार का 'कण्ठ' स्थान होता है यदि अकार कण्ठ के ऊपरी और निचले दोनों भागों से बोला जायेगा तो 'स्वरित' सञ्ज्ञक होगा । इसी प्रकार अपने २ स्थानों के दोनों भागों से बोले जाने वाले इकार आदि भी स्वरितसञ्ज्ञक होंगे। अब इस प्रकार ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत प्रत्येक के उदात्त, अनुदात्त तथा स्व- रित २ भेद होकर प्रत्येक अच् के नौ २ भेद हो जाते हैं (ध्यान रहे कि यह सामान्यतः कथन किया गया है यद्यपि जिन अचों के ह्रस्व या दीर्घ नहीं होते उन के तो छः २ भेद ही होते हैं) । ये नौ भेद निम्नलिखित हैं-
| (१) ह्रस्व उदात्त | (४) दीर्घ उदात्त | (७) प्लुत उदात्त | | (२) ह्रस्व अनुदात्त | (५) दीर्घ अनुदात्त | (८) प्लुत अनुदात्त | | (३) ह्रस्व स्वरित | (६) दीर्घ स्वरित | (९) प्लुत स्वरित |
इन नौ भेदों में भी हर एक के पुनः अनुनासिक तथा अननुनासिक धर्मों के कारण दो २ भेद होकर प्रत्येक अच् के अठारह २ भेद हो जाते हैं यह सब अग्रिम सूत्र में प्रतिपादन किया गया है। कोई समय था जब उदात्त आदि स्वरों का प्रयोग लोक में भी किया जाता था, पर अब इन का प्रचार लोक में सर्वथा नष्ट हो गया है। ये प्रायः वेद में ही प्रयुक्त होते हैं। वेद में इन का सङ्केत चिह्नों द्वारा किया जाता है। उदात्त के लिये कोई चिह्न नहीं होता, अनुदात्त के नीचे पड़ी रेखा तथा स्वरित के ऊपर खड़ी रेखा का चिह्न होता है। यथा- उदात्त - अ । इ । उ । इत्यादि । अनुदात्त - अ॒ । इ॒ । उ॒ । इत्यादि । स्वरित - अ॑ । इ॑ । उ॑ । इत्यादि । सामवेद आदि में अन्य प्रकार के भी चिह्न होते हैं जो वैदिक ग्रन्थों से जानने चाहियें।
संज्ञा-प्रकरणम् १७ [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (६) मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः । १।१।८॥ मुख-सहित-नासिकयोच्चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्यात्¹ । तदित्थम् - अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकष्टादश भेदाः । लृ-वर्णस्य द्वादश, तस्य दीर्घाभावात् । एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभावात् ॥ अर्थः - मुखसहित नासिका से बोला जाने वाला वर्ण अनुनासिक-संज्ञक होता है । इस प्रकार - 'अ, इ, उ, ऋ' इन वर्णों में प्रत्येक के अठारह २ भेद हो जाते हैं । 'लृ' वर्ण के - दीर्घ न होने से बारह भेद होते हैं। एचों (ए, ओ, ऐ, औ) के भी
- ह्रस्व न होने से बारह २ भेद होते हैं । व्याख्या - मुख-नासिका-वचनः ।१।१। अनुनासिकः ।१।१। समासः - मुखेन सहिता मुख-सहिता, तृतीया-तत्पुरुष-समासः, मुख-सहिता नासिका मुखनासिका, शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपस्योपसङ्ख्यानम् इति वार्त्तिकेन समासः । उच्चत इति वचनः (वर्ण इत्यर्थः), कर्मणि ल्युट् । मुखनासिकया वचनः = मुखनासिकावचनः । तृतीया-तत्पुरुष-समासः । अर्थः - (मुख-नासिका-वचनः) मुखसहित नासिका से बोला जाने वाला वर्ण (अनुनासिकः) अनुनासिक-संज्ञक होता है। भाव यह है कि मुख से तो प्रत्येक वर्ण बोला ही जाता है, पर जो मुख और नासिका दोनों से बोला जाये वह अनुनासिक होता है । यथा ङ्, ञ्, ण्, न्, म् इत्यादि मुख और नासिका दोनों से बोले जाते हैं अतः 'अनुनासिक' संज्ञक हैं। इसी प्रकार यदि अच् मुख और नासिका दोनों से बोला जायेगा तो 'अनुनासिक' होगा और यदि केवल मुख से ही बोला जायेगा तो 'अननुनासिक' (न अनुनासिकः, जो अनुनासिक नहीं) होगा । इस प्रकार पीछे कहे नौ २ भेदों के अनुनासिक और अननुनासिक धर्म के कारण अठारह २ भेद हो जाते हैं । अब अचों का सामान्यतः भेद-निरूपण करके पुनः प्रत्येक का विशेषतः भेद- निरूपण करते हैं । 'अ, इ, उ, ऋ' इन में से प्रत्येक वर्ण के अठारह भेद होते हैं । 'लृ' वर्ण के बारह भेद होते हैं । इस के दीर्घ न होने से छः भेद कम हो जाते हैं । 'एचू' अर्थात् 'ए, ओ, ऐ, औ' वर्णों के भी बारह २ भेद होते हैं, क्योंकि इन का ह्रस्व नहीं होता । ह्रस्व न होने से छः २ भेद कम हो जाते हैं। यह ध्यान रहे कि 'ए, ऐ' तथा 'ओ, औ' परस्पर ह्रस्व दीर्घ नहीं, किन्तु सब दीर्घ और भिन्न २ जाति वाले हैं। इन सब की तालिका यथा - १. अत्र मुखसहितया नासिकया इति व्यास एव न्याय्यः । समासे तु शाकपार्थिवादि- त्वात् सहितपदलोपप्राप्तिः । ल० प्र० (२)
१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
| अ, इ, उ, ऋ, ऌ | अ, इ, उ, ऋ, ए, ओ, ऐ, औ | अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ |
|---|---|---|
| १ ह्रस्व उदात्त अनुनासिक | ७ दीर्घ उदात्त अनुनासिक | १३ प्लुत उदात्त अनुनासिक |
| २ ,, ,, अननुनासिक | ८ ,, अननुनासिक | १४ ,, अननुनासिक |
| ३ ,, अनुदात्त अनुनासिक | ९ ,, अनुदात्त अनुनासिक | १५ ,, अनुदात्त अनुनासिक |
| ४ , ,, अननुनासिक | १० ,, अननुनासिक | १६ , ,, अननुनासिक |
| ५ ,, स्वरित अनुनासिक | ११ , स्वरित अनुनासिक | १७ , स्वरित अनुनासिक |
| ६ ,, ,, अननुनासिक | १२ ,, अननुनासिक | १८ , ,, अननुनासिक |
| प्रकरण का सार— | ||
| इस प्रकरण का सार यह है कि सजातीय (एक ही स्थान वाले) अचों में | ||
| परस्पर तीन प्रकार के भेद होते हैं। १ कालकृत भेद। २ स्थानभागकृत भेद। | ||
| ३ नासिक्याकृत भेद। | ||
| ऊँ३कालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुत (५) सूत्र कालकृत भेद करता है। उच्चैरुदात्तः, | ||
| नीचैरनुदात्तः, समाहारः स्वरितः (६, ७, ८) ये सब स्थानभागकृत भेद करते हैं। मुख- | ||
| नासिकावचनोऽनुनासिकः (६) यह सूत्र नासिकाकृत भेद करता है। उदाहरणार्थ | ||
| अकार के अठारह भेदों की आकृति यथा— | ||
| ह्रस्व—अँ, अ, $\underline{अँ}$, $\underline{अ}$, अँ॑, अ॑ ॥ | ||
| दीर्घ—आँ, आ, $\underline{आँ}$, $\underline{आ}$; आँ॑, आ॑ ॥ | ||
| प्लुत—आँ३, आ३; $\underline{आँ३}$, $\underline{आ३}$, आँ॑३, आ॑३ ॥ | ||
| (१) अँ और अ में केवल नासिकाकृत भेद है क्योंकि पहला अनुनासिक और | ||
| दूसरा अननुनासिक है। दोनों एकमात्रिक हैं अतः कालकृत भेद नहीं है। दोनों | ||
| उदात्त होने के कारण स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होते हैं अतः स्थानभागकृत भेद | ||
| भी नहीं है। | ||
| (२) अ और $\underline{अँ}$ में नासिकाकृत तथा स्थानभागकृत दो प्रकार का भेद है। | ||
| क्योंकि पहला अननुनासिक तथा कण्ठ स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होता है, दूसरा | ||
| अनुनासिक तथा कण्ठ स्थान के अधोभाग में निष्पन्न होता है। इन दोनों में कालकृत | ||
| भेद नहीं है क्योंकि दोनों एकमात्रिक हैं। |
संज्ञा-प्रकरणम् १६ (३) अ और आँ में तीनों प्रकार का भेद है। पहला एकमात्रिक तथा दूसरा द्विमात्रिक है अतः कालकृत भेद हुआ; पहला उदात्त होने से ऊर्ध्वभाग से निष्पन्न होने वाला तथा दूसरा अनुदात्त होने से अधोभाग में निष्पन्न होने वाला है अतः स्थान- भागकृत भेद हुआ; पहला अननुनासिक तथा दूसरा अनुनासिक है अतः नासिकाकृत भेद हुआ। (४) सजातीय अर्थात् एक स्थान वाले अचों में इन तीन भेदों से अतिरिक्त अन्य कोई भेद नहीं हो सकता, पर विजातीय अर्थात् भिन्न २ स्थानों वाले अचों में चौथा 'स्थानकृत' भेद भी हुआ करता है। यथा—अ और ई॒ में; पहला कण्ठस्थानीय तथा दूसरा तालुस्थानीय है अतः स्थानकृत भेद है। नोट—विद्यार्थियों को अचों के परस्पर इन चार प्रकार के भेदों का सुचारु रूप से अभ्यास कर लेना चाहिये। [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् —(१०) तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् १।१।९॥ ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतद् द्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः सवर्ण-संज्ञं स्यात् ॥ अर्थ.—तालु आदि स्थान तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न ये दोनों जिस वर्ण के जिस वर्ण के साथ तुल्य हों वह वर्णजात (अक्षर-समुदाय) परस्पर सवर्णसंज्ञक होता है। व्याख्या—तुल्यास्यप्रयत्नम् १।१। सवर्णम् १।१। समासः—आस्ये (मुखे) भवम् = आस्यम्, शरीरावयवाच्च (१०६१) इति भवार्थे यत्प्रत्ययः। यस्येति च (२३६) इत्यकारलोपे हलो यमां यमि लोपः (६६७) इति यकारलोपः। प्रकृष्टो यत्नः प्रयत्नः, यद्वा प्राक्तनो यत्नः प्रयत्नः, कुगतिप्रादयः (६४६) इति प्रादिसमासः। आस्यञ्च प्रयत्नश्च आस्यप्रयत्नौ, इतरेतरद्वन्द्वः। तुल्यौ आस्य-प्रयत्नौ यस्य (वर्णजा- तस्य) तत् = तुल्यास्यप्रयत्नम्, बहुव्रीहिसमासः। अर्थः—(तुल्यास्य-प्रयत्नम्) जिस वर्ण समूह का पारस्परिक ताल्वादिस्थान तथा आभ्यन्तर प्रयत्न तुल्य हो वह (सवर्णम्) परस्पर सवर्ण-संज्ञक होता है। स्थान कण्ठ से शुरू होते हैं अतः 'ताल्वादि' की अपेक्षा 'कण्ठादि' कहना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। कई लोग—'तालुन आदिस्ताल्वादिः (कण्ठः)। तालु आदिर्येषान्तानीमानि ताल्वादीनि, ताल्वादिश्च ताल्वादीनि च ताल्वादीनि, एकशेषः। इस प्रकार विग्रह कर के कण्ठ को भी ला घसीटते हैं, परन्तु हमारी सम्मति में सीधा 'कण्ठादि' न कह कर 'ताल्वादि' कहना द्रविड़-प्राणायाम से कम नहीं। लोक में आभ्यन्तर तथा बाह्य यत्नों के लिये सामान्यतया 'प्रयत्न' शब्द प्रयुक्त होता है, पर शास्त्र में इन दोनों के लिये यत्न' शब्द का ही प्रयोग होता है। इस सूत्र में 'यत्न' शब्द के साथ 'प्र' जुड़ा हुआ है, जो बाह्ययत्न को हटा कर आभ्यन्तर-
२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या यत्न का ही बोध कराता है। तथाहि-- प्राक्तनो यत्न प्रयत्नः, अथवा प्रकृष्टो यत्न प्रयत्न' जो पहला यत्न अथवा उत्कृष्ट यत्न हो उस 'प्रयत्न' कहते हैं। इस रीति से 'आभ्यन्तर' ही 'प्रयत्न' ठहरता है क्योंकि वह वर्णोत्पत्ति से पूर्व होता है तथा वर्णोत्पत्ति का कारण होने से उत्कृष्ट है। बाह्ययत्न वर्णोत्पत्ति के पश्चात् होने तथा वर्णोत्पत्ति में कारण न होने से वैसा नहीं है। यहां यह ध्यान रखना चाहिये कि जब तक सम्पूर्ण स्थान और सम्पूर्ण प्रयत्न तुल्य न हों तब तक 'सवर्ण' संज्ञा नहीं होती। यथा 'इ' और 'ए' वर्णों का प्रयत्न तुल्य है तालुस्थान भी तुल्य है, परन्तु 'ए' का 'इ' से कण्ठस्थान अधिक है अतः इन की सवर्णसंज्ञा नहीं होती। सवर्णसंज्ञा न होने से 'भवन्ति + एव' इत्यादि में अनिष्ट सवर्ण- दीर्घ की निवृत्ति हो जाती है। यह सब मुनिवर पाणिनि के 'यजुष्येकेषाम्' (८।३।१०४) सूत्र में (यजुषि + एकेषाम्) सवर्णदीर्घ न कर के यण् करने से विदित होता है। अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि सम्पूर्ण स्थान + प्रयत्न के साम्य होने से ही सावर्ण्य माना जायेगा तो 'क' और 'ङ' की सवर्णसंज्ञा न हो सकेगी, क्योंकि कण्ठस्थान और स्पृष्ट प्रयत्न के तुल्य होने पर भी ङकार का नासिकास्थान अधिक होता है। और यदि इन की सवर्ण-संज्ञा न होगी तो क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०६) सूत्र से ककार ङकार का ग्रहण न करायेगा इस से 'प्राङ्' आदि प्रयोगों में नकार को ङकार न हो कर अनिष्ट प्रयोग निष्पन्न होंगे। इस का समाधान यह है कि सूत्र में आस्य+प्रयत्न के तुल्य होने का उल्लेख है। 'आस्य' का अर्थ 'मुख में होने वाला स्थान' है। क्कार और ङ्कार का मुख में होने वाला स्थान कण्ठ तुल्य ही है। 'नासिका' तो मुख से बाहर का स्थान है, फिर चाहे वह तुल्य हो या न हो चिन्ता नहीं, सवर्णसंज्ञा हो जाती है। निष्कर्ष यह है कि-- यदि किसी वर्ण के मुखगत कण्ठादि स्थान तथा आभ्यन्तर यत्न अन्य वर्ण से पूरी तरह से तुल्य हों तो वे परस्पर 'सवर्ण' संज्ञक होते हैं। स्मरण रहे कि 'ए' और 'ऐ' की तथा 'ओ' और 'औ' की सम्पूर्ण स्थान और प्रयत्न के साम्य होने पर भी सवर्णसंज्ञा नहीं होती, इस का कारण यह है कि मुनिवर पाणिनि ने एओङ्, ऐऔच् सूत्रों में दोनों का पृथक् २ निर्देश किया है। [लघु०] वा०-- (१) ऋलृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम् ॥ अर्थः--ऋकार और लृकार वर्णों की परस्पर 'सवर्ण' संज्ञा कहनी चाहिये। व्याख्या--तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१०) सूत्र के अनुसार ऋकार और लृकार की परस्पर सवर्ण-संज्ञा नहीं हो सकती, क्योंकि ऋकार का स्थान मूर्धा और लृकार का स्थान दन्त है। परन्तु 'तवल्कार' आदि प्रयोगों के लिये इन की सवर्ण संज्ञा करना अतीव आवश्यक है। इस त्रुटि की पूर्ति मुनिवर कात्यायन ने उपर्युक्त वार्त्तिक द्वारा कर दी है। अब दोनों का स्थानसाम्य न होने पर भी सवर्णसंज्ञा सिद्ध हो जाती है।
संज्ञा-प्रकरणम् २१ नोट न हि सर्वः सर्वं जानाति (हर एक पुरुष हर एक बात का ज्ञाता नहीं हुआ करता) इस न्यायानुसार मुनिवर पाणिनि से जो कुछ छूट गया उसकी पूर्ति करने तथा मुनिवर पाणिनि के सूत्रपाठ का तात्पर्य समझाने के लिये महामुनि कात्या- यन ने वार्त्तिक-पाठ का निर्माण किया है। इस वार्त्तिक-पाठ की भी त्रुटियों को दूर करने के लिये तथा कात्यायन का आशय स्पष्ट करने के लिये महामुनि पतञ्जलि ने महाभाष्य नामक अति-सुन्दर वृहत्काय ग्रन्थ रचा है। यही तीनों मुनि इस व्याकरण के मुनित्रय कहलाते हैं और इन के कारण ही इस पाणिनीय-व्याकरण को त्रिमुनि व्याकरणम् कहते हैं। इन मुनियों में उत्तरोत्तर मुनि अर्थात् पाणिनि से कात्यायन तथा कात्यायन से पतञ्जलि अधिक प्रामाणिक हैं। इस का कारण यह है कि जगत् में यह नियम है कि सब से पहले पुरुष को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है वैसा उत्तरोत्तर पुरुषों को नहीं, क्योंकि पहले पुरुष की सम्पूर्ण विचारधारा उत्तर- पुरुष को अनायास प्राप्त हो जाती है इस से वह उस से आगे के लिये यत्न किया करता है, अत एव बुद्धिमान् लोग उत्तरोत्तर को अधिक प्रामाणिक माना करते हैं। उत्तरोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् यह उक्ति भी इसी आधार पर आश्रित है। सूचना—इस ग्रन्थ में कात्यायन की वार्त्तिकों के आदि में वा० ऐसा चिह्न कर दिया गया है और इन की क्रमसंख्या भी सूत्रक्रम से पृथक् निर्दिष्ट की गई है। सवर्णसंज्ञा में स्थान और प्रयत्न का उपयोग होने से अब उन का विवेचन किया जाता है— [लघु०] अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः॥ अर्थः—अठारह प्रकार के अवर्ण, कवर्ग, हकार तथा विसर्ग का कण्ठ स्थान होता है। व्याख्या—अकुहविसर्जनीयानाम् ।६।३। कण्ठः ।१।१। समासः—अश्च कुश्च हश्च विसर्जनीयश्च अकुहविसर्जनीयाः, तेषाम् = अकुहविसर्जनीयानाम्, इतरेतरद्वन्द्वः। यहां 'अ' से लोकप्रसिद्धनुसार सारे का सारा अवर्णकुल तथा 'कु' से कवर्ग का ग्रहण समझना चाहिये। विसर्जनीय और विसर्ग पर्याय अर्थात् एकार्थवाची शब्द हैं। यहां यह ध्यान रहे कि विसर्ग का कण्ठस्थान तभी होता है जब वह अकाराश्रित अर्थात् अकार से परे होता है; जैसा कि पाणिनि के नाम से प्रचलित पाणिनीय-शिक्षा में कहा गया है— अयोगवाहा विज्ञेया आश्रयस्थानभागिनः। (श्लोक २२) अयोगवाहों (यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय) का वही स्थान होता है जिस के वे आश्रित होते हैं। यम और अनुस्वार नासिकास्थानीय ही रहते हैं, क्योंकि शिक्षा में कहा गया है— अनुस्वारयमानाञ्च नासिकास्थानमुच्यते। (श्लोक २२)