लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ — (अन्त्येन) अन्त्य (इता) इत् से (सह) युक्त (आदि ) आदि वर्ण (स्वस्य) अपनी तथा मध्यगत वर्णों की सञ्ज्ञा होता है। यहां हमने 'स्वस्य' पद से आदि का ग्रहण किया है, पर कोई पूछ सकता है कि 'स्वस्य' पद से अन्त्य का ग्रहण कर 'अन्त्य इत् से युक्त आदि अन्त्य तथा मध्यगत वर्णों की सञ्ज्ञा हो' ऐसा अर्थ क्यों न किया जाये ? इसका उत्तर यह है कि 'स्व' यह सर्वनाम है। सर्वनाम प्रधान का ही निर्देश कराने वाले होते हैं, अप्रधान का नहीं। 'अन्त्येनेता सहादि' यहां प्रधान आदि है, अन्त्य नहीं। क्योंकि सहयुक्तेऽप्रधाने (२ ३ १९) से अप्रधान में ही तृतीया होती है, अतः 'स्व' यह सर्वनाम प्रधान = आदि का ही ग्रहण करायेगा, अप्रधान अन्त्य का नहीं। अ इ उ ण् यहां अन्त्य इत् = ण् है। आदि 'अ' है। अतः अन्त्य इत् से युक्त आदि 'अण्' हुआ। यह सञ्ज्ञा है। 'इ उ' मध्यगत तथा 'अ' आदि ये तीन सञ्ज्ञी हैं। इसी प्रकार अच्, अक्, हल्, अल् आदि भी जानने चाहियें। इन अण् आदि सञ्ज्ञाओं को पूर्ववर्ती आचार्य 'प्रत्याहार' कहते चले आ रहे हैं। यहां इस शास्त्र में भी इन के लिये प्रत्याहार शब्द व्यवहृत होता है। प्रत्याह्रियन्ते = सङ्क्षिप्यन्ते वर्णा अत्रेति प्रत्याहार। यहां अन्त्य और आदि अ इ उ ण् आदि सूत्रों की अपेक्षा से नहीं लेने, किन्तु मन में रखे समुदाय की अपेक्षा से लेने हैं। यथा—इ उ ण् ऋ लृ क् इस समुदाय का आदि 'इ' और अन्त्य 'क्' है। अन्त्य युक्त आदि = इक् सञ्ज्ञा होगा। इ उ ऋ लृ-- ये सञ्ज्ञी होंगे। 'रट्लँ' यहां उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) में लकारस्थ अकार इत् है। समुदाय का आदि 'र्' है। अन्त्य अँ है। अन्त्य युक्त आदि र्+अँ = 'रँ' यह सञ्ज्ञा होगा। इस सञ्ज्ञा में 'र्' और 'ल्' दो ही सञ्ज्ञी हैं। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अण् आदि प्रत्याहारों में आदि और मध्य- गत वर्ण सञ्ज्ञी होते हैं तो इक् प्रत्याहार में 'क्' भले ही न आये, पर ण् तो आना चाहिये; क्योंकि वह मध्यगत वर्ण है। इस का उत्तर यह है कि आचार्य पाणिनि की शैली से यह प्रतीत होता है कि मध्यगत वर्ण यदि इतसञ्ज्ञक होंगे तो उन का प्रत्या- हारों के सञ्ज्ञियों में ग्रहण न होगा। तथाहि—यदि वे सञ्ज्ञी होते तो 'अच्' प्रत्या- हार में 'क्' का भी ग्रहण होता क्योंकि यह मध्यवर्ण है। 'क्' के ग्रहण होने से उपदेशे- ऽजनुनासिक इत् (२८) इस सूत्र के 'अनुनासिक.' इस पद में 'क्' इस अच् के परे होने पर सकारस्थ इकार को इको यणचि (१५) से यण् तथा यण् का लोपो व्योर्वलि (४२६) से लोप होकर 'अनुनास्क' हुआ होता; पर आचार्य पाणिनि ने ऐसा नहीं किया। इस से यह विदित होता है कि इतसञ्ज्ञक मध्यवर्ती होने पर भी सञ्ज्ञी नहीं होते। अ इ उ ण् आदि चौदह सूत्रों से यद्यपि अनेक प्रत्याहार बन सकते हैं तथापि इस व्याकरणशास्त्र में जिन का व्यवहार किया गया है उन की सङ्ख्या चवालीस