लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४४) है। कई लोग 'रँ' प्रत्याहार को नहीं मानते उन के मत में तैंतालीस (४३) प्रत्याहार होते हैं। इन में से बयालीस ('रँ' प्रत्याहार न मानने वालों के मत में इक्ता- लीस ४१) प्रत्याहार तो मुनिवर पाणिनि ने स्वयं सूत्रों में व्यवहृत किये हैं। शेष दो में से एक 'वम्' उणादि सूत्रों का तथा दूसरा 'चय्' वार्त्तिकपाठ का है। हम इन प्रत्या- हारों के लिखने से पूर्व यह बता देना आवश्यक समझते हैं कि प्रत्याहारगत वर्णों के जानने का सुगम उपाय क्या है ? प्रत्याहारगत वर्णों के जानने का सुगम उपाय यह है कि निम्नलिखित बातों को अच्छी तरह से बुद्धि में बिठा लिया जाये— (क) वर्गों के पञ्चवें वर्ण ञमङणनम् सूत्र में हैं। (ख) वर्गों के चौथे वर्ण झभञ्, घढधष् सूत्रों में हैं। (ग) वर्गों के तीसरे वर्ण जबगडदश् सूत्र में है। (घ) वर्गों के दूसरे वर्ण खफछठथ तक हैं। (ङ) वर्गों के प्रथम वर्ण चटतव्, कपय् सूत्रों में है। (च) ऊष्मवर्ण शषसर्, हल् सूत्रों में हैं। (छ) अन्तःस्थवर्ण यवरट्, लँण् सूत्रों में हैं। (ज) स्वरवर्ण अइउण्, ऋऌक्, एओङ्, ऐऔच् सूत्रों में हैं। इस के अतिरिक्त जिन सूत्रों के बीच से कटाव हो कर प्रत्याहार बनते हैं उन सूत्रों के स्थान भी याद रखने योग्य हैं। वे स्थान निम्नलिखित हैं— अइउण् । यहां 'इ' से कटाव होकर इक्, इच् तथा 'उ' से कटाव हो कर उक् प्रत्याहार बनता है। हयवरट् । यहां 'य' से कटाव हो कर यण्, यञ्, यम्, यय्, यर् प्रत्याहार 'व' से कटाव होकर वल् प्रत्याहार तथा 'र्' से कटाव हो कर रँ प्रत्याहार बनता है। ञमङणनम् । यहां 'म' से कटाव होकर मय् तथा 'ङ' से कटाव होकर ङम् प्रत्याहार बनता है। झभञ् । यहां 'भ' से कटाव होकर भष् प्रत्याहार बनता है। जबगडदश् । यहां 'ब' से कटाव होकर बश् प्रत्याहार बनता है। खफछठथचटतव् । यहां 'छ' से कटाव हो कर छव् तथा 'च' से कटाव हो कर चय् प्रत्याहार बनता है। इस व्याकरण में प्रयुक्त होने वाले प्रत्याहारों का दो श्लोकों में संग्रह यथा— ङणटञ्च्वात् स्मृतो ह्येकः, चत्वारश्च चमान्मताः । शलाभ्यां षड् यरातपञ्च, पाद् द्वौ च कणतस्त्रयः ॥१॥ केषाञ्चिच्च मते रोऽपि, प्रत्याहारोऽपरो मतः । लस्याऽवर्णेन वाञ्छन्त्यनुनासिकवलादिह ॥२॥