लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंज्ञा-प्रकरणम् ६ व्याख्या—तस्य ।६।१। इतः ।६।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से प्रथमान्त 'इत्' पद आकर विभक्ति-विपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है) । लोपः ।१।१। अर्थः- (तस्य) उस (इतः) इत्सञ्ज्ञक का (लोपः) लोप होता है । अब यहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि यदि इस सूत्र में 'तस्य' पद न लेते तो भी अर्थ में कोई हानि नहीं हो सकती थी, क्योंकि 'इतः' पद की अनुवृत्ति तो आ ही रही थी । इस का समाधान यह है कि यदि 'तस्य' पद ग्रहण न करते तो इत्सञ्ज्ञक के अन्त्य वर्ण का लोप होता, सम्पूर्ण इत्सञ्ज्ञक का लोप न होता । तथाहि—ञिमिदाँ स्नेहने, टुनदिँ समृद्धौ, डुकृञ् करणे यहां आदिरञिटुडवः (४६२) सूत्र द्वारा ञि, टु, डु, की इत्सञ्ज्ञा हो कर लोप प्राप्त होने पर अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र द्वारा अन्त्य इकार, उकार का लोप प्रसक्त होता है जो कि अनिष्ट है । अब यदि सूत्र में तस्य पद ग्रहण करते हैं तो यह दोष नहीं आता क्योंकि आचार्य का 'तस्य' यह कहना बतलाता है कि आचार्य सारे इत् का लोप चाहते हैं केवल अन्त्य का नहीं । अब इस सूत्र से ण्, क्, ङ्, च् आदि इतो का लोप प्राप्त होता है । उस पर कहते हैं कि इन का लोप नहीं करना, क्योंकि इन से अण् आदि प्रत्याहार बनाये जायेंगे । यदि इन का लोप करना होता तो इन का ग्रहण किस लिये करते ? अतः इन का लोप नहीं करना चाहिये । अब इत्सञ्ज्ञकों से प्रत्याहार बनाने के लिए अग्रिमसूत्र लिखते हैं :— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(४) आदिरन्त्येन सहेता ।१।१।७०॥ अन्त्येनेता सहित आदिर्मध्यगानां स्वस्य च सञ्ज्ञा स्यात् । यथाऽण् इति 'अ इ उ' वर्णानां सञ्ज्ञा । एवमक्, अच्, हल्, अल् इत्यादयः ॥ अर्थ.—अन्त्य इत् से युक्त आदिवर्ण, मध्यगत वर्णों की तथा अपनी सञ्ज्ञा हो । यथाण्— जैसे अण् यह अ इ उ वर्णों की सञ्ज्ञा है । इसी प्रकार अक्, अच्, हल्, अल् आदि भी जान लेने चाहियें । व्याख्या—आदिः ।१।१। अन्त्येन ।३।१। सह इत्यव्ययपदम् । इता ।३।१। स्वस्य ।६।१। (स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसञ्ज्ञा से 'स्वम्' यह प्रथमान्त पद आकर विभक्ति- विपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है) । यह सूत्र सञ्ज्ञाधिकार के बीच पढ़ा जाने से सञ्ज्ञासूत्र है । यहां 'अन्त्येनेता सहादिः' अर्थात् 'अन्त्य इत् से युक्त आदि' यह सञ्ज्ञा है । अब सञ्ज्ञी का निर्णय करना है कि सञ्ज्ञी कौन हो ? क्योंकि सूत्र में तो किसी का निर्देश है ही नहीं । आदि और अन्त्य अवयव शब्द हैं । अवयवों से अवयवी लाया जाता है । अतः यहां अवयवी ही सञ्ज्ञी होगा । उस अवयवी (समुदाय) से आदि और अन्त्य सञ्ज्ञा होने के कारण निकल जायेंगे । शेष मध्यगत वर्ण ही सञ्ज्ञी ठहरेंगे । पुनः 'स्वस्य' पद की अनुवृत्ति आकर आदि भी सञ्ज्ञी हो जायेगा । इस प्रकार आदि तथा मध्यगत वर्ण सञ्ज्ञी बनेंगे । तो अब इस सूत्र का अर्थ यह हुआ —