भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 633 में से

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पृष्ठ 25

८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां है, उसे 'उपदेश' कहते हैं। भाष्यकार ने सब स्थल नियत कर दिये हैं; उन का कथन है कि प्रत्याहार-सूत्र, धातुपाठ, गणपाठ, प्रत्यय, आगम और आदेश ये सब उपदेश हैं¹। उन में अन्त्य हल् इत्सञ्ज्ञक होता है। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२) अदर्शनं लोपः ।१।१।५६॥ प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थ:—विद्यमान का अदर्शन लोपसञ्ज्ञक होता है। व्याख्या-स्थानस्य ।६।१। (स्थानेऽन्तरतम सूत्र से 'स्थाने' पद आकर विभक्तिविपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है)। अदर्शनम् ।१।१। लोप ।१।१। अर्थ — (स्थानस्य) विद्यमान का (अदर्शनम्) न सुनाई देना (लोप ) लोप होता है। यहां अदर्शन सञ्ज्ञी तथा लोप सञ्ज्ञा है। हम ने 'अदर्शन' का अर्थ 'न सुनाई देना' किया है। इस का यह कारण है कि यह 'शब्दानुशासन' अर्थात् शब्द-शास्त्र है। इस में शब्दों के साधु (ठीक) असाधु (गलत) होने का विवेचन है। शब्द कान से सुने जाते हैं, आंख से देखे नहीं जाते अतः यहां पर 'अदर्शन' का अर्थ 'न दिखाई देना' की अपेक्षा 'न सुनाई देना' ही युक्त है। ऐसा अर्थ करने पर 'दृश्' धातु को ज्ञानार्थक मानना चाहिये। ज्ञान —आंख, कान, नाक आदि सब से हो सकता है। 'शब्दानुशासन' का अधिकार होने से हम यहां ज्ञान कान-विषयक ही मानेंगे। यहां स्थानेऽन्तरतम (१७) से स्थान शब्द लाने का तात्पर्य यह है कि विद्यमान का अदर्शन ही लोपसञ्ज्ञक हो, अविद्यमान का अदर्शन लोपसञ्ज्ञक न हो। यथा —'दधि, मधु' यहां 'क्विप्' प्रत्यय कभी नहीं हुआ अतः उस का अदर्शन है। यदि पीछे से स्थान शब्द न लावें तो यहां क्विप् प्रत्यय का अदर्शन होने से प्रत्ययलक्षण द्वारा ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् (७७७) से तुक् प्राप्त होगा जो कि अनिष्ट है; अतः 'स्थान' शब्द की अनुवृत्ति लाकर विद्यमान के अदर्शन की ही लोपसञ्ज्ञा करनी युक्त है। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३) तस्य लोपः ।१।३।६॥ तस्येतो लोपः स्यात् । णादयोऽणाद्यर्थाः ॥ अर्थ —उस इत्सञ्ज्ञक का लोप होता है। ण् आदि 'अण्' आदियों के लिये हैं। १. प्रत्याहारसूत्र यथा—अइउण् आदि। धातुपाठ यथा—डुपचष् पाके आदि। गणपाठ यथा—नडट्, देवट् आदि। प्रत्यय यथा—तृच्, तृन्, तसिल् आदि। आगम यथा—कुक्, तुक्, इट् आदि। आदेश यथा—अर्वणस्त्रसावनञः (२६२) द्वारा 'तृ' आदेश आदि। प्रत्यया शिवसूत्राणि, आदेशा आगमास्तथा। धातुपाठो गणो पाठः, उपदेशाः प्रकीर्त्तिताः ॥

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