भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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संज्ञा-प्रकरणम् ७ ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अप्रत्ययः ।१।१। स्मरण रहे कि कई स्थानों पर विभक्ति का लुक् तथा अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति भी लगी रहती है । इसे सूत्रकार की गलती नहीं समझी जाती क्योंकि छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति अर्थात् सूत्र वेद की नाईं होते हैं । जैसे वेद में विभक्ति का लुक् तथा अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति लगी रहती है, वैसे सूत्रों में भी होता है । विभक्ति का लुक् यथा— न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१=०) यहां ‘न’ और ‘प्रातिपदिक’ शब्दों से परे षष्ठी- विभक्ति का लुक् हुआ है । अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति लगे रहने के उदाहरण आगे यत्र तत्र बहुत आएंगे । (३) पदच्छेद और विभक्ति जानने के पश्चात् समास जानना चाहिये । समास कहीं होता है और कहीं नहीं भी होता । यथा—तस्य लोपः (३) इस सूत्र में कोई समास नही । तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१०) इत्यादि सूत्रों में समास है। आवश्यक तद्धितादि का समावेश भी हम ने समास में कर दिया है । अर्थात् समास के जानने के साथ २ आवश्यक तद्धित आदि प्रत्यय भी जान लेने चाहियें । (४) इतना जान लेने के पश्चात् महामुनि पाणिनि के अर्थ करने के नियमों का ध्यान रख कर सूत्र का अर्थ करना चाहिये । वे नियम प्रायः ये हैं— (१) षष्ठी स्थानेयोगा (१.१.४८) | (६) इको गुणवृद्धी (१.१.३) (२) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य | (७) अचश्च (१.२.२८) (१.१.६५) | (८) येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) (३) तस्मादित्युत्तरस्य (१.१.६६) | (६) यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे (४) अलोऽन्त्यस्य (१.१.५१) | (वा०) (५) आदेः परस्य (१.१.५३) | (१०) प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् (प०) इन सब को हम यथास्थान स्पष्ट करेंगे । पीछे ‘एषामन्त्या इतः’ कह कर ण् क् आदियों को ‘इत्’ कह आये हैं । अब वह सूत्रों से सिद्ध करते हैं । हलन्त्यम् । उपदेशे ।७।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । हल् ।१।१। अन्त्यम् ।१।१। इत् ।१।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । अर्थः—(उपदेशे) उपदेश में विद्यमान (अन्त्यम्) अन्तिम (हल्) हल् = व्यञ्जन (इत्) इत्सञ्ज्ञक होता है । यदि उपदेश में कहीं हमें अन्त्य हल् मिलेगा तो वह इत्सञ्ज्ञक होगा । अब प्रश्न यह पैदा होता है कि उपदेश क्या है ? इसका उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि उपदेश आद्योच्चारणम् आद्योच्चारण उपदेश होता है । इस शब्द पर शेखरादि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में बहुत विवाद है । हम उस विवाद के निकट नहीं जाते, क्योंकि वह प्रपञ्च बालकों की समझ में नहीं आ सकता । यहां सरल मार्ग यह है कि यहां षष्ठीतत्पुरुषसमास है—आद्यानाम् उच्चारणम् आद्यो- च्चारणम् । जो आद्यों अर्थात् शिव, पाणिनि, कात्यायन तथा पतञ्जलि का उच्चारण