भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां हों जाने से वैसे विद्वान् उत्पन्न नहीं होते । अब भी यदि इस परिपाटी का पुनरुद्धार हो जावे तो पुनः वैसे विद्वान् निकलने लग पड़ेंगे । कर्त्तव्योऽत्र यत्न । इस ग्रन्थ में अष्टाध्यायी के सूत्र बिखरे हुए हैं। इन सूत्रों के आगे तीन अङ्क लिखे हैं। इन में से पहला अष्टाध्यायी के अध्याय का सूचक, दूसरा पादसूचक तथा तीसरा सूत्रसूचक समझना चाहिये । यथा — हलन्त्यम् ।१।३।३॥ यहां ‘१’ से तात्पर्य प्रथमाध्याय, ‘३’ से तात्पर्य तृतीयपाद और अन्तिम ३ से तात्पर्य तीसरे सूत्र से है । तो इस प्रकार यह सूत्र प्रथमाध्याय के तृतीय पाद का तीसरा है ऐसा ज्ञात होता है । एवम् आगे भी सर्वत्र समझ लेना । पाणिनि के सूत्रपाठ के अर्थ करने का विचित्र ढंग है । कई पदों का सूत्रों में नामोनिशान नहीं होता, परन्तु अर्थ करते समय वे आ जाया करते हैं । अतः सूत्रों के अर्थ करने के ढंग पर कुछ थोड़ा विचार करते हैं । (१) सब से प्रथम सूत्र का पदच्छेद करना चाहिये । जैसे— हलन्त्यम् ।१।३।३।। हल् । अन्त्यम् । आदिरन्त्येन सहेता ।१।१।७०॥ आदि । अन्त्येन । सह । इता । इको यणचि ।६।१।७६।। इक । यण् । अचि । अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय । ।१।१।६८॥ अण् । उदित् । सवर्णस्य । च । अप्रत्यय । कई स्थानों पर पिछले सूत्रों से तथा कहीं २ अग्रिम सूत्रों से भी¹ पद ले लिये जाते हैं । महामुनि पाणिनि ने यद्यपि इन की स्वरित के चिह्न से व्यवस्था की थी, परन्तु अब वह व्यवस्था बिगड़ गई है । अब तो गुरुपरम्परा में जो जो पद पीछे से या आगे से लिया जाता है लिया जाना चाहिये । इस में अपनी ओर से कोई गड़बड़ नहीं करनी चाहिये । यथा— हलन्त्यम् यहां पिछले उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से ‘उपदेशे’ और ‘इत्’ ये दो पद आते हैं । इन पदों को भी पदच्छेद में लिखना चाहिये और कोष्ठ में बता देना चाहिये कि ये पद कहां से आते हैं² । यथा—उपदेशे (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । हल् । अन्त्यम् । इत् (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) । (२) पदच्छेद के बाद उन पदों की विभक्तियां जाननी चाहियें । यथा— हलन्त्यम् । उपदेशे ।७।१। अन्त्यम् ।१।१। हल् ।१।१। इत् ।१।१। (यहा पहले अङ्क से विभक्ति तथा दूसरे अङ्क से वचन समझना चाहिये) । आदिरन्त्येन सहेता । आदि ।१।१। अन्त्येन ।३।१। सह इत्यव्ययपदम् । इता ।३।१। इको यणचि । इक ।६।१। यण् ।१।१। अचि ।७।१। अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय । अण् ।१।१। उदित् ।१।१। सवर्णस्य १ यथा ईस से (७ २ ७७) सूत्र मे अगले सूत्र से 'ध्वे' पद लाया जाता है । २ इस अनुवृत्ति का व्यवहार लोक मे भी देखा जाता है, जैसे किसी ने कहा 'भरत को चार आम दो' 'राम को तीन' । अब यहां 'राम को तीन' यह वाक्य अपूर्ण है, इस की पूर्णता 'आम दो' इतने पद मिलाकर 'राम को तीन आम दो' इस प्रकार हो जाती है, तो यहां 'आम दो' इन दो पदों की अनुवृत्ति समझनी चाहिये । इस प्रकार इस का लोक मे सर्वत्र अतीव प्रयोग देखा जाना है ।