लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंज्ञा-प्रकरणम् ५ [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१) हलन्त्यम् ।१।३।३॥ उपदेशेऽन्त्यं हलित् स्यात् । उपदेश आद्योच्चारणम् । सूत्रेष्वदृष्टम्पदं सूत्रान्तरादनुवर्त्तनीयं सर्वत्र ॥ अर्थ:—उपदेश में वर्त्तमान अन्त्य हल् इत्संज्ञक हो । उपदेश:—आद्यों के उच्चारण को अथवा धातु आदि के आद्य उच्चारण को उपदेश कहते हैं । सूत्रेषु—सूत्रों में जो पद न हो (पर वृत्ति में दिखाई दे) वह पद सर्वत्र पिछले (या कहीं २ अगले) सूत्रों में ले लेना चाहिये । व्याख्या—इस व्याकरण के प्रथम कर्त्ता महामुनि पाणिनि हैं । इन्होंने 'अष्टा- ध्यायी' नामक जगत्प्रसिद्ध ग्रन्थ रचा है । इस ग्रन्थ में आठ अध्याय और प्रत्येक अध्याय में चार २ पाद हैं । अर्थात् सब मिला कर बत्तीस पाद अष्टाध्यायी में हैं । हर एक पाद में भिन्न भिन्न सङ्ख्याओं में सूत्र हैं । इन सब की तालिका निम्न प्रकार से समझनी चाहिये । | अध्यायनाम | प्रथमपाद | द्वितीयपाद | तृतीयपाद | चतुर्थपाद | सम्पूर्णसंख्या | | प्रथमाध्याय | ७४ | ७३ | ६३ | १०६ | ३४६ | | द्वितीयाध्याय | ७१ | ३८ | ७३ | ८५ | २६७ | | तृतीयाध्याय | १५० | १८८ | १७६ | ११७ | ६३१ | | चतुर्थाध्याय | १७६ | १४४ | १६६ | १४४ | ६३० | | पञ्चमाध्याय | १३५ | १४० | ११६ | १६० | ५५४ | | षष्ठाध्याय | २१७ | १६८ | १३८ | १५५ | ७२८ | | सप्तमाध्याय | १०३ | ११८ | ११६ | ६७ | ४३७ | | अष्टमाध्याय | ७४ | १०८ | ११६ | ६८ | ३६६ | | समग्र अष्टाध्यायी की सूत्रसंख्या— | | | | | ३९६५ | प्राचीन काल में यह सम्पूर्ण अष्टाध्यायी कण्ठस्थ की जाती थी । तदनन्तर व्याकरण पढ़ा जाता था । तभी तो काशिकाकार जयादित्य, पदमञ्जरीकार हरदत्त, शेखरकार नागेशभट्ट सरीखे विद्वान् उत्पन्न होते थे । परन्तु अब इस परिपाटी के मन्द