भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 633 में से

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पृष्ठ 21

४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां सकता है। व्यवहार के लिये आवश्यक है कि जिसका हम व्यवहार करना चाहें उस की कोई न कोई संज्ञा अवश्य करें। बिना संज्ञा के कभी व्यवहार नहीं चल सकता। यहां आगे आदिरन्त्येन सहेता (४) आदि सूत्रों में इन ण्, य् आदि अक्षरों का व्यव- हार करना है, अतः इन की 'इत्' यह संज्ञा की जाती है। हमारी लिपि अर्थात् वर्णमाला में दो प्रकार के अक्षर हैं। एक तो 'अ, इ, उ' आदि स्वर, दूसरे 'क्, ख्, ग्, घ्' आदि व्यञ्जन या हल्। व्यञ्जनों का उच्चारण स्वरों के मिलाये बिना नहीं हो सकता। इसलिये आजकल की वर्णमाला की छोटी २ पुस्तको में भी 'क, ख, ग, घ, ङ' इत्यादि प्रकार से अकार-युक्त व्यञ्जन देखने में आते हैं।¹ इन चौदह सूत्रों में 'हयवरट्' सूत्र के हकार से व्यञ्जन आरम्भ होते हैं। इन में भी अकार केवल इसीलिये है कि इन का उच्चारण हो सके, क्योंकि अकार के बिना 'ह्, य्, व्, र्, ट्' इस प्रकार उच्चारण नहीं हो सकता। अतः अकार का इन में ग्रहण नहीं करना चाहिये। यदि अलग २ अकार ग्रहण के लिये होता तो उस का बार २ उच्चारण न होता। क्योंकि ग्रहण तो एक बार के उच्चारण से भी हो जाता, तो पुनः ग्रन्थ क्यों बढ़ाते ? लँण् इस सूत्र में ल्कारस्थ (लकार में ठहरा हुआ) अकार उच्चारण के लिये नहीं किन्तु प्रयोजन वशात् इत्संज्ञक है। उसका प्रयोजन 'रँ' प्रत्याहार सिद्ध करना है जो आगे उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र पर मूल में ही स्पष्ट हो जावेगा। हम भी इस की वहीं व्याख्या करेंगे। टिप्पणी—महेश्वरादागतानि = माहेश्वराणि, तत आगत (१०६५) इत्यण्। अण् आदिर्यासां ता अणादयः, अणादयश्च ता संज्ञा = अणादिसंज्ञा। अणादिसंज्ञा अर्थः प्रयोजनं येषान्तानीमानि = अणादिसंज्ञार्थानि। अन्त्या वर्णा इतो ज्ञेयाः, प्रत्याहारोपयोगिनः । अकारो मुखसौख्याय हकारादौ प्रकीर्तितः ॥१॥ परमेतं बुधाः प्राहुर् इत्त्वमेव गतं लणि। रेत्यपूर्वंस्ततस्तेन प्रत्याहारः प्रजायते ॥२॥ १ व्यञ्जनों के साथ स्वर मिलाने का प्रकार यथा— क्+अ=क, क्+आ=का, क्+इ=कि, क्+ई=की, क्+उ=कु, क्+ऊ=कू, क्+ऋ=कृ, क्+ॠ=कॄ, क्+ऌ=कॢ, क्+ए=के, क्+ ऐ=कै, क्+ओ=को, क्+औ=कौ, क्+अं=कं, क्+अः=कः। इसी प्रकार अन्य व्यञ्जनों के साथ भी संयोग कर लेना चाहिये। इन में से 'कि' पर विशेष ध्यान देना चाहिये। प्राय कई बालक 'कि' में 'इ' को प्रथम और क् को पश्चात् लिखा माना करते हैं, उन्हें उपर्युक्त प्रकार से अपनी भ्रान्ति दूर कर लेनी चाहिये। ध्यान रहे कि बिना स्वर व्यञ्जन का संयोग जान कदाचित् इस ग्रन्थ में प्रवेश ही नहीं हो सकता।

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