भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम् । पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम् ॥ १ ॥ अन्वय —अहम् (वरदराज ) शुद्धां गुण्यां सरस्वतीं देवीं नत्वा पाणिनीय- प्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीं करोमि । अर्थ --मैं (वरदराज) शुद्ध तथा गुणों से युक्त सरस्वती देवी को नमस्कार कर पाणिनि के बनाये व्याकरणशास्त्र में (बालकों के) प्रवेश के लिये लघुसिद्धान्त- कौमुदी को बनाता हूं। व्याख्या—ज्ञान की अधिष्ठात्री (स्वामिनी) एक देवी मानी जाती है, जिसे सरस्वती कहते हैं। ग्रन्थकार ने आदि में उसे इसलिये नमस्कार किया है कि वह प्रसन्न होकर मेरे ऊपर कृपा करे जिस से मैं ग्रन्थ बनाने में समर्थ हो सकूं । इस ग्रन्थ के बनाने वाले वरदराज नामक पण्डित हैं। इन का सम्पूर्ण वृत्तान्त भूमिका में लिखा है देख लें । जिस से किसी भाषा के शुद्ध अशुद्ध होने का ज्ञान हो उसे उस भाषा का व्याकरण कहते हैं। संस्कृतभाषा के अनेक व्याकरण हैं। यथा—पाणिनीय, कातन्त्र, चान्द्र, मुग्धबोध, सारस्वत आदि । संस्कृतभाषा के सम्पूर्ण व्याकरणों में पाणिनिमुनि का बनाया व्याकरण ही सब से श्रेष्ठ और प्रचलित है। इस के अध्ययन में कठिनता का अनुभव कर वरदराज ने यह लघुसिद्धान्तकौमुदी बनाई है। 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' शब्द का अर्थ कुछ व्याकरण-सिद्धान्तों को चांदनी के समान प्रकाशित करने वाली है। टिप्पणी—गुण्याम् = प्रशस्ता गुणाः सन्त्यस्या इति गुण्या । ताम् = गुण्याम् । [रूपादाहतप्रशंसयोर्यप् (५।२।१२०) इति सूत्रस्थेन अन्येभ्योऽपि दृश्यते इति वार्त्तिकेन यप् ] । पाणिनीयप्रवेशाय— पाणिनिना प्रोक्तम् = पाणिनीयम्, तस्मिन् प्रवेशः =पाणिनीयप्रवेशस्तस्मै = पाणिनीयप्रवेशाय । लघुसिद्धान्तकौमुदी—लघवः = असमग्रा ये सिद्धान्ताः = ऊहापोहकृतनिश्चितविचारास्तेषां कौमुदी = कौमुदीव = चन्द्रिकेव । [अत्रत्यः कौमुदीशब्दः कौमुदीवेत्यर्थे लाक्षणिकः ] । यथा हि ज्योत्स्ना तमो निरस्य सकलभावान् प्रकाशयति, दिनकरकिरणजनितं तापमुपशमयति, तथेयमप्यज्ञानन्दूरीकृत्य महाभाष्यादिदुरुहग्रन्थजनितं तापमुपशमय्य व्याकरणसिद्धान्तान् मानसे प्रकटीकरोतीति सादृश्यम् । अथ संज्ञाप्रकरणम् [लघु०] अइउण् ॥१॥ ऋऌक् ॥२॥ एओङ् ॥३॥ ऐऔच् ॥४॥ हयवरट् ॥५॥ लँण् ॥६॥ ञमङणनम् ॥७॥ झभञ् ॥८॥ घढधष् ॥९॥ जबगडदश् ॥१०॥ खफछठथचटतव् ॥११॥ कपय् ॥१२॥ शषसर् ॥१३॥ हल् ॥१४॥