लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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संज्ञा-प्रकरणम् १७ [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (६) मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः । १।१।८॥ मुख-सहित-नासिकयोच्चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्यात्¹ । तदित्थम् - अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकष्टादश भेदाः । लृ-वर्णस्य द्वादश, तस्य दीर्घाभावात् । एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभावात् ॥ अर्थः - मुखसहित नासिका से बोला जाने वाला वर्ण अनुनासिक-संज्ञक होता है । इस प्रकार - 'अ, इ, उ, ऋ' इन वर्णों में प्रत्येक के अठारह २ भेद हो जाते हैं । 'लृ' वर्ण के - दीर्घ न होने से बारह भेद होते हैं। एचों (ए, ओ, ऐ, औ) के भी
- ह्रस्व न होने से बारह २ भेद होते हैं । व्याख्या - मुख-नासिका-वचनः ।१।१। अनुनासिकः ।१।१। समासः - मुखेन सहिता मुख-सहिता, तृतीया-तत्पुरुष-समासः, मुख-सहिता नासिका मुखनासिका, शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपस्योपसङ्ख्यानम् इति वार्त्तिकेन समासः । उच्चत इति वचनः (वर्ण इत्यर्थः), कर्मणि ल्युट् । मुखनासिकया वचनः = मुखनासिकावचनः । तृतीया-तत्पुरुष-समासः । अर्थः - (मुख-नासिका-वचनः) मुखसहित नासिका से बोला जाने वाला वर्ण (अनुनासिकः) अनुनासिक-संज्ञक होता है। भाव यह है कि मुख से तो प्रत्येक वर्ण बोला ही जाता है, पर जो मुख और नासिका दोनों से बोला जाये वह अनुनासिक होता है । यथा ङ्, ञ्, ण्, न्, म् इत्यादि मुख और नासिका दोनों से बोले जाते हैं अतः 'अनुनासिक' संज्ञक हैं। इसी प्रकार यदि अच् मुख और नासिका दोनों से बोला जायेगा तो 'अनुनासिक' होगा और यदि केवल मुख से ही बोला जायेगा तो 'अननुनासिक' (न अनुनासिकः, जो अनुनासिक नहीं) होगा । इस प्रकार पीछे कहे नौ २ भेदों के अनुनासिक और अननुनासिक धर्म के कारण अठारह २ भेद हो जाते हैं । अब अचों का सामान्यतः भेद-निरूपण करके पुनः प्रत्येक का विशेषतः भेद- निरूपण करते हैं । 'अ, इ, उ, ऋ' इन में से प्रत्येक वर्ण के अठारह भेद होते हैं । 'लृ' वर्ण के बारह भेद होते हैं । इस के दीर्घ न होने से छः भेद कम हो जाते हैं । 'एचू' अर्थात् 'ए, ओ, ऐ, औ' वर्णों के भी बारह २ भेद होते हैं, क्योंकि इन का ह्रस्व नहीं होता । ह्रस्व न होने से छः २ भेद कम हो जाते हैं। यह ध्यान रहे कि 'ए, ऐ' तथा 'ओ, औ' परस्पर ह्रस्व दीर्घ नहीं, किन्तु सब दीर्घ और भिन्न २ जाति वाले हैं। इन सब की तालिका यथा - १. अत्र मुखसहितया नासिकया इति व्यास एव न्याय्यः । समासे तु शाकपार्थिवादि- त्वात् सहितपदलोपप्राप्तिः । ल० प्र० (२)