लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
| अ, इ, उ, ऋ, ऌ | अ, इ, उ, ऋ, ए, ओ, ऐ, औ | अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ |
|---|---|---|
| १ ह्रस्व उदात्त अनुनासिक | ७ दीर्घ उदात्त अनुनासिक | १३ प्लुत उदात्त अनुनासिक |
| २ ,, ,, अननुनासिक | ८ ,, अननुनासिक | १४ ,, अननुनासिक |
| ३ ,, अनुदात्त अनुनासिक | ९ ,, अनुदात्त अनुनासिक | १५ ,, अनुदात्त अनुनासिक |
| ४ , ,, अननुनासिक | १० ,, अननुनासिक | १६ , ,, अननुनासिक |
| ५ ,, स्वरित अनुनासिक | ११ , स्वरित अनुनासिक | १७ , स्वरित अनुनासिक |
| ६ ,, ,, अननुनासिक | १२ ,, अननुनासिक | १८ , ,, अननुनासिक |
| प्रकरण का सार— | ||
| इस प्रकरण का सार यह है कि सजातीय (एक ही स्थान वाले) अचों में | ||
| परस्पर तीन प्रकार के भेद होते हैं। १ कालकृत भेद। २ स्थानभागकृत भेद। | ||
| ३ नासिक्याकृत भेद। | ||
| ऊँ३कालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुत (५) सूत्र कालकृत भेद करता है। उच्चैरुदात्तः, | ||
| नीचैरनुदात्तः, समाहारः स्वरितः (६, ७, ८) ये सब स्थानभागकृत भेद करते हैं। मुख- | ||
| नासिकावचनोऽनुनासिकः (६) यह सूत्र नासिकाकृत भेद करता है। उदाहरणार्थ | ||
| अकार के अठारह भेदों की आकृति यथा— | ||
| ह्रस्व—अँ, अ, $\underline{अँ}$, $\underline{अ}$, अँ॑, अ॑ ॥ | ||
| दीर्घ—आँ, आ, $\underline{आँ}$, $\underline{आ}$; आँ॑, आ॑ ॥ | ||
| प्लुत—आँ३, आ३; $\underline{आँ३}$, $\underline{आ३}$, आँ॑३, आ॑३ ॥ | ||
| (१) अँ और अ में केवल नासिकाकृत भेद है क्योंकि पहला अनुनासिक और | ||
| दूसरा अननुनासिक है। दोनों एकमात्रिक हैं अतः कालकृत भेद नहीं है। दोनों | ||
| उदात्त होने के कारण स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होते हैं अतः स्थानभागकृत भेद | ||
| भी नहीं है। | ||
| (२) अ और $\underline{अँ}$ में नासिकाकृत तथा स्थानभागकृत दो प्रकार का भेद है। | ||
| क्योंकि पहला अननुनासिक तथा कण्ठ स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होता है, दूसरा | ||
| अनुनासिक तथा कण्ठ स्थान के अधोभाग में निष्पन्न होता है। इन दोनों में कालकृत | ||
| भेद नहीं है क्योंकि दोनों एकमात्रिक हैं। |