भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

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१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

अ, इ, उ, ऋ, ऌअ, इ, उ, ऋ, ए, ओ, ऐ, औअ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ
१ ह्रस्व उदात्त अनुनासिक७ दीर्घ उदात्त अनुनासिक१३ प्लुत उदात्त अनुनासिक
२ ,, ,, अननुनासिक८ ,, अननुनासिक१४ ,, अननुनासिक
३ ,, अनुदात्त अनुनासिक९ ,, अनुदात्त अनुनासिक१५ ,, अनुदात्त अनुनासिक
४ , ,, अननुनासिक१० ,, अननुनासिक१६ , ,, अननुनासिक
५ ,, स्वरित अनुनासिक११ , स्वरित अनुनासिक१७ , स्वरित अनुनासिक
६ ,, ,, अननुनासिक१२ ,, अननुनासिक१८ , ,, अननुनासिक
प्रकरण का सार—
इस प्रकरण का सार यह है कि सजातीय (एक ही स्थान वाले) अचों में
परस्पर तीन प्रकार के भेद होते हैं। १ कालकृत भेद। २ स्थानभागकृत भेद।
३ नासिक्याकृत भेद।
ऊँ३कालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुत (५) सूत्र कालकृत भेद करता है। उच्चैरुदात्तः,
नीचैरनुदात्तः, समाहारः स्वरितः (६, ७, ८) ये सब स्थानभागकृत भेद करते हैं। मुख-
नासिकावचनोऽनुनासिकः (६) यह सूत्र नासिकाकृत भेद करता है। उदाहरणार्थ
अकार के अठारह भेदों की आकृति यथा—
ह्रस्व—अँ, अ, $\underline{अँ}$, $\underline{अ}$, अँ॑, अ॑ ॥
दीर्घ—आँ, आ, $\underline{आँ}$, $\underline{आ}$; आँ॑, आ॑ ॥
प्लुत—आँ३, आ३; $\underline{आँ३}$, $\underline{आ३}$, आँ॑३, आ॑३ ॥
(१) अँ और अ में केवल नासिकाकृत भेद है क्योंकि पहला अनुनासिक और
दूसरा अननुनासिक है। दोनों एकमात्रिक हैं अतः कालकृत भेद नहीं है। दोनों
उदात्त होने के कारण स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होते हैं अतः स्थानभागकृत भेद
भी नहीं है।
(२) अ और $\underline{अँ}$ में नासिकाकृत तथा स्थानभागकृत दो प्रकार का भेद है।
क्योंकि पहला अननुनासिक तथा कण्ठ स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होता है, दूसरा
अनुनासिक तथा कण्ठ स्थान के अधोभाग में निष्पन्न होता है। इन दोनों में कालकृत
भेद नहीं है क्योंकि दोनों एकमात्रिक हैं।