लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंज्ञा-प्रकरणम् १६ (३) अ और आँ में तीनों प्रकार का भेद है। पहला एकमात्रिक तथा दूसरा द्विमात्रिक है अतः कालकृत भेद हुआ; पहला उदात्त होने से ऊर्ध्वभाग से निष्पन्न होने वाला तथा दूसरा अनुदात्त होने से अधोभाग में निष्पन्न होने वाला है अतः स्थान- भागकृत भेद हुआ; पहला अननुनासिक तथा दूसरा अनुनासिक है अतः नासिकाकृत भेद हुआ। (४) सजातीय अर्थात् एक स्थान वाले अचों में इन तीन भेदों से अतिरिक्त अन्य कोई भेद नहीं हो सकता, पर विजातीय अर्थात् भिन्न २ स्थानों वाले अचों में चौथा 'स्थानकृत' भेद भी हुआ करता है। यथा—अ और ई॒ में; पहला कण्ठस्थानीय तथा दूसरा तालुस्थानीय है अतः स्थानकृत भेद है। नोट—विद्यार्थियों को अचों के परस्पर इन चार प्रकार के भेदों का सुचारु रूप से अभ्यास कर लेना चाहिये। [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् —(१०) तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् १।१।९॥ ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतद् द्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः सवर्ण-संज्ञं स्यात् ॥ अर्थ.—तालु आदि स्थान तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न ये दोनों जिस वर्ण के जिस वर्ण के साथ तुल्य हों वह वर्णजात (अक्षर-समुदाय) परस्पर सवर्णसंज्ञक होता है। व्याख्या—तुल्यास्यप्रयत्नम् १।१। सवर्णम् १।१। समासः—आस्ये (मुखे) भवम् = आस्यम्, शरीरावयवाच्च (१०६१) इति भवार्थे यत्प्रत्ययः। यस्येति च (२३६) इत्यकारलोपे हलो यमां यमि लोपः (६६७) इति यकारलोपः। प्रकृष्टो यत्नः प्रयत्नः, यद्वा प्राक्तनो यत्नः प्रयत्नः, कुगतिप्रादयः (६४६) इति प्रादिसमासः। आस्यञ्च प्रयत्नश्च आस्यप्रयत्नौ, इतरेतरद्वन्द्वः। तुल्यौ आस्य-प्रयत्नौ यस्य (वर्णजा- तस्य) तत् = तुल्यास्यप्रयत्नम्, बहुव्रीहिसमासः। अर्थः—(तुल्यास्य-प्रयत्नम्) जिस वर्ण समूह का पारस्परिक ताल्वादिस्थान तथा आभ्यन्तर प्रयत्न तुल्य हो वह (सवर्णम्) परस्पर सवर्ण-संज्ञक होता है। स्थान कण्ठ से शुरू होते हैं अतः 'ताल्वादि' की अपेक्षा 'कण्ठादि' कहना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। कई लोग—'तालुन आदिस्ताल्वादिः (कण्ठः)। तालु आदिर्येषान्तानीमानि ताल्वादीनि, ताल्वादिश्च ताल्वादीनि च ताल्वादीनि, एकशेषः। इस प्रकार विग्रह कर के कण्ठ को भी ला घसीटते हैं, परन्तु हमारी सम्मति में सीधा 'कण्ठादि' न कह कर 'ताल्वादि' कहना द्रविड़-प्राणायाम से कम नहीं। लोक में आभ्यन्तर तथा बाह्य यत्नों के लिये सामान्यतया 'प्रयत्न' शब्द प्रयुक्त होता है, पर शास्त्र में इन दोनों के लिये यत्न' शब्द का ही प्रयोग होता है। इस सूत्र में 'यत्न' शब्द के साथ 'प्र' जुड़ा हुआ है, जो बाह्ययत्न को हटा कर आभ्यन्तर-