लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या यत्न का ही बोध कराता है। तथाहि-- प्राक्तनो यत्न प्रयत्नः, अथवा प्रकृष्टो यत्न प्रयत्न' जो पहला यत्न अथवा उत्कृष्ट यत्न हो उस 'प्रयत्न' कहते हैं। इस रीति से 'आभ्यन्तर' ही 'प्रयत्न' ठहरता है क्योंकि वह वर्णोत्पत्ति से पूर्व होता है तथा वर्णोत्पत्ति का कारण होने से उत्कृष्ट है। बाह्ययत्न वर्णोत्पत्ति के पश्चात् होने तथा वर्णोत्पत्ति में कारण न होने से वैसा नहीं है। यहां यह ध्यान रखना चाहिये कि जब तक सम्पूर्ण स्थान और सम्पूर्ण प्रयत्न तुल्य न हों तब तक 'सवर्ण' संज्ञा नहीं होती। यथा 'इ' और 'ए' वर्णों का प्रयत्न तुल्य है तालुस्थान भी तुल्य है, परन्तु 'ए' का 'इ' से कण्ठस्थान अधिक है अतः इन की सवर्णसंज्ञा नहीं होती। सवर्णसंज्ञा न होने से 'भवन्ति + एव' इत्यादि में अनिष्ट सवर्ण- दीर्घ की निवृत्ति हो जाती है। यह सब मुनिवर पाणिनि के 'यजुष्येकेषाम्' (८।३।१०४) सूत्र में (यजुषि + एकेषाम्) सवर्णदीर्घ न कर के यण् करने से विदित होता है। अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि सम्पूर्ण स्थान + प्रयत्न के साम्य होने से ही सावर्ण्य माना जायेगा तो 'क' और 'ङ' की सवर्णसंज्ञा न हो सकेगी, क्योंकि कण्ठस्थान और स्पृष्ट प्रयत्न के तुल्य होने पर भी ङकार का नासिकास्थान अधिक होता है। और यदि इन की सवर्ण-संज्ञा न होगी तो क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०६) सूत्र से ककार ङकार का ग्रहण न करायेगा इस से 'प्राङ्' आदि प्रयोगों में नकार को ङकार न हो कर अनिष्ट प्रयोग निष्पन्न होंगे। इस का समाधान यह है कि सूत्र में आस्य+प्रयत्न के तुल्य होने का उल्लेख है। 'आस्य' का अर्थ 'मुख में होने वाला स्थान' है। क्कार और ङ्कार का मुख में होने वाला स्थान कण्ठ तुल्य ही है। 'नासिका' तो मुख से बाहर का स्थान है, फिर चाहे वह तुल्य हो या न हो चिन्ता नहीं, सवर्णसंज्ञा हो जाती है। निष्कर्ष यह है कि-- यदि किसी वर्ण के मुखगत कण्ठादि स्थान तथा आभ्यन्तर यत्न अन्य वर्ण से पूरी तरह से तुल्य हों तो वे परस्पर 'सवर्ण' संज्ञक होते हैं। स्मरण रहे कि 'ए' और 'ऐ' की तथा 'ओ' और 'औ' की सम्पूर्ण स्थान और प्रयत्न के साम्य होने पर भी सवर्णसंज्ञा नहीं होती, इस का कारण यह है कि मुनिवर पाणिनि ने एओङ्, ऐऔच् सूत्रों में दोनों का पृथक् २ निर्देश किया है। [लघु०] वा०-- (१) ऋलृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम् ॥ अर्थः--ऋकार और लृकार वर्णों की परस्पर 'सवर्ण' संज्ञा कहनी चाहिये। व्याख्या--तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१०) सूत्र के अनुसार ऋकार और लृकार की परस्पर सवर्ण-संज्ञा नहीं हो सकती, क्योंकि ऋकार का स्थान मूर्धा और लृकार का स्थान दन्त है। परन्तु 'तवल्कार' आदि प्रयोगों के लिये इन की सवर्ण संज्ञा करना अतीव आवश्यक है। इस त्रुटि की पूर्ति मुनिवर कात्यायन ने उपर्युक्त वार्त्तिक द्वारा कर दी है। अब दोनों का स्थानसाम्य न होने पर भी सवर्णसंज्ञा सिद्ध हो जाती है।