लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (१।१६१) इति मत्वर्थीयोऽच् प्रत्यय ] । स्वरितः १।१। अर्थ -(उदात्तस्य = उदा- त्तत्वस्य) उदात्तपन (अनुदात्तस्य = अनुदात्तत्वस्य) और अनुदात्तपने के (समाहारः ) मेल वाला (अच्) अच् (स्वरितः ) स्वरितसञ्ज्ञक होता है। पूर्व-सूत्रों में स्थानी के दो भाग कह आये हैं एक ऊपर वाला भाग और दूसरा नीचे वाला भाग । जो अच् इन दोनों भागों में बोला जाय उसे 'स्वरित' कहते हैं। यथा अकार का 'कण्ठ' स्थान होता है यदि अकार कण्ठ के ऊपरी और निचले दोनों भागों से बोला जायेगा तो 'स्वरित' सञ्ज्ञक होगा । इसी प्रकार अपने २ स्थानों के दोनों भागों से बोले जाने वाले इकार आदि भी स्वरितसञ्ज्ञक होंगे। अब इस प्रकार ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत प्रत्येक के उदात्त, अनुदात्त तथा स्व- रित २ भेद होकर प्रत्येक अच् के नौ २ भेद हो जाते हैं (ध्यान रहे कि यह सामान्यतः कथन किया गया है यद्यपि जिन अचों के ह्रस्व या दीर्घ नहीं होते उन के तो छः २ भेद ही होते हैं) । ये नौ भेद निम्नलिखित हैं-
| (१) ह्रस्व उदात्त | (४) दीर्घ उदात्त | (७) प्लुत उदात्त | | (२) ह्रस्व अनुदात्त | (५) दीर्घ अनुदात्त | (८) प्लुत अनुदात्त | | (३) ह्रस्व स्वरित | (६) दीर्घ स्वरित | (९) प्लुत स्वरित |
इन नौ भेदों में भी हर एक के पुनः अनुनासिक तथा अननुनासिक धर्मों के कारण दो २ भेद होकर प्रत्येक अच् के अठारह २ भेद हो जाते हैं यह सब अग्रिम सूत्र में प्रतिपादन किया गया है। कोई समय था जब उदात्त आदि स्वरों का प्रयोग लोक में भी किया जाता था, पर अब इन का प्रचार लोक में सर्वथा नष्ट हो गया है। ये प्रायः वेद में ही प्रयुक्त होते हैं। वेद में इन का सङ्केत चिह्नों द्वारा किया जाता है। उदात्त के लिये कोई चिह्न नहीं होता, अनुदात्त के नीचे पड़ी रेखा तथा स्वरित के ऊपर खड़ी रेखा का चिह्न होता है। यथा- उदात्त - अ । इ । उ । इत्यादि । अनुदात्त - अ॒ । इ॒ । उ॒ । इत्यादि । स्वरित - अ॑ । इ॑ । उ॑ । इत्यादि । सामवेद आदि में अन्य प्रकार के भी चिह्न होते हैं जो वैदिक ग्रन्थों से जानने चाहियें।