लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंज्ञा-प्रकरणम् १५ भागों वाले तालु आदि स्थानों में जो अच् निचले भाग में बोला जाय वह अनुदात्त होता है ॥७॥ व्याख्या—उच्चैः इत्यव्ययपदम् । उदात्तः ।१।१। अच् ।१।१। (ऊकालोऽज्झ्र- स्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥६॥ नीचैः इत्यव्ययपदम् । अनुदात्तः ।१।१। अच् ।१।१। (ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥७॥ 'उच्चैस्' शब्द का अर्थ ऊँचा तथा 'नीचैस्' शब्द का अर्थ नीचा है । भाष्य के प्रमाणानुसार वर्णों का अपने २ स्थानों में ही ऊँचा या नीचापन समझना चाहिये । यदि स्थान अखण्ड हों अर्थात् उन के भाग न हो सकते हों तो ऊँचापन या नीचापन नहीं बन सकता । अतः स्थानों के दो भाग मानने पड़ेंगे एक ऊँचा भाग दूसरा नीचा भाग । वृत्ति में इसीलिये 'सभाग' शब्द लिखा गया है ; अर्थः—(उच्चैः) अपने स्थान के ऊपर वाले भाग में उच्चार्यमाण (अच्) अच् (उदात्तः) उदात्तसंज्ञक होता है ॥६॥ (नीचैः) अपने स्थान के नीचे वाले भाग में उच्चार्यमाण (अच्) अच् (अनुदात्त) अनुदात्तसंज्ञक होता है ॥७॥ यथा अकार का 'कण्ठ' स्थान है । यदि अकार कण्ठ में ऊपरले भाग से बोला जायेगा तो उदात्त और यदि निचले भाग में बोला जायेगा तो अनुदात्त संज्ञक होगा । एवम् आगे इकार आदियों के विषय में भी जान लेना चाहिये । कुछ लोग 'जो ऊँची स्वर से बोला जाय वह उदात्त होता है' ऐसा अनर्थ किया करते हैं । उनके अनर्गल-प्रलाप से सावधान रहना चाहिये; क्योंकि तब मानसिक जप में उदात्तत्व आदि न माना जा सकेगा, पर यह अनिष्ट है । नोटः---इन सूत्रों की तथा अगले सूत्र की वृत्ति 'लघुकौमुदी' में नहीं दी गई । हम ने सुगमता के लिये 'सिद्धान्तकौमुदी' से ले कर कोष्ठ में दे दी है । [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (८) समाहारः स्वरितः ।१।२।३१॥ (उदात्तानुदात्तत्वे वर्णधर्मौ समाह्रियेते यस्मिन् सोऽच् स्वरितसंज्ञः स्यात्) । स नवविधोऽपि प्रत्येकम्अनुनासिकाननुनासिकत्वाभ्यां द्विधा ॥ अर्थः—उदात्त और अनुदात्त वर्णों के धर्म जो उदात्तत्व और अनुदात्तत्व ये दोनों जिस अच् में विद्यमान हों वह अच् 'स्वरित' संज्ञक होता है। स नवविधोऽपि-- इस तरह नौ प्रकार का वह अच् पुनः अनुनासिक तथा अननुनासिकधर्मों के कारण दो प्रकार का हो जाता है । व्याख्या—उदात्तस्य ।६।१। अनुदात्तस्य ।६।१। (उच्चैरुदात्तः से 'उदात्तः' तथा नीचैरनुदात्तः से 'अनुदात्तः' पद का अनुवर्त्तन होता है । इन दोनों का यहां षष्ठी- विभक्ति में विपरिणाम हो जाता है । ये दोनों पद भाष्य के प्रमाणानुसार धर्मप्रधान हैं, अर्थात् इन का अर्थ उदात्तत्व और अनुदात्तत्व है। समाहारः ।१।१। [समाहरणम् =समाहारः, भावे घञ् । समाहारोऽस्त्यस्मिन्निति समाहारः, अर्शआदिभ्योऽच् दीर्घ के बोलने में दो सकेण्ड तथा प्लुत के बोलने में तीन सैकेण्ड का समय लगाना चाहिये ।