लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थात् अनुस्वार और यमों का 'नासिका' स्थान होता है। अब अयोगवाहों में शेष रहे जिह्वामूलीय, उपध्मानीय और विसर्ग। इन में से जिह्वामूलीय का 'जिह्वामूल' ही स्थान निश्चित है, इसी प्रकार उपध्मानीय भी सदैव पकार या फकार के आश्रित होने से ओष्ठस्थानीय ही रहते हैं। तो अब विसर्ग के सिवाय अयोगवाहों में अन्य कोई अनियतस्थान वाला नहीं रहा। उदाहरण यथा—'कविः' यहां इकारा- श्रित होने से विसर्जनीय का तालुस्थान होता है। 'भानुः' यहां उकाराश्रित होने से विसर्जनीय का ओष्ठस्थान है। 'रामयोः' यहां ओकाराश्रित होने से विसर्जनीय का कण्ठ+ओष्ठ स्थान है। इसी प्रकार अन्यत्र भी जिस २ के आश्रित विसर्ग होगा उस २ का वह २ स्थान विसर्ग का भी होगा। [लघु०] इचुयशानां तालु ॥ अर्थ.—अठारह प्रकार के इवर्ण, चवर्ग, दो प्रकार के यकार तथा शकार का 'तालु' स्थान होता है। व्याख्या—इचुयशानाम् ।६।३। तालु ।१।१। समास—इश्च चुश्च यश्च शश्च इचुयशाः, तेषाम् = इचुयशानाम्, इतरेतरद्वन्द्व। यहां लोकप्रसिद्धयनुसार 'इ' से इवर्णकुल, 'चु' से चवर्ग 'य्' से अनुनासिक और अननुनासिक दोनों प्रकार के यकारों का ग्रहण होता है। दांतों के पीछे जो कठिन मुख की छत है उसे 'तालु' कहते हैं। [लघु०] ऋ-टुर-षाणां मूर्धा ॥ अर्थ—अठारह प्रकार के ऋवर्ण, टवर्ग, रेफ तथा षकार का 'मूर्धा' स्थान होता है। व्याख्या—ऋटुरषाणाम् ।६।३। मूर्धा ।१।१। समास—ऋ च टुश्च रश्च षश्च ऋटुरषाः, तेषाम् = ऋटुरषाणाम्, इतरेतरद्वन्द्व। 'तालु' स्थान से पीछे मुख की छत का जो कोमल भाग है उसे 'मूर्धा' कहते हैं। आजकल षकार का उच्चारण सम्यग्- रीत्या नहीं हुआ करता अतः इस का विशेष ध्यान रखना चाहिये। [लघु०] ऌ-तुल-सानां दन्ताः ॥ अर्थ—बारह प्रकार के ऌकार, तवर्ग, दो प्रकार के लकार तथा सकार का 'दन्त' स्थान होता है। व्याख्या—ऌतुलसानाम् ।६।३। दन्ताः ।१।३। समास—ऌ च तुश्च लश्च सश्च = ऌतुलसाः, तेषाम् = ऌतुलसानाम्, इतरेतरद्वन्द्व। यहां 'दन्त' से तात्पर्य ऊपर वाले दांतों के पीछे साथ लगे हुए मांस से है, अतः एवं भग्न दांतों वाला पुरुष भी इन वर्णों का उच्चारण कर सकता है। [लघु०] उपूपध्मानीयानामोष्ठौ ॥ अर्थ—अठारह प्रकार के उकार, पवर्ग तथा उपध्मानीय का ओष्ठ (होठ) स्थान होता है।
संज्ञा-प्रकरणम् २३ व्याख्या — उपूपध्मानीयानाम् ।६।३। ओष्ठौ ।१।२। समासः — उश्च पुश्च उपध्मानीयश्च उपूपध्मानीयाः, तेषाम् = उपूपध्मानीयानाम् । इतरेतरद्वन्द्वः । अच् से परे तथा पकार फकार से पूर्व '≍' इस प्रकार उपध्मानीय होता है । इस का विवेचन आगे उसी प्रकरण में किया जायेगा । [लघु०] ञ-म-ङ-ण-नानां नासिका च ॥ अर्थः—ञ्, म्, ङ्, ण्, न् इन पाञ्च वर्णों का 'नासिका' स्थान भी होता है । व्याख्या—ञमङणनानाम् ।६।३। नासिका ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । समासः— ञश्च मश्च ङश्च णश्च नश्च = ञमङणनाः, तेषाम् = ञमङणनानाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । आदिश्चकार उच्चारणार्थः । यहाँ मूल में 'च' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि इन वर्णों का अपने-अपने वर्गों का स्थान भी होता है। यथा - ञकार का तालुस्थान और नासिकास्थान दोनों हैं । उस प्रकार मकारादि में भी समझ लेना चाहिये । [लघु०] एदैतोः कण्ठ-तालु ॥ अर्थः—बारह प्रकार के एकार तथा ऐकार का कण्ठ और तालु स्थान होता है । व्याख्या—एदैतोः ।६।२। कण्ठतालु ।१।१। एच ऐच्च = एदैतौ, तयोः= एदैतोः, इतरेतरद्वन्द्वः । कण्ठश्च तालु च = कण्ठतालु । प्राण्यङ्गत्वात् समाहार-द्वन्द्वः । मूल में तकार सुखपूर्वक उच्चारण के लिये ग्रहण किया गया है, इसे तपर नहीं समझना चाहिये । [लघु०] ओदौतोः कण्ठोष्ठम् ॥ अर्थः—बारह प्रकार के ओकार तथा औकार का 'कण्ठ' और 'ओष्ठ' स्थान होता है । व्याख्या—ओदौतोः ।६।२। कण्ठोष्ठम् ।१।१। समासः—ओच्च औच्च ओदौतौ, तयोः = ओदौतोः, इतरेतर-द्वन्द्वः । कण्ठश्च ओष्ठौ च कण्ठोष्ठम्, प्राण्यङ्गत्वात् समा- हारद्वन्द्वः । ओत्वोष्ठयोः समासे वा इति वार्तिकेन पररूपता । यहां भी मूल में तकार मुख-सुखार्थ ही समझना चाहिये । [लघु०] वकारस्य दन्तोष्ठम् ॥ अर्थः—वकार का दन्त और ओष्ठ स्थान होता है । व्याख्या—वकारस्य ।६।१। दन्तोष्ठम् ।१।१। समासः—दन्ताश्च ओष्ठौ च = दन्तोष्ठम्, प्राण्यङ्गत्वात् समाहारद्वन्द्वः । ओत्वोष्ठयोः समासे वा इति वार्तिकेन पररूपता । जो लोग वकार के उच्चारण में दोनों ओष्ठों का प्रयोग करके उसे बकार बना देते हैं उन्हें यह वचन ध्यान से पढ़ना चाहिये । [लघु०] जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् ॥ अर्थः—जिह्वामूलीय का स्थान जिह्वा की जड़ होता है । व्याख्या—जिह्वामूलीयस्य ।६।१। जिह्वामूलम् ।१।१। जिह्वा का मूल स्थान
२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां प्राय कण्ठ के ही निकट होता है । अच् से परे तथा ककार खकार से पूर्व 'ᳵ' ऐसा चिह्न जिह्वामूलीय का होता है इस का विवेचन आगे इसी प्रकरण में मूल में ही किया जायेगा । [लघु०] नासिकाऽनुस्वारस्य ॥ अर्थ —अनुस्वार का नासिका-स्थान होता है । व्याख्या—नासिका ।१।१। अनुस्वारस्य ।६।१। अच् से परे '—' इस प्रकार के चिह्न को 'अनुस्वार' कहते हैं । इस का विवेचन आगे मूल में ही किया जायेगा । [लघु०] इति स्थानानि ॥ अर्थः—ये स्थान समाप्त हुए । [लघु०] यत्नो द्विधा, आभ्यन्तरो बाह्यश्च । आद्यः पञ्चधा, स्पृष्टेषत्स्पृष्टे- षद्द्विवृतविवृतसंवृतभेदात् । तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् । ईषत्स्पृष्टमन्त - स्थानाम् । ईषद्विवृतमूष्मणाम् । विवृतं स्वराणाम् । ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम् । प्रक्रिया-दशायान्तु विवृतमेव ॥ अर्थ.—यत्न दो प्रकार का होता है, एक 'आभ्यन्तर' और दूसरा 'वाह्य' । पहला आभ्यन्तर-यत्न पांच प्रकार का होता है, १ स्पृष्ट, २ ईषत्स्पृष्ट, ३ ईषद्विवृत, ४ विवृत, ५ संवृत । इन में से स्पृष्ट-प्रयत्न स्पर्श अक्षरों का होता है । ईषत्स्पृष्ट- प्रयत्न अन्त स्थ अक्षरों का होता है । ईषद्विवृत-प्रयत्न ऊष्म अक्षरों का होता है । स्वरों का विवृत-प्रयत्न होता है । ह्रस्व अवर्ण का उच्चारण-काल में संवृत-प्रयत्न और प्रयोग-सिद्धि के समय केवल विवृत-प्रयत्न होता है । व्याख्या—कोशिश को 'यत्न' कहते हैं । वह यत्न यहां दो प्रकार का होता है । एक वर्ण की उत्पत्ति से पूर्व और दूसरा वर्ण की उत्पत्ति के पश्चात् । जो यत्न वर्णोत्पत्ति से पूर्व किया जाता है उसे 'आभ्यन्तर' तथा जो वर्णोत्पत्ति के अनन्तर किया जाता है उसे 'बाह्य' कहते हैं । इन में प्रथम 'आभ्यन्तर' यत्न पांच प्रकार का होता है। यथा—१ स्पृष्ट, २ ईषत्स्पृष्ट, ३ ईषद्विवृत, ४ विवृत, ५ संवृत । वर्णों की उत्पत्ति में जिह्वा के अग्र, उपाग्र, मध्य तथा मूल भागों का उपयोग हुआ करता है । जिह्वा का स्थान को छूना 'स्पृष्ट', थोड़ा छूना 'ईषत्स्पृष्ट', थोड़ा दूर रहना 'ईषद्विवृत', दूर रहना 'विवृत' तथा हट कर समीप रहना 'संवृत' यत्न कहलाता है । स्पर्श अर्थात् 'क्' से लेकर 'म्' पर्यन्त वर्णों का 'स्पृष्ट' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा (यह उपलक्षणमात्र है, पवर्ग के उच्चारण में ओष्ठ भी समझ लेना चाहिये) को स्थान के साथ स्पर्शरूप यत्न करना पड़ता है । अन्त स्थ अर्थात् य्, व्, र्, ल् वर्णों का 'ईषत्स्पृष्ट' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा (ओष्ठ भी) को स्थान के साथ थोड़ा स्पर्शरूप यत्न करना पड़ता है । ऊष्म अर्थात् श्, ष्, स्, ह् वर्णों का 'ईषद्विवृत' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा को स्थान से
संज्ञा-प्रकरणम् २५ थोड़ी दूर रखना चाहिये । स्वरों का 'विवृत' प्रयत्न है; अर्थात् उनके उच्चारण में जिह्वा (उकार के उच्चारण में ओष्ठ) को स्थान से दूर रखना चाहिये । ह्रस्व अवर्ण का 'संवृत' प्रयत्न है; अर्थात् इस के उच्चारण में जिह्वा को स्थान से हटा कर उसके समीप रखना चाहिये । उन सब प्रयत्नों का शिक्षा-ग्रन्थों में यथावत् वर्णन किया गया है वहीं देखें । उन प्रयत्नों से व्याकरण में और तो कोई दोष नहीं आता किन्तु ह्रस्व अकार दीर्घ आकार का सवर्णी नहीं हो सकता; क्योंकि ह्रस्व अकार का संवृत और दीर्घ आकार का विवृत प्रयत्न होता है । सावर्ण्य न होने से 'दण्ड + आनयन' इत्यादि में अकः सवर्णे दीर्घः (४७) द्वारा सवर्णदीर्घ न हो सकेगा । इस दोष की निवृत्ति के लिये महामुनि पाणिनि ने इस शास्त्र में प्रक्रिया-अवस्था में ह्रस्व अकार को विवृत माना है, इस से दोनों की सवर्ण-संज्ञा हो जाने से कोई दोष नहीं आता । इस विषय का विस्तार अ अ (८.४.६७) सूत्र पर 'काशिका' आदि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें । अब बाह्य-यत्न का वर्णन किया जाता है - [लघु०] बाह्ययत्नस्त्वेकादशधा । विवारः संवारः श्वासो नादोऽघोषो घोषोऽल्पप्राणो महाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितश्चेति । खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च । हशः संवारा नादा घोषाश्च । वर्गाणां प्रथम-तृतीय-पञ्चमा यण- श्चाल्पप्राणाः । वर्गाणां द्वितीय-चतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः ॥ अर्थः-बाह्ययत्न ग्यारह प्रकार का होता है । १-विवार, २-संवार, ३-श्वास, ४-नाद, ५-अघोष, ६-घोष, १ ७-अल्पप्राण, ८-महाप्राण, ९-उदात्त, १०-अनुदात्त, ११-स्वरित । 'खर्' प्रत्याहार के अन्तर्गत वर्ण विवार, श्वास तथा अघोष यत्न वाले होते हैं । 'हश्' प्रत्याहार के अन्तर्गत वर्ण संवार, नाद तथा घोष यत्न वाले होते हैं । वर्गों के प्रथम, तृतीय, पञ्चम और यण् अल्पप्राण यत्न वाले होते हैं । वर्गों के द्वितीय, चतुर्थ और शल् महाप्राण यत्न वाले होते हैं । व्याख्या-हशः संवारा नादा घोषाश्च तथा यणश्चाल्पप्राणाः इन दोनों स्थानों पर 'च' से 'अच्' का ग्रहण होता है । अतः अच्-संवार, नाद, घोष तथा अल्पप्राण यत्न वाले हैं । उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भी अचों के ही यत्न हैं इन का वर्णन पीछे हो चुका है अतः यहां इन के विषय में कुछ नहीं कहा गया । यद्यपि यह वर्णन ध्वनिशास्त्र का विषय है तथापि यहां विवार आदि का सङ्क्षिप्त सरलार्थ लिख देना अनुचित न होगा । विवार-वर्णोच्चारण के समय मुख के खुलने को विवार कहते हैं । जिन वर्णों १. यहां पर अघोषः, घोषः ऐसा उपर्युक्त पाठ मानने से अन्वय ठीक हो जाता है, फिर एक २ को छोड़ देने से “विवार, श्वास, अघोष" तथा "संवार, नाद, घोष" यह क्रम भी ठीक हो जाता है।
२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां के उच्चारण करते समय मुख खुलता है वे विवार-यत्न वाले कहाते हैं। संवार - वर्णोच्चारण के समय मुख के विकास न होने को संवार कहते हैं। श्वास - वर्णोच्चा- रण के समय श्वास चलने को श्वास यत्न कहते हैं। नाद - वर्णोच्चारण के समय नाद अर्थात् गम्भीर ध्वनि होने को नाद यत्न कहते हैं। घोष-अघोष—वर्णोच्चारण के समय घोष अर्थात् गूंज का उठना घोष तथा गूंज का न उठना अघोष यत्न कहाता है। अल्पप्राण-महाप्राण—वर्णोच्चारण के समय प्राणवायु के अल्प उपयोग को अल्पप्राण तथा अधिक उपयोग को महाप्राण यत्न कहते हैं। अब उपर्युक्त स्थान-यत्न-प्रकरण में आए हुए १ १ स्पर्श २ अन्तस्थ या अन्तस्था, ३ ऊष्म, ४ स्वर, ५ जिह्वामूलीय ६ उपध्मानीय ७ अनुस्वार और ८ विसर्ग इन आठ शब्दों की व्याख्या स्वयं ग्रन्थकार करते हैं— [लघु०] कादयो मावसानाः स्पर्शाः। यणोऽन्तस्थाः। शल ऊष्माणः। अच स्वराः। ≍ क ≍ ख इति कखाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृशो जिह्वामूलीयः। ≍ प ≍ फ इति पफाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्मानीयः। 'अं अः' इत्यच परावनुस्वारविसर्गौ॥ अर्थ — 'क्' से ले कर 'म्' पर्यन्त स्पर्श वर्ण हैं। यण् अर्थात् 'य्, व्, र्, ल्' ये चार वर्ण अन्तस्थ वा अन्तस्था२ हैं। शल् अर्थात् 'श्, ष्, स्, ह्' ये चार वर्ण ऊष्म हैं। अच् प्रत्याहार स्वर होता है। 'क्' अथवा 'ख्' वर्ण से पूर्व (तथा अच् से परे) आधे विसर्ग के तुल्य जिह्वामूलीय होता है। 'प्' अथवा 'फ्' वर्ण से पूर्व (तथा अच् से परे) आधे विसर्ग के तुल्य उपध्मानीय होता है। 'अं, अः' यहां अकार स्वर से परे क्रमशः अनुस्वार तथा विसर्ग हैं। व्याख्या—'क्' से 'म्' तक स्पर्श वर्ण हैं। यहां लौकिक क्रम का आश्रयण किया गया है जो आज तक प्रसिद्ध चला आ रहा है। प्रत्याहारसूत्रों में 'क्' से 'म्' तक मिलना असम्भव है अतः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग ये पच्चीस वर्ण ही स्पर्शसंज्ञक होते हैं। इन का नाम स्पर्श इस कारण से है क्योंकि इन का उच्चारण जिह्वा (ओष्ठ भी) का स्थान के साथ स्पर्श होने से होता है। 'य्, व्, र्, ल्' इन चार वर्णों को अन्तस्थ या अन्तस्था इसलिये कहते हैं क्योंकि ये स्वर और व्यञ्जनों के बीच के रहते हैं। प्रत्याहारसूत्रों में भी स्वरों और व्यञ्जनों के मध्य इन को पढ़ा गया है। ये व्यञ्जन भी हैं और स्वर भी। अंग्रेजी में इन को अर्धस्वर (Semi Vowel) भी इसीलिये कहा जाता है। इको यणचि (१५), इग्यणः सम्प्रसारणम् १ तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम्; ईषत्स्पृष्टम् अन्तस्थानाम्; ईषद्विवृतम् ऊष्मणाम्; ⁕विवृतं स्वराणाम्; जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्; उपूपध्मानीयानामोष्ठौ; नासि- काऽनुस्वारस्य, अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः। २ अन्तस्थ' शब्द का उच्चारण रामशब्दवत् तथा 'अन्तस्था' शब्द का उच्चारण विश्वपाशब्दवत् होता है।
संज्ञा-प्रकरणम् २७ (२५६) आदि सूत्र भी यही प्रकट करते हैं। कुछ लोगों का विचार है कि प्रसिद्ध- लिपिक्रम में स्पर्शों और ऊष्मों के मध्य में वर्त्तमान होने से इन का नाम अन्तस्थ पड़ गया है। 'श्, ष्, स्, ह्' ये चार वर्ण ऊष्म कहाते हैं। इन को ऊष्म कहने का कदाचित् यह प्रयोजन है कि इन के उच्चारण में गरम वायु निकलती है। कुछ लोगों की राय है कि इन के उच्चारण में शरीर में उष्णता - गरमी का अधिक सञ्चार होता है अतः ये ऊष्म कहाते हैं। 'क्' या 'ख्' परे होने पर विसर्ग के स्थान पर जिह्वामूलीय तथा 'प्' या 'फ्' परे होने पर उपध्मानीय आदेश होते हैं यह आगे कुप्वोः ≍ क ≍ पौ च (६८) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे। ये जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय आधे विसर्ग के सदृश होते हैं। यहां सादृश्य उच्चारण की अपेक्षा से नहीं किन्तु लिपि की अपेक्षा से समझना चाहिये। यथा विसर्ग का स्वरूप ' ः ' इन ऊपर नीचे लिखे दो गोल शून्य चिह्नों से प्रकट किया जाता है, इनका आधा ' ≍ ' यही उपध्मानीय और जिह्वा- मूलीय का स्वरूप समझना चाहिये। अनुस्वार की आकृति ' ं ' इस प्रकार ऊपर एक बिन्दुरूप होती है। यह सदा स्वर के ऊपर लिखा जाता है परन्तु इस की स्थिति सदा स्वर के अनन्तर स्वीकार की जाती है। अनुस्वार का चिह्न यथा—अं, इं, उं, कं, किं, कुं इत्यादि। विसर्ग की आकृति ' ः ' इस प्रकार दो गोल चिह्नों से प्रकट की जाती है। यह सदा स्वर के आगे प्रयुक्त किया जाता है। इसकी स्थिति भी स्वर के अनन्तर ही स्वीकार की जाती है। विसर्ग का उदाहरण यथा—अः, इः, उः, कः, किः, कुः इत्यादि। (१) अथ स्थान-बोधक-चक्रम्
| कण्ठः | तालु | ओष्ठौ | मूर्धा | दन्ताः | नासिका | कण्ठतालु | कण्ठोष्ठम् | दन्तोष्ठम् | जिह्वा० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | इ | उ | ऋ | ऌ | ङ् | ए | ओ | व् | ≍क |
| क् | च् | प् | ट् | त् | म् | ऐ | औ | ≍ख | |
| ख् | छ् | फ् | ठ् | थ् | ञ् | ||||
| ग् | ज् | ब् | ड् | द् | ण् | ||||
| घ् | झ् | भ् | ढ् | ध् | न् | ||||
| ङ् | ञ् | म् | ण् | न् | ं | ||||
| ह् | य् | ≍प् | र् | ल् | |||||
| ः | श् | ≍फ् | ष् | स् |
२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या (२) अथ आभ्यन्तर-यत्न-बोधक-चक्रम्
| स्पृष्टम् | ईषत्स्पृष्टम् | विवृतम् | ईषद्विवृतम् | संवृतम् |
|---|---|---|---|---|
| क्, ख्, ग्, घ्, ङ् | य् | अ ए | श् | ह्रस्वस्य |
| च्, छ्, ज्, झ्, ञ् | व् | इ ओ | ष् | अवर्णस्य |
| ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण् | र् | उ ऐ | स् | उच्चारणकाले |
| त्, थ्, द्, ध्, न् | ल् | ऋ औ | ह् | केवलम् |
| प्, फ्, ब्, भ्, म् | ऌ |
(३) अथ बाह्य-यत्न-बोधक-चक्रम्
| विवारः, श्वासः, अघोष | संवार, नाद., घोष | अल्पप्राण | महाप्राण | उदात्तानुदात्त-स्वरिताः |
|---|---|---|---|---|
| क्, ख्, | ग्, घ्, ङ् | क्, ग्, ङ् | ख्, घ् | अ |
| च्, छ् | ज्, झ्, ञ् | च्, ज्, ञ् | छ्, झ् | इ |
| ट्, ठ् | ड्, ढ्, ण् | ट्, ड्, ण् | ठ्, ढ् | उ |
| त्, थ् | द्, ध्, न् | त्, द्, न् | थ्, ध् | ऋ |
| प्, फ् | ब्, भ्, म् | प्, ब्, म् | फ्, भ् | ऌ |
| श् | य्, व् | य् ⎫ | श् | ए |
| ष् | र्, ल् | व् ⎪ | ष् | ओ |
| स् | ह्, | र् ⎬ [सर्व स्वर] | स् | ऐ |
| [सर्व स्वर] | ल् ⎭ | ह् | औ |
संज्ञा-प्रकरणम् २६ [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् (-११) अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः ।१।१।६८॥ प्रतीयते-विधीयत इति प्रत्ययः । अविधीयमानोऽण् उदिच्च सवर्णस्य सञ्ज्ञा स्यात् । अत्रैवाण् परेण णकारेण । कुँ, चुँ, टुँ, तुँ, पुँ—एत उदितः । तदेवम्—अ इत्यष्टादशानां सञ्ज्ञा, तथेकारोकारौ । ऋकारस्त्रिंशतः, एवम् लृकारोऽपि । एचो द्वादशानाम् । अनुनासिकाऽननुनासिकभेदेन यवला द्विधा, तेनाऽननुनासिकास्ते द्वयोर्द्वयोः सञ्ज्ञा ॥ अर्थः- जिस का विधान किया जाये उसे 'प्रत्यय' कहते हैं। अप्रत्यय अर्थात् न विधान किया हुआ अण् और उदित् सवर्णों की तथा अपनी सञ्ज्ञा वाला हो। अत्रैवाण्—केवल इसी सूत्र में अण् प्रत्याहार पर णकार से गृहीत होता है। 'कुँ, चुँ, टुँ, तुँ, पुँ' इन को उदित् कहते हैं। इस प्रकार 'अ' यह अठारह प्रकार की सञ्ज्ञा वाला हो जाता है। इसी प्रकार 'इ' और 'उ' भी। ऋकार तीस प्रकार की सञ्ज्ञा वाला होता है। इसी प्रकार लृकार भी। एच् प्रत्याहार का प्रत्येक बारह २ प्रकार की सञ्ज्ञा है। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से य्, व्, ल् दो प्रकार के होते हैं, अतः अननुनासिक य्, व्, ल् ही दो २ की सञ्ज्ञा होंगे। व्याख्या- अण् ।१।१। उदित् ।१।१। सवर्णस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम्। अप्रत्ययः ।१।१। स्वस्य ।६।१। (चकार के बल से स्वं रूपं शब्दस्याऽशब्दसञ्ज्ञा सूत्र में 'स्वम्' पद आ कर षष्ठ्यन्त में परिणत हो जाता है)। समासः- उद्=ह्रस्व उवर्णः इत् यस्मात् स उदित्, बहुव्रीहि-समासः । प्रतीयते==विधीयते इति प्रत्ययः, प्रतिपूर्वाद् इणः कर्मणि अच्प्रत्ययः। न प्रत्ययः = अप्रत्ययः, नञ्तत्पुरुषसमासः । अर्थः- (अप्रत्ययः) न विधान किया हुआ (अण्) अण् और (उदित्) उदित् (सवर्णस्य) सवर्णियों की (च) तथा (स्वस्य) अपने स्वरूप की सञ्ज्ञा होता है। 'प्रत्यय' शब्द यहाँ यौगिक है, इस का अर्थ है 'विधान किया हुआ'। यथा- इको यण् अचि (१५) सूत्र में 'यण्' और सनाद्यंसभिक्ष उः (८४०) सूत्र में 'उ' विधान किया गया है। अतः ये दोनों प्रत्यय हैं। अण् तथा इण् प्रत्याहार दो प्रकार से बन सकते हैं। एक-अ इ उ ण् के णकार से और दूसरा लँण् के णकार से। कहां पूर्व णकार से तथा कहां पर णकार से इन का ग्रहण करना चाहिये ? इस विषय में ऊहापोह द्वारा निश्चित भाष्य-सम्मत निर्णय यह है- परेणैवेण्ग्रहाः सर्वे, पूर्वेणैवाण्ग्रहा मताः । ऋतेऽणुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥ अर्थात् इण् प्रत्याहार सर्वत्र पर लँण् वाले णकार से तथा अण् प्रत्याहार अणु- दित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः (११) को छोड़ सर्वत्र अइउण् वाले णकार से ग्रहण करना चाहिये । अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः सूत्र में अण् प्रत्याहार लँण् वाले णकार से ग्रहण किया जाता है। इस नियम के अनुसार यहां 'अण्' पर णकार से ग्रहण होता है । तो
३० भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इस प्रकार यहां 'अण्' में 'अ इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल्' इन चौदह वर्णों का ग्रहण होता है। यदि ये वर्ण अविधीयमान (न विधान किये हुए) होंगे तो अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। यथा—इको यण् अचि (१५) यहां इक् और अच् अविधीयमान हैं—विधान नहीं किये गये (विधान तो यण् ही किया गया है), इस से इक्-प्रत्याहारान्तर्गत 'इ, उ, ऋ, ऌ' ये चार वर्ण अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'सुधी +उपास्य' यहां दीर्घ ईकार के स्थान पर भी यण् हो जाता है। एवम् अच् प्रत्याहार के अन्तर्गत 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ' ये नौ वर्ण भी अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'दधि +आनय = दध्यानय' यहां दीर्घ आकार के परे होने पर भी यण् सिद्ध हो जाता है। 'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं' ये इस शास्त्र में उदित् माने जाते हैं। इन के उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा होती है। यद्यपि 'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं' इन समुदायों का कोई सवर्ण नहीं होता तथापि इन समुदायों के आदि वर्ण 'क्, च्, ट्, त्, प्' के सवर्णों का तथा उन के स्वरूप का यहां ग्रहण समझना चाहिये। 'क्' के सवर्ण 'ख्, ग्, घ्, ङ्' ये चार वर्ण हैं अतः 'कुं' कहने से इन चार वर्णों तथा पांचवें अपने रूप 'क्' अर्थात् कुल मिला कर पांच वर्णों का ग्रहण होगा। इसी प्रकार 'चुं' से चवर्ग, 'टुं' से टवर्ग, 'तुं' से तवर्ग तथा 'पुं' से पवर्ग का ग्रहण होगा। उदित् के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध नहीं है, अतः उदित् चाहे विधीयमान हो या अविधीयमान, प्रत्येक अवस्था में अपनी तथा अपने सवर्णों की सञ्ज्ञा होगा। यथा—चोः कुः (३०६) यहां 'चुं' अविधीयमान और 'कुं' विधीयमान है, दोनों अपने तथा अपने सवर्णों के ग्राहक होंगे। 'अण्' के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध इस लिये किया गया है कि सनाशंसभिक्ष उः (८४०) इत्यादि स्थानों में विधीयमान उकार आदि सवर्णों के ग्राहक न हों, इस से दीर्घ ऊकार आदि प्रसक्त न होंगे। अब अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल् ये सञ्ज्ञाएं हैं, इन के सञ्ज्ञी निम्नप्रकार से होते हैं। अ, इ, उ इन सञ्ज्ञाओं के पीछे लिखे अनुसार अठारह २ सञ्ज्ञी होते हैं। ऋ, ऌ वार्त्तिक (१) से इन दोनों की सवर्णसञ्ज्ञा हो जाने के कारण प्रत्येक वर्ण के तीस २ सञ्ज्ञी होते हैं। ('ऋ' के १८ + 'ऌ' के १२ = ३०)। ए, ओ, ऐ, औ ह्रस्व न होने के कारण इन सञ्ज्ञाओं में से प्रत्येक वर्ण के पीछे लिखे अनु- सार बारह २ सञ्ज्ञी होते हैं। य्, व्, ल् ये दो प्रकार के होते हैं, एक अनुनासिक और दूसरे अननुनासिक। अण् प्रत्या- हार में अननुनासिक य्, व्, ल् का पाठ है, अतः अननुनासिक ही अपनी तथा दूसरे
संज्ञा-प्रकरणम् ३१ अनुनासिकों की संज्ञा होते हैं। यहां यह भी समझ लेना चाहिये कि दीर्घ तथा प्लुत वर्ण अण्प्रत्याहारान्तर्गत न होने से सवर्णों के ग्राहक नहीं हुआ करते। ह्रस्व वर्ण ही (एच् दीर्घ ही) अणों में गृहीत होते हैं, अतः वे ही सवर्णों के ग्राहक हैं। रेफ और हकार अणों के अन्तर्गत होते हुए भी किसी अन्य वर्ण के ग्राहक नहीं होते, क्योंकि शिक्षाकारों का कथन है कि-रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति अर्थात् रेफ और ऊष्म वर्णों के सवर्ण नहीं हुआ करते। [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१२) परः संनिकर्षः संहिता ।१।४।१०८॥ वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहिता-सञ्ज्ञः स्यात् ॥ अर्थः-वर्णों की अत्यन्त समीपता संहिता-सञ्ज्ञक होती है। व्याख्या-परः ।१।१। सन्निकर्षः ।१।१। संहिता ।१।१। अर्थः- (परः) अत्यन्त (सन्निकर्षः) सामीप्य (संहिता) 'संहिता' सञ्ज्ञक होता है। दो वर्णों के मध्य आधी मात्रा से कम का व्यवधान सम्भव नहीं हो सकता; यही अत्यन्त समीपता 'संहिता' कहाती है। संहितासंज्ञा का सोदाहरण विवेचन आगे (१५) सूत्र पर देखें। [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१३) हलोऽनन्तराः संयोगः ।१।१।७॥ अजिभिरव्यवहिता हलः संयोग-सञ्ज्ञाः स्युः ॥ अर्थः-अचों के व्यवधान से रहित हलों की 'संयोग' सञ्ज्ञा हो। व्याख्या-हलः ।१।३। अनन्तराः ।१।३। संयोगः ।१।१। समासः--अविद्य- मानम् अन्तरम् = व्यवधानं येषान्तेऽनन्तराः, बहुव्रीहि-समासः। अर्थः- (अनन्तराः) जिन में अन्तर अर्थात् व्यवधान नहीं ऐसे (हलः) हल् (संयोगः) संयोग-सञ्ज्ञक होते हैं। व्यवधान (परदा) सदा विजातियों का ही हुआ करता है; सजातियों का नहीं। हल् के विजातीय अच् हैं। अतः यदि हल्, अचों के व्यवधान से रहित होंगे तो उन की संयोग सञ्ज्ञा होगी। सूत्र में 'हलः' पद में बहुवचन विवक्षित नहीं, किन्तु जाति में बहुवचन किया गया है। इस से दो या दो से अधिक हलों की संयोग-सञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है। उदाहरण यथा--मृट् । यहां 'भृस्ज्' शब्द के आगे 'सुँ' प्रत्यय के अपृक्त सकार का लोप होने पर स् और ज् की संयोग-सञ्ज्ञा हो कर स्कोः संयोगाद्योरन्ते च (३०६) सूत्र से संयोग के आदि सकार का लोप हो जाता है। इसी प्रकार 'इन्द्रः' में नकार दकार और रेफ की, 'उष्ट्रः' में षकार टकार और रेफ की संयोगसञ्ज्ञा समझनी चाहिये। नोट-ध्यान रहे कि प्रत्येक हल् की संयोगसञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु सम्पूर्ण हल्-समुदाय की ही हुआ करती है। फिर चाहे वह हल्-समुदाय दो हलों का हो अथवा दो से अधिक हलों का। [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१४) सुँप्तिङन्तं पदम् ।१।४।१४॥ सुबन्तं तिङन्तञ्च पदसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थः-सुँबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप पद-सञ्ज्ञक होते हैं।
३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां व्याख्या — सुप्तिङन्तम् १।१। पदम् १।१। समास — सुप च तिङ् च सुप्तिङौ, इतरे- तरद्वन्द्वः । सुप्तिङौ अन्तो यस्य तत्—सुप्तिङन्तम् (शब्दस्वरूपम्), बहुव्रीहि समास । अर्थ — (सुप्तिङन्तम्) सुबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप (पदम्) पद-सञ्ज्ञक होते हैं । यहां शब्दानुशासन-शास्त्र के प्रस्तुत होने से सुप्तिङन्तम् पद का 'शब्द-स्वरूपम्' विशेष्य अध्याहार कर लिया जाता है । स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र से विधान किये गये इक्कीस प्रत्यय 'सुप्' तथा तिप्तस्झिसिप्० (३७५) सूत्र से विधान किये गये अठारह प्रत्यय 'तिङ्' कहाते हैं । ये सुप् वा तिङ् प्रत्यय जिसके अन्त में हों उन की पद-सञ्ज्ञा होती है । यहां यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि इन प्रत्ययों से युक्त सम्पूर्ण समुदाय की ही पद सञ्ज्ञा होती है । केवल प्रकृति वा प्रत्यय की नहीं । उदाहरण यथा— ‘रामः पुष्प, देवस्य पुष्पस्य’ इत्यादि सुप् अन्त में होने के कारण ‘पदसञ्ज्ञक’ हैं । पचति, पठति अपचत् अपठत् —इत्यादि तिङ् अन्त में होने के कारण पदसञ्ज्ञक हैं । पदसञ्ज्ञा का प्रयोजन आगे (७७ ८० ६३ १०५ आदि) सूत्रों से स्पष्ट होगा । इस सूत्र में 'अन्त' ग्रहण का प्रयोजन आगे (१५४) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे । [लघु०] इति सञ्ज्ञा-प्रकरणं समाप्तम् ॥ अर्थ —यह सञ्ज्ञा प्रकरण समाप्त होता है । व्याख्या —इस प्रकरण में यद्यपि व्याकरण-गत सम्पूर्ण सञ्ज्ञाओं का समावेश नहीं किया गया तथापि सन्धि-प्रकरण के लिये उपयोगी प्रायः सभी सञ्ज्ञाओं का इस में वर्णन आ गया है । 'प्रायः' कथन का यह तात्पर्य है कि अदेङ् गुण (२५), वृद्धिरादैच् (३२), अचोऽन्त्यादि टि (३६), तस्य परमाम्रेडितम् (६६) प्रभृति सूत्रों से गुण, वृद्धि, टि और आम्रेडित आदि अन्य भी सन्ध्युपयोगी सञ्ज्ञाएं आगे कही गई हैं । अभ्यास (१) (१) 'क्, श्, ए, व्, ऌ, म्, ख्, ह्, अ, र्, औ, ऋ' इन वर्णों के स्थान तथा दोनों प्रकार के यत्न लिख कर यथासम्भव सवर्णों का भी निर्देश करें । (२) 'अण्, टव्, रल्, जश्, यण्, छव्, मय्, झय्, रँ' इन प्रत्याहारों की प्रसून सिद्धि कर तदन्तर्गत वर्णों का संक्षिप्तरीत्या उल्लेख करें । (३) अचों में परस्पर कितने प्रकार का अन्तर सम्भव है, उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें । (४) कौन सूत्र 'ऋ' सञ्ज्ञा करता है ? इस के कितने और कौन से सञ्ज्ञी होते हैं ? (५) अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय सूत्र में 'अप्रत्यय' पद का क्या अभिप्राय है और इस का किस के साथ सम्बन्ध है ? सोदाहरण स्पष्ट करें । (६) सञ्ज्ञा और सञ्ज्ञी स्पष्ट करते हुए अदर्शनं लोप सूत्र के 'अदर्शनम्' पद का विवेचन करें ।
संज्ञा-प्रकरणम् ३३ (७) 'इतः' पद के पीछे से प्राप्त होने पर भी तस्य लोपः सूत्र में 'तस्य' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (८) उदात्त, अनुदात्त और स्वरित में परस्पर भेद बताएं । (६) 'उपदेश' किसे कहते हैं ? यथाधीन स्पष्ट करें । (१०) अष्टाध्यायी किस ने बनाई है ? इस में कितने अध्याय और कितने पाद हैं ? लघु-सिद्धान्त-कौमुदी के साथ अष्टाध्यायी का क्या संबन्ध है ? (११) त्रिमुनि व्याकरणम् और उत्तरोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् का भाव स्पष्ट करें । (१२) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी शब्द का अर्थ लिख कर इस के कर्त्ता के विषय में संक्षिप्त नोट लिखें । (१३) 'उ' और 'ई' में, 'ऋ' और 'ऌ' में, 'ए' और 'ओ' में, 'ओ' और 'औ' में पारस्परिक भेद बताएं । (१४) आभ्यन्तर और बाह्य यत्नों के भेद लिख कर उन का सार्थ विवेचन करें । (१५) यदि सम्पूर्ण स्थान तुल्य होने पर ही सवर्ण-सञ्ज्ञा होती है तो क्या 'क्' और 'ङ्' की सवर्णसञ्ज्ञा नहीं होगी ? (१६) 'ऌ' और 'ऐ' के बारह-बारह भेद सूत्रों द्वारा सिद्ध करें । (१७) 'संयोग' सञ्ज्ञा क्या प्रत्येक वर्ण की है या समुदाय की ? स्पष्ट करें । (१८) अर्ध-विसर्ग-सदृश उपध्मानीयः इस वचन का विवेचन करें । (१६) निम्न-लिखित सूत्रों का सूत्रस्थ पदों द्वारा अर्थ निकाल कर व्याख्यान करें—तुल्यास्य-प्रयत्नं सवर्णम् । अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः । हलोऽ- नन्तराः संयोगः । ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः । समाहारः स्वरितः । (२०) पद, संहिता, अनुनासिक और लोप सञ्ज्ञा करने वाले सूत्र सार्थ लिखें । (२१) इति सञ्ज्ञा-प्रकरणं समाप्तम् इस वचन की विस्तृत समालोचना करें । (२२) विसर्जनीय के स्थान का शास्त्रीत्या विवेचन करें । (२३) सूत्रों के आगे मुद्रित तीन संख्याओं का क्या तात्पर्य होता है ? (२४) किस २ प्रत्याहार के अन्तर्गत निम्नस्थ वर्ण आते हैं ? श्, ष्, स्; य्, व्, र्, ल्; च्, ट्, त्, क्, प्; वर्गतृतीय; वर्गपञ्चम । इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यां सन्ध्युपयोगिसंज्ञानां प्रायोवर्णनं समाप्तम् ॥ ल० प्र० (३)
अथाऽच्सन्धि-प्रकरणम् अब अचों की सन्धि का प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है । इस प्रकरण में अचों अर्थात् स्वरों का प्रायः स्वरों के साथ मेल दिखाया जायेगा । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१५) इको यणचि ।६।१।७४॥ इकः स्थाने यण् स्यादचि संहितायां विषये । 'सुधी + उपास्य' इति स्थिते— अर्थ — संहिता के विषय में अच् के विद्यमान होने पर इक् के स्थान पर यण् हो जाता है । 'सुधी + उपास्य' ऐसा स्थित होने पर (अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है) । व्याख्या — इक् ।६।१। यण् ।१।१। अचि — भावसप्तम्यन्तम्¹ । संहितायाम्— विषयसप्तम्यन्तम् (संहितायाम् यह पीछे से अधिकार चला आ रहा है) । महामुनि पाणिनि ने अपने सूत्रों का अर्थज्ञान कराने के लिए कुछ विशेष नियम बनाये हैं, जो कि अष्टाध्यायी के प्रथमाध्याय के प्रथमपाद के अन्तर्गत हैं, यह हम पीछे कह चुके हैं। उन में षष्ठी स्थानेयोगा (१ १ ४८) यह भी एक नियम है। इस का तात्पर्य यह है कि इस शास्त्र में षष्ठीविभक्ति का अर्थ 'स्थान पर' ऐसा करना चाहिये । यथा— 'इक' ।६।१। इस का अर्थ हुआ इक् के स्थान पर' । 'एच' ।६।१। इस का अर्थ हुआ 'एच् के स्थान पर' । परन्तु यह नियम वहां लागू नहीं होगा, जहां सम्बन्ध पहले से नियत किया गया होगा । यथा — ऊद् उपधाया गोहः ( ६ ४ ८६) । ऊठ् ।१।१। उप- धाया ।६।१। गोहः ।६।१। यहां गोह् का सम्बन्ध उपधा से नियत किया गया है, अतः यहाँ स्थानषष्ठी का प्रसङ्ग न होगा । इस विषय का विस्तार काशिका (अष्टाध्यायी की सुप्रसिद्ध व्याख्या) आदि में देखना चाहिये । यहां 'इक' इस में स्थानषष्ठी है इस से 'इक् के स्थान पर' ऐसा इस का अर्थ होगा । 'अचि' यहां भावसप्तमी या सति- सप्तमी है² । अर्थ — (इकः) इक् के स्थान पर (यण्) यण् होता है (अचि) अच् होने पर (संहितायाम्) संहिता के विषय में । अच् विद्यमान हो तो संहिता के विषय में अर्थात् संहिता करने की इच्छा होने पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) करना चाहिये । यहां यण् विधान किया गया है, अतः यह अण् प्रत्याहार के अन्तर्गत होता हुआ भी अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय (११) से अपने सवर्णियों (अनुनासिक यँ, वँ, लँ वर्णों) का ग्राहक नहीं होगा । इक् और अच् दोनों अविधीयमान अण् हैं, अतः ये अपने सवर्णियों के ग्राहक होंगे । १ नवीनास्त्वत्र औपश्लेषिकाधारे सप्तमीत्याहुः । तन्मतं शेखरादौ द्रष्टव्यम् । २ यह सप्तमी यस्य च भावेन भावलक्षणम् ( २ ३ ३७) सूत्र से विधान की जाती है । इस सप्तमी का 'विद्यमान होने पर' या 'होने पर' ऐसा अर्थ होता है । इस का विवेचन इस व्याख्या के तृतीयभागस्थ कारक प्रकरण (पृ० ३४६) पर देखें।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३५
'सुधोभिरुपास्यः' इस तृतीयातत्पुरुषममास में सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) से भिस् और सुं का लुक् होने पर 'सुधी+-उपास्य' यह रूप हुआ । अब यहां समास के कारण संहिता का विषय स्पष्ट है जैसा कि कहा गया है— संहितैकपदे नित्या, नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे, वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥ एकपद अर्थात् अखण्डपद में; धातु और उपसर्ग में तथा समास में संहिता नित्य करनी चाहिये; वाक्य में संहिता करना 'वक्ता' (यह उपलक्षणार्थ है, 'लेखक' भी समझ लेना चाहिये) की इच्छा पर निर्भर है, चाहे करे या न करे । इन के उदा- हरण यथा--चयः, जयः । यहां 'चे+अ' 'जे+अ' इस अवस्था में अयादेश एकपद होने के कारण नित्य होता है । 'प्र+एति' यहां धातु और उपसर्ग में नित्य संहिता होने से वृद्धि हो कर नित्य 'प्रैति' रूप ही बनेगा । 'गजेन्द्रः' यहां 'गजानामिन्द्रः' इस प्रकार का समास होने से नित्य गुणादेश होगा । 'नाहं वेद्मि' यहां वाक्य होने से 'न अहं वेद्मि' या 'नाहं वेद्मि' दोनों प्रयोग शुद्ध हैं; वक्ता चाहे जिस का प्रयोग करे । 'सुधी+उपास्य' यहां समास है; अतः संहिता नित्य होगी । इस प्रकार संहिता का विषय होने पर इको यणचि (१५) सूत्र प्रवृत्त हुआ । यहां सकार-में उकार, धकार में ईकार तथा 'उपास्य' शब्द का आदि उकार इक् हैं । यदि सकारस्थ उकार = इक् को यण् करें तो धकारस्थ ईकार = 'अच्' विद्यमान है । यदि धकारस्थ ईकार = इक् को यण् करें तो सकारस्थ उकार या 'उपास्य' शब्द का आदि उकार = 'अच्' विद्यमान है तथा यदि 'उपास्य' शब्द के आदि उकार = इक् को यण् करें तो पकारस्थ आकार या विपरीत दिशा में धकारस्थ ईकार = अच् विद्यमान रहता है । तो अब यह शङ्का उत्पन्न होती है कि किस अच् के विद्यमान रहते किस इक् के स्थान पर यण् किया जाये ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिमसूत्र लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम् — (१६) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ।१।१।६५॥ सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यं वर्णान्तरेणाऽव्यवहितस्य पूर्वस्य बोध्यम् ॥ अर्थः - सप्तम्यन्त के निर्देश से क्रियमाण कार्य अन्य वर्णों के व्यवधान से रहित पूर्व के स्थान पर जानना चाहिये । व्याख्या - तस्मिन् = सप्तम्यन्तानुकरणं लुप्तसप्तम्येकवचनान्तम्¹ । [इको यणचि (१५) आदियों में स्थित 'अचि' आदि सप्तम्यन्त पदों का अनुकरण यहां 'तस्मिन्' शब्द से किया गया है। इसके आगे सप्तमी विभक्ति का सुपां सुलुक्० (७.१.३६) सूत्र से लुक् हुआ २ है। इस का अर्थ - इको यणचि (१५) आदियों में स्थित 'अचि' १. 'तस्मिन्' इत्यत्र नागेशस्तु 'अची'त्यादि-सप्तम्यन्तार्थकत्तच्छब्दात् सप्तमीति मन्यते ।
३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् आदि सप्तम्यन्त पदों के होने पर—ऐसा होता है] । इति ऽप्यव्ययपदम् । निर्दिष्टे ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। इति शब्द पद के अर्थ को उल्टा कर दिया करता है, अर्थात् इस के जोड़ने से शब्दपरक पद अर्थपरक और अर्थपरक पद शब्दपरक हो जाते हैं । यथा—‘वृक्ष’ इस पद का अर्थ लोक में विद्यमान पदार्थ विशेष है, अतः यह अर्थपरक है । अब यदि इस के आगे ‘इति’ शब्द जोड़ दें ‘वृक्ष इति’, तो इस का अर्थ ‘वृक्ष’ यह लिखा हुआ शब्द हो जायेगा । शब्दपरक पद से अर्थपरक पद हो जाना नवेति विभाषा (१ १ ४३) सूत्र में सिद्धान्तकौमुदी में देखें । तो अब यहां ‘तस्मिन्’ इस लुप्तसप्तम्यन्त पद का अर्थ—इको यणचि (१५) आदियों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के होने पर —ऐसा था । ‘इति’ के जोड़ने से यह शब्द-परक से अर्थ परक हो गया, अर्थात् इस का अर्थ “इको यणचि आदियों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के अर्थों के होने पर” ऐसा हो गया । ‘निर्दिष्टे’ पद ‘तस्मिन्’ पद का विशेषण है । निर्’ का अर्थ निरन्तर और ‘दिश्’ धातु का अर्थ ‘उच्चारण करना’ है । तो इस प्रकार ‘निर्दिष्टे’ पद का अर्थ ‘निरन्तर उच्चरित होने पर’ ऐसा हो जाता है । ‘तस्मिन्’ और ‘निर्दिष्टे’ इन दोनों पदों में भाव-सप्तमी है । भाव-सप्तमी का अर्थ ‘होने पर’ ऐसा हुआ करता है । इसे ‘सति सप्तमी’ भी कहते हैं । यह यस्य च भावेन भावलक्षणम् (२ ३ ३७) सूत्र से विधान की जाती है, यथा—‘गच्छत्सु बाल- केषु त्वं स्थित’ यहां भाव-सप्तमी है । इस प्रकार इस सूत्र का यह अर्थ हुआ— (तस्मिन्निति) इको यणचि आदि सूत्रों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के अर्थों के (निर्दिष्टे) निरन्तर उच्चरित होने पर (पूर्वस्य) पूर्व के स्थान पर [कार्य होता है] । यदि सप्तम्यन्त पद के अर्थ से व्यवधान-रहित पूर्व को कार्य करेंगे तो तभी वह सप्तम्यन्त पद का अर्थ निरन्तर उच्चरित हो सकेगा । अतः निरन्तर कथन से यह प्राप्त हुआ कि ‘सप्तम्यन्त पदार्थ के उच्चरित होने पर उस में व्यवधान-रहित पूर्व के स्थान पर कार्य हो’ । यथा—इको यणचि (१५) सूत्र में ‘अचि’ यह सप्तम्यन्त पद है । इस सप्त- म्यन्त पद का अर्थ यहां ‘सुधी + उपास्य’ में सकारोत्तर उकार, धकारोत्तर ईकार, ‘उपास्य’ शब्द का आदि उकार तथा पकारोत्तर आकार है । अब हमें इन में से ऐसा सप्तम्यन्त पदार्थ चुनना है, जिस से अव्यवहित पूर्व इक् हो; हम उसी इक् के स्थान पर ही यण् करेंगे । तो ऐसा सप्तम्यन्त पदार्थ यहां ‘उपास्य’ शब्द के आदि वाले उकार के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं हो सकता, क्योंकि अन्यों से पूर्व अव्यवहित इक् नहीं है । तथाहि—पकारोत्तर आकार को यदि सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो उस से अव्यवहित पूर्व ‘उपास्य’ शब्द का उकार नहीं होता; पकार का व्यवधान
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३७ पड़ता है। यदि धकारस्थ ईकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो उस से अव्यवहित पूर्व सकारस्थ उकार नहीं होता; धकार का व्यवधान पड़ता है। यदि सकारोत्तर उकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो इस से पूर्व कोई इक् नहीं रहता। अतः 'उपास्य' शब्द का आदि उकार ही सप्तम्यन्त पद का अर्थ=अच् होने योग्य है और इस से अव्यवहित पूर्व धकारोत्तर ईकार के स्थान पर ही यण् होना चाहिये।१ यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषा-सूत्रों का उपयोग रूप-सिद्धि में नहीं हुआ करता, किन्तु इन का उपयोग सूत्रों के अर्थ करने में ही होता है; अर्थात् इन की सहायता से हम सूत्रों का अर्थ किया करते हैं। यहां भी इस सूत्र को रखने का तात्पर्य इको यणचि (१५) सूत्र का अर्थ करना ही है। इस सूत्र की सहायता से इको यणचि (१५) का यह अर्थ होगा—अच् होने पर, उस से अव्यवहित पूर्व इक् के स्थान पर यण् होता है संहिता के विषय में। शास्त्र में पर-सप्तमी नाम की किसी सप्तमी का विधान नहीं किया गया। यही सूत्र जब सप्तम्यन्त पद के अर्थ से अव्यवहित पूर्व को कार्य करने के लिये कहता है तो एक प्रकार से भावसप्तमी ही पर-सप्तमी हो जाया करती है। अतः कई लोग इको यणचि (१५) सूत्र का अर्थ 'इक् के स्थान पर यण् हो अच् परे होने पर संहिता के विषय में' ऐसा भी किया करते हैं। यह अर्थ भी शुद्ध है। आगे चलकर ग्रन्थकार भी इस परिभाषा को सूत्रार्थ के साथ मिलाते हुए 'परे होने पर' ऐसा ही अर्थ करेंगे। तो अब धकारस्थ ईकार के स्थान पर यण् अर्थात् य्, व्, र्, ल् प्राप्त होते हैं। यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इन चारों में से कौन सा यण् ईकार के स्थान पर किया जाये ? इस शङ्का को दूर करने के लिये ग्रन्थकार एक पाणिनीय परिभाषा को उद्धृत करते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(१७) स्थानेऽन्तरतमः। १।१।४६॥ प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात्। सुध्य्+उपास्य इति जाते॥ अर्थः—प्रसङ्ग अर्थात् प्रसक्ति (प्राप्ति) होने पर अत्यन्त सदृश आदेश होता है। 'सुध्य्+उपास्य' इस प्रकार हो जाने पर (अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है)। व्याख्या—स्थाने ।७।१। अन्तरतमः ।१।१। यहां अन्तर शब्द का अर्थ सदृश है। अतिशयितोऽन्तरः=अन्तरतमः। अर्थः--(स्थाने) प्राप्ति होने पर (अन्तरतमः) अत्यन्त सदृश आदेश२ होता है। १. ध्यान रहे कि कार्य केवल अव्यवहित को ही नहीं होता किन्तु जो अव्यवहित होते हुए पूर्व भी हो उसे कार्य होता है। इसीलिये यहां विपरीतता में भी कार्य न होगा अर्थात् 'उपास्य' वाले उकार की विपरीत दिशा में धकारोत्तर ईकार सप्तम्यन्त-पदार्थ अच् मानें तो उकार को यण् न होगा; यद्यपि इस में कोई व्यवधान नहीं, तथापि उकार पूर्व में नहीं। २. जो किसी के स्थान में उस को हटा कर स्वयं स्थित हो जाता है उसे आदेश
एक के स्थान पर बहुता की यदि प्राप्ति हो तो उन मे ग जो स्थानीय के अत्यन्त सदृश होगा वही स्थानीय के स्थान पर आदेश होगा । वर्णों की सदृशता न तो आकृति से और न ही तराजू मे तोल कर जानी जा सकती है । इन की सदृशता अर्थ, स्थान, प्रयत्न अथवा मात्रा की दृष्टि से ही देखी जा सकती है । आगे इन के उदाहरण यत्र तत्र बहुत आयेंगे, हम इन का स्पष्टीकरण भी वही करेंगे । यहां ईकार के साथ यणों की सदृशता अर्थ प्रयत्न और मात्रा की दृष्टि से तो हो नहीं सकती, अब शेष रहे स्थान की दृष्टि से ही समता देखेंगे । ईकार का स्थान इचुयशानां तालु के अनुसार तालु है । यणां में तालुस्थान यकार का है, अतः ईकार के स्थान पर यकार होकर सुध्य् + उपास्य ऐसा हो जायगा। इस सूत्र में अन्तर शब्द के साथ तमप् जोड़ा गया है इस कारण 'सदृशों में भी जो अत्यन्त सदृश हो वही आदेश हो' ऐसा अर्थ हो जाता है । इस का फल वाग्घरि प्रयोग पर हल्सन्धि में स्पष्ट करेंगे । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१८) अनचि च ॥८।४।४६॥ अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्वम् ॥ अर्थ —अच् से परे यर् को विकल्प करके द्वित्व हो जाता है परन्तु अच् पर होने पर नहीं होता । इस सूत्र से धकार का द्वित्व हो जाता है । व्याख्या—अचः ।५।१। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । यरः ।६।१। (यरोऽनुनासिके- ऽनुनासिको वा से)। द्वे ।१।२। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । वा इत्यव्ययपदम् (यरोऽनुना- सिकेऽनुनासिको वा से) । अनचि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । समास —न अच् = अनच्, तस्मिन् = अनचि, नञ्समास । नञ्' प्रतिषेधार्थक अव्यय है । प्रतिषेध दो प्रकार का होता है । एक पर्युदास-प्रतिषेध और दूसरा प्रसज्य-प्रतिषेध । तथाहि — द्वौ नञौ तु समाख्यातौ, पर्युदास-प्रसज्यकौ । पर्युदासः सदृग्ग्राही, प्रसज्यस्तु निषेध-कृत् ॥१॥ प्राधान्यं तु विधेर्यत्र, प्रतिषेधेऽप्रधानता । पर्युदासः स विज्ञेयो, यत्रोत्तरपदेन नञ् ॥२॥ अप्राधान्यं विधेर्यत्र, प्रतिषेधे प्रधानता । प्रसज्यस्तु स विज्ञेयः, क्रियया सह यत्र नञ् ॥३॥ इन तीनों श्लोकों का तात्पर्य निम्नरीत्या जानना चाहिए— कहते हैं । शत्रुवदादेश आदेश शत्रु के समान होता है—शत्रु जैसा व्यवहार करता है । वह स्थानी को हटा कर वहां स्वयं बैठ जाता है । यथा 'सुधी + उपास्य' में ईकार के स्थान पर होने वाला य्' आदेश है । जिस के स्थान पर आदेश होता है उसे स्थानी कहते हैं । यथा 'सुधी+उपास्य' में ईकार स्थानी है।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३६ पर्युदास-प्रतिषेध (१) इस मे विधि की प्रधानता तथा निषेध की अप्रधानता होती है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां लाने की प्रधानता है निषेध की नहीं; क्योंकि लाने का निषेध नहीं किया गया। (२) इस में 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध किया करता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां उत्तरपद 'ब्राह्मण' का निषेध किया गया है। (३) इस में जिसका निषेध किया जाता है पुनः विधि में उसके सदृश का ही ग्रहण किया जाता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां ब्राह्मण का निषेध किया गया है, अब जो लाया जायेगा वह भी ब्राह्मण के सदृश अर्थात् मनुष्य ही होगा; पत्थर आदि नहीं। प्रसज्य-प्रतिषेध (१) इस में विधि की अप्रधानता तथा निषेध की प्रधानता होती है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां 'बोलना चाहिये' इस विधि की अप्रधानता और 'न बोलना चाहिए' इस निषेध की प्रधानता है। (२) इसमें 'नञ्' क्रिया का निषेध किया करता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम् यहां 'नञ्' ने 'बोलना चाहिए' इस क्रिया का निषेध कर दिया है। (३) यहां केवल निषेध ही होता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां केवल निषेध ही है। हम विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए इन दोनों प्रकार के निषेधों के कुछ उदा- हरण दे रहे हैं; इनका अत्यन्त सावधानता से अभ्यास करना चाहिये— प्रसज्य के उदाहरण— (१) न व्यापार-शतेनापि शुकवत् पाठ्यते बकः। यहां 'न पाठ्यते'¹ इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है।
१. यद्यपि यहां पर पद्य में क्रिया के साथ 'नञ्' साक्षात् नहीं; तथापि यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः। अर्थतो ह्यसमर्थानाम् आनन्तर्यमकारणम्॥ (न्यायद० वा० भा० १.२.६) इस न्यायदर्शनोद्धृत पद्यानुसार क्रिया सह यत्र नञ् वाली बात समन्वित हो जाती है।
(२) न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः । यहां 'न प्रविशन्ति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (३) शत्रुना न हि सन्दध्यात् । यहां 'न सन्दध्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (४) न कुर्यान्निष्फलं कर्म । यहां 'न कुर्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (५) एव पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति । यहां 'न सिद्ध्यति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । पर्युदास के उदाहरण — (१) पुत्रः शत्रुरपण्डितः । 'अपण्डितः' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (२) जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः । 'अनाथ' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (३) दूरादस्पर्शनं वरम् । 'अस्पर्शनम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (४) नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति । 'अप्राप्यम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (५) समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः । 'अपेया' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४१ यहां यह ध्यान रखना चाहिये कि प्रायः समास में पर्युदास और असमास में प्रसज्य-प्रतिषेध हुआ करता है। 'प्रायः' इसलिये कहा गया है कि कहीं २ इस नियम का उल्लङ्घन भी हो जाया करता है। यथा - अनचि च (१८), सुँडनपुंसकस्य (१६३) इत्यादि में समास होने पर भी प्रसज्य-प्रतिषेध है। 'अनचि' यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है; अतः 'अच् परे होने पर द्वित्व न हो' इस निषेध की ही प्रधानता होगी, विधि की नहीं। अर्थात् अच् परे न हो, अच् से भिन्न चाहे अन्य वर्ण परे हो या न हो द्वित्व हो जायेगा। इस का फल यह होगा कि अवसान में भी द्वित्व हो जायेगा। यथा - वाक्क्, वाक् । यदि 'अनचि' में पर्युदास- प्रतिषेध होता तो सदृश का ग्रहण होने से अच् के सदृश = हल् के परे होने पर ही द्वित्व होता; 'वाक्' इत्यादि स्थानों पर अवसान मे द्वित्व न हो सकता। अतः पर्युदास की अपेक्षा प्रसज्य-प्रतिषेध मानना ही उपयुक्त है। किञ्च - यदि यहां मुनिवर पाणिनि को पर्युदास-प्रतिषेध अभीष्ट होता; तो वे 'अनचि' न कह कर सीधा उस के स्थान पर 'हलि' ही कह देते; इस से एक वर्ण का लाघव भी हो जाता, परन्तु उन के ऐसा न कहने मे यह प्रतीत होता है कि यहां पर्युदास-प्रतिषेध नहीं किन्तु प्रसज्य-प्रतिषेध है। अर्थः- (अचः) अच् से परे (यरः) यर् प्रत्याहार के स्थान पर (वा) विकल्प करके (द्वे) दो शब्द स्वरूप हो जाते हैं। (अनचि) परन्तु अच् परे होने पर नहीं होते। कार्य का होना और पक्ष में न होना विकल्प कहाता है। एक को दो करने का नाम द्वित्व है। द्वित्व हो भी और न भी हो, इसे द्वित्व का विकल्प कहते हैं¹। 'सुध्य्+उपास्य' यहां सकारोत्तर उकार = अच् से परे यर् = धकार को इस सूत्र से विकल्प करके द्वित्व करने से दो रूप बन जाते हैं- (१) सु ध् ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व होता है]। (२) सु ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व नहीं होता है]। अब द्वित्व वाले पक्ष में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१६) झलां जश्झशि ।८।४।५२॥ स्पष्टम्। इति पूर्व-धकारस्य दकारः ॥ अर्थः-झश् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर जश् हो जाता है। इस सूत्र से पूर्व धकार के स्थान पर दकार हो जाता है। व्याख्या-झलाम् ।६।३। जश् ।१।१। झशि ।७।१। अर्थः- (झशि) झश् प्रत्याहार परे होने पर (झलाम्) झलों के स्थान पर (जश्) जश् हो जाता है। 'झलाम्' पद में षष्ठी स्थाने-योगा (१.१.४८) के अनुसार स्थानषष्ठी है। 'झशि' पद सप्तम्यन्त है; अतः तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) सूत्र के अनुसार झश् से १. ध्यान रहे कि विकल्प के दोनों रूप शुद्ध हुआ करते हैं। इन में से चाहे जिस का प्रयोग करें हमारी इच्छा पर निर्भर है।