भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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(२) न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः । यहां 'न प्रविशन्ति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (३) शत्रुना न हि सन्दध्यात् । यहां 'न सन्दध्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (४) न कुर्यान्निष्फलं कर्म । यहां 'न कुर्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (५) एव पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति । यहां 'न सिद्ध्यति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । पर्युदास के उदाहरण — (१) पुत्रः शत्रुरपण्डितः । 'अपण्डितः' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (२) जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः । 'अनाथ' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (३) दूरादस्पर्शनं वरम् । 'अस्पर्शनम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (४) नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति । 'अप्राप्यम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (५) समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः । 'अपेया' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है ।