भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३६ पर्युदास-प्रतिषेध (१) इस मे विधि की प्रधानता तथा निषेध की अप्रधानता होती है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां लाने की प्रधानता है निषेध की नहीं; क्योंकि लाने का निषेध नहीं किया गया। (२) इस में 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध किया करता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां उत्तरपद 'ब्राह्मण' का निषेध किया गया है। (३) इस में जिसका निषेध किया जाता है पुनः विधि में उसके सदृश का ही ग्रहण किया जाता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां ब्राह्मण का निषेध किया गया है, अब जो लाया जायेगा वह भी ब्राह्मण के सदृश अर्थात् मनुष्य ही होगा; पत्थर आदि नहीं। प्रसज्य-प्रतिषेध (१) इस में विधि की अप्रधानता तथा निषेध की प्रधानता होती है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां 'बोलना चाहिये' इस विधि की अप्रधानता और 'न बोलना चाहिए' इस निषेध की प्रधानता है। (२) इसमें 'नञ्' क्रिया का निषेध किया करता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम् यहां 'नञ्' ने 'बोलना चाहिए' इस क्रिया का निषेध कर दिया है। (३) यहां केवल निषेध ही होता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां केवल निषेध ही है। हम विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए इन दोनों प्रकार के निषेधों के कुछ उदा- हरण दे रहे हैं; इनका अत्यन्त सावधानता से अभ्यास करना चाहिये— प्रसज्य के उदाहरण— (१) न व्यापार-शतेनापि शुकवत् पाठ्यते बकः। यहां 'न पाठ्यते'¹ इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है।

१. यद्यपि यहां पर पद्य में क्रिया के साथ 'नञ्' साक्षात् नहीं; तथापि यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः। अर्थतो ह्यसमर्थानाम् आनन्तर्यमकारणम्॥ (न्यायद० वा० भा० १.२.६) इस न्यायदर्शनोद्धृत पद्यानुसार क्रिया सह यत्र नञ् वाली बात समन्वित हो जाती है।