लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक के स्थान पर बहुता की यदि प्राप्ति हो तो उन मे ग जो स्थानीय के अत्यन्त सदृश होगा वही स्थानीय के स्थान पर आदेश होगा । वर्णों की सदृशता न तो आकृति से और न ही तराजू मे तोल कर जानी जा सकती है । इन की सदृशता अर्थ, स्थान, प्रयत्न अथवा मात्रा की दृष्टि से ही देखी जा सकती है । आगे इन के उदाहरण यत्र तत्र बहुत आयेंगे, हम इन का स्पष्टीकरण भी वही करेंगे । यहां ईकार के साथ यणों की सदृशता अर्थ प्रयत्न और मात्रा की दृष्टि से तो हो नहीं सकती, अब शेष रहे स्थान की दृष्टि से ही समता देखेंगे । ईकार का स्थान इचुयशानां तालु के अनुसार तालु है । यणां में तालुस्थान यकार का है, अतः ईकार के स्थान पर यकार होकर सुध्य् + उपास्य ऐसा हो जायगा। इस सूत्र में अन्तर शब्द के साथ तमप् जोड़ा गया है इस कारण 'सदृशों में भी जो अत्यन्त सदृश हो वही आदेश हो' ऐसा अर्थ हो जाता है । इस का फल वाग्घरि प्रयोग पर हल्सन्धि में स्पष्ट करेंगे । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१८) अनचि च ॥८।४।४६॥ अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्वम् ॥ अर्थ —अच् से परे यर् को विकल्प करके द्वित्व हो जाता है परन्तु अच् पर होने पर नहीं होता । इस सूत्र से धकार का द्वित्व हो जाता है । व्याख्या—अचः ।५।१। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । यरः ।६।१। (यरोऽनुनासिके- ऽनुनासिको वा से)। द्वे ।१।२। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । वा इत्यव्ययपदम् (यरोऽनुना- सिकेऽनुनासिको वा से) । अनचि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । समास —न अच् = अनच्, तस्मिन् = अनचि, नञ्समास । नञ्' प्रतिषेधार्थक अव्यय है । प्रतिषेध दो प्रकार का होता है । एक पर्युदास-प्रतिषेध और दूसरा प्रसज्य-प्रतिषेध । तथाहि — द्वौ नञौ तु समाख्यातौ, पर्युदास-प्रसज्यकौ । पर्युदासः सदृग्ग्राही, प्रसज्यस्तु निषेध-कृत् ॥१॥ प्राधान्यं तु विधेर्यत्र, प्रतिषेधेऽप्रधानता । पर्युदासः स विज्ञेयो, यत्रोत्तरपदेन नञ् ॥२॥ अप्राधान्यं विधेर्यत्र, प्रतिषेधे प्रधानता । प्रसज्यस्तु स विज्ञेयः, क्रियया सह यत्र नञ् ॥३॥ इन तीनों श्लोकों का तात्पर्य निम्नरीत्या जानना चाहिए— कहते हैं । शत्रुवदादेश आदेश शत्रु के समान होता है—शत्रु जैसा व्यवहार करता है । वह स्थानी को हटा कर वहां स्वयं बैठ जाता है । यथा 'सुधी + उपास्य' में ईकार के स्थान पर होने वाला य्' आदेश है । जिस के स्थान पर आदेश होता है उसे स्थानी कहते हैं । यथा 'सुधी+उपास्य' में ईकार स्थानी है।