लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ३७ पड़ता है। यदि धकारस्थ ईकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो उस से अव्यवहित पूर्व सकारस्थ उकार नहीं होता; धकार का व्यवधान पड़ता है। यदि सकारोत्तर उकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो इस से पूर्व कोई इक् नहीं रहता। अतः 'उपास्य' शब्द का आदि उकार ही सप्तम्यन्त पद का अर्थ=अच् होने योग्य है और इस से अव्यवहित पूर्व धकारोत्तर ईकार के स्थान पर ही यण् होना चाहिये।१ यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषा-सूत्रों का उपयोग रूप-सिद्धि में नहीं हुआ करता, किन्तु इन का उपयोग सूत्रों के अर्थ करने में ही होता है; अर्थात् इन की सहायता से हम सूत्रों का अर्थ किया करते हैं। यहां भी इस सूत्र को रखने का तात्पर्य इको यणचि (१५) सूत्र का अर्थ करना ही है। इस सूत्र की सहायता से इको यणचि (१५) का यह अर्थ होगा—अच् होने पर, उस से अव्यवहित पूर्व इक् के स्थान पर यण् होता है संहिता के विषय में। शास्त्र में पर-सप्तमी नाम की किसी सप्तमी का विधान नहीं किया गया। यही सूत्र जब सप्तम्यन्त पद के अर्थ से अव्यवहित पूर्व को कार्य करने के लिये कहता है तो एक प्रकार से भावसप्तमी ही पर-सप्तमी हो जाया करती है। अतः कई लोग इको यणचि (१५) सूत्र का अर्थ 'इक् के स्थान पर यण् हो अच् परे होने पर संहिता के विषय में' ऐसा भी किया करते हैं। यह अर्थ भी शुद्ध है। आगे चलकर ग्रन्थकार भी इस परिभाषा को सूत्रार्थ के साथ मिलाते हुए 'परे होने पर' ऐसा ही अर्थ करेंगे। तो अब धकारस्थ ईकार के स्थान पर यण् अर्थात् य्, व्, र्, ल् प्राप्त होते हैं। यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इन चारों में से कौन सा यण् ईकार के स्थान पर किया जाये ? इस शङ्का को दूर करने के लिये ग्रन्थकार एक पाणिनीय परिभाषा को उद्धृत करते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(१७) स्थानेऽन्तरतमः। १।१।४६॥ प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात्। सुध्य्+उपास्य इति जाते॥ अर्थः—प्रसङ्ग अर्थात् प्रसक्ति (प्राप्ति) होने पर अत्यन्त सदृश आदेश होता है। 'सुध्य्+उपास्य' इस प्रकार हो जाने पर (अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है)। व्याख्या—स्थाने ।७।१। अन्तरतमः ।१।१। यहां अन्तर शब्द का अर्थ सदृश है। अतिशयितोऽन्तरः=अन्तरतमः। अर्थः--(स्थाने) प्राप्ति होने पर (अन्तरतमः) अत्यन्त सदृश आदेश२ होता है। १. ध्यान रहे कि कार्य केवल अव्यवहित को ही नहीं होता किन्तु जो अव्यवहित होते हुए पूर्व भी हो उसे कार्य होता है। इसीलिये यहां विपरीतता में भी कार्य न होगा अर्थात् 'उपास्य' वाले उकार की विपरीत दिशा में धकारोत्तर ईकार सप्तम्यन्त-पदार्थ अच् मानें तो उकार को यण् न होगा; यद्यपि इस में कोई व्यवधान नहीं, तथापि उकार पूर्व में नहीं। २. जो किसी के स्थान में उस को हटा कर स्वयं स्थित हो जाता है उसे आदेश