लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३७ पड़ता है। यदि धकारस्थ ईकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो उस से अव्यवहित पूर्व सकारस्थ उकार नहीं होता; धकार का व्यवधान पड़ता है। यदि सकारोत्तर उकार को सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो इस से पूर्व कोई इक् नहीं रहता। अतः 'उपास्य' शब्द का आदि उकार ही सप्तम्यन्त पद का अर्थ=अच् होने योग्य है और इस से अव्यवहित पूर्व धकारोत्तर ईकार के स्थान पर ही यण् होना चाहिये।१ यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषा-सूत्रों का उपयोग रूप-सिद्धि में नहीं हुआ करता, किन्तु इन का उपयोग सूत्रों के अर्थ करने में ही होता है; अर्थात् इन की सहायता से हम सूत्रों का अर्थ किया करते हैं। यहां भी इस सूत्र को रखने का तात्पर्य इको यणचि (१५) सूत्र का अर्थ करना ही है। इस सूत्र की सहायता से इको यणचि (१५) का यह अर्थ होगा—अच् होने पर, उस से अव्यवहित पूर्व इक् के स्थान पर यण् होता है संहिता के विषय में। शास्त्र में पर-सप्तमी नाम की किसी सप्तमी का विधान नहीं किया गया। यही सूत्र जब सप्तम्यन्त पद के अर्थ से अव्यवहित पूर्व को कार्य करने के लिये कहता है तो एक प्रकार से भावसप्तमी ही पर-सप्तमी हो जाया करती है। अतः कई लोग इको यणचि (१५) सूत्र का अर्थ 'इक् के स्थान पर यण् हो अच् परे होने पर संहिता के विषय में' ऐसा भी किया करते हैं। यह अर्थ भी शुद्ध है। आगे चलकर ग्रन्थकार भी इस परिभाषा को सूत्रार्थ के साथ मिलाते हुए 'परे होने पर' ऐसा ही अर्थ करेंगे। तो अब धकारस्थ ईकार के स्थान पर यण् अर्थात् य्, व्, र्, ल् प्राप्त होते हैं। यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इन चारों में से कौन सा यण् ईकार के स्थान पर किया जाये ? इस शङ्का को दूर करने के लिये ग्रन्थकार एक पाणिनीय परिभाषा को उद्धृत करते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(१७) स्थानेऽन्तरतमः। १।१।४६॥ प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्यात्। सुध्य्+उपास्य इति जाते॥ अर्थः—प्रसङ्ग अर्थात् प्रसक्ति (प्राप्ति) होने पर अत्यन्त सदृश आदेश होता है। 'सुध्य्+उपास्य' इस प्रकार हो जाने पर (अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है)। व्याख्या—स्थाने ।७।१। अन्तरतमः ।१।१। यहां अन्तर शब्द का अर्थ सदृश है। अतिशयितोऽन्तरः=अन्तरतमः। अर्थः--(स्थाने) प्राप्ति होने पर (अन्तरतमः) अत्यन्त सदृश आदेश२ होता है। १. ध्यान रहे कि कार्य केवल अव्यवहित को ही नहीं होता किन्तु जो अव्यवहित होते हुए पूर्व भी हो उसे कार्य होता है। इसीलिये यहां विपरीतता में भी कार्य न होगा अर्थात् 'उपास्य' वाले उकार की विपरीत दिशा में धकारोत्तर ईकार सप्तम्यन्त-पदार्थ अच् मानें तो उकार को यण् न होगा; यद्यपि इस में कोई व्यवधान नहीं, तथापि उकार पूर्व में नहीं। २. जो किसी के स्थान में उस को हटा कर स्वयं स्थित हो जाता है उसे आदेश
एक के स्थान पर बहुता की यदि प्राप्ति हो तो उन मे ग जो स्थानीय के अत्यन्त सदृश होगा वही स्थानीय के स्थान पर आदेश होगा । वर्णों की सदृशता न तो आकृति से और न ही तराजू मे तोल कर जानी जा सकती है । इन की सदृशता अर्थ, स्थान, प्रयत्न अथवा मात्रा की दृष्टि से ही देखी जा सकती है । आगे इन के उदाहरण यत्र तत्र बहुत आयेंगे, हम इन का स्पष्टीकरण भी वही करेंगे । यहां ईकार के साथ यणों की सदृशता अर्थ प्रयत्न और मात्रा की दृष्टि से तो हो नहीं सकती, अब शेष रहे स्थान की दृष्टि से ही समता देखेंगे । ईकार का स्थान इचुयशानां तालु के अनुसार तालु है । यणां में तालुस्थान यकार का है, अतः ईकार के स्थान पर यकार होकर सुध्य् + उपास्य ऐसा हो जायगा। इस सूत्र में अन्तर शब्द के साथ तमप् जोड़ा गया है इस कारण 'सदृशों में भी जो अत्यन्त सदृश हो वही आदेश हो' ऐसा अर्थ हो जाता है । इस का फल वाग्घरि प्रयोग पर हल्सन्धि में स्पष्ट करेंगे । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१८) अनचि च ॥८।४।४६॥ अचः परस्य यरो द्वे वा स्तो न त्वचि। इति धकारस्य द्वित्वम् ॥ अर्थ —अच् से परे यर् को विकल्प करके द्वित्व हो जाता है परन्तु अच् पर होने पर नहीं होता । इस सूत्र से धकार का द्वित्व हो जाता है । व्याख्या—अचः ।५।१। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । यरः ।६।१। (यरोऽनुनासिके- ऽनुनासिको वा से)। द्वे ।१।२। (अचो रहाभ्यां द्वे से) । वा इत्यव्ययपदम् (यरोऽनुना- सिकेऽनुनासिको वा से) । अनचि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । समास —न अच् = अनच्, तस्मिन् = अनचि, नञ्समास । नञ्' प्रतिषेधार्थक अव्यय है । प्रतिषेध दो प्रकार का होता है । एक पर्युदास-प्रतिषेध और दूसरा प्रसज्य-प्रतिषेध । तथाहि — द्वौ नञौ तु समाख्यातौ, पर्युदास-प्रसज्यकौ । पर्युदासः सदृग्ग्राही, प्रसज्यस्तु निषेध-कृत् ॥१॥ प्राधान्यं तु विधेर्यत्र, प्रतिषेधेऽप्रधानता । पर्युदासः स विज्ञेयो, यत्रोत्तरपदेन नञ् ॥२॥ अप्राधान्यं विधेर्यत्र, प्रतिषेधे प्रधानता । प्रसज्यस्तु स विज्ञेयः, क्रियया सह यत्र नञ् ॥३॥ इन तीनों श्लोकों का तात्पर्य निम्नरीत्या जानना चाहिए— कहते हैं । शत्रुवदादेश आदेश शत्रु के समान होता है—शत्रु जैसा व्यवहार करता है । वह स्थानी को हटा कर वहां स्वयं बैठ जाता है । यथा 'सुधी + उपास्य' में ईकार के स्थान पर होने वाला य्' आदेश है । जिस के स्थान पर आदेश होता है उसे स्थानी कहते हैं । यथा 'सुधी+उपास्य' में ईकार स्थानी है।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ३६ पर्युदास-प्रतिषेध (१) इस मे विधि की प्रधानता तथा निषेध की अप्रधानता होती है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां लाने की प्रधानता है निषेध की नहीं; क्योंकि लाने का निषेध नहीं किया गया। (२) इस में 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध किया करता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां उत्तरपद 'ब्राह्मण' का निषेध किया गया है। (३) इस में जिसका निषेध किया जाता है पुनः विधि में उसके सदृश का ही ग्रहण किया जाता है। यथा—अब्राह्मणमानय। यहां ब्राह्मण का निषेध किया गया है, अब जो लाया जायेगा वह भी ब्राह्मण के सदृश अर्थात् मनुष्य ही होगा; पत्थर आदि नहीं। प्रसज्य-प्रतिषेध (१) इस में विधि की अप्रधानता तथा निषेध की प्रधानता होती है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां 'बोलना चाहिये' इस विधि की अप्रधानता और 'न बोलना चाहिए' इस निषेध की प्रधानता है। (२) इसमें 'नञ्' क्रिया का निषेध किया करता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम् यहां 'नञ्' ने 'बोलना चाहिए' इस क्रिया का निषेध कर दिया है। (३) यहां केवल निषेध ही होता है। यथा—अनृतं न वक्तव्यम्। यहां केवल निषेध ही है। हम विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए इन दोनों प्रकार के निषेधों के कुछ उदा- हरण दे रहे हैं; इनका अत्यन्त सावधानता से अभ्यास करना चाहिये— प्रसज्य के उदाहरण— (१) न व्यापार-शतेनापि शुकवत् पाठ्यते बकः। यहां 'न पाठ्यते'¹ इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है।
१. यद्यपि यहां पर पद्य में क्रिया के साथ 'नञ्' साक्षात् नहीं; तथापि यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः। अर्थतो ह्यसमर्थानाम् आनन्तर्यमकारणम्॥ (न्यायद० वा० भा० १.२.६) इस न्यायदर्शनोद्धृत पद्यानुसार क्रिया सह यत्र नञ् वाली बात समन्वित हो जाती है।
(२) न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः । यहां 'न प्रविशन्ति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (३) शत्रुना न हि सन्दध्यात् । यहां 'न सन्दध्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (४) न कुर्यान्निष्फलं कर्म । यहां 'न कुर्यात्' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । (५) एव पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति । यहां 'न सिद्ध्यति' इस प्रकार क्रिया का निषेध किया गया है और इसी निषेध की यहां प्रधानता है, अतः यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है । पर्युदास के उदाहरण — (१) पुत्रः शत्रुरपण्डितः । 'अपण्डितः' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (२) जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः । 'अनाथ' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (३) दूरादस्पर्शनं वरम् । 'अस्पर्शनम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (४) नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति । 'अप्राप्यम्' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है । (५) समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः । 'अपेया' यहां पर 'नञ्' उत्तर-पद का निषेध करता है । विधि की प्रधानता है । किञ्च—विधि में निषिध्यमान के सदृश का ग्रहण होता है, अतः यहां पर्युदास- प्रतिषेध है ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४१ यहां यह ध्यान रखना चाहिये कि प्रायः समास में पर्युदास और असमास में प्रसज्य-प्रतिषेध हुआ करता है। 'प्रायः' इसलिये कहा गया है कि कहीं २ इस नियम का उल्लङ्घन भी हो जाया करता है। यथा - अनचि च (१८), सुँडनपुंसकस्य (१६३) इत्यादि में समास होने पर भी प्रसज्य-प्रतिषेध है। 'अनचि' यहां प्रसज्य-प्रतिषेध है; अतः 'अच् परे होने पर द्वित्व न हो' इस निषेध की ही प्रधानता होगी, विधि की नहीं। अर्थात् अच् परे न हो, अच् से भिन्न चाहे अन्य वर्ण परे हो या न हो द्वित्व हो जायेगा। इस का फल यह होगा कि अवसान में भी द्वित्व हो जायेगा। यथा - वाक्क्, वाक् । यदि 'अनचि' में पर्युदास- प्रतिषेध होता तो सदृश का ग्रहण होने से अच् के सदृश = हल् के परे होने पर ही द्वित्व होता; 'वाक्' इत्यादि स्थानों पर अवसान मे द्वित्व न हो सकता। अतः पर्युदास की अपेक्षा प्रसज्य-प्रतिषेध मानना ही उपयुक्त है। किञ्च - यदि यहां मुनिवर पाणिनि को पर्युदास-प्रतिषेध अभीष्ट होता; तो वे 'अनचि' न कह कर सीधा उस के स्थान पर 'हलि' ही कह देते; इस से एक वर्ण का लाघव भी हो जाता, परन्तु उन के ऐसा न कहने मे यह प्रतीत होता है कि यहां पर्युदास-प्रतिषेध नहीं किन्तु प्रसज्य-प्रतिषेध है। अर्थः- (अचः) अच् से परे (यरः) यर् प्रत्याहार के स्थान पर (वा) विकल्प करके (द्वे) दो शब्द स्वरूप हो जाते हैं। (अनचि) परन्तु अच् परे होने पर नहीं होते। कार्य का होना और पक्ष में न होना विकल्प कहाता है। एक को दो करने का नाम द्वित्व है। द्वित्व हो भी और न भी हो, इसे द्वित्व का विकल्प कहते हैं¹। 'सुध्य्+उपास्य' यहां सकारोत्तर उकार = अच् से परे यर् = धकार को इस सूत्र से विकल्प करके द्वित्व करने से दो रूप बन जाते हैं- (१) सु ध् ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व होता है]। (२) सु ध् य्+उपास्य [जहां द्वित्व नहीं होता है]। अब द्वित्व वाले पक्ष में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१६) झलां जश्झशि ।८।४।५२॥ स्पष्टम्। इति पूर्व-धकारस्य दकारः ॥ अर्थः-झश् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर जश् हो जाता है। इस सूत्र से पूर्व धकार के स्थान पर दकार हो जाता है। व्याख्या-झलाम् ।६।३। जश् ।१।१। झशि ।७।१। अर्थः- (झशि) झश् प्रत्याहार परे होने पर (झलाम्) झलों के स्थान पर (जश्) जश् हो जाता है। 'झलाम्' पद में षष्ठी स्थाने-योगा (१.१.४८) के अनुसार स्थानषष्ठी है। 'झशि' पद सप्तम्यन्त है; अतः तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) सूत्र के अनुसार झश् से १. ध्यान रहे कि विकल्प के दोनों रूप शुद्ध हुआ करते हैं। इन में से चाहे जिस का प्रयोग करें हमारी इच्छा पर निर्भर है।
४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अव्यवहित पूर्व झल् को ही जश् होगा, अर्थात् झश् परे होने पर झलों को जश् होगा¹। झल् प्रत्याहार में वर्गों के चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय, प्रथम और ऊष्म वर्ण आते हैं। इनके स्थान पर जश् अर्थात् वर्गों के तृतीय वर्ण [ ज्, ब्, ग्, ड्, द् ] हो जाते हैं, यदि झश् अर्थात् वर्गों के तृतीय या चतुर्थ वर्ण परे हों तो। 'सु ध् ध् य्+उपास्य' यहां द्वित्व वाले पक्ष में इस सूत्र से पूर्व धकार=झल् को जश् होता है, क्योंकि इस से परे परला धकार = झश् विद्यमान है। जश् पांच हैं—१ ज्, २ ब्, ३ ग् ४ ड्, ५ द्। यहां स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार धकार के स्थान पर दकार=जश् होता है [देखें—लृ-तुल-सानां दन्ता.]। यथा— (१) सुद्ध्य् + उपास्य [द्वित्वपक्ष में जश्त्व होकर] (२) सुध्य् + उपास्य [द्वित्वाभावपक्ष में] अब दोनों पक्षों में समान रूप से अग्रिम-सूत्र प्राप्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् —(२०) संयोर्गान्तस्य लोपः ।८।२।२३॥ संयोगान्तं यत् पदं तस्य लोपः स्यात् ॥ अर्थः—जिस पद के अन्त में संयोग हो उस का लोप हो जाता है। व्याख्या—संयोगान्तस्य ।८।२। पदस्य ।८।२। (यह अधिकार पीछे से आ रहा है)। लोपः ।१।१। समास —संयोगोऽन्ते यस्य तत् = संयोगान्तम्, बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(संयोगान्तस्य) जिस के अन्त में संयोग है ऐसे (पदस्य) पद का (लोपः) लोप हो जाता है। पाणिनीय-व्याकरण में येन विधिरुतदन्तस्य (१.१.७१) यह भी एक परिभाषा है। इस का भाव यह है कि विशेषण के साथ तदन्त-विधि करनी चाहिये। यथा— अचो यत् (७७३) यहां 'धातोः' पद की अनुवृत्ति आकर 'अचः ।३।१। धातोः ।३।१। यत् ।१।१।' ऐसा हो जाता है। इस में 'अचः' पद 'धातोः' पद का विशेषण है, इस से तदन्त-विधि होकर अजन्त धातु से यत् प्रत्यय हो' ऐसा अर्थ बन जाता है। इस नियम के अनुसार यहां यदि 'संयोगस्य लोपः' सूत्र भी बनाते, तो भी 'संयोगस्य' पद के 'पदस्य' पद के विशेषण होने के कारण तदन्त विधि होकर उपर्युक्त अर्थ सिद्ध हो सकता था, पुनः यहां स्पष्ट-प्रतिपत्ति अर्थात् विद्यार्थियों के क्लेश का ध्यान रख अनायास-ज्ञान के लिये ही मुनि ने 'अन्त' पद का ग्रहण किया है। सुद्ध्य् + उपास्य, सुध्य् + उपास्य इन रूपों में क्रमशः 'सुद्ध्य्' और 'सुध्य्' संयोगान्त पद हैं। हलोऽनन्तराः संयोगः (१३) के अनुसार 'द्, ध्, य्' अथवा 'ध्, य्' वर्णों की संयोग संज्ञा है। सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र द्वारा यहां पद-संज्ञा होती है। यद्यपि इसके अन्त में भिस् = सुप् लुप्त हो चुका है, तथापि प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्
१. इस कारण परले 'ध्' को जश् नहीं होगा, क्योंकि समक्षस्थित 'य्' झश् नहीं है।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४३
(१६०) द्वारा सुबन्त के अक्षुण्ण रहने से पद-संज्ञा में कोई दोष नहीं होता। इस प्रकार दोनों पक्षों में सम्पूर्ण संयोगान्त पद का लोप प्राप्त होता है। अब अग्रिम- परिभाषा द्वारा केवल अन्त्य के लोप का विधान करते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२१) अलोऽन्त्यस्य ।१।१।५२।। षष्ठी-निर्दिष्टस्यान्त्यस्याल आदेशः स्यात्¹। इति यलोपे प्राप्ते— अर्थः—आदेश—षष्ठी-निर्दिष्ट के अन्त्य अल् के स्थान पर होता है। इस सूत्र ने (दोनों पक्षों में) यकार के लोप के प्राप्त होने पर (अग्रिम वार्त्तिक द्वारा निषेध हो जाता है)। व्याख्या—स्थाने ।७।१। (षष्ठी स्थाने-योगा से)। विधीयमान आदेशः (ये अध्याहार किये जाते हैं)। षष्ठ्या ।३।१। (षष्ठी स्थानेयोगा में प्रथमान्त ‘षष्ठी’ शब्द आ कर तृतीयान्त-रूपेण परिणत हो जाता है)। निर्दिष्टस्य ।६।१। (इस का अध्याहार किया गया है)। अलः ।६।१। अन्त्यस्य ।६।१। अर्थः—(स्थाने) स्थान पर विधान किया आदेश (षष्ठ्या) षष्ठी-विभक्ति से (निर्दिष्टस्य) निर्देश किये गये के (अन्त्यस्य) अन्त्य (अलः) अल् के स्थान पर होता हैं। इस का सार यह है कि जो आदेश षष्ठी-निर्दिष्ट के स्थान पर प्राप्त होता है वह उस के अन्तिम अल् को होता है। यथा—त्यदादीनाम् अः (१६३) त्यदादियों को ‘अ’ हो। यहां षष्ठी स्थाने-योगा (१.१.४८) सूत्र से सम्पूर्ण त्यदादियों के स्थान पर ‘अ’ प्राप्त होता है, परन्तु इस परिभाषा (२१) से त्यदादियों के अन्त्य अल् को ‘अ’ हो जाता है। ‘त्यदादीनाम्’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। रायो हलि (२१५) हलादि विभक्ति परे होने पर रै शब्द को आकार आदेश होता है। यहां सम्पूर्ण ‘रै’ के स्थान पर प्राप्त आदेश इस परिभाषा द्वारा अन्त्य अल्=ऐकार को हो जाता है। ‘रायः’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। दिव औत् (२६४) सुँ परे होने पर दिव् शब्द को औकार आदेश होता है। यहां सम्पूर्ण ‘दिव्’ के स्थान पर प्राप्त आदेश इस परिभाषा द्वारा अन्त्य अल्=वकार को ही होता है। ‘दिवः’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। संयोगान्तस्य लोपः (२०) संयोगान्त पद का लोप होता है। यहां सम्पूर्ण संयोगान्त पद के स्थान पर प्राप्त लोप इस परिभाषा द्वारा अन्त्य अल् के स्थान पर ही होता है। ‘संयोगान्तस्य’ यह यहां षष्ठी-निर्दिष्ट है। यह परिभाषा-सूत्र है, अतः इस का उपयोग रूप-सिद्धि में न हो कर सूत्रार्थ करने में ही होता है। इस की सहायता से संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र का यह अर्थ होता है—संयोगान्त पद के अन्त्य अल् का लोप हो जाता है। इस प्रकार—१. सुद्ध्य् +उपास्य। २. सुध्य्+उपास्य। इन दोनों पक्षों में अन्त्य अल् यकार का ही लोप प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम वार्त्तिक से यकार के लोप का भी निषेध हो जाता है। १. अत्र षष्ठीनिर्दिष्टोऽन्त्यस्याल आदेशः स्यात् इति क्वाचित्कः पाठोऽपपाठ एव। यतो न ह्यादेशः क्वचित् षष्ठीनिर्दिष्टो भवति ।
४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] वा०—(२) यणः प्रतिषेधो वाच्यः ॥ सुद्ध्युपास्यः, सुध्युपास्यः । मध्वरिः, मध्वरिः । धात्त्रंशः, धात्रंशः । लाकृतिः ॥ अर्थ —संयोग के अन्त में यण् के लोप का निषेध कहना चाहिये। व्याख्या—यह वार्तिक संयोगातस्य लोपः (२०) सूत्र का है। जिस सूत्र पर जो वार्तिक पढ़ा जाता है वह तद्विषयक ही समझा जाता है। संयोगात्तस्य लोपः (२०) सूत्र—संयोगान्त पद के अन्त्य अल् का लोप करता है, अब यदि वे अन्त्य अल् यण् (य्, व्, र्, ल्) हों तो उन का लोप न होगा। इस प्रकार इस वार्तिक से पूर्वोक्त रूपों में प्राप्त यकार-लोप का निषेध हो जाता है। तब (१) सु द् ध् य् + उपास्यः । (२) सु ध् य् + उपास्यः । ये दोनों उसी तरह अवस्थित रहते हैं। हमारी लिपि (देव-नागरी) का नियम है कि अज्हीनं परेण संयोज्यम् अर्थात् अच् से रहित हल् अग्रिम वर्ण के साथ मिला देना चाहिये। इस नियमानुसार हलों का अग्रिम वर्णों के साथ संयोग करके 'सुद्ध्युपास्य' और सुध्युपास्य' ये दो रूप बनते हैं। जब समास होने से प्रातिपदिक-संज्ञा होकर विभक्ति आने पर 'सुद्ध्युपास्यः', 'सुध्युपास्यः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।१ नोट—'सुधी+उपास्यः' इस प्रकार विसर्ग वाला रूप प्रक्रिया-दशा में रखना अत्यन्त अशुद्ध है, क्योंकि समास में विभक्तियों के लुक् के बाद सन्धि और उसके बाद सुँ आदि प्रत्यय करने उचित होते हैं पूर्व नहीं। अतः यहाँ 'सुधी + उपास्य' ऐसी दशा में प्रथम सन्धि करके 'सुध्युपास्य' बना लेना उचित है, तदनन्तर सुँ प्रत्यय लाकर उस के स्थान पर विसर्ग आदेश करने से 'सुध्युपास्यः' प्रयोग सिद्ध करना चाहिये। 'मधु + अरि' यहां इको यणचि (१५) सूत्र से धकारोत्तर उकार के स्थान पर यण् प्राप्त होता है, पुनः स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा ओष्ठ-स्थान के तुल्य होने के कारण उकार के स्थान पर वकार ही हो जाता है—म ध् व् + अरि । अब अनचि च (१८) से धकार को वैकल्पिक द्वित्व होकर द्वित्वपक्ष में झलां जश्झशि (१६) से आदि धकार को दकार करने पर—१ 'मद्द्व् + अरि' और २ 'मध्व् + अरि' ये दो रूप बनते हैं। अब इस दशा में दोनों पक्षों में अलोऽन्त्यस्य (२१) की सहायता से संयोगातस्य लोपः (२०) सूत्र द्वारा वकार के लोप के प्राप्त होने पर यण् प्रतिषेधो १ सुधी+उपास्य में इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च (५६) से प्रकृति-भाव नहीं होता, न समासे (वा० ६) से निषेध हो जाता है। न सु-सुधियोः (२०२) से यण्निषेध भी नहीं होता, क्योंकि वह अजादि सुँप् में निषेध करता है। किञ्च— अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा इस न्याय से वह एरनेकाचो० (२००) के यण् का निषेध कर सकता है, इको यणचि (१५) के नहीं।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४५ वाच्यः वार्त्तिक से उस का निषेध हो जाता है। अब 'सुं' प्रत्यय लाकर उसके स्थान पर विसर्ग आदेश करने से 'मद्ध्वरिः, मध्वरिः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'धातृ + अंश' यहां इको यणचि (१५) सूत्र से तकारोत्तर ऋकार के स्थान पर यण् प्राप्त होता है, पुनः स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा मूर्धा-स्थान के तुल्य होने से ऋकार के स्थान पर रेफ ही आदेश हो जाता है - धात् र् + अंश। अब अनचि च (१८) सूत्र ने तकार को वैकल्पिक द्वित्व होकर दोनों पक्षों में अलोऽन्त्यस्य (२१) की सहा- यता से संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र द्वारा रेफ के लोप के प्राप्त होने पर यणः प्रति- षेधो वाच्यः (वा० २) वार्त्तिक से उस का निषेध हो जाता है। अब 'सुं' प्रत्यय ला कर विसर्ग आदेश करने में 'धात्त्रंशः, धात्रंशः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'लृ + आकृति' यहां स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र की सहायता से इको यणचि (१५) सूत्र द्वारा दन्त-स्थान वाले लृकार के स्थान पर तादृश दन्त-स्थानीय लकार आदेश होकर 'सुं' प्रत्यय लाकर विसर्ग आदेश करने में 'लाकृतिः' प्रयोग सिद्ध होता है। 'सुद्ध्युपास्यः' और 'मद्ध्वरिः' प्रयोगों की सिद्धि एक समान होती है। 'धात्त्रंशः' में जश्त्व की तथा 'लाकृतिः' में द्वित्व और जश्त्व दोनों की प्रवृत्ति नहीं होती। टिप्पणी-सुधीभिः = विद्वद्भिर् उपास्यः = आराधनीयः सुद्ध्युपास्यो भगवान् विष्णुरित्यर्थः [विद्वानों द्वारा आराधना करने योग्य, भगवान् विष्णु] । मधोः = तदा- ख्यस्य दैत्यस्य अरिः = शत्रुः मद्ध्वरिः, भगवान् विष्णुः ['मधु' नामक दैत्य को मारने के कारण भगवान् विष्णु 'मद्ध्वरि' कहाते हैं ] । धातुः = ब्रह्मणः, अंशः = भागः धात्त्रंशः [ब्रह्मा का भाग] । लृ आकृतिरिव आकृतिः = स्वरूपं यस्य सः = लाकृतिः, वंशी-वादन-समये वक्राकृतिश्श्रीकृष्ण इत्यर्थः [बांसुरी बजाने के समय 'लृ' के समान टेढ़ी आकृति वाले श्रीकृष्ण] । अभ्यास (२) (१) अधोलिखित रूपों में सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धिविच्छेद करें - १. घस्लादेशः । २. मात्राज्ञा । ३. वद्ध्वागमनम् । ४. यद्यपि । ५. लनुबन्धः । ६. कत्त्र्रायुः । ७. शृण्विदम् । ८. करोत्ययम् । ६. लाकारः । १०. पित्रधीनम् । ११. चार्वङ्गी । १२. वार्येति । १३. लादेशः । १४. धात्त्रैतत् । १५. गुर्वाज्ञा । १६. ह्ययम् । १७. गम्लादेशः । १८. त्रसौ । १६. खल्वेहि । २०. दध्यत्र । २१. मद्ध्वानय । २२. अस्त्यनु- भवः । २३. कुविद्म् । २४. भत्रादेशः । २५. पुनर्वस्वृक्षः । (२) निम्नलिखित रूपों में सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धि करें - १. शशी + उदियाय । २. सिध्यतु + एतत् । ३. भाति + अम्बरे । ४. धातु + आदेश । ५. पातृ + एतत् । ६. लृ + अङ्ग । ७. शिशु + अङ्ग । ८. नृ + आत्मज । ६. स्मृति + आदेशः । १०. अनु + आदेशः । ११. ०
४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पितृ + अर्च्चा । १२ अपि + एतत् । १३ वृक्षेषु + अभिलाष । १४ त्वष्टृ + आकाङ्क्षा । १५ दर्वी + अमी । १६ अभि + उदय । १७ प्रति + एक । १८ वधू + अलङ्कार । १६ वस्तु + अस्ति । २० भ्रातृ
- उत्त । २१ दधि + अशनम् । २२ तनु + अङ्गी । २३ स्त्री + उत्सव । २४ देवेषु + आसीत् । २५ मनु + आदि । (३) 'लाकृतिः' का क्या विग्रह है ? 'लृ' शब्द का षष्ठ्येकवचन तथा प्रथमै- कवचन क्या बनेगा ? अथवा 'लृ' शब्द का उच्चारण लिखें । (४) प्रसज्य और पर्युदास प्रतिषेधों का तात्पर्य अपनी भाषा में स्पष्ट करते हुए नायं शशो और अश्राद्धभोजी ब्राह्मणः में कौन-सा निषेध है सोप- पत्तिक लिखें । (५) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य अलोऽन्त्यस्य तथा स्थानेऽन्तरतम ये सूत्र यदि न होते तो कौन-कौन-सी हानियां होतीं ? सोदाहरण स्पष्ट करें । (६) अनचि च सूत्र में कौन सा प्रतिषेध है और वैसा मानने की क्या आव- श्यकता है ? (७) संहिता की विवक्षा कहां कहां नित्य और कहां कहां ऐच्छिक हुआ करती है ? सप्रमाण सोदाहरण विवेचन करें । (८) 'सुधी + उपास्य' में इकोऽसवर्णे० सूत्र से प्रकृतिभाव क्यों नहीं होता ? अथवा न मु-सुधियो में यण्निषेध ही क्यो नही होता ? [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२) एचोऽयवायावः । ६।१।७५॥ एचः क्रमाद् अय्, अव्, आय्, आव् एते स्युरचि ॥ अर्थ—अच् परे हो तो एच् के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् हों । व्याख्या—एचः ।६।१। (षष्ठी स्थाने-योगा के अनुसार यहां स्थान-षष्ठी है) । अयवायावः ।१।३। अचि ।७।१। (इको यणचि सूत्र से) । संहितायाम् ।७।१। (यह पीछे से अधिकृत है) । समास—अय् च अव् च आय् च आव् च = अयवायावः, इतरे- तरद्वन्द्वः । अर्थ—(अचि) अच् परे होने पर (संहितायाम्) संहिता के विषय में (एचः) एच् के स्थान पर (अयवायावः) अय्, अव्, आय्, आव् हो जाते हैं । 'एच्' प्रत्याहार के मध्य 'ए, ओ, ऐ, औ' ये चार वर्ण आते हैं । इन के स्थान पर 'अय्, अव्, आय्, आव्' ये चार आदेश होते हैं यदि इन से परे अच् अर्थात् स्वर हो तो । 'संहिता' के विषय में पीछे लिख चुके हैं वही नियम यहां और अन्यत्र सब जगह समझ लेना चाहिये । 'अचि' यहां भाव-सप्तमी है, यह पूर्ववत् तस्मिन्निति निर्दि- ष्टेपूर्वस्य (१६) परिभाषा द्वारा पर-सप्तमी में परिणत हो जाती है । यहां वृत्ति में 'क्रमात्' पद यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) परिभाषा के कारण आया हुआ है । अब इस परिभाषा को स्पष्ट करते हैं—
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४७
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२३) यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ।१।३।१०॥ समसम्बन्धी विधिर्यथासंख्यं स्यात् । हरये । विष्णवे । नायकः । पावकः॥ अर्थः—(संख्या की दृष्टि से) समान सम्बन्ध वाली विधि संख्या के अनुसार हो। व्याख्या—समानाम् ।६।३। अनुदेशः ।१।१। यथा-सङ्ख्यम् ।१।१। समासः— सङ्ख्याम् अनतिक्रम्येति यथासङ्ख्यम्, अव्ययीभाव-समासः । यहां समानता सङ्ख्या की दृष्टि से अभिप्रेत है । अर्थः—(समानाम्) समान सङ्ख्या वालों का (अनुदेशः) कार्य (यथा-सङ्ख्यम्) सङ्ख्या के अनुसार अर्थात् बारी २ से होता है¹ । ‘समानाम्’ में षष्ठी शेषे (६०१) सूत्र द्वारा सम्बन्ध में षष्ठी हुई है । यदि यहां कर्तृ-कर्मणोः कृति (२.३.६५) सूत्र द्वारा कर्म में षष्ठी मानें तो जहां स्थानी के साथ तुल्य सङ्ख्या वालों का विधान किया जायेगा, वहां ही इस सूत्र की प्रवृत्ति हो सकेगी; यथा – एचोऽयवायावः सूत्र में । परन्तु जहां विधीयमान सम-सङ्ख्यक न होंगे किन्तु प्रकारान्तर से समान सङ्ख्या होनी होगी वहां इस सूत्र की प्रवृत्ति न हो सकेगी; यथा—समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः (३.४.३६) यहां विधीयमान ‘णमुल्’ एक है, इस की किसी के साथ समान सङ्ख्या नहीं है; तीन उपपदों की तीन धातुओं के साथ समान सङ्ख्या है । यहां यदि यथासङ्ख्य नहीं करते तो अनिष्ट हो जाता है । अतः ‘समानाम्’ पद में कर्मणि-षष्ठी न मान कर शेष-षष्ठी मानना ही युक्त है । एचोऽयवायावः (२२) सूत्र द्वारा विहित ‘अय्, अव्, आय्, आव्’ यह आदेश रूप विधि सम-विधि है; क्योंकि एच् (ए, ओ, ऐ, औ) भी चार हैं और अय्, अव्, आय्, आव् ये आदेश भी चार हैं । अतः इस परिभाषा द्वारा यह विधि बारी २ अर्थात् पहले को पहला, दूसरे को दूसरा, तीसरे को तीसरा और चौथे को चौथा इस ढंग से होगी । ‘ए’ पहले को पहला अय्, ‘ओ’ दूसरे को दूसरा अव्, ‘ऐ’ तीसरे को तीसरा आय् तथा ‘औ’ चौथे को चौथा आव् होगा । इन सब के क्रमशः उदाहरण यथा— हरे+ए=हर् अय्+ए=हरये । विष्णो+ए=विष्ण् अव्+ए=विष्णवे । इन दोनों उदाहरणों में ‘हरि’ और ‘विष्णु’ शब्दों से चतुर्थी का एकवचन ‘ङे’ आने पर ङकार अनुबन्ध का लोप हो घेर्ङिति (१७२) सूत्र से गुण हो जाता है । नै+अक=न् आय्+अक=नायकः । पौ+अक=प् आव्+अक=पावकः । इन दोनों उदाहरणों में ‘नी’ और ‘पू’ धातुओं से ‘ण्वुल्’ प्रत्यय लाने पर अनुबन्धों का लोप तथा ‘वु’ के स्थान पर अकादेश होकर अचो ञ्णिति (१८२) सूत्र १. यद्यपि इको यणचि (१५) में भी इस परिभाषा से काम चलाया जा सकता था तथापि इक् (अविधीयमान होने से सवर्णों सहित) ६६ हैं और यण् (विधीयमान होने से) केवल चार, कैसे यथासंख्य हो ? इस दृष्टि के आश्रयण से वहां स्थाने- ऽन्तरतमः (१७) की प्रवृत्ति दर्शाई गई थी । वस्तुतः जाति के आश्रयण से चार इक्कों को क्रमशः चार यण् हो सकते हैं कोई दोष नहीं आता । परन्तु तब भी ‘वाग्घरिः’ आदि प्रयोगों के लिये स्थानेऽन्तरतमः परिभाषा का होना तो आव- श्यक है ही ।
४८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् में क्रमशः ईकार ऊकार को ऐकार औकार वृद्धि हो जाती है। इसी प्रकार भावुक , शयनम्, गायन पवन आदि प्रयोगों में भी अयादि-प्रक्रिया समझ लेनी चाहिये। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४) वान्तो यि प्रत्यये।६।१।७६॥ यकारादौ प्रत्यये परे ओदोतोर् अव् आव् एतौ स्तः। गव्यम्। नाव्यम् ॥ अर्थ —यकारादि प्रत्यय परे होने पर 'ओ' को अव् तथा 'औ' को आव् आदेश हो जाता है। व्याख्या—वान्तः ।१।१। यि ।७।१। प्रत्यये ।७।१। मुनिवर पाणिनि के 'येन विधिस्तदन्तस्य' (१।१।७१) नियम का 'यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे' यह वार्तिक अपवाद है। इस का अभिप्राय यह है कि सप्तम्यन्त एकाल् विशेषण से तदन्तविधि न हो किन्तु तदादिविधि हो। यहां 'यि' यह सप्तम्यन्त एकाल् है और 'प्रत्यये' का विशेषण है, अतः इस में तदादिविधि होकर 'यादौ प्रत्यय' ऐसा बन जायेगा। समास—व अन्ते यस्य स =वान्तः, वकारादकार उच्चारणार्थः, बहुव्रीहि-समास । जिस के अन्त में 'व्' हो उसे वान्त कहते हैं। यहां वान्त से अभिप्राय पूर्व-सूत्र-पठित अव्, आव् आदेशों से है। यहां स्थानी ओदौतौश्चेति वक्तव्यम् वार्तिक से ओ और औ समझने चाहियें। अर्थ —(यि = यादौ) जिस के आदि में 'य्' हो ऐसे (प्रत्यये) प्रत्यय के परे होने पर (वान्त) 'ओ' और 'औ' के स्थान पर अव् और आव् आदेश हो जाते हैं। इन के उदाहरण यथा— 'गो+य' [यहां 'गो' से गोपयसोर्यत् (४।३।१५८) द्वारा 'यत्' प्रत्यय होता है] यहां 'य' यह यकारादि प्रत्यय परे है अतः गकारोत्तर ओकार के स्थान पर अव् आदेश हो—ग् अव्+य =गव्य । अब विभक्ति लाने में 'गव्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। गोर्विकारः =गव्यम्, दुग्ध-दध्यादिकमित्यर्थः। दूध, दही आदि गो के विकार 'गव्य' कहाते हैं। 'नौ+य' [यहां 'नौ' से तार्य— 'तरने योग्य' अर्थ में नौ-व्यो-धर्म०(४।४।६१) सूत्र से यत् प्रत्यय होता है] यहां 'य' यह यकारादि प्रत्यय परे है अतः नकारोत्तर औकार के स्थान पर आव् आदेश होकर विभक्ति लाने में 'नाव्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। नावा तार्यम् नाव्यं जलम्, नौका से तरने योग्य जल को 'नाव्य' कहते हैं। यथा— गङ्गायां नाव्यं जलं वर्तते। इन उदाहरणों में 'अच्' परे न होने के कारण एचोऽयवायावः (२२) सूत्र से काम नहीं चल सकता था अतः यह सूत्र बनाना पड़ा है। ध्यान रहे कि यकारादि प्रत्यय परे न होने पर इस सूत्र की प्रवृत्ति न होगी। यथा—गोयानम्, नौयानम्। यहां वान्त आदेश नहीं होते। [लघु०] वा०—(३) अध्वपरिमाणे च ॥ गव्यूतिः॥ अर्थ —'गो' शब्द से 'यूति' शब्द परे होने पर ओकार को वान्त (अव्) आदेश हो जाता है, यदि समुदाय से मार्ग का परिमाण (माप) अर्थ ज्ञात हो तो।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ४९ व्याख्या—गोः ।६।१। यूतौ ।७।१। (गोर्यूतौ छन्दस्युपसङ्ख्यानम् वार्त्तिक मे)। वान्तः ।१।१। (वान्तो यि प्रत्यये से) । अध्व-परिमाणे ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थः—(यूतौ) ‘यूति’ शब्द परे होने पर (गोः) ‘गो’ शब्द के ओकार के स्थान पर (वान्तः) ‘अव्’ आदेश हो (अध्व-परिमाणे) मार्ग के परिमाण अर्थात् माप के गम्यमान होने पर । उदाहरण यथा— गो + यूति = ग् अव् + यूति = गव्यूतिः । इस का अर्थ ‘दो कोस’ है। गव्यूतिः स्त्री क्रोशयुगम्—इत्यमरः । जहां मार्ग-परिमाण अर्थ न होगा वहां ‘गोयूतिः’ बनेगा । यहां पर यकारादि प्रत्यय न होने से यह वार्त्तिक बनाना पड़ा है । अभ्यास (३) (१) निम्न-लिखित रूपों में सन्धिच्छेद कर सूत्रों द्वारा उसे सिद्ध करें— १. वटवृक्षः¹। २. ग्लायति । ३. भवति । ४. गणयति । ५. माण्डव्यः² । ६. स्तावकः । ७. नयति । ८. गायन्ति । ९. नाविकः । १०. शयनम् । ११. जयः । १२. असावुत्तुङ्गः । १३. औपगवः । १४. चयः । १५. चिक्याय । १६. अलावीत् । १७. पवनः । १८. नयः । १६. त्रायते । २०. कवये । २१. क्षयः । २२. मनवे । २३. रायौ । २४. पपावसाविह । २५. द्रवति । (२) निम्न-लिखित रूपों में सन्धि कर के सूत्रों द्वारा उसे सिद्ध करें— १. असौ + अयम् । २. अमे + ए । ३. चे + अन । ४. लो + अन । ५. चोरे + अनि । ६. भौ + उक । ७. गै + अक । ८. साधो + ए । ६. शङ्खो + य³ । १०. अग्नी + इह । ११. भौ + अयति । १२. पो + इत्र । १३. शे + आन । १४. भो + अन । १५. ग्लौ + औ । १६. वाभ्रो
- य⁴ । १७. गो + यूति । १८. वाली + अत्र । १६. इन्दौ + उदिते । २०. पूजार्हौ + अरिसूदन । (३) एचोऽयवायावः में ‘अचि’ पद न लाते तो कौन सा दोष उत्पन्न हो जाता ? (४) यथा-सङ्ख्यमनु० की व्याख्या करते हुए ‘समानाम्’ पद पर प्रकाश डालें । (५) वान्तो यि प्रत्यये और अध्व-परिमाणे च के निर्माण का प्रयोजन बताएं । —: : ० : :— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(२५) अदेङ् गुणः ।१।१।२।। अत् एङ् च गुण-सञ्ज्ञः स्यात् ।। अर्थः—अ, ए, ओ—इन तीन वर्णों की ‘गुण’ संज्ञा होती है । १. ‘वटो + ऋक्षः’ इतिच्छेदः । २. मण्डुशब्दाद् गोत्रापत्ये गर्गादिभ्यो यञ् (१००५) इति यञि, ञित्त्वादादिवृद्धौ ओर्गुणः (१००२) इति गुणः । ३. शङ्कुशब्दात् तस्मै हितम् (५.१.५) इत्यधिकारे उगवादिभ्यो यत् (५.१.२) इति यत् । ४. वभ्रुशब्दाद् अपत्येऽर्थे मधु-वभ्र्वोर्ब्राह्मण-कौशिकयोः (४.१.१०६) इति यञ् । ल० प्र० (४)
५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् व्याख्या—अत् १।१। एङ् १।१। गुण १।१। अर्थ — (अत्, एङ्) अ, ए, ओ ये तीन वर्ण (गुण) गुण-सञ्ज्ञक होते हैं । इस सूत्र पर जो वक्तव्य है वह अग्रिम सूत्र पर लिखा जायेगा । [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (२६) तपरस्तत्कालस्य ।१।१।६६॥ त परो यस्मात् स च तात् परश्चोच्चार्यमाणसमकालस्यैव सञ्ज्ञा स्यात् ॥ अर्थ.—‘त्’ जिससे परे है और ‘त्’ से जो परे है वह अपने सदृश काल वाले की सञ्ज्ञा होता है । व्याख्या—तपर १।१। तत्कालस्य ६।१। स्वस्य ६।१। (स्वं रूपं शब्दस्या- शब्दसञ्ज्ञा से विभक्ति-विपरिणाम करके) । समास — तात् पर तपर, पञ्चमी- तत्पुरुष । त परो यस्मादसौ तपर, बहुव्रीहि समास । तस्य = तपरत्वेनोच्चार्यमाणस्य काल इव कालो यस्य स तत्काल तस्य = तत्कालस्य, बहुव्रीहि-समास । अर्थ — (तपर) ‘त’ जिससे परे है और ‘त्’ से जो परे है वह (तत्कालस्य) अपने काल के समान काल वाले की तथा (स्वस्य) अपनी सञ्ज्ञा होता है । अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्यय (११) सूत्र द्वारा अण् अपने तथा अपने सवर्णों के बोधक होते हैं, यह पीछे कह चुके हैं । यह सूत्र उस का अपवाद (निषेध करने वाला) है । जिस के आगे या पीछे ‘त्’ लगाया जाये वह केवल अपना तथा अपने काल के सदृश काल वाले सवर्णों का ही ग्राहक हो अन्य सवर्णों का न हो, यही इस सूत्र का तात्पर्य है । यथा अदेङ् गुण (२५) यहां ‘अ’ तपर है, क्योंकि इस से परे ‘त्’ है, एवम् ‘एङ्’ भी तपर है, क्योंकि यह ‘त्’ से परे है । अब यहां ‘अ’ और ‘एङ्’ ये दोनो तपर अण् प्रत्याहार के अन्तर्गत होते हुए भी अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्यय (११) सूत्र द्वारा अपने सम्पूर्ण सवर्णों का ग्रहण न करायेंगे, किन्तु उन्हीं सवर्णों का ग्रहण करायेंगे जिन का काल इन के साथ तुल्य होगा । ‘अ’ यह एक-मात्रिक है, अतः यह अपने एक-मात्रिक सवर्णों का ही बोधक होगा दीर्घादियो का नहीं । एङ् अर्थात् ‘ए’, ‘ओ’ द्वि-मात्रिक हैं, अतः ये अपने द्विमात्रिक सवर्णों के ही बोधक होंगे प्लुतो के नहीं । तात्पर्य यह हुआ कि तपर अ¹—केवल अपने समकाल वाले छ ह्रस्व-भेदों का ही ग्राहक होगा सम्पूर्ण अठारह भेदों का नहीं । इसी प्रकार तपर ‘ए, ओ’—केवल अपने समकाल वाले छ दीर्घ भेदों के ही ग्राहक होंगे सम्पूर्ण बारह भेदों के नहीं । एवम् तपर इ, उ, ऋ, आ, ई आदियों में भी समझ लेना चाहिये ¹ १ ध्यान रहे कि इस तपर से अतिरिक्त विभक्ति-तपर भी हुआ करता है । यथा आद् गुणः (२७) यहां पर ‘आत्’ यह ‘अ’ शब्द की पञ्चमी का ‘त’ है, अतः यहां पर ह्रस्व (उपेन्द्र) दीर्घ (रमेश) दोनो अकारों का ग्रहण हो जाता है । इस में उपसर्गादृति धातौ (३७) सूत्र ज्ञापक है । ‘उपसर्गात्’ यहां पञ्चमी का ‘त्’ है, यदि यहां पर भी तपरस्तत्कालस्य (२६) का उपयोग करते हैं, तो फिर उस से परे स्थित ‘ऋ’ में तपर-ग्रहण व्यर्थ हो जाता है ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५१ तो अब अदेङ् गुणः (२५) सूत्र का यह अर्थ हुआ—ह्रस्व अकार, दीर्घ एकार तथा दीर्घ ओकार गुण-सञ्ज्ञक होते हैं । अब अग्रिम-सूत्र में गुण-सञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम् – (२७) आद् गुणः ।६।१।८७।। अवर्णादचि परे पूर्व-परयोरेको गुण आदेशः स्यात् । उपेन्द्रः । गङ्गो- दकम् ॥ अर्थः—अवर्ण से अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान पर एक गुण आदेश हो जाता है । व्याख्या—अष्टाध्यायी के छठे अध्याय के प्रथम-पाद में एकः पूर्व-परयोः (६.१.८१) यह अधिकार-सूत्र है, इस का अधिकार एत्येधत्यूठ्सु (६.१.१०८) सूत्र के पूर्व तक जाता है। इस अधिकार' में 'पूर्व पर दोनों के स्थान पर एक आदेश होता है'। यह आद् गुणः (२७) सूत्र भी इसी अधिकार में पढ़ा गया है । आत् ।१।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधि- कृत है) । गुणः ।१।१। अर्थः – (आत्) अवर्ण से (अचि) अच् परे होने पर (पूर्व- परयोः) पूर्व और पर के स्थान पर (एकः) एक (गुणः) गुण आदेश होता है । अवर्ण से अवर्ण परे होने पर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) तथा अवर्ण से 'ए, ओ, ऐ, औ' परे होने पर वृद्धिरेचि (३३) सूत्र इस गुण का बाध कर लेते हैं, अतः अवर्ण से इकार, उकार, ऋकार तथा लृकार परे होने पर ही गुण प्रवृत्त होता है । उदाहरण यथा—उपेन्द्रः (विष्णु) । 'उप + इन्द्र' यहां पकारोत्तर अवर्ण से परे 'इन्द्र' का आदि अच् 'इ' विद्यमान है, अतः पूर्व = अवर्ण तथा पर = इवर्ण दोनों के स्थान पर प्रकृत आद् गुणः (२७) सूत्र द्वारा एक गुण प्राप्त होता है । अदेङ् गुणः (२५) सूत्र के अनुसार 'अ, ए, ओ' ये तीन गुण हैं । अब इन तीनों में से कौन सा गुण 'अ+इ' के स्थान पर किया जाये ? इस शङ्का के उत्पन्न होने पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र से स्थान-कृत आनन्तर्य द्वारा 'अ+इ' के स्थान पर 'ए' गुण हो जाता है १. इस अधिकार के २१ सूत्र लघुसिद्धान्तकौमुदी में प्रयुक्त किये गये हैं। तथाहि— १. अन्तादिवच्च (४१); २. आद् गुणः (२७); ३. वृद्धिरेचि (३३); ४. एत्येधत्यूठ्सु (३४); ५. आटश्च (१६७); ६. उपसर्गादृति धातौ (३७); ७. ओतोम्शसोः (२१४); ८. एङि पर-रूपम् (३८); ९. ओमाङोश्च (४०); १०. उस्यपदान्तात् (४६२); ११. अतो गुणे (२७४); १२. अकः सवर्णे दीर्घः (४२); १३. प्रथमयोः पूर्व-सवर्णः (१२६); १४. तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७); १५. नादिचि (१२७); १६. दीर्घाज्जसि च (१६२); १७. अमि पूर्वः (१३५); १८. सम्प्रसारणाच्च (२५८); १६. एङः पदान्तादति (४३); २०. ङसि-ङसोश्च (१७३); २१. ऋत उत् (२०८); इन सूत्रों को सदा ध्यान में रखना चाहिये।
५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
['अ+इ' का स्थान 'कण्ठ+तालु' है, गुणों में कण्ठ+तालु स्थान वाला 'ए' ही है]। उप् 'ए' न्द्र = 'उपेन्द्र' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। गङ्गोदकम् (गङ्गा का जल)। गङ्गा + उदक' यहां गकारोत्तर 'आ' अवर्ण है, इस से परे 'उदक' का आदि 'उ' अच् विद्यमान है। 'आ+उ' का स्थान 'कण्ठ+ ओष्ठ' है। तीनों गुणों में 'कण्ठ+ओष्ठ स्थान ओ' का ही है, अतः पूर्व = आ और पर = उ इन दोनों के स्थान पर² आद् गुण (२७) द्वारा 'ओ' यह एक गुण आदेश हो कर- गङ्ग् 'ओ' दक = 'गङ्गोदकम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अवर्ण से ऋ, ऌ परे वाले उदाहरणों में उरण्रपर (२६) सूत्र का उपयोग किया जाता है, वह सूत्र 'रँ' प्रत्याहार के आधीन है अतः प्रथम रँ' प्रत्याहार की सिद्धि के लिये 'इत्' संज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् — (२८) उपदेशेऽजनुनासिक इत् ।१।३।२॥ उपदेशेऽनुनासिकोऽज् इत्संज्ञः स्यात् । प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणि- नीयाः । 'लँण्' (प्रत्याहारसूत्र ६) सूत्रस्थावर्णेन सहोच्चार्यमाणो रेफो रलयो र्सज्ञा ॥ अर्थ — जो अच् उपदेश अवस्था में अनुनासिक हो, उस की इत् संज्ञा होती है। प्रतिज्ञेति — पाणिनि के वर्ण प्रतिज्ञा अर्थात् गुरु-परम्परा के उपदेश से अनुनासिक धर्म वाले हैं। लँण् इति — 'लँण्' सूत्र में स्थित लकारोत्तर अवर्ण (अन्त्य) के साथ युक्त हुआ रेफ (आदि) र् और ल् वर्णों की संज्ञा होता है। व्याख्या—उपदेशे ।७।१। अच् ।१।१। अनुनासिकः ।१।१। इत् ।१।१। अर्थ — (उपदेशे) उपदेश अवस्था में (अनुनासिकः) अनुनासिक (अच्) अच् (इत्) इत्- संज्ञक होता है। महामुनि पाणिनि ने अपने व्याकरण में अनुनासिक अचों पर (ँ) इस प्रकार का चिह्न किया था³, परन्तु अब वह अनुनासिक-पाठ परिभ्रष्ट हो गया है।
१ जब समासादि में सन्धि हो चुकती है तब विभक्ति की उत्पत्ति हुआ करती है— यह हम पीछे लिख चुके हैं, सर्वत्र नहीं लिखेंगे। २ यद्यपि 'गङ्गा+उदक' में 'आ+उ' स्थानी के त्रिमात्र होने से आदेश 'ओ' भी सदृशतम त्रिमात्र होना चाहिये तथापि अदेङ् गुण (२५) में एङ् के तपर होने से द्विमात्र 'ओ' ही गुण एङ् हो जाता है। यह पूर्व-सूत्र में सङ्केतित कर आये हैं। ३ जैसे 'एधँ वृद्धौ, गम्ऌँ गतौ, यजँ देवपूजा-सङ्गतिकरण-दानेषु' इन में अनुनासिक के चिह्न होने से ये अच् पाणिनि को 'इत्' अभीष्ट हैं। अनुदात्तेत् होने से एध् धातु आत्मनेपदी और स्वरितेत् होने से यज् धातु उभयपदी है। 'गम्ऌँ' धातु में लृकार न अनुदात्त है और न स्वरित अतः अवशिष्ट उदात्त है, उदात्तेत् होने से गम् धातु परस्मैपदी है। इत्-संज्ञा किसी प्रयोजन के लिये होती है। प्रयोजना-
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५३ अतः अब अनुनासिक जानने की व्यवस्था इस प्रकार समझनी चाहिये—प्रतिज्ञाऽनुना- सिक्याः पाणिनीयाः। पाणिनीयाः = पाणिनिना प्रोक्ता वर्णाः, प्रतिज्ञा = गुरुपरम्परी- पदेशेन आनुनासिकाः = अनुनासिक-धर्मवन्तः सन्तीति शेषः। अर्थः—पाणिनि मे कहे गये वर्ण गुरु-परम्परा के उपदेशानुसार अनुनासिक धर्म वाले जानने चाहियें। तात्पर्य यह है कि अनुनासिक के विषय में अब तक आ रही गुरु-परम्परा का आश्रय करना ही युक्त है; गुरुपरम्परा में जो जो अनुनासिक चला आ रहा है उसे अनुनासिक और जो अनुनासिक नहीं माना जा रहा उसे अनुनासिक न मानना ही ठीक है। इस सूत्र में लँण् इस छठे प्रत्याहारसूत्र में लकारोत्तर अकार की इत् सञ्ज्ञा हो जाती है; क्योंकि गुरु-परम्परा में लँण्मध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः ऐसा प्रवाद चला आ रहा है अतः यह अनुनासिक 'लँण्' इस रूप में है। इस अन्त्य इत् = अकार के साथ हयवरट् (प्रत्याहार० ५) सूत्र का 'र्' [देखो—हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः] मिलाने से र्+अँ = 'रँ' प्रत्याहार बन जाता है, इस 'रँ' प्रत्याहार के अन्तर्गत 'र्' और 'ल्' ये दो वर्ण आते हैं। टकार हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्-सञ्ज्ञक है अतः मध्यवर्ती होने पर भी इस का ग्रहण नहीं होता। अब इस 'रँ' प्रत्याहार का अग्रिम-सूत्र में उपयोग बतलाते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२६) उरण् रपरः ।१।१।५०॥ 'ऋ इति त्रिंशतः सञ्ज्ञा' इत्युक्तम्; तत्स्थाने योऽण् स रँपरः सन्नेव प्रवर्त्तते। कृष्णर्द्धिः। तवल्कारः॥ अर्थः—'ऋ' यह तीस की सञ्ज्ञा है; यह हम पीछे [अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः (११) सूत्र पर] कह चुके हैं। उस तीस प्रकार वाले 'ऋ' के स्थान पर यदि अण् आदेश करना हो तो वह 'रँ' प्रत्याहार परे वाला ही प्रवृत्त होता है। व्याख्या—उः ।६।१। ('ऋ' शब्द के षष्ठी के एकवचन में 'पितुः' के समान 'उः' प्रयोग बनता है)। अण् ।१।१। रँपरः ।१।१। समासः—रँः परो यस्माद् असौ रँपरः, बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(उः) 'ऋ' वर्ण के स्थान पर (अण्) अण् अर्थात् अ, इ, उ (रँपरः) 'रँ' प्रत्याहार परे वाले होते हैं। अणुदित् सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः (११) सूत्र पर 'ऋ' की तीस सञ्ज्ञाओं का प्रतिपादन कर चुके हैं; उस 'ऋ' के स्थान पर यदि अण् (अ इ उ) आदेश होगा तो वह 'रँ' प्रत्याहार परे वाला अर्थात् उस से परे र् और ल् वर्ण भी होंगे। यथा—अर्, अल्, आर्, आल्, इर्, इल्, उर्, उल् इत्यादि। उदाहरण यथा— भाव में अच् उच्चारणार्थक ही माना जाता है। कुछ लोग सुखोच्चारण को भी एक प्रयोजन मान कर वहां पर भी इत्संज्ञा की प्रवृत्ति स्वीकार करते हैं। हम ने इस व्याख्या में गुरुपरम्परागत इन अनुनासिक चिह्नों को यथावत् अङ्कित करने का प्रथम प्रयास किया है। आशा है विद्यार्थियों को इस से सुविधा होगी।
५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् कृष्णर्द्धि (कृष्ण की समृद्धि) । 'कृष्ण + ऋद्धि' यहां णकारोत्तर अवर्ण से परे ऋकार = अच् के विद्यमान होने से आद् गुण (२७) सूत्र द्वारा पूर्व + पर के स्थान पर एक गुण प्राप्त होता है । 'अ + ऋ' का स्थान 'कण्ठ + मूर्धा' है। तीनों गुणों में 'कण्ठ' स्थान तो सब का मिलता है पर मूर्धा-स्थान किसी का नहीं मिलता । अब यदि पूर्व + पर के स्थान पर 'अ' गुण करें तो प्रकृतसूत्रद्वारा उस से परे 'रँ' प्रत्याहार प्राप्त हो जाता है । 'रँ' प्रत्याहार में र् और ल् दो वर्ण आते हैं, स्थानेऽन्तरतम (१७) द्वारा 'ऋ' के स्थान पर अण् करने पर उस से परे 'र्' और 'ॡ' के स्थान पर अण् करने पर उस से परे 'ल्' भी साथ में प्रवृत्त हो जाता है । यहां पूर्व + पर के स्थान पर एकादेश होने से 'ऋ' के स्थान पर अण् (अ) करना है, अतः उस से परे 'र्' भी हो जाता है । इस प्रकार 'अर्' का स्थान 'कण्ठ + मूर्धा' होने से स्थानीय और आदेश तुल्य हो जाते हैं । तो अब अर्' एकादेश करने से— कृष्ण् 'अर्' द्धि = 'कृष्णर्द्धि ' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । तवल्कार (तेरा लृकार) । तव + लृकार यहां आद् गुण (२७) से गुण एकादेश प्राप्त होने पर उरण्रपर. (२६) से रँ' प्रत्याहार भी पर प्राप्त होता है । अब स्थानेऽन्तरतम. (१७) सूत्र से कण्ठ + दन्त स्थान वाले 'अ + ॡ' के स्थान पर तादृश सपर अण् होकर तव् 'अल्' कार = 'तवल्कार' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । अभ्यास (४) (१) निम्नलिखित रूपों में सन्धिविच्छेद कर उस सूत्रों द्वारा सिद्ध करें— १ गजेन्द्र । २ परीक्षोत्सव । ३ वसन्तर्तु । ४ रमेश । ५ सूर्यो- दय । ६ गणेश । ७ देवर्षि । ८ ममल्कार । ९ हितोपदेश । १० तथेति । ११. अत्यन्तोर्ध्वम् । १२ परमोत्तम । १३ नेति । १४ यथेच्छम् । १५ उमेश । १६ महर्षि । १७ यज्ञोपवीतम् । १८ महेष्वास । १६ विक्लेन्द्रिय । २० तवोत्साह । २१ वेदर्क । २२. दयोदयोज्ज्वल । २३ उत्तमर्ण । २४ प्रेक्षते । २५ गुडाकेश । (२) अधोलिखित प्रयोगों में उपपत्ति-पूर्वक सूत्रों द्वारा सन्धि करें— १ महा + ईश । २ कण्ठ + उच्चारण । ३ राम + इतिहास । १ जलतुम्ब्बिकान्यायेन रेफस्योर्ध्वगमनम्—जैसे जल में तुम्बी (शुष्क लौकी) डालने पर वह ऊपर ही ऊपर आ जाती है वैसे देवनागरी लिपि में हल् अर्थात् व्यञ्जन के परे रहते रेफ का भी सदा ऊर्ध्वगमन होता है । जैसे—अर् + थ = अर्थ । आर् + य = आर्य । ध्यान रहे कि यह रेफ अपने से आगे सस्वर व्यञ्जन के सिर पर ही चढ़ता है चाहे वह व्यञ्जन उस शब्द में कितनी भी दूर क्या न हो । यथा— मूर् + च्छना = मूर्च्छना । कार् + त्स्न्य = कात्स्न्र्य । कहा भी है— तुम्ब्बिकातृणकाष्ठं च तैलं जलमुपागतम् । स्वभावादूर्ध्वमायाति रेफस्यैतादृशी गतिः ॥
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५५ ४. न + उपलब्धिः । ५. भाष्यकार + दृष्टि । ६. परम + उपकारक । ७. स्वच्छ + उदक । ८. नतत + उक्षन । ६. तव + लृदन्तः । १०. ग्रीष्म
- ऋतु । ११. सप्त + ऋषि । १२. मम + लृवर्णः । १३. अधम + ऋण । १४. आ + उदकान्तात् । १५. पाप + ऋद्धि । ( ३ ) उरण्रपरः मे अण् किस णकार मे गृहीत होता है और क्यों ? ( ४ ) 'ऋ' की तीन सञ्ज्ञाओं का उल्लेख करें । ( ५ ) 'र्' प्रत्याहार की तसूत्र सिद्धि लिख कर तदन्तर्गत वर्णों को लिखते हुए 'र्' प्रत्याहार को स्वीकार करने का प्रयोजन भी स्पष्ट करें । ( ६ ) अनुनासिक जानने की आजकल क्या व्यवस्था है ? सविस्तर लिखें । ( ७ ) तपर करने का प्रयोजन सोदाहरण स्पष्ट करें । ( ८ ) आद् गुणः सूत्र किस २ सूत्र का अपवाद है; सोदाहरण लिखें । —: : ० : : — [लघु०] विधि-सूत्रम् —( ३० ) लोपः शाकल्यस्य ।८।३।१९॥ अवर्ण-पूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्लोपो वाऽशि परे ॥ अर्थः —अश् प्रत्याहार परे होने पर अवर्ण पूर्व वाले पदान्त यकार वकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है । व्याख्या —अ-पूर्वयोः ।६।२। (भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि से 'अ-पूर्वस्य' अंश की अनुवृत्ति आकर वचन-विपरिणाम हो जाता है) । व्योः ।६।२। (व्योर्लघु- प्रयत्नतरः शाकटायनस्य से) । पदान्तयोः ।६।२। (पदस्य यह पीछे से अधिकार चला आ रहा है । 'व्योः' का विशेषण होने से इस से तदन्त-विधि हो कर वचन-विपरिणाम से द्विवचन हो जाता है) । लोपः ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। अशि ।७।१। (भो-भगो- अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि से) । समासः—अः = अवर्णः पूर्वो याभ्यां तौ = अ-पूर्वो, तयोः = अपूर्वयोः, बहुव्रीहि-समासः । व् च य् च = व्यौ, तयोः = व्योः, इतरेतर-द्वन्द्वः । अर्थः---(अ-पूर्वयोः) अवर्ण पूर्व वाले (पदान्तयोः) पदान्त (व्योः) वकार यकार का (अशि) अश् परे होने पर (लोपः) लोप हो जाता है । (शाकल्यस्य) यह कार्य शाकल्याचार्य का है । यह लोप शाकल्याचार्य —जो पाणिनि से पूर्व व्याकरण के एक महान् आचार्य हो चुके हैं—के मत में होता है; पाणिनि के मत में नहीं । हमें दोनों आचार्य प्रमाण हैं अतः विकल्प से लोप होगा । उदाहरण यथा— 'हरे + इह', 'विष्णो + इह' यहां 'हरे' और 'विष्णो' पद सम्बोधन के एकवच- नान्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) के अनुसार पद-सञ्ज्ञक हैं । इन दोनों में एचो- ऽयवायावः (२२) सूत्र से क्रमशः एकार को अय् और ओकार को अव् आदेश हो कर— 'हर् अय् + इह' 'विष्ण् अव् + इह' बन जाते हैं । अब पुनः दोनों रूपों में 'इह' के आदि इकार = अश् के परे होने पर पदान्त यकार वकार का प्रकृतसूत्र (३०) द्वारा विकल्प से लोप हो कर लोपपक्ष में—'हर् अ + इह; विष्ण् अ + इह' तथा लोप के अभाव में—'हरय् + इह; विष्णव् + इह' बना । अब लोप-पक्ष के रूपों में आद् गुणः
५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (२७) सूत्र द्वारा 'अ+इ' के स्थान पर 'ए' तथा 'अ+उ' के स्थान पर 'ओ' गुण एकादेश प्राप्त होता है । इस पर इस के निवारणार्थ अग्रिम-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] अधिकार-सूत्रम्—(३१) पूर्वत्रासिद्धम् ।८।२।१॥ सपाद-सप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रमसिद्धम् । हर इह, हरयिह । विष्ण इह, विष्णविह ॥ अर्थ —सवा सात अध्यायों के प्रति त्रिपादी-सूत्र असिद्ध होते हैं और त्रिपादी सूत्रों में भी पूर्वशास्त्र के प्रति पर-शास्त्र असिद्ध होता है । व्याख्या—अष्टाध्यायी में आठ अध्याय और प्रत्येक अध्याय में चार चार पाद हैं, यह सब पीछे संज्ञा-प्रकरण में विस्तार पूर्वक स्पष्ट कर चुके हैं । सात अध्याय सम्पूर्ण और आठवें अध्याय के प्रथम-पाद के व्यतीत होने पर आठवें अध्याय के दूसरे पाद का यह प्रथम-सूत्र है । यह अधिकार-सूत्र है । अधिकारसूत्र स्वयं कुछ नहीं किया करते किन्तु अग्रिम-सूत्रों में अनुवृत्ति के लिये हुआ करते हैं । उन की अवधि (हद्द) निश्चित हुआ करती है । इस सूत्र का अधिकार यहां से लेकर अ अ (८।४।६७) सूत्र अर्थात् अष्टाध्यायी के अन्तिमसूत्र तक जाता है । इस प्रकार आठवें अध्याय का दूसरा, तीसरा तथा चौथा पाद इस के अधिकार में आता है । यह सूत्र इन तीनों पादों के सूत्रों में जा कर अनुवृत्ति करता है कि तू (पूर्वत्र इत्यव्ययपदम्) पूर्व-शास्त्र में (असिद्धम् ।१।२।) असिद्ध है, अर्थात् पूर्व की दृष्टि में तेरा कोई अस्तित्त्व ही नहीं । इस से यह होता है कि इन तीन पादों के सूत्र पूर्व-घटित सवा सात अध्यायों की दृष्टि में तथा इन तीन पादों में भी पूर्व के प्रति पर-सूत्र असिद्ध हो जाता है । यथा—आद् गुणः (२७) सवा सात अध्यायों के अन्तर्गत-सूत्र है [यह छठे अध्याय के प्रथम पाद का ८४ वा सूत्र है]। इसकी दृष्टि में आठवें अध्याय के तीसरे पाद में वर्त्तमान लोपः शाकल्यस्य (३०) सूत्र असिद्ध है, अतः आद् गुणः (२७) सूत्र लोपः शाकल्यस्य (३०) सूत्र द्वारा किये गये यकार-वकार के लोप को नहीं देखता, इसे तो अब भी यकार-वकार सामने पड़े हुए दीख रहे हैं । अवर्ण से परे यकार-वकार के दिखाई देने से अच् परे न होने के कारण आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश नहीं होता—हर इह, विष्ण इह—ऐसे ही अवस्थित रहते हैं । इस प्रकार—लोप-पक्ष में 'हर इह, विष्ण इह' तथा लोपाभावपक्ष में 'हरयिह, विष्णविह' रूप सिद्ध होते हैं ।¹ अभ्यास (५) (१) कौमुदीस्थ लम्बा-चौड़ा अर्थ पूर्वत्रासिद्धम् सूत्र का कैसे हो जाता है ? (२) सूत्र में विकल्प वाचक पद के न होने पर भी लोपः शाकल्यस्य सूत्र कैसे वैकल्पिक लोप किया करता है ? १ त्रिपाद्यां में पूर्व के प्रति पर-शास्त्र की असिद्धि में उदाहरण यथा—किम्मुक्तम् । यहां पर मोऽनुस्वारः (८।३।२३) इस पूर्व त्रिपादी सूत्र के प्रति मयो ञ्ञो वो वा (८।३।३३) इस पर-त्रिपादी-सूत्र के असिद्ध होने से (अर्थात् व् की जगह उ = अच् होने से) म् को अनुस्वार नहीं होता ।