भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् व्याख्या—अत् १।१। एङ् १।१। गुण १।१। अर्थ — (अत्, एङ्) अ, ए, ओ ये तीन वर्ण (गुण) गुण-सञ्ज्ञक होते हैं । इस सूत्र पर जो वक्तव्य है वह अग्रिम सूत्र पर लिखा जायेगा । [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (२६) तपरस्तत्कालस्य ।१।१।६६॥ त परो यस्मात् स च तात् परश्चोच्चार्यमाणसमकालस्यैव सञ्ज्ञा स्यात् ॥ अर्थ.—‘त्’ जिससे परे है और ‘त्’ से जो परे है वह अपने सदृश काल वाले की सञ्ज्ञा होता है । व्याख्या—तपर १।१। तत्कालस्य ६।१। स्वस्य ६।१। (स्वं रूपं शब्दस्या- शब्दसञ्ज्ञा से विभक्ति-विपरिणाम करके) । समास — तात् पर तपर, पञ्चमी- तत्पुरुष । त परो यस्मादसौ तपर, बहुव्रीहि समास । तस्य = तपरत्वेनोच्चार्यमाणस्य काल इव कालो यस्य स तत्काल तस्य = तत्कालस्य, बहुव्रीहि-समास । अर्थ — (तपर) ‘त’ जिससे परे है और ‘त्’ से जो परे है वह (तत्कालस्य) अपने काल के समान काल वाले की तथा (स्वस्य) अपनी सञ्ज्ञा होता है । अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्यय (११) सूत्र द्वारा अण् अपने तथा अपने सवर्णों के बोधक होते हैं, यह पीछे कह चुके हैं । यह सूत्र उस का अपवाद (निषेध करने वाला) है । जिस के आगे या पीछे ‘त्’ लगाया जाये वह केवल अपना तथा अपने काल के सदृश काल वाले सवर्णों का ही ग्राहक हो अन्य सवर्णों का न हो, यही इस सूत्र का तात्पर्य है । यथा अदेङ् गुण (२५) यहां ‘अ’ तपर है, क्योंकि इस से परे ‘त्’ है, एवम् ‘एङ्’ भी तपर है, क्योंकि यह ‘त्’ से परे है । अब यहां ‘अ’ और ‘एङ्’ ये दोनो तपर अण् प्रत्याहार के अन्तर्गत होते हुए भी अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्यय (११) सूत्र द्वारा अपने सम्पूर्ण सवर्णों का ग्रहण न करायेंगे, किन्तु उन्हीं सवर्णों का ग्रहण करायेंगे जिन का काल इन के साथ तुल्य होगा । ‘अ’ यह एक-मात्रिक है, अतः यह अपने एक-मात्रिक सवर्णों का ही बोधक होगा दीर्घादियो का नहीं । एङ् अर्थात् ‘ए’, ‘ओ’ द्वि-मात्रिक हैं, अतः ये अपने द्विमात्रिक सवर्णों के ही बोधक होंगे प्लुतो के नहीं । तात्पर्य यह हुआ कि तपर अ¹—केवल अपने समकाल वाले छ ह्रस्व-भेदों का ही ग्राहक होगा सम्पूर्ण अठारह भेदों का नहीं । इसी प्रकार तपर ‘ए, ओ’—केवल अपने समकाल वाले छ दीर्घ भेदों के ही ग्राहक होंगे सम्पूर्ण बारह भेदों के नहीं । एवम् तपर इ, उ, ऋ, आ, ई आदियों में भी समझ लेना चाहिये ¹ १ ध्यान रहे कि इस तपर से अतिरिक्त विभक्ति-तपर भी हुआ करता है । यथा आद् गुणः (२७) यहां पर ‘आत्’ यह ‘अ’ शब्द की पञ्चमी का ‘त’ है, अतः यहां पर ह्रस्व (उपेन्द्र) दीर्घ (रमेश) दोनो अकारों का ग्रहण हो जाता है । इस में उपसर्गादृति धातौ (३७) सूत्र ज्ञापक है । ‘उपसर्गात्’ यहां पञ्चमी का ‘त्’ है, यदि यहां पर भी तपरस्तत्कालस्य (२६) का उपयोग करते हैं, तो फिर उस से परे स्थित ‘ऋ’ में तपर-ग्रहण व्यर्थ हो जाता है ।