भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५१ तो अब अदेङ् गुणः (२५) सूत्र का यह अर्थ हुआ—ह्रस्व अकार, दीर्घ एकार तथा दीर्घ ओकार गुण-सञ्ज्ञक होते हैं । अब अग्रिम-सूत्र में गुण-सञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम् – (२७) आद् गुणः ।६।१।८७।। अवर्णादचि परे पूर्व-परयोरेको गुण आदेशः स्यात् । उपेन्द्रः । गङ्गो- दकम् ॥ अर्थः—अवर्ण से अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान पर एक गुण आदेश हो जाता है । व्याख्या—अष्टाध्यायी के छठे अध्याय के प्रथम-पाद में एकः पूर्व-परयोः (६.१.८१) यह अधिकार-सूत्र है, इस का अधिकार एत्येधत्यूठ्सु (६.१.१०८) सूत्र के पूर्व तक जाता है। इस अधिकार' में 'पूर्व पर दोनों के स्थान पर एक आदेश होता है'। यह आद् गुणः (२७) सूत्र भी इसी अधिकार में पढ़ा गया है । आत् ।१।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधि- कृत है) । गुणः ।१।१। अर्थः – (आत्) अवर्ण से (अचि) अच् परे होने पर (पूर्व- परयोः) पूर्व और पर के स्थान पर (एकः) एक (गुणः) गुण आदेश होता है । अवर्ण से अवर्ण परे होने पर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) तथा अवर्ण से 'ए, ओ, ऐ, औ' परे होने पर वृद्धिरेचि (३३) सूत्र इस गुण का बाध कर लेते हैं, अतः अवर्ण से इकार, उकार, ऋकार तथा लृकार परे होने पर ही गुण प्रवृत्त होता है । उदाहरण यथा—उपेन्द्रः (विष्णु) । 'उप + इन्द्र' यहां पकारोत्तर अवर्ण से परे 'इन्द्र' का आदि अच् 'इ' विद्यमान है, अतः पूर्व = अवर्ण तथा पर = इवर्ण दोनों के स्थान पर प्रकृत आद् गुणः (२७) सूत्र द्वारा एक गुण प्राप्त होता है । अदेङ् गुणः (२५) सूत्र के अनुसार 'अ, ए, ओ' ये तीन गुण हैं । अब इन तीनों में से कौन सा गुण 'अ+इ' के स्थान पर किया जाये ? इस शङ्का के उत्पन्न होने पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र से स्थान-कृत आनन्तर्य द्वारा 'अ+इ' के स्थान पर 'ए' गुण हो जाता है १. इस अधिकार के २१ सूत्र लघुसिद्धान्तकौमुदी में प्रयुक्त किये गये हैं। तथाहि— १. अन्तादिवच्च (४१); २. आद् गुणः (२७); ३. वृद्धिरेचि (३३); ४. एत्येधत्यूठ्सु (३४); ५. आटश्च (१६७); ६. उपसर्गादृति धातौ (३७); ७. ओतोम्शसोः (२१४); ८. एङि पर-रूपम् (३८); ९. ओमाङोश्च (४०); १०. उस्यपदान्तात् (४६२); ११. अतो गुणे (२७४); १२. अकः सवर्णे दीर्घः (४२); १३. प्रथमयोः पूर्व-सवर्णः (१२६); १४. तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७); १५. नादिचि (१२७); १६. दीर्घाज्जसि च (१६२); १७. अमि पूर्वः (१३५); १८. सम्प्रसारणाच्च (२५८); १६. एङः पदान्तादति (४३); २०. ङसि-ङसोश्च (१७३); २१. ऋत उत् (२०८); इन सूत्रों को सदा ध्यान में रखना चाहिये।