लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
['अ+इ' का स्थान 'कण्ठ+तालु' है, गुणों में कण्ठ+तालु स्थान वाला 'ए' ही है]। उप् 'ए' न्द्र = 'उपेन्द्र' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। गङ्गोदकम् (गङ्गा का जल)। गङ्गा + उदक' यहां गकारोत्तर 'आ' अवर्ण है, इस से परे 'उदक' का आदि 'उ' अच् विद्यमान है। 'आ+उ' का स्थान 'कण्ठ+ ओष्ठ' है। तीनों गुणों में 'कण्ठ+ओष्ठ स्थान ओ' का ही है, अतः पूर्व = आ और पर = उ इन दोनों के स्थान पर² आद् गुण (२७) द्वारा 'ओ' यह एक गुण आदेश हो कर- गङ्ग् 'ओ' दक = 'गङ्गोदकम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अवर्ण से ऋ, ऌ परे वाले उदाहरणों में उरण्रपर (२६) सूत्र का उपयोग किया जाता है, वह सूत्र 'रँ' प्रत्याहार के आधीन है अतः प्रथम रँ' प्रत्याहार की सिद्धि के लिये 'इत्' संज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् — (२८) उपदेशेऽजनुनासिक इत् ।१।३।२॥ उपदेशेऽनुनासिकोऽज् इत्संज्ञः स्यात् । प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणि- नीयाः । 'लँण्' (प्रत्याहारसूत्र ६) सूत्रस्थावर्णेन सहोच्चार्यमाणो रेफो रलयो र्सज्ञा ॥ अर्थ — जो अच् उपदेश अवस्था में अनुनासिक हो, उस की इत् संज्ञा होती है। प्रतिज्ञेति — पाणिनि के वर्ण प्रतिज्ञा अर्थात् गुरु-परम्परा के उपदेश से अनुनासिक धर्म वाले हैं। लँण् इति — 'लँण्' सूत्र में स्थित लकारोत्तर अवर्ण (अन्त्य) के साथ युक्त हुआ रेफ (आदि) र् और ल् वर्णों की संज्ञा होता है। व्याख्या—उपदेशे ।७।१। अच् ।१।१। अनुनासिकः ।१।१। इत् ।१।१। अर्थ — (उपदेशे) उपदेश अवस्था में (अनुनासिकः) अनुनासिक (अच्) अच् (इत्) इत्- संज्ञक होता है। महामुनि पाणिनि ने अपने व्याकरण में अनुनासिक अचों पर (ँ) इस प्रकार का चिह्न किया था³, परन्तु अब वह अनुनासिक-पाठ परिभ्रष्ट हो गया है।
१ जब समासादि में सन्धि हो चुकती है तब विभक्ति की उत्पत्ति हुआ करती है— यह हम पीछे लिख चुके हैं, सर्वत्र नहीं लिखेंगे। २ यद्यपि 'गङ्गा+उदक' में 'आ+उ' स्थानी के त्रिमात्र होने से आदेश 'ओ' भी सदृशतम त्रिमात्र होना चाहिये तथापि अदेङ् गुण (२५) में एङ् के तपर होने से द्विमात्र 'ओ' ही गुण एङ् हो जाता है। यह पूर्व-सूत्र में सङ्केतित कर आये हैं। ३ जैसे 'एधँ वृद्धौ, गम्ऌँ गतौ, यजँ देवपूजा-सङ्गतिकरण-दानेषु' इन में अनुनासिक के चिह्न होने से ये अच् पाणिनि को 'इत्' अभीष्ट हैं। अनुदात्तेत् होने से एध् धातु आत्मनेपदी और स्वरितेत् होने से यज् धातु उभयपदी है। 'गम्ऌँ' धातु में लृकार न अनुदात्त है और न स्वरित अतः अवशिष्ट उदात्त है, उदात्तेत् होने से गम् धातु परस्मैपदी है। इत्-संज्ञा किसी प्रयोजन के लिये होती है। प्रयोजना-