लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ५३ अतः अब अनुनासिक जानने की व्यवस्था इस प्रकार समझनी चाहिये—प्रतिज्ञाऽनुना- सिक्याः पाणिनीयाः। पाणिनीयाः = पाणिनिना प्रोक्ता वर्णाः, प्रतिज्ञा = गुरुपरम्परी- पदेशेन आनुनासिकाः = अनुनासिक-धर्मवन्तः सन्तीति शेषः। अर्थः—पाणिनि मे कहे गये वर्ण गुरु-परम्परा के उपदेशानुसार अनुनासिक धर्म वाले जानने चाहियें। तात्पर्य यह है कि अनुनासिक के विषय में अब तक आ रही गुरु-परम्परा का आश्रय करना ही युक्त है; गुरुपरम्परा में जो जो अनुनासिक चला आ रहा है उसे अनुनासिक और जो अनुनासिक नहीं माना जा रहा उसे अनुनासिक न मानना ही ठीक है। इस सूत्र में लँण् इस छठे प्रत्याहारसूत्र में लकारोत्तर अकार की इत् सञ्ज्ञा हो जाती है; क्योंकि गुरु-परम्परा में लँण्मध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः ऐसा प्रवाद चला आ रहा है अतः यह अनुनासिक 'लँण्' इस रूप में है। इस अन्त्य इत् = अकार के साथ हयवरट् (प्रत्याहार० ५) सूत्र का 'र्' [देखो—हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः] मिलाने से र्+अँ = 'रँ' प्रत्याहार बन जाता है, इस 'रँ' प्रत्याहार के अन्तर्गत 'र्' और 'ल्' ये दो वर्ण आते हैं। टकार हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्-सञ्ज्ञक है अतः मध्यवर्ती होने पर भी इस का ग्रहण नहीं होता। अब इस 'रँ' प्रत्याहार का अग्रिम-सूत्र में उपयोग बतलाते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२६) उरण् रपरः ।१।१।५०॥ 'ऋ इति त्रिंशतः सञ्ज्ञा' इत्युक्तम्; तत्स्थाने योऽण् स रँपरः सन्नेव प्रवर्त्तते। कृष्णर्द्धिः। तवल्कारः॥ अर्थः—'ऋ' यह तीस की सञ्ज्ञा है; यह हम पीछे [अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः (११) सूत्र पर] कह चुके हैं। उस तीस प्रकार वाले 'ऋ' के स्थान पर यदि अण् आदेश करना हो तो वह 'रँ' प्रत्याहार परे वाला ही प्रवृत्त होता है। व्याख्या—उः ।६।१। ('ऋ' शब्द के षष्ठी के एकवचन में 'पितुः' के समान 'उः' प्रयोग बनता है)। अण् ।१।१। रँपरः ।१।१। समासः—रँः परो यस्माद् असौ रँपरः, बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(उः) 'ऋ' वर्ण के स्थान पर (अण्) अण् अर्थात् अ, इ, उ (रँपरः) 'रँ' प्रत्याहार परे वाले होते हैं। अणुदित् सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः (११) सूत्र पर 'ऋ' की तीस सञ्ज्ञाओं का प्रतिपादन कर चुके हैं; उस 'ऋ' के स्थान पर यदि अण् (अ इ उ) आदेश होगा तो वह 'रँ' प्रत्याहार परे वाला अर्थात् उस से परे र् और ल् वर्ण भी होंगे। यथा—अर्, अल्, आर्, आल्, इर्, इल्, उर्, उल् इत्यादि। उदाहरण यथा— भाव में अच् उच्चारणार्थक ही माना जाता है। कुछ लोग सुखोच्चारण को भी एक प्रयोजन मान कर वहां पर भी इत्संज्ञा की प्रवृत्ति स्वीकार करते हैं। हम ने इस व्याख्या में गुरुपरम्परागत इन अनुनासिक चिह्नों को यथावत् अङ्कित करने का प्रथम प्रयास किया है। आशा है विद्यार्थियों को इस से सुविधा होगी।