लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् कृष्णर्द्धि (कृष्ण की समृद्धि) । 'कृष्ण + ऋद्धि' यहां णकारोत्तर अवर्ण से परे ऋकार = अच् के विद्यमान होने से आद् गुण (२७) सूत्र द्वारा पूर्व + पर के स्थान पर एक गुण प्राप्त होता है । 'अ + ऋ' का स्थान 'कण्ठ + मूर्धा' है। तीनों गुणों में 'कण्ठ' स्थान तो सब का मिलता है पर मूर्धा-स्थान किसी का नहीं मिलता । अब यदि पूर्व + पर के स्थान पर 'अ' गुण करें तो प्रकृतसूत्रद्वारा उस से परे 'रँ' प्रत्याहार प्राप्त हो जाता है । 'रँ' प्रत्याहार में र् और ल् दो वर्ण आते हैं, स्थानेऽन्तरतम (१७) द्वारा 'ऋ' के स्थान पर अण् करने पर उस से परे 'र्' और 'ॡ' के स्थान पर अण् करने पर उस से परे 'ल्' भी साथ में प्रवृत्त हो जाता है । यहां पूर्व + पर के स्थान पर एकादेश होने से 'ऋ' के स्थान पर अण् (अ) करना है, अतः उस से परे 'र्' भी हो जाता है । इस प्रकार 'अर्' का स्थान 'कण्ठ + मूर्धा' होने से स्थानीय और आदेश तुल्य हो जाते हैं । तो अब अर्' एकादेश करने से— कृष्ण् 'अर्' द्धि = 'कृष्णर्द्धि ' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । तवल्कार (तेरा लृकार) । तव + लृकार यहां आद् गुण (२७) से गुण एकादेश प्राप्त होने पर उरण्रपर. (२६) से रँ' प्रत्याहार भी पर प्राप्त होता है । अब स्थानेऽन्तरतम. (१७) सूत्र से कण्ठ + दन्त स्थान वाले 'अ + ॡ' के स्थान पर तादृश सपर अण् होकर तव् 'अल्' कार = 'तवल्कार' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । अभ्यास (४) (१) निम्नलिखित रूपों में सन्धिविच्छेद कर उस सूत्रों द्वारा सिद्ध करें— १ गजेन्द्र । २ परीक्षोत्सव । ३ वसन्तर्तु । ४ रमेश । ५ सूर्यो- दय । ६ गणेश । ७ देवर्षि । ८ ममल्कार । ९ हितोपदेश । १० तथेति । ११. अत्यन्तोर्ध्वम् । १२ परमोत्तम । १३ नेति । १४ यथेच्छम् । १५ उमेश । १६ महर्षि । १७ यज्ञोपवीतम् । १८ महेष्वास । १६ विक्लेन्द्रिय । २० तवोत्साह । २१ वेदर्क । २२. दयोदयोज्ज्वल । २३ उत्तमर्ण । २४ प्रेक्षते । २५ गुडाकेश । (२) अधोलिखित प्रयोगों में उपपत्ति-पूर्वक सूत्रों द्वारा सन्धि करें— १ महा + ईश । २ कण्ठ + उच्चारण । ३ राम + इतिहास । १ जलतुम्ब्बिकान्यायेन रेफस्योर्ध्वगमनम्—जैसे जल में तुम्बी (शुष्क लौकी) डालने पर वह ऊपर ही ऊपर आ जाती है वैसे देवनागरी लिपि में हल् अर्थात् व्यञ्जन के परे रहते रेफ का भी सदा ऊर्ध्वगमन होता है । जैसे—अर् + थ = अर्थ । आर् + य = आर्य । ध्यान रहे कि यह रेफ अपने से आगे सस्वर व्यञ्जन के सिर पर ही चढ़ता है चाहे वह व्यञ्जन उस शब्द में कितनी भी दूर क्या न हो । यथा— मूर् + च्छना = मूर्च्छना । कार् + त्स्न्य = कात्स्न्र्य । कहा भी है— तुम्ब्बिकातृणकाष्ठं च तैलं जलमुपागतम् । स्वभावादूर्ध्वमायाति रेफस्यैतादृशी गतिः ॥