लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५५ ४. न + उपलब्धिः । ५. भाष्यकार + दृष्टि । ६. परम + उपकारक । ७. स्वच्छ + उदक । ८. नतत + उक्षन । ६. तव + लृदन्तः । १०. ग्रीष्म
- ऋतु । ११. सप्त + ऋषि । १२. मम + लृवर्णः । १३. अधम + ऋण । १४. आ + उदकान्तात् । १५. पाप + ऋद्धि । ( ३ ) उरण्रपरः मे अण् किस णकार मे गृहीत होता है और क्यों ? ( ४ ) 'ऋ' की तीन सञ्ज्ञाओं का उल्लेख करें । ( ५ ) 'र्' प्रत्याहार की तसूत्र सिद्धि लिख कर तदन्तर्गत वर्णों को लिखते हुए 'र्' प्रत्याहार को स्वीकार करने का प्रयोजन भी स्पष्ट करें । ( ६ ) अनुनासिक जानने की आजकल क्या व्यवस्था है ? सविस्तर लिखें । ( ७ ) तपर करने का प्रयोजन सोदाहरण स्पष्ट करें । ( ८ ) आद् गुणः सूत्र किस २ सूत्र का अपवाद है; सोदाहरण लिखें । —: : ० : : — [लघु०] विधि-सूत्रम् —( ३० ) लोपः शाकल्यस्य ।८।३।१९॥ अवर्ण-पूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्लोपो वाऽशि परे ॥ अर्थः —अश् प्रत्याहार परे होने पर अवर्ण पूर्व वाले पदान्त यकार वकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है । व्याख्या —अ-पूर्वयोः ।६।२। (भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि से 'अ-पूर्वस्य' अंश की अनुवृत्ति आकर वचन-विपरिणाम हो जाता है) । व्योः ।६।२। (व्योर्लघु- प्रयत्नतरः शाकटायनस्य से) । पदान्तयोः ।६।२। (पदस्य यह पीछे से अधिकार चला आ रहा है । 'व्योः' का विशेषण होने से इस से तदन्त-विधि हो कर वचन-विपरिणाम से द्विवचन हो जाता है) । लोपः ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। अशि ।७।१। (भो-भगो- अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि से) । समासः—अः = अवर्णः पूर्वो याभ्यां तौ = अ-पूर्वो, तयोः = अपूर्वयोः, बहुव्रीहि-समासः । व् च य् च = व्यौ, तयोः = व्योः, इतरेतर-द्वन्द्वः । अर्थः---(अ-पूर्वयोः) अवर्ण पूर्व वाले (पदान्तयोः) पदान्त (व्योः) वकार यकार का (अशि) अश् परे होने पर (लोपः) लोप हो जाता है । (शाकल्यस्य) यह कार्य शाकल्याचार्य का है । यह लोप शाकल्याचार्य —जो पाणिनि से पूर्व व्याकरण के एक महान् आचार्य हो चुके हैं—के मत में होता है; पाणिनि के मत में नहीं । हमें दोनों आचार्य प्रमाण हैं अतः विकल्प से लोप होगा । उदाहरण यथा— 'हरे + इह', 'विष्णो + इह' यहां 'हरे' और 'विष्णो' पद सम्बोधन के एकवच- नान्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) के अनुसार पद-सञ्ज्ञक हैं । इन दोनों में एचो- ऽयवायावः (२२) सूत्र से क्रमशः एकार को अय् और ओकार को अव् आदेश हो कर— 'हर् अय् + इह' 'विष्ण् अव् + इह' बन जाते हैं । अब पुनः दोनों रूपों में 'इह' के आदि इकार = अश् के परे होने पर पदान्त यकार वकार का प्रकृतसूत्र (३०) द्वारा विकल्प से लोप हो कर लोपपक्ष में—'हर् अ + इह; विष्ण् अ + इह' तथा लोप के अभाव में—'हरय् + इह; विष्णव् + इह' बना । अब लोप-पक्ष के रूपों में आद् गुणः