लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पितृ + अर्च्चा । १२ अपि + एतत् । १३ वृक्षेषु + अभिलाष । १४ त्वष्टृ + आकाङ्क्षा । १५ दर्वी + अमी । १६ अभि + उदय । १७ प्रति + एक । १८ वधू + अलङ्कार । १६ वस्तु + अस्ति । २० भ्रातृ
- उत्त । २१ दधि + अशनम् । २२ तनु + अङ्गी । २३ स्त्री + उत्सव । २४ देवेषु + आसीत् । २५ मनु + आदि । (३) 'लाकृतिः' का क्या विग्रह है ? 'लृ' शब्द का षष्ठ्येकवचन तथा प्रथमै- कवचन क्या बनेगा ? अथवा 'लृ' शब्द का उच्चारण लिखें । (४) प्रसज्य और पर्युदास प्रतिषेधों का तात्पर्य अपनी भाषा में स्पष्ट करते हुए नायं शशो और अश्राद्धभोजी ब्राह्मणः में कौन-सा निषेध है सोप- पत्तिक लिखें । (५) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य अलोऽन्त्यस्य तथा स्थानेऽन्तरतम ये सूत्र यदि न होते तो कौन-कौन-सी हानियां होतीं ? सोदाहरण स्पष्ट करें । (६) अनचि च सूत्र में कौन सा प्रतिषेध है और वैसा मानने की क्या आव- श्यकता है ? (७) संहिता की विवक्षा कहां कहां नित्य और कहां कहां ऐच्छिक हुआ करती है ? सप्रमाण सोदाहरण विवेचन करें । (८) 'सुधी + उपास्य' में इकोऽसवर्णे० सूत्र से प्रकृतिभाव क्यों नहीं होता ? अथवा न मु-सुधियो में यण्निषेध ही क्यो नही होता ? [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२) एचोऽयवायावः । ६।१।७५॥ एचः क्रमाद् अय्, अव्, आय्, आव् एते स्युरचि ॥ अर्थ—अच् परे हो तो एच् के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् हों । व्याख्या—एचः ।६।१। (षष्ठी स्थाने-योगा के अनुसार यहां स्थान-षष्ठी है) । अयवायावः ।१।३। अचि ।७।१। (इको यणचि सूत्र से) । संहितायाम् ।७।१। (यह पीछे से अधिकृत है) । समास—अय् च अव् च आय् च आव् च = अयवायावः, इतरे- तरद्वन्द्वः । अर्थ—(अचि) अच् परे होने पर (संहितायाम्) संहिता के विषय में (एचः) एच् के स्थान पर (अयवायावः) अय्, अव्, आय्, आव् हो जाते हैं । 'एच्' प्रत्याहार के मध्य 'ए, ओ, ऐ, औ' ये चार वर्ण आते हैं । इन के स्थान पर 'अय्, अव्, आय्, आव्' ये चार आदेश होते हैं यदि इन से परे अच् अर्थात् स्वर हो तो । 'संहिता' के विषय में पीछे लिख चुके हैं वही नियम यहां और अन्यत्र सब जगह समझ लेना चाहिये । 'अचि' यहां भाव-सप्तमी है, यह पूर्ववत् तस्मिन्निति निर्दि- ष्टेपूर्वस्य (१६) परिभाषा द्वारा पर-सप्तमी में परिणत हो जाती है । यहां वृत्ति में 'क्रमात्' पद यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) परिभाषा के कारण आया हुआ है । अब इस परिभाषा को स्पष्ट करते हैं—