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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

५. तिङन्त प्रकरण (दश लकार, भ्वादि-प्रभृति दश गण रूप-साधन)

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७१ इस सूत्र से 'इदम् + स्' यहां अत्व नहीं होता । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (२७३) इदोऽय् पुंसि ।७।२।१११॥ इदम इदोऽय् स्यात्सौ पुंसि । सोर्लोपः । अयम् । त्यदाद्यत्वे— अर्थः — सुं परे हो तो पुंल्लिङ्ग में 'इदम्' के 'इद्' को 'अय्' आदेश हो । व्याख्या—इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। अय् ।१।१। पुंसि ।७।१। सौ ।७।१। (यः सौ से) । अर्थः—(सौ) सुं परे होने पर (पुंसि) पुंल्लिङ्ग में (इदमः) इदम् शब्द के अवयव (इदः) इद् के स्थान पर (अय्) अय् आदेश हो । अनेकाल्परि- भाषा द्वारा अय् आदेश सम्पूर्ण इद् के स्थान पर होगा । ग्रहणसामर्थ्य से यकार का लोप न होगा, किञ्च प्रयोजनाभाव से इत्सञ्ज्ञा भी न होगी¹ । 'इदम् + स्' यहां पुंल्लिङ्ग में प्रकृतसूत्र से इद् को अय् आदेश हो कर 'अय् अम् + स्' हुआ । अब हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप करने पर 'अयम्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + औ' यहां सुं परे नहीं है अतः इदमो मः (२७२) प्रवृत्त न होगा, त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से मकार को अकार आदेश हो कर 'इद अ + औ' हुआ । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७४) अतो गुणे ।६।१।९७॥ अपदान्तादतो गुणे पररूपमेकादेशः ॥ अर्थः—अपदान्त अत् से गुण परे हो तो पूर्वपर के स्थान पर पररूप एकादेश हो। व्याख्या—अपदान्तात् ।५।१। (उस्यपदान्तात् से) । अतः ।५।१। गुणे ।७।१। पूर्वपरयोः ।६।२। एकम् ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । पररूपम् ।१।१। (एङि पररूपम् मे) । अर्थः—(अपदान्तात्) अपदान्त (अतः) अत् से परे (गुणे) गुणसञ्ज्ञक वर्ण हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकम्) एक (पर- रूपम्) पररूप आदेश हो । अदेङ् गुणः (२५) के अनुसार 'अ, ए, ओ' ये तीन वर्ण गुणसञ्ज्ञक हैं । यह सूत्र सवर्णदीर्घ तथा वृद्धि आदि का अपवाद है । उदाहरण यथा — पच् + अन्ति = पच् 'अ' न्ति = पचन्ति । यज् + अन्ति = यज् 'अ' न्ति = यजन्ति । एध + ए = एध् 'ए' = एधे । यदि अत् पदान्त होगा तो पररूप न होगा । यथा—दैत्य + अरि = दैत्यारिः, दीर्घ + एकार = दीर्घेकारः । दीर्घ + ओकार = दीर्घौकारः । इन में समास के कारण विभक्ति का लुक् होने से प्रत्ययलक्षण के कारण अत् पदान्त है । अतः पररूप नहीं होता । 'इद अ + औ' यहां दकारोत्तर अपदान्त अत् से परे 'अ' यह गुण विद्यमान है; अतः पूर्व (अ) और पर (अ) दोनों के स्थान पर एक पररूप 'अ' हो कर 'इद + औ' हुआ । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— १. पुंसीति किम् ? इयं ब्राह्मणी । साविति किम् ? इमौ पुत्रौ ।

३७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७५) दश्च ।७।२।१०६॥ इदमो दस्य मः स्याद्विभक्तौ । इमौ । इमे । त्यदादेः सम्बोधनं नास्ती- त्युत्सर्गः ॥ अर्थः—विभक्ति परे होने पर इदम् शब्द के दकार को मकार आदेश हो । त्यदादेरिति—सामान्यतया त्यद् आदि शब्दों का सम्बोधन नहीं होता । व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । इदम् ।६।१। म ।१।१। (इदमो मः से । मकारादकार उच्चारणार्थः) । दः ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थ— (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर (मः) म् आदेश हो । 'इद + औ' यहां विभक्ति 'औ' परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को मकार हो कर 'इम+औ' हुआ । अब रामशब्दवत् पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर नादिचि (१२७) सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर 'इमौ' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + अस्' (जस्) । यहां त्यदाद्यत्व, पररूप तथा दश्च (२७५) सूत्र से दकार को मकार आदेश हो कर 'इम + अस्' हुआ । अब एकदेशविकृतन्याय से 'इम' शब्द की भी सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । तब जसः शी (१५२) से जस् को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश करने पर—'इमे' प्रयोग सिद्ध होता है । त्यदादियों [त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम्] का सम्बोधन प्रायः नहीं हुआ करता । 'प्रायः' इसलिये कहा है कि भाष्य में कहीं २ 'हे स' आदि प्रयोग भी प्राप्त होते हैं । मूल का अक्षरार्थ यह है—(त्य- दादेः) त्यदादिगण का (सम्बोधनम्) सम्बोधन (नास्ति) नहीं होता (इति) यह (उत्सर्गः) सामान्य नियम है । 'इदम्' शब्द के सम्बोधन में भी वही रूप बनेंगे जो उस के प्रथमा में बनते हैं । परन्तु लोक में इन का प्रयोग कहीं नहीं देखा जाता । 'इदम् + अम्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, दश्च (२७५) से दकार को मकारादेश तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'इमम्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + अस् (शस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, दकार को मकारादेश तथा पूर्वसवर्ण- दीर्घ कर सकार को नकारादेश करने से 'इमान्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + आ' (टा) । यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + आ' इस स्थिति में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७६) अनाप्यकः ।७।२।११२॥ अककारस्येदम इदोऽन् आपि विभक्तौ । आप् इति प्रत्याहारः । अनेन ॥ अर्थ —ककाररहित इदम् शब्द के 'इद्' भाग को 'अन्' आदेश हो तृतीयादि विभक्ति परे हो तो ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७३ व्याख्या—अकः ।६।१। इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। (इदोऽय् पुंसि से) । अन् ।१।१। आपि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । यहां 'आप्' यह 'टा' के आकार से 'सुप्' के पकार तक प्रत्याहार समझना चाहिये । इस प्रकार तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, और सप्तमी—इन पञ्च विभक्तियों में स्थित सब प्रत्ययों का 'आप्' शब्द से ग्रहण होता है । नास्ति क् (ककारः) यस्मिन् सः= अकू, तस्य = अकः, बहुव्रीहिसमासः । अर्थः— (अकः) ककार-रहित (इदमः) इदम् शब्द के (इदः) इद भाग के स्थान पर (अन्) अन् आदेश हो (आपि) तृतीयादि (विभक्तौ) विभक्ति परे हो तो । 'इदम्' शब्द में जब अव्ययसर्वनाम्नाकच्प्राक्टेः (१२२६) सूत्र से अकच् प्रत्यय किया जाता है तब वह 'इदकम्' इस प्रकार ककार- सहित हो जाता है। तब 'अन्' आदेश के निषेध के लिये सूत्र में 'अकः' (ककाररहित) कहा है । ध्यान रहे कि 'अन्' आदेश अनेकाल् होने से सम्पूर्ण 'इद' भाग के स्थान पर आदिष्ट होता है । 'इद + आ' यहां प्रकृत-सूत्र से इद भाग को अन् आदेश हो कर--अन् अ + आ = अन + आ हुआ । पुनः टा-ङसिँ-ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से आ को इन आदेश तथा आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश करने पर 'अनेन' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + भ्याम्' यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + भ्याम्' इस स्थिति में अनाप्यकः (२७६) सूत्र से अन् आदेश प्राप्त होता है । इस पर अग्रिम अपवादसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७७) हलि लोपः ।७।२।११३॥ अककारस्येदम इदो लोपः स्यादापि हलादौ । नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिर- नभ्यासविकारे (प०) ॥ अर्थः—तृतीयादि हलादि विभक्ति परे हो तो ककाररहित इदम् शब्द के इद भाग का लोप हो जाता है । नानर्थक इति—अभ्यासविकार को छोड़ कर अन्यत्र अन- र्थकों में अलोऽन्त्यस्य (२६) सूत्र प्रवृत्त नहीं होता । व्याख्या—अकः ।६।१। (अनाप्यकः से) । इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। (इदोऽय् पुंसि से) । लोपः ।१।१। आपि ।७।१। (अनाप्यकः से) । हलि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । 'हलि' यह 'विभक्तौ' पद का विशेषण है और साथ ही सप्तम्यन्त अल् भी है अतः यस्मिन्विधिस्तदादावल्० से तदादिविधि हो जाती है । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमः) इदम् शब्द के अवयवं (इदः) इद का (लोपः) लोप हो जाता है (हलि = हलादौ) हलादि (आपि) तृतीयादि विभक्ति परे हो तो । यह सूत्र पिछले अनाप्यकः (२७६) सूत्र का अपवाद है । 'इद + भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यह तृतीयादि हलादि विभक्ति परे है अतः यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र का बाध कर हलि लोपः (२७७) सूत्र से 'इद' का लोप प्राप्त होता है । परन्तु अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इद के अन्त्य दकार का लोप होना

३७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

चाहिये। इस पर— नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिरनभ्यासविकारे यह परिभाषा प्रवृत्त हो कर कहती है कि अनर्थक में अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र प्रवृत्त नहीं हुआ करता, हां १ यदि अभ्यास का विकार अनर्थक हो तो यह (अलोऽन्त्यस्य) प्रवृत्त हो जाता है' । कौन अनर्थक और कौन सार्थक होता है ? इस का निर्णय इस परिभाषा से होता है— समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैकदेशोऽनर्थकः । अर्थात् समुदाय ही सार्थक और उस का एक भाग निरर्थक हुआ करता है। तो इस प्रकार 'इदम्' यह सम्पूर्ण समुदाय सार्थक और इस का 'इद्' यह अवयव निरर्थक है। अनर्थक में अलोऽन्त्यविधि नहीं हुआ करती अतः यहां भी दकार का लोप न हो कर सम्पूर्ण इद् भाग का ही लोप हो जायेगा—'अ + भ्याम्' । अब यहां सुपि च (१४१) सूत्र से हम दीर्घ करना अभीष्ट है परन्तु उस से वह हो नहीं सकता, क्योंकि उस के अर्थ में 'अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो' ऐसा लिखा है। यहां अत् अङ्ग तो है पर अदन्त (अत् है अन्त में जिसके ऐसा) अङ्ग नहीं है। अतः इस की सिद्धि के लिय अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(२७८) आद्यन्तवदेकस्मिन् ।१।१।२१॥ एकस्मिन् क्रियमाणं कार्यमादाविव अन्त इव च स्यात्। सुपि च (१४१) इति दीर्घः । आभ्याम् ॥ अर्थ —जैसे आदि और अन्त में कार्य होते हैं वैसे एक वर्ण में भी कार्य हों। व्याख्या—आद्यन्तवत् इत्यव्ययपदम् । एकस्मिन् ।७।१। समास —आदिश्च अन्तश्च = आद्यन्तौ, इतरेतरद्वन्द्वः । तयोरिव = आद्यन्तवत् । तत्र तस्येव (११७६) इति वतिप्रत्ययः । अर्थ — (आद्यन्तवत्) आदि और अन्त में जैसे कार्य होते हैं वैसे (एकस्मिन्) एक वर्ण में भी हों । आदि और अन्त शब्द सापेक्ष अर्थात् दूसरे की अपेक्षा या आश्रय करने वाले हैं। जब तक अन्य वर्ण न हों, आदि और अन्त नहीं बन सकते । जैसा कि भाष्य में कहा है—यस्मात्पूर्वं नास्ति परम्‌अस्ति स आदिरित्युच्यते । यस्मात्पूर्वमस्ति परञ्च नास्ति सोऽन्त इत्युच्यते । अर्थात् जिस से पूर्व कोई नहीं, परे है वह—'आदि' तथा जिस के पूर्व तो है, परे नहीं वह—'अन्त' कहलाता है । इस प्रकार आदि और अन्त में विधान किये गये कार्य केवल एक वर्ण में प्राप्त नहीं हो सकते । अतः उन की एक-असहाय वर्ण में भी प्रवृत्ति कराने के लिय यह सूत्र आरम्भ किया गया है। उदाहरण यथा— जैसे 'रामाभ्याम्, पुरुषाभ्याम्' यहां अदन्त अङ्ग को सुपि च (१४१) से दीर्घ होता है वैसे—'अ + भ्याम्' यहां केवल अत् को भी दीर्घ हो कर 'आभ्याम्' बनेगा । आदि का उदाहरण—जैसे 'भविष्यति' यहां वलादि स्य को आर्धधातुकस्येड् वलादे (४०१) से इट् का आगम होता है वैसे 'आतिष्ठाम्, आतिष्ठु' इत्यादियों में केवल 'स्' को भी होगा। १ यथा—बिभर्ति, पिपर्ति आदियों में अभ्यास के अन्त्य ऋकार को इकार आदेश हो जाता है। अन्यथा यहां भी सम्पूर्ण अभ्यास के स्थान पर आदेश होना (देखें भैमीव्याख्या द्वितीय भाग सूत्र ६१०) ।

हलन्त-पुलिंङ्ग-प्रकरणम् ३७५ नोट—भाष्यकार ने इस सूत्र को और अधिक विस्तृत करने के लिये व्यप- देशिवदेकस्मिन् ऐसा लिखा है। मुख्यव्यवहार को 'व्यपदेश' कहते हैं। व्यपदेशोऽस्या- स्तीति व्यपदेशी, व्यपदेश वाले का नाम 'व्यपदेशी' हुआ। अर्थात् मुख्य का नाम 'व्यप- देशी' है। उस मुख्य के समान एक में भी कार्य हो जाते हैं। यथा—एकाचो वशो भष्० (२५३) का मुख्य उदाहरण 'गर्दभ्' है। यहां गर्दभ् धातु का अवयव एकाच् भषन्त 'दभ्' है। परन्तु 'धुक्' यहां ऐसा नहीं। यहां धातु भी वही है और एकाच् भषन्त भी वही है, अर्थात् दोनों अभिन्न हैं, इस में भी मुख्य के समान कार्य हो जाएंगे। ये उदाहरण पाणिनि के आद्यन्तवदेकस्मिन् सूत्र से सिद्ध नहीं हो सकते थे अतः भाष्य- कार को व्यपदेशिवदेकस्मिन् इस प्रकार रचना पड़ा। शास्त्र में इसे ही व्यपदेशिवद्भाव कहा गया है। व्यपदेशिवद्भाव का अर्थ गौण को भी मुख्य के समान मानना है। 'इदम् + भिस्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, हलि लोपः (२७७) से इद का लोप हो 'अ+भिस्' इस स्थिति में व्यपदेशिवद्भाव से अतो भिस ऐस् (१४२) द्वारा भिस् को ऐस् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२७६) नेदमदसोरकोः ।७।१।११॥ अककारयोरिदमदसोर्भिस ऐस् न । एभिः । अस्मै । एभ्यः । अस्मात् । अस्य । अनयोः २ । एषाम् । अस्मिन् । एषु ॥ अर्थः—ककाररहित इदम् और अदस् शब्द के भिस् को ऐस् नहीं होता । व्याख्या—अकोः ।६।२। इदमदसोः ।६।२। भिसः ।६।१। ऐस् ।१।१। (अतो भिस ऐस् से) । न इत्यव्ययपदम् । नास्ति क् ययोस्तौ = अको, तयोः = अकोः, बहुव्रीहि- समासः । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमदसोः) इदम् और अदस् शब्द के (भिसः) भिस् के स्थान पर (ऐस्) ऐस् (न) न हो । 'अ+भिस्' यहां प्रकृतसूत्र से भिस् को ऐस् न हुआ । तब बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व हो सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'एभिः' प्रयोग बना । चतुर्थी के एकवचन में 'इदम् + ए' (ङे) = इद + ए । इस अवस्था में सर्वनाम्नः स्मै (१५३) सूत्र से एकार को स्मै आदेश तथा अनाप्यकः (२७६) से इद् को अन् आदेश युगपत् प्राप्त होते हैं । विप्रतिषेधपरिभाषा से परकार्य अन् आदेश होने योग्य है । परन्तु वह अनिष्ट है । इस के लिये परिभाषा प्रवृत्त होती है—पूर्व-पर- नित्याऽन्तरङ्गाऽपवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः (प०) । अर्थात् पूर्व से पर, पर से नित्य, नित्य से अन्तरङ्ग और अन्तरङ्ग से अपवाद बलवान् होता है। नित्य उसे कहते हैं कि जो अपने विरोधी के प्रवृत्त होने पर भी प्रवृत्त हो सके । यथा—यहां 'स्मै' आदेश नित्य है क्योंकि यह अपने विरोधी अन् आदेश के प्रवृत्त हो जाने पर भी प्रवृत्त हो सकता है । पर से नित्य बलवान् होता है अतः अनाप्यकः (७.२.११२) के परे होने पर भी सर्वनाम्नः स्मै (७.१.१४) सूत्र के नित्य होने से स्मै आदेश हो जाता है । तब 'इद + स्मै' इस स्थिति में हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप हो कर 'अस्मै' प्रयोग सिद्ध होता है ।

३७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इदम् + अस् (ङसिँ) = इद + अस्। यहां भी पूर्ववत् नित्य होने से अन् आदेश का बाध कर ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) सूत्र से स्मात् आदेश हो जाता है। तब हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप करने से अस्मात्' रूप बनता है। इदम् + अस् (ङस्) = इद + अस्। नित्य होने से ङसिँङ्योस्मा० (१४०) से स्य आदेश हो जाता है। तब इद् का लोप हो अस्य प्रयोग सिद्ध होता है। इदम् + ओस् = इद + ओस्। यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र से अन् आदेश, ओसि च (१४७) से एत्व तथा एचोऽयवायावः (२२) से अय् आदेश करने पर 'अनयोः' रूप बनता है। इदम् + आम्। त्यदाद्यत्व, पररूप, नित्य होने से आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५) से सुँट् इद् भाग का लोप और बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व करने पर—एषाम्। अब आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व कर 'एषाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। इदम् + इ (ङि) = इद + इ। यहां ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) से प्रथम स्मिन् आदेश हो कर तदनन्तर इद् भाग का लोप हो जाता है—अस्मिन् । इदम् + सु (सुप्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, इद् का लोप, एत्व और षत्व करने पर एषु प्रयोग सिद्ध होता है। 'इदम्' शब्द की पुल्लिङ्ग में रूपमाला यथा— प्र० अयम् इमौ इमे प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः द्वि० इमम् " इमान् ष० अस्य अनयोः एषाम् तृ० अनेन आभ्याम् एभिः स० अस्मिन् , एषु च० अस्मै " एभ्यः सम्बोधनं नास्तीति प्रायोवादः । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२८०) द्वितीयाटौस्स्वेनः ।२।४।३४॥ इदमेतदोरन्वादेशे। किञ्चित्कार्यं विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातुं पुनरुपादानमन्वादेशः। यथा—अनेन व्याकरणमधीतमेनं छन्दोऽध्यापयेति । अनया पवित्रं कुलम् एनयोः प्रभूतं स्वम् इति। एनम्। एनौ। एनान्। एनेन। एनयोः २॥ अर्थ—द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों के परे होने पर अन्वादेश में इदम् और एतद् शब्द को 'एन' आदेश हो। किञ्चिद इति—किसी कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण किये हुए का पुनः दूसरे कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण करना 'अन्वादेश' कहलाता है। व्याख्या—इदमः ।६।१। (इदमोऽन्वादेशे० ग०)। एतदः ।६।१। (एतदस्त्रतसो ० से)। अन्वादेशे ।७।१। (इदमोऽन्वादेशे० सू०)। द्वितीयाटोरसु ।७।३। एन् ।१।१। समास—द्वितीया च टाश्च ओस् च=द्वितीयाटौसः तासु—द्वितीयाटौस्सु इतरतर- द्वन्द्वः। अर्थ—(अन्वादेशे) अन्वादेश में (इदमः) इदम् तथा (एतदः) एतद् शब्द के स्थान पर (एन) 'एन' आदेश हो (द्वितीयाटौस्सु) द्वितीया, टा और ओस् विभक्ति

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७७ परे होने पर। अनेकाल् होने से 'एन' आदेश सम्पूर्ण इदम् और एतद् के स्थान पर होगा। अन्वादेश किसे कहते हैं? किसी अज्ञात कार्य को जनाने या विधान करने के लिये जिस का प्रथम एक बार ग्रहण हो चुका हो; यदि पुनः दूसरे अज्ञात कार्य को जनाने या विधान करने के लिये उस का ग्रहण किया जावे तो वह पुनर्ग्रहण 'अन्वादेश' कहाता है। यथा — (१) अनेन व्याकरणम् अधीतम् एनं छन्दोऽध्यापय (इस ने व्या- करण पढ़ लिया है अब इसे छन्दश्शास्त्र पढ़ाओ)। यहां 'व्याकरण पढ़ लिया है' इस कार्य के लिये 'अनेन' का ग्रहण किया गया है। पुनः छन्दोऽध्ययन के लिये भी उस का ग्रहण किया गया है अतः दूसरी वार उस का ग्रहण 'अन्वादेश' हुआ। (२) अनयोः पवित्रं कुलम्, एनयोः प्रभूतं स्वम् (इन दोनों का कुल पवित्र है तथा इन का धन भी बहुत है)। यहां प्रथम पवित्र कुल कहने के लिये ग्रहण किये हुए 'इन दोनों' का पुनः बहुत धन कहने के लिये दोबारा ग्रहण किया गया है अतः यह दूसरी वार वाला ग्रहण 'अन्वादेश' है। इसी प्रकार — इमं बालकं शिक्षामपीपठः, अथो एनं वेदमध्यापय (इस बालक को तुम शिक्षा पढ़ा चुके हो अब इसे वेद पढ़ाओ)। यहां वेद पढ़ाने के लिये पुनः उस का ग्रहण 'अन्वादेश' है। अनेनच्छात्रेण रात्रिरधीता, अथो एनेनाहरप्यधीतम् (इस छात्र ने रात भर पढ़ा और इस ने दिन भर भी पढ़ा)। यहां 'दिन भर भी पढ़ा' यह जनाने के लिये पुनः उस का ग्रहण अन्वादेश है। अनयोश्छात्रयोः शोभनं शीलम्, अथो एनयोः कुशाग्रा मेधा (ये दोनों छात्र अच्छे आचार वाले हैं और इन की बुद्धि भी तीक्ष्ण है)। यहां 'बुद्धि तीक्ष्ण है' यह जनाने के लिये पुनः उन का ग्रहण 'अन्वादेश' है। अन्वादेश में द्वितीया (अम्, औट्, शस्) तथा टा और ओस् (षष्ठी और सप्तमी दोनों के द्विवचन) इन पञ्च प्रत्ययों के परे होने पर इदम् और एतद् शब्द को 'एन' सर्वादेश हो जाता है। अन्य विभक्तियों में अनन्वादेश की भांति रूप चलते हैं¹। 'एतद्' शब्द का वर्णन आगे आयेगा यहां 'इदम्' शब्द प्रस्तुत है— १. इदम् + अम् = एन + अम् = एनम्। २. इदम् + औट् = एन + औ = एनौ। ३. इदम् + शस् = एन + अस् = एनान्। ४. इदम् + टा = एन + आ = एन + इन = एनेन। ५. इदम् + ओस् = एन + ओस् = एनयोः। 'एन' आदेश होकर यहां पुंल्लिङ्ग में रामवत् प्रक्रिया होती है। इन सब का दो श्लोकों में प्राचीन संग्रह यथा— इमं विद्धि हरेर्भक्तं, विद्धयथैनं शिवार्चकम्। इमाविमान् वित्त शैवान्, एनावेनांस्तु वैष्णवान् ॥ १ ॥ १. यद्यपि अन्य विभक्तियों में रूप अनन्वादेश की भाँति होते हैं तो भी प्रक्रिया में बड़ा अन्तर होता है। अन्वादेश में इदम् शब्द के स्थान पर तृतीयादि विभक्तियों में इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ (२.४.३२) सूत्र से 'अश्' आदेश हो कर शकार का लोप करने पर अदन्त सर्वनाम की तरह कार्य होते हैं। यह सब सप्रयोजन विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी में देखें।

३७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

अनेन पूजितः कृष्णोऽथैनेन गिरिशोऽर्चितः । अनयोः केशवः स्वामी, शिवः स्वामी ह्यथैनयोः ॥ २ ॥ विशेष—किञ्चित्कार्यं विधातुम्० यहां 'विधातुम्' से केवल विधान का अभि- प्राय नहीं है । किसी अज्ञात बात को बतलाना या जनाना ही यहां अभिप्रेत है । अत एव —अप्येतमद्रेस्तनया शुशोच (रघु० २/३७) यहां विधानाभाव में भी अन्वादेश के स्वीकृत होने से 'एन' आदेश सिद्ध हो जाता है । ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाऽभिविधौ च यः । एतम् आतं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् (देखें पृष्ठ ६०) इस पद्य के पूर्वार्ध में ईषद आदि लोकप्रसिद्ध अर्थों का अनुवाद ही प्रस्तुत किया गया है अत अज्ञातज्ञापन न होने से अन्वादेश के अभाव के कारण 'एन' आदेश नहीं हुआ । इसी प्रकार 'गीतगोविन्द' के — नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे ! गृहं प्रापय (यह कृष्ण रात्रि में भीरु है अत तू=राधा ही इसे घर पहुंचा दे)—इस आद्य पद्य में ज्ञात- भीरुता का अनुवादमात्र प्रस्तुत होने से अन्वादेश न होने के कारण 'इमम्' का 'एनम्' नहीं हुआ । यहां यह जरूरी नहीं कि इदम् शब्द के द्वारा गृहीत का ही जब उसी इदम् शब्द के द्वारा दोबारा ग्रहण हो तभी अन्वादेश मान कर एन आदेश किया जाये, किन्तु प्रथम ग्रहण में चाहे यद्, तद् आदि किसी अन्य शब्द के द्वारा या किसी अन्य प्रकार से भी ग्रहण हो तो दूसरे ग्रहण में इदम् और एतद् को एन आदेश हो जाता है । यथा— एव तयोक्ते तमवेक्ष्य किञ्चिद्विस्रंसिदुर्वाङ्कमधूकमाला । ऋजुप्रणामक्रिययैव तन्वी प्रत्यादिदेशैनमभाष्यमाणा ॥ (रघु० ६/२५) यहां प्रथम 'तद्' शब्द से गृहीत होने पर भी पुनर्ग्रहण में इदम् या एतद् को एन आदेश हो जाता है । (यहां मकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।)

अभ्यास (३६) (१) 'किम्' शब्द ही सर्वनामों में पढ़ा गया है 'क' शब्द नहीं, पुनः के, कस्मै' आदियों में क्या सर्वनामकार्य हो जाते हैं ? (२) 'इदम्' शब्द में स्वतः ही ककार का श्रवण नहीं होता, पुनः उस के वारण के लिये अनाप्यकः में यत्न क्यों किया गया है ? (३) 'अयम्' में त्यदाद्यत्व क्यों नहीं होता ? यदि उस के प्रवृत्त्यभाव का कोई कारण है तो वह 'इमौ, इमे' आदि में क्यों नहीं ? (४) 'पुष्+नाति = पुष्णाति' यहां ष्टुत्व होता है या णत्व ? विवेचन करें । (५) आदि और अन्त का लक्षण लिख कर व्यपदेशिवद्भाव को स्पष्ट करें । (६) अन्वादेश का सोदाहरण स्पष्टीकरण करें । (७) 'नानर्थके० परिभाषा की आवश्यकता पर सोदाहरण एक टिप्पण लिखें । (८) (क) 'प्रशान्' यहां नकार का लोप क्यों नहीं होता ?

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७६ (ख) 'चतुर्षु' में रेफ को विसर्गादेश क्यों नहीं होता ? (ग) 'अग्निर्नयति' में णत्व क्यों नहीं होता ? (६) चत्वारः, केषाम्, प्रशान्तसु, चतुर्णाम्, अयम्, अनयोः, अस्मै, एनयोः, एभिः, एषु—इन रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें। (१०) अनाप्यकः, दश्च, शरोऽचि, रषाभ्यां नो णः०, आद्यन्तवदेकस्मिन्, अतो गुणे—इन की व्याख्या करते हुए प्रत्येक को उदाहरणों में घटाएं। —:०:— अब नकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन प्रारम्भ करते हैं— [लघु०] राजा ।। व्याख्या—'राजृँ दीप्तौ (भ्वा० उभ०) धातु से कनिन् यु-वृषि-तक्षि-राजि- धन्वि-द्यु-प्रतिदिवः (उणा० १५४) सूत्रद्वारा कनिँन् प्रत्यय करने से राजन् (राजा) शब्द निष्पन्न होता है। राजते=शोभत इति राजा। 'राजन्+स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) सूत्र से सुंलोप तथा सर्वनाम- स्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु परत्व के कारण प्रथम उपधादीर्घ हो कर पश्चात् सुंलोप हो जाता है— राजान्+स् = राजान्। अब न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो कर 'राजा' रूप सिद्ध होता है। 'राजन् + औ' यहां सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) मे उपधादीर्घ हो कर 'राजानौ' बनता है। इसी प्रकार आगे भी सर्वनामस्थानों में उपधादीर्घ हो जाता है— राजानः, राजानम्, राजानौ। हे राजन्+स्। यहां एकवचनं सम्बुद्धिः (१३२) से 'सुँ' की सम्बुद्धि सञ्ज्ञा है, अतः सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ नही होता। हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुंलोप हो कर 'हे राजन् !' हुआ। अब यहां न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप प्राप्त होता है, परन्तु यह अनिष्ट है। अतः इस का अग्रिमसूत्र से निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२८१) न ङिसम्बुद्ध्योः ।८।२।८। नस्य लोपो न, ङौ सम्बुद्धौ च। हे राजन् !॥ अर्थः—ङि अथवा सम्बुद्धि परे होने पर नकार का लोप नहीं होता। व्याख्या—न ।६।१। (लुप्तषष्ठीकं पदम्)। लोपः ।१।१। (न लोपः० से)। न इत्यव्ययपदम्। ङिसम्बुद्ध्योः ।७।२। समासः—ङिश्च सम्बुद्धिश्च = ङिसम्बुद्धी, तयोः = ङिसम्बुद्ध्योः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(ङिसम्बुद्ध्योः) ङि अथवा सम्बुद्धि परे हो तो (न=नस्य) नकार का (लोपः) लोप (न) नहीं होता¹। १. ङि का उदाहरण वेद में आता है—परमे व्योमन् (ऋ० १.१६४.३६)।

३८० | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'हे राजन्' यहां सम्बुद्धि का लोप होने पर भी प्रत्ययलक्षण परिभाषा द्वारा सम्बुद्धि को मान कर नकारलोप का निषेध हो जाता है—हे राजन्' । [लघु०] वा०— (२५) ङावुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्यः ॥ ब्रह्मनिष्ठ । राजानौ । राजान । राज्ञ ॥ अर्थ—उत्तरपदपरक 'ङि' के परे होने पर न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र का निषेध कहना चाहिये । व्याख्या—ङौ ।७।१। उत्तरपदे ।७।१। प्रतिषेध ।१।१। वक्तव्य ।१।१। अर्थ— (उत्तरपद) उत्तरपद परे होने पर (ङौ) जो ङि, उस के परे होने पर (प्रतिषेध ) निषेध (वक्तव्य ) कहना चाहिये । किस का निषेध कहना चाहिये ? इस का उत्तर यह है कि जिस सूत्र पर जो वार्त्तिक पढ़ा जाता है वह तत्सूत्रविषयक ही समझा जाना है। यहां यह वार्त्तिक न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र पर पढ़ा गया है अतः यह न ङिसम्बुद्धयो द्वारा प्राप्त नकार-लोप के निषेध का ही निषेध करेगा।¹ यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि व्याकरण में समास के अन्तिम पद को उत्तरपद तथा आदिम पद को पूर्वपद कहते हैं। यथा—राज्ञ पुरुष = राजपुरुष । यहां 'राज्ञ' यह षष्ठ्यन्त पूर्वपद तथा 'पुरुष' यह प्रथमान्त उत्तरपद है। ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्मणि निष्ठा यस्य स ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्म में स्थिति या विश्वास रखने वाला पुरुष 'ब्रह्मनिष्ठ' कहाता है । 'ब्रह्मन्+ङि निष्ठा+सुं' यहां बहुव्रीहिसमास में सुपो धातु० (७२१) सूत्र से ङि और सुं का लुक् हो कर न लोप प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप प्राप्त होता है, परन्तु न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र उस लोप का निषेध कर देता है क्योंकि प्रत्ययलक्षणपरिभाषा से 'ङि' परे स्थित है। अब ङावुत्तरपदे० इस प्रकृत वार्त्तिक से उस निषेध का भी निषेध हो कर पुनः न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) से नकारलोप हो जाता है। यहां 'ङि' से परे 'निष्ठा' यह उत्तरपद विद्यमान है। 'ब्रह्मनिष्ठा' ऐसा होने पर गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) सूत्र द्वारा ह्रस्व हो कर विभक्ति लाने से ब्रह्मनिष्ठ' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार— 'आत्मविश्वास, चर्मतिल' आदि प्रयोग जानने चाहियें। 'राजन्+शस्' (शस्) यहां अल्लोपोऽन (२४७) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर—'राजन्+अस्' हुआ। अब स्तोः श्चुना श्चुः (६२) सूत्र से नकार को ञकार करने पर—राज्ञ्+अस्='राज्ञ' प्रयोग सिद्ध होता है। नोट—'ज्ञ्' यह संयुक्त व्यञ्जन है। ज् और ञ् के योग से इस की निष्पत्ति होती है। लिखने की सुविधा के लिये इस का ऐसा स्वरूप माना गया प्रतीत होता है। 'ज्ञ' को पृथक् वर्ण मान कर इस का 'ग्य' वा 'ज्य, ग्न, जन' आदि उच्चारण करना नितान्त अशुद्ध और शास्त्रविरुद्ध है। यदि यह अपूर्व वर्ण बन जाता तो शिक्षाकार १ यदि ङावुत्तरपदेऽप्रतिषेधो वक्तव्यः कही पाठ मिले तो उस का भाव यह होगा कि न ङिसम्बुद्धयो वाले निषेध को मत करो अर्थात् वहां पर 'न्' का लोप कर दो।

हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८१ इस के उच्चारण का भी कहीं निर्देश करते; परन्तु उन्होंने ऐसा कहीं नहीं किया । इस को अपूर्व वर्ण मानने से स्तोः श्चुना श्चुः (६२) द्वारा श्चुत्व भी न हो सकेगा । यथा — तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्, एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम्, यज्ज्ञात्वा मुच्यतेऽशुभात् इत्यादि । सिद्धान्तकौमुदी के जञोर्ज्ञः पर शेखरकार का वक्तव्य भी यहां द्रष्टव्य है—जञयोगे लोक- वेदसिद्धतादृशध्वनेर्लिपिविशेषस्य चानुवादकमभियुक्तवचनं न त्विदं वर्णान्तरम्, शिक्षा- दावपरिगणितत्वेन सत्सत्त्वे मानाभावात् । अत एव 'तज्ज्ञानम्' इत्यादौ श्चुत्वसिद्धिः । किञ्च यदि इस का उच्चारण 'ग्य' आदि होता तो प्राकृत में—मणोज्ज (मनोज्ञ), जण्ण (यज्ञ), अहिज्जो (अभिज्ञ), सव्वज्जो (सर्वज्ञ) इत्यादियों में इस प्रकार आदि में जकार वा णकार न होता । अतः 'ज्ञ' कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं यह सिद्ध होता है । इसी प्रकार 'क्ष्' के विषय में भी समझना चाहिये । यह भी 'क् + ष्' के योग से उत्पन्न होता है । राजन् + आ (टा)। भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर श्चुत्व करने से— राज्ज् + आ = 'राज्ञा' प्रयोग सिद्ध होता है । 'राजन् + भ्याम्' इस स्थिति में न लोपः० (१८०) से पदान्त नकार का लोप हो जाता है । तब 'राज + भ्याम्' इस अवस्था में सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त होता है । उस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] नियम-सूत्रम्— (२८२) नलोपः सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु कृति । ८।२।२॥ सुब्विधौ स्वरविधौ सञ्ज्ञाविधौ कृति तुग्विधौ च नलोपोऽसिद्धो नान्यत्र 'राजाश्व' इत्यादौ । इत्यसिद्धत्वाद् आत्वमेत्वमैस्त्वं च न । राजभ्याम् । राजभिः । राजभ्यः २ । राज्ञि, राजनि । राजसु ॥ अर्थः—सुब्विधि, स्वरविधि, सञ्ज्ञाविधि तथा कृत्प्रत्ययपरक तुग्विधि करने में ही नकार का लोप असिद्ध होता है अन्यत्र नहीं । यथा—'राजाश्वः' इत्यादियों में असिद्ध नहीं होता । इत्यसिद्धत्वाद् इति — इस सूत्र से यहां नकारलोप के असिद्ध होने से आ-भाव, ए-भाव, ऐस्-भाव नहीं होता । व्याख्या — नलोपः ।१।१। सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु ।७।३। कृति ।७।१। असिद्धः ।१।१। (पूर्वत्रासिद्धम् से लिङ्गविपरिणाम कर के) । समासः—नस्य लोपः=नलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः । सुँप् च स्वरश्च सञ्ज्ञा च तुक् च = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुकः, इतरेतरद्वन्द्वः । तेषां विधयः = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधयः, तेषु = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु, षष्ठीतत्पुरुषः । विधिशब्दोऽत्र भावसाधनः । विधानं विधिः । यहां सुँवादिगत शेषषष्ठी के साथ विधि- शब्द का समास हुआ जानना चाहिये । सुब्विधिः—सुँपो विधिः । यहां शेष में षष्ठी होने के कारण 'सुँप्सम्बन्धी विधि' ऐसा अर्थ हो जाता है । सुँप्सम्बन्धी विधि दो प्रकार की हो सकती है; एक तो सुँप् के स्थान पर, यथा—राजभिः । यहां अतो भिस ऐस् (१४२) सूत्र से भिस्=सुँप् के स्थान पर ऐस् प्राप्त होता है । दूसरी सुँप् परे होने

३८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पर, यथा—राजभ्याम्, राजभ्यः। यहां सुँप् परे होने पर आत्त्व तथा एत्त्व प्राप्त होता है। स्वरविधि = स्वरस्य विधिः। यहां स्वर कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति हुई है। 'स्वर को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। सञ्ज्ञाविधि = सञ्ज्ञायाः विधिः। यहां भी कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति हुई है। 'सञ्ज्ञा को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। तुग्विधि = तुको विधिः। यहां भी तुँक् कर्म में शेषत्व की विवक्षा से षष्ठी विभक्ति जाननी चाहिये। 'कृति' यह 'तुग्विधि' के साथ ही सम्बन्ध रखता है, असम्भव होने से अन्यों के साथ नहीं। अतः 'कृत् परे होने पर तुँक् को विधान करना' यह अर्थ निष्पन्न होता है। अर्थ —(सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्वि- धिषु) सुँप्सम्बन्धी विधान, स्वरविधान, सञ्ज्ञाविधान तथा कृत् प्रत्यय परे होने पर तुग्विधान करने में (नलोपः) नकार का लोप (असिद्धः) असिद्ध होता है। ये जितनी विधियां गिनाई गई हैं, सब अष्टाध्यायी के सवा सात अध्यायों में स्थित हैं। अतः इन विधियों के प्रति नकार का लोप त्रिपादीस्थ होने से ही पूर्वत्रा- सिद्धम् (३१) द्वारा असिद्ध है, पुनः यहां इन विधियों में नकारलोप को असिद्ध कहना नियमार्थ है—सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः। अर्थात् इन विधियों में ही नकार का लोप असिद्ध हो अन्य विधियां में न हो। यथा—राज्ञोऽश्वः = राजाश्वः। 'राजन्‌ङस् अश्वसुँ' यहां षष्ठीतत्पुरुषसमास में सुँपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र से ङस् और सुँ का लुक् हो—राजन् अश्व। न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो—राज अश्व। अब यहां नलोप के असिद्ध होने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा सवर्णदीर्घ नहीं हो सकता। पुनः इस उपर्युक्त नियम से नकारलोप के सिद्ध हो जाने से वह हो जाता है। तो इस प्रकार—'राजाश्वः' रूप निष्पन्न होता है। इसी प्रकार —दण्ड्यश्वः, योग्यात्मा, मन्त्राज्ञा आदि प्रयोगों में नकारलोप के सिद्ध होने से यण्, 'राजेन्द्रः' आदि प्रयोगों में गुण तथा 'राजीयति, राजायते' में क्रमशः क्यचि च (७२२) में ईत्व और अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः (४८३) से दीर्घ हो जाता है। इस सूत्र का यही प्रयोजन है। 'राज् + भ्याम्' यहां सुँपि च (१४१) से आत्त्व, 'राज् + भिस्' यहां अतो भिस ऐस् (१४२) से भिस् का ऐस्, 'राज् + भ्यस्' यहां बहुवचने झल्येत् (१४५) में एत्त्व ये सुँब्विधियां प्राप्त होती हैं। इन के प्रति नकारलोप असिद्ध ही है अतः इन में से कोई भी कार्य न होगा। राजभ्याम्, राजभिः, राजभ्यः। राजन् + ङि(डि)। यहां विभाषा ङिश्योः (२४८) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के अकार का वैकल्पिक लोप हो जाना है। लोपपक्ष में श्चुत्व हो कर—'राज्ञि'। लोपा- भाव में—'राजनि'। 'राजन्' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० राजा राजानौ राजानः । प० राज्ञः राजभ्याम् राजभ्यः द्वि० राजानम् " राज्ञः । ष० " राज्ञोः राज्ञाम् तृ० राज्ञा राजभ्याम् राजभिः । स० राज्ञि, राजनि " राजसु च० राज्ञे " राजभ्यः । सं० हे राजन्! हे राजानौ! हे राजानः!

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८३ इसी प्रकार निम्नस्थ शब्दों के रूप होते हैं। [ * यह चिह्न णत्वबोधक है ] शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ (१) अकिञ्चनिमनू = निर्धनता | (२४) प्रेमन्* = प्रियत्व, प्रेम, स्नेह (२) अणिमन् = अणुत्व, अणुपना | (२५) बधिरिमन्* = बहरापन (३) अम्लिमन् = अम्लत्व, खट्टापन | (२६) बंहिमन् = बाहुल्य, आधिक्य (४) आशिमन् = आशुता, शीघ्रता | (२७) बालिमन् = बालपन, लड़कपन (५) उष्णिमन् = उष्णता, गरमी | (२८) भूमन् = बहुत्व, आधिक्य (६) ऋजिमन् = ऋजुता, सरलता | (२९) भृशिमन् = भृशता, बहुतायत (७) कालिमन् = कालापन, कृष्णता | (३०) मधुरिमन्* = माधुर्य, मिठास (८) कृष्णिमन् = कृष्णता, कालापन | (३१) मन्दिमन् = मन्दत्व, मन्दपना (९) कृशिमन् = कृशत्व, दुबलापन | (३२) महिमन् = महत्त्व, गौरव (१०) क्षेपिमन्* = क्षिप्रता, शीघ्रता | (३३) मूकिमन् = मूकता, गूंगापन (११) क्षोदिमन् = क्षुद्रता, छुटप्पन | (३४) म्रदिमन् = मृदुता, कोमलता (१२) गरिमन्* = गुरुत्व, गौरव | (३५) रक्तिमन् = रक्तता, लाली (१३) चण्डिमन् = चण्डता, तीव्रता | (३६) लघिमन् = लघुता, हल्कापन (१४) जटिमन् = जड़त्व, मूर्खता | (३७) लवणमन् = लवणता, नमकीनपन (१५) तनिमन् = तनुत्व, पतलापन | (३८) लोहितिमन् = लोहितत्व, लाली (१६) द्रढिमन् = दृढ़ता, कठोरता | (३९) वरिमन्* = उरुत्व, विशालता (१७) द्राघिमन्* = दीर्घता, लम्बाई | (४०) शीतिमन् = शीतत्व, ठण्डक (१८) पटिमन् = पटुता, चतुराई | (४१) शुक्लिमन् = शुक्लत्व, सुफेदी (१९) पण्डितिमन् = पाण्डित्य, विद्वत्ता | (४२) श्वेतिमन् = श्वेतता, सुफेदी (२०) परिवृढिमन् = स्वामित्व | (४३) साधिमन् = साधुत्व, सज्जनता (२१) पाण्डिमन् = पाण्डुता, पीलापन | (४४) स्थेमन् = स्थिरता, दृढ़ता (२२) पाण्डुरिमन्* = पीलापन, सुफेदी | (४५) स्वादिमन् = स्वादुपना (२३) प्रथिमान् = पृथुता, विस्तार | (४६) ह्रसिमन् = ह्रस्वत्व, छुटप्पन इसी प्रकार—अश्वत्थामन्, उक्षन्, तक्षन्, वृषन्, मूर्धन् प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] यज्वा । यज्वानौ । यज्वानः ॥ व्याख्या—यजें (भ्वा० उभ०) धातु से सुयजोर्ङ्वनिँप् (३.२.१०३) सूत्र १. ये सब शब्द पृथादिभ्यः इमनिँचू (११५२) सूत्र द्वारा भाव में इमनिँच् प्रत्यय करने से निष्पन्न होते हैं। इमनिँचूप्रत्ययान्त शब्द पुंल्लिङ्ग हुआ करते हैं। केवल 'प्रेमन्' शब्द कहीं २ नपुंसक में प्रयुक्त होता है।

३८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां द्वारा भूतकालिक 'क्वनिँप्' प्रत्यय हो कर 'यज्वन्' शब्द सिद्ध होता है। इष्टवान् इति यज्वा, जो यज्ञ कर चुका है वह 'यज्वन्' कहाता है। 'यज्वन्' शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'राजन्' शब्दवत् होती है, केवल भसञ्ज्ञकों में अल्लोपोऽनः (२४७) द्वारा प्राप्त अत् के लोप का निषेध हो जाता है— [लघु०] निषेध-सूत्रम् (२८३) न संयोगाद्वमन्तात् ।६।४।१३७॥ वमन्तसंयोगादनोऽकारस्य लोपो न। यज्वनः। यज्वना। यज्वभ्याम्। ब्रह्मन् । ब्रह्मणा ॥ अर्थ—वकारान्त वा मकारान्त संयोग से परे अन् के अकार का लोप न हो। व्याख्या—वमन्तात् ।५।१। संयोगात् ।५।१। अनः ।६।१। अल्लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। न इत्यव्ययपदम्। समास—वश्च म् च=वमौ, इतरेतरद्वन्द्वः । वकारादकार उच्चारणार्थः। वमौ अन्तो यस्य स वमन्, तस्मात् =वमन्तात्, बहुव्रीहि- समासः। अर्थ—(वमन्तात्) वकारान्त और मकारान्त (संयोगात्) संयोग से परे (अनः) अन् के (अल्लोपः) अकार का लोप (न) नहीं होता। 'यज्वन् + टा (शस्)' यहां 'यज्व्-अन्' शब्द में 'ज्व्' यह वकारान्त संयोग है अतः इस से परे अन् के अकार का लोप न हुआ—'यज्वनः' सिद्ध हुआ। एवम् आगे भी भसञ्ज्ञाओं में समझ लेना चाहिये। रूपमाला यथा— प्र० यज्वा यज्वानौ यज्वानः | प० यज्वनः यज्वभ्याम् यज्वभ्यः द्वि० यज्वानम् ,, यज्वनः | ष० ,, यज्वनोः यज्वनाम् तृ० यज्वना यज्वभ्याम् यज्वभिः | स० यज्वनि ,, यज्वसु च० यज्वने ,, यज्वभ्यः | सं० हे यज्वन् ! हे यज्वानौ ! हे यज्वानः ! मकारान्त संयोग का उदाहरण 'ब्रह्मन्' (ब्रह्मा अथवा ब्राह्मण) है। 'ब्रह्मन्

  • टा (शस्)' यहां 'ब्रह्म-अन्' शब्द में 'ह्म' यह मकारान्त संयोग है अतः इस से परे भसञ्ज्ञा अन् के अकार का लोप न हुआ—'ब्रह्मणा'। रूपमाला यथा— प्र० ब्रह्मा ब्रह्माणौ ब्रह्माणः | प० ब्रह्मणः ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभ्यः द्वि० ब्रह्माणम् ,, ब्रह्मणः | ष० ,, ब्रह्मणोः ब्रह्मणाम् तृ० ब्रह्मणा ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभिः | स० ब्रह्मणि ,, ब्रह्मसु च० ब्रह्मणे ,, ब्रह्मभ्यः | सं० हे ब्रह्मन् ! हे ब्रह्माणौ ! हे ब्रह्माणः ! इसी प्रकार—१ आत्मन् (आत्मा)। २ अश्मन् (पत्थर)। ३ पुण्ड्रधन्वन् (कामदेव)। ४ शार्ङ्गधन्वन् (विष्णु)। ५ सुपर्वन् (बाण, देवता)। ६ अनर्वन् (शत्रु- रहित)। ७ पृषत्त्वन्मन् (अग्नि)। ८ मातरिश्वन् (वायु)। ९ सुधमँन् (देवसभा)। १० प्रकृष्टवर्मन् (शुभ वर्मों वाला)। ११ अग्रजन्मन् (बड़ा भाई, ब्राह्मण)। १२. अन्तरामन् (परमात्मा)। १३ अभ्रिधन्वन् (मित्र)। १४ अनुजन्मन् (छोटा भाई)। १५ अध्वन्मन् (अनभ्यासी)। १६ अनात्मन् (जो पदार्थ आत्मा नहीं—शरीर आदि)।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८५ १७. सुशर्मन् (प्राचीनकाल का एक राजा, अच्छी तरह सुखी) । १८. शतधन्वन् (प्राचीनकाल का एक राजा)। १६. पाप्मन् (पाप)। २०. अध्वन् (मार्ग)-इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं। वृत्रं हतवान् इति वृत्रहा । वृत्रकर्मोपपदाद् हन हिंसागत्योः (अदा० प०) इति धातोर् ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप् (३.२.८७) इति भूते कर्तरि क्विप् । वृत्र को मारने के कारण इन्द्र का नाम 'वृत्रहन्' है । वृत्रहन् + स् (सुं) । यहां सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) द्वारा नान्त की उपधा को दीर्घ प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] नियम-सूत्रम्-(२८४) इन्हन्पूषार्यम्णां शौ ।६।४।१२॥ एषां शावेवोपधाया दीर्घा नान्यत्र । इति निषेधे प्राप्ते- अर्थः-इन्नन्त, हन्शब्दान्त, पूषन्शब्दान्त तथा अर्यमन्शब्दान्त अङ्गों की उपधा को शि परे होने पर ही दीर्घ हो अन्यत्र न हो। इस से निषेध प्राप्त होने पर (अग्रिम- सूत्र प्रवृत्त होता है।) व्याख्या-इन्हन्पूषार्यम्णाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य का वचन- विपरिणाम हो जाता है)। शौ ।७।१। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घः ।१।१। (ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । 'अङ्गानाम्' का विशेषण होने से 'इन्हन्पूषार्यम्णाम्' से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः- (इन्हन्पूषार्यम्णाम्) इन्नन्त, हन्नन्त, पूषन्दशब्दान्त तथा अर्यमन्दशब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गों की (उपधायाः) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है (शौ) शि परे होने पर। नपुंसकलिङ्ग में 'शि' की शि सर्वनामस्थानम् (२३८) सूत्र-द्वारा सर्वनाम- स्थानसञ्ज्ञा होती है, अतः उस के परे होने पर सूत्र में गिनाये सब शब्दों की उपधा को सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से ही दीर्घ हो सकता है। पुनः इस सूत्र द्वारा दीर्घविधान सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः के अनुसार नियमार्थ है। अर्थात्-इन की उपधा को यदि दीर्घ हो तो 'शि' परे होने पर ही हो, अन्यत्र न हो-यह नियम फलित होता है। 'वृत्रहन् + स्' यहां हन्शब्दान्त से परे 'सुं' वर्तमान है 'शि' नहीं, अतः प्रकृत- नियम से यहां दीर्घ प्राप्त नहीं हो सकता। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(२८५) सौ च ।६।४।१३॥ इन्नादीनामुपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सौ (परे) । वृत्रहा । हे वृत्रहन् ! ॥ अर्थः- इन्नन्त आदि अङ्गों की उपधा को दीर्घ हो, सम्बुद्धि-भिन्न सुं परे हो तो। व्याख्या-इन्हन्पूषार्यम्णाम् ।६।३। (इन्हन्पूषार्यम्णां शौ से)। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य यह अधिकृत है) । उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से) । दीर्घः ।१।१। (ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। (सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ से)। सौ ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थः-(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुं परे होने पर ल० प्र० (२५)

१८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (इन्हन्पूषार्यम्णाम्) इन्नन्त, हन्नन्त, पूषन्शब्दान्त तथा अर्यमन्शब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गो की (उपधाया ) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। पूर्वसूत्र के नियम से 'सुं' मे दीर्घ नही हो सकता था, अब इस से 'सुं' मे हो जाता है। शेष 'शि'- भिन्न सर्वनामस्थान मे पूर्वनियमानुसार निषेध ही रहेगा। 'वृत्रहन् + स्' यहा प्रकृतसूत्र से दीर्घ हो जाता है - वृत्रहान् + स् । अब हल्ङ्या- ब्भ्य० (१७६) से सकारलोप तथा न लोप ० (१८०) से नकार का लोप हो कर 'वृत्रहा' प्रयोग सिद्ध होता है। 'वृत्रहन् + औ' यहा प्राप्त उपधादीर्घ का इन्हन्पूषार्यम्णां शो (२८४) सूत्र से निषेध हो जाता है। अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व भी नही हो सकता क्योकि समान- पद नही है। अत णत्व करने के लिये अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (२८६) एकाजुत्तरपदे णः ।८।४।१२॥ एकाजुत्तरपदं यस्य तस्मिन्समासे पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य प्राति- पदिकान्तनुम्विभक्तिस्थस्य नस्य ण स्यात् । वृत्रहणौ ॥ अर्थः-एक अच् वाला उत्तरपद है जिस के, ऐसे समास मे पूर्वपद मे ठहरे निमित्त (ऋ, र् ष्) से परे प्रातिपदिकान्त, नुंम् तथा विभक्ति मे स्थित नकार को णकार आदेश हो जाता है। व्याख्या - एकाजुत्तरपदे ।७।१। पूर्वपदाभ्याम् ।५।२। (पूर्वपदारसञ्ज्ञायामगः मे) । रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। ण. ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समानपदे से)। प्राति- पदिकान्तनुम्विभक्तिषु ।७।३। (प्रातिपदिकान्त० से)। समास - एकोऽच् यस्मिन् तद् एकाच्, बहुव्रीहिसमास । एकाच् उत्तरपदं यस्य स एकाजुत्तरपद. (समास), तस्मिन् = एकाजुत्तरपदे, बहुव्रीहिसमास । पूर्व पदं ययोस्तो पूर्वपदो (रषौ), ताभ्याम् = पूर्वपदाभ्याम् (रषाभ्याम्), बहुव्रीहिसमासः । प्रातिपदिकस्य अन्त = प्रातिपदिकान्त, षष्ठीतत्पुरुष । प्रातिपदिकान्तश्च नुम् च विभक्तिश्च = प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तय, तासु = प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ - (एकाजुत्तरपदे) जिस समास में उत्तरपद एक अच् वाला हो उस समास मे (पूर्वपदाभ्याम्) पूर्वपद वाले (रषा- भ्याम्) रेफ षकार से परे (प्रातिकान्तनुम्विभक्तिपु) प्रातिपदिक के अन्त मे, नुंम् मे, तथा विभक्ति मे स्थित (न.) नकार के स्थान पर (ण) णकार आदेश हो जाता है। 'वृत्रहन् + औ' यहा उपपदसमास मे 'वृत्र' यह पूर्वपद तथा 'हन्' यह उत्तरपद है। उत्तरपद 'हन्' एक अच् वाला है। पूर्वपद मे तकारोत्तर रेफ भी विद्यमान है अत उस से परे प्रातिपदिक के अन्त मे स्थित नकार को णकार हो कर 'वृत्रहणौ' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार आगे सर्वनामस्थानों मे - 'वृत्रहण, वृत्रहणम्, वृत्रहणौ' रूप बनते हैं। 'वृत्रहन् + अस्' (शस्) यहा एकाजुत्तरपदे णः (८४ १२) के असिद्ध होने से अल्लोपोऽन. (६४ १३४) द्वारा अन् के अकार का लोप हो जाता है। 'वृत्रहन् + अस्' इस अवस्था में अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होना है-

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८७ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२८७) हो हन्तेर्ञ्णिन्नेषु ।७।३।५४॥ ञिति णिति प्रत्यये नकारे च परे हन्तेर्हकारस्य कुत्वं स्यात्। वृत्रघ्नः। इत्यादि। एवं शार्ङ्गिन्, यशस्विन्, अर्यमन्, पूषन्॥ अर्थः—ञित् णित् प्रत्यय परे होने पर अथवा नकार परे होने पर हन् धातु के हकार को कवर्ग (घकार) आदेश हो जाता है। व्याख्या—हन्तेः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। हः ।६।१। ञ्णिन्नेषु ।७।३। कु ।१।१। (चजोः कु घिण्ण्यतोः से)। समासः—ञ् च् ण् च=ञ्णौ, इतरेतर- द्वन्द्वः। ञ्णौ इतौ ययोस्तौ=ञ्णितौ (अङ्गाधिकारत्वात्प्रत्ययौ), बहुव्रीहिसमासः। ञ्णितौ च नश्च=ञ्णिन्नास्तेषु=ञ्णिन्नेषु, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(ञ्णिन्नेषु) ञित् णित् प्रत्यय अथवा नकार परे होने पर (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (हन्तेः) हन् धातु के (हः) हकार के स्थान पर (कु) कवर्ग आदेश हो जाता है। हकार का—संवार, नाद, घोष तथा महाप्राण यत्न है; कवर्गों में तत्सदृश केवल घकार ही है, अतः हकार के स्थान पर आन्तरतम्य से घकार ही कवर्ग आदेश होगा।¹ 'वृत्रहन् + अस्' यहां नकार परे है अतः प्रकृतसूत्र से हकार को कवर्ग-घकार आदेश हो कर 'वृत्रघ्नः' रूप सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां उत्तरपद के एकाच् न रहने से पूर्वसूत्रद्वारा णत्व नहीं होता। इसी प्रकार आगे भसञ्ज्ञकों में जब अल्लो- पोऽनः (२४७) से अन् के अकार का लोप हो जाता है तब नकार परे होने से हकार को घकार हो जाता है। यथा—टा में—'वृत्रघ्ना'; ङे में—'वृत्रघ्ने'; ङसिं और ङस् में—'वृत्रघ्नः'; ओस् में 'वृत्रघ्नोः'; आम् में—'वृत्रघ्नाम्' रूप बनते हैं। ङि में विभाषा ङिश्योः (२४८) द्वारा अन् के अकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है अतः लोपपक्ष में नकार परे रहने से 'वृत्रघ्नि' और लोपाभाव में नकार परे न होने के कारण 'वृत्रहणि' रूप बनते हैं। रूपमाला यथा— प्र० वृत्रहा वृत्रहणौ वृत्रहणः | प० वृत्रघ्नः वृत्रहभ्याम् वृत्रहभ्यः द्वि० वृत्रहणम् ,, वृत्रघ्नः | ष० ,, वृत्रघ्नोः वृत्रघ्नाम् तृ० वृत्रघ्ना वृत्रहभ्याम् वृत्रहभिः | स० वृत्रघ्नि, वृत्रहणि ,, वृत्रहसु च० वृत्रघ्ने ,, वृत्रहभ्यः | सं० हे वृत्रहन्! हे वृत्रहणौ! हे वृत्रहणः! इसी प्रकार—ब्रह्महन्, भ्रूणहन् शब्दों के उच्चारण होते हैं। शार्ङ्गिन् (विष्णु)। शार्ङ्गम्=शृङ्गनिर्मितं धनुरस्यास्तीति शार्ङ्गी। अत इनिँठनौ (११८७) इतीनिँप्रत्ययः। रूपमाला यथा— प्र० शार्ङ्गी* शार्ङ्गिणौ शार्ङ्गिणः | प० शार्ङ्गिणः शार्ङ्गिभ्याम् शार्ङ्गिभ्यः द्वि० शार्ङ्गिणम् ,, ,, | ष० ,, शार्ङ्गिणोः शार्ङ्गिणाम् तृ० शार्ङ्गिणा शार्ङ्गिभ्याम् शार्ङ्गिभिः | स० शार्ङ्गिणि ,, शार्ङ्गिषु च० शार्ङ्गिणे ,, शार्ङ्गिभ्यः | सं० हे शार्ङ्गिन्! शार्ङ्गिणौ! शार्ङ्गिणः! १. ञित् के उदाहरण 'घातः' आदि तथा णित् के उदाहरण 'जघान' आदि आगे आयेंगे।

३८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२७४)' नियम से उपधादीर्घ के निषिद्ध होने पर 'सौ च (२८५)' से दीर्घ हो सकार और नकार का लोप हो जाता है। ‡ 'शार्ङ्गिणौ' आदियों में अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व हो जाता है। 'हे शार्ङ्गिन् !' में पदान्तस्य (१३६) सूत्र द्वारा णत्वनिषेध होता है। † 'शार्ङ्गिषु' में सुब्विधि न होने से नकार का लोप असिद्ध नहीं होता, अतः णत्व करने में बाधा नहीं होती। इस प्रकार के इन्अन्त शब्द संस्कृतसाहित्य में बहुत हैं। कुछ का बालोपयोगि- सङ्ग्रह नीचे दिया जा रहा है। यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का परिचायक है। शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अनृच्छिन् = ऋणरहित | कृतिन् = पण्डित | नयशालिन् = नीतिज्ञ अनृणिन् = " | केसरिन् = शेर | निवासिन् = रहने वाला अक्षदेविन् = जुआरी | क्रोधिन् = क्रोधी | पक्षिन् = परिन्दा अज्ञानिन् = अज्ञानी | क्षणविध्वंसिन् = क्षणिक | परदेशिन् = विदेशी अतिशायिन् = बढ़ा हुआ | खड्गिन् = गैण्डा | परमेष्ठिन् = ब्रह्मा अधिकारिन्* = अधिकारी | गुणिन् = गुणयुक्त | परिपन्थिन् = शत्रु अधीतिन्¹ = विद्वान् | गृहमेधिन् = गृहस्थी | पादचारिन्* = पैदल अनुजीविन् = सेवक | गृहिन्* = " | पाशिन् = यमराज अनुयायिन् = अनुयायी | गृहीतिन् = समझा हुआ | पिनाकिन् = शिव अन्तेवासिन् = शिष्य | घोणिन् = सूअर | पुष्करिन्* = हाथी आगामिन् = आने वाला | चक्रवर्तिन् = सार्वभौम | प्रकम्पिन् = कापने वाला आततायिन् = दुष्ट | चक्रिन्* = चक्रधारी | प्रणयिन् = प्रेमी उपजीविन् = सेवक | जन्मिन् = प्राणी | प्रतिवेशिन् = पड़ौसी उपयोगिन् = उपयोगी | जम्भभेदिन् = इन्द्र | प्रत्यर्थिन् = शत्रु ऊर्मिमालिन् = समुद्र | ज्ञानिन् = ज्ञानी | प्रवासिन् = परदेश गया एकाकिन् = अकेला | तपस्विन् = तपस्वी | प्राणिन् = प्राणी कञ्चुकिन् = कञ्चुकी | त्यागिन् = त्यागी | फणिन् = फणधर सांप कपटिन् = कपटी | दंष्ट्रिन्* = सूअर | फलिन् = फल वाला पेड़ कपालिन् = महादेव | दण्डिन् = दण्डधारी | बलशालिन् = बलवान् करटिन् = हाथी | दन्तिन् = हाथी | बलिविध्वंसिन् = विष्णु करिन्* = हाथी | दीर्घदर्शिन् = दूरदर्शी | बलिन् = बलवान् कलापिन् = मोर | देहिन् = जीवात्मा | बुद्धिशालिन् = बुद्धि मान् कामिन् = कामी | द्वारिन्* = द्वारपाल | ब्रह्मचारिन्* = ब्रह्मचारी किरणमालिन् = सूर्य | दीपिन् = बाघ | ब्रह्मवादिन् = ब्रह्मवादी कुण्डलिन् = सांप | धनिन् = धनवान् | भागिन् = हिस्सेदार १ इस के योग में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है—व्याकरणेऽधीती।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८६ शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ भिक्षाशिन् = भिक्षुक | वनमालिन् = श्रीकृष्ण | शिखण्डिन् = मोर भोगिन् = सांप, राजा | वनवासिन् = वनवासी | शिल्पिन् = कारीगर मनस्विन् = बुद्धिमान् | वशवर्त्तिन् = आज्ञाकारी | शेषशायिन् = विष्णु मनीषिन्* = बुद्धिमान् | वशिन् = वशवर्त्ती | श्रमिन्* = परिश्रमी मन्त्रिन्* = मन्त्री | वाग्मिन् = वाक्पटु | श्रेष्ठिन् = धनवान् मरीचिमालिन् = सूर्य | विटपिन् = वृक्ष | संयमिन् = संयमी मस्करिन्* = संन्यासी | वियोगिन् = विरही | सङ्गिन् = साथी मानिन् = अभिमानी | वीचिमालिन् = समुद्र | सञ्चारिन्* = सञ्चारी मालिन् = मालाधारी | वैरिन्* = शत्रु | सत्यवादिन् = सत्यवादी मुण्डिन् = सिरमुण्डा | व्यभिचारिन्* = दुराचारी | सब्रह्मचारिन्* = सहपाठी मेधाविन् = बुद्धिमान् | व्यवायिन् = व्यभिचारी | सव्यसाचिन् = अर्जुन योगिन् = योगी | व्यापिन् = व्यापक | सहकारिन्* = सहयोगी रथारोहिन्* = रथसवार | व्योमचारिन्* = नभचर | साक्षिन्* = गवाह रूपधारिन्* = रूपधारी | व्रतिन् = व्रत वाला | सादिन् = घुड़सवार रोगिन्* = रोगी | शमिन् = शान्त | स्वामिन् = स्वामी लाङ्गलिन् = बलराम | शरीरिन्* = जीवात्मा | हस्तिन् = हाथी लिङ्गिन् = साधु | शास्त्रदर्शिन् = शास्त्रज्ञ | हितैषिन्* = हितेच्छुक लोभिन् = लोभी | शास्त्रिन्* = शास्त्रज्ञ | नोट— ध्यान रहे कि इन्अन्त शब्दों का इकार, आम् में सदा ह्रस्व ही रहता है। यथा—योगिनाम्, करिणाम्, धनिनाम् आदि। इस की दीर्घता केवल सुँ में ही हुआ करती है—योगी, करी, धनी आदि। समास में नकार का लोप हो कर इकार ह्रस्व ही रहता है। यथा—विटपिनः शाखा—विटपिशाखा। रोगिणश्चर्या—रोगिचर्या। स्त्रीलिङ्ग में इन्अन्त शब्दों का प्रयोग करना हो तो इन के आगे ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) द्वारा ङीप् प्रत्यय किया जाता है। ङीप् के अनुबन्धों का लोप हो कर 'ई' मात्र अवशिष्ट रहता है। तब इस की रूपमाला गौरीशब्द के समान होती है— योगिनी, योगिन्यौ, योगिन्यः आदि। हिन्दी में इन्अन्त शब्द ईकारान्त के रूप में प्रचलित हैं अतः कई लोग इन को ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग समझने की भूल किया करते हैं। इस से सावधान रहना चाहिये। पूषन् (सूर्य)। पूषन् शब्द श्वन्नुक्षन्पूषन्० (उणा० १५७) इस औणादिक सूत्र द्वारा पुष पुष्टौ (क्र्या० प०) धातु से कनिन्प्रत्ययान्त निपातित होता है। पुष्णातीति पूषा। जगत् को पुष्टि प्रदान करने के कारण सूर्य का नाम 'पूषन्' है। विकर्त्तनाऽर्क-मार्तण्ड-मिहिराऽरुणपूषणः—इत्यमरः। 'पूषन्' शब्द की रूपमाला यथा—

३६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां प्र० पूषा‡ पूषणौ† पूषण † प० पूष्ण * पूषभ्याम् पूषभ्य द्वि० पूषणम्† ,† पूष्ण * ष० ,, * पूष्णो * पूष्णाम्* तृ० पूष्णा* पूषभ्याम् पूषभि स० पूष्णि पूषणि✓ ,, पूषसु च० पूष्णे* ,, पूषभ्य स० हे पूषन्' हे पूषणौ' हे पूषण ' ‡ इनहन्पूषार्यम्णां शौ (२८४), सौ च (२८५) । † ष्ट हन्निति नियमात् दीर्घ । णत्वमत्र अट्कु० (१३८) इति सूत्रेण भवति । भसञ्ज्ञकेषु तु अल्लोपे कृते रषाभ्या नो ण समानपदे (२६७) इति णत्व बोध्यम् । *अल्लोपोऽन (२४७) । ✓ विभाषा ङिश्यो (२४८) । अर्यमन् (सूर्य) । इवन्वुक्षन्० (उणा० १५७) इत्युणादिसूत्रेण अर्योपपदाद् माङ माने (जुहो० आ०) इत्यस्माद्धातो कनिन्प्रत्ययान्तो निपात्यते । रूपमाला यथा- प्र० अयमा अर्यमणौ अर्यमण प० अर्यम्ण अर्यमभ्याम् अर्यमभ्य द्व० अर्यमणम् ,, अर्यम्ण ष० ,, अर्यम्णो अर्यम्णाम् तृ० अर्यम्णा अर्यमभ्याम् अर्यमभि स० अर्यम्णि,अर्यमणि ,, अर्यमसु च० अर्यम्णे ,, अर्यमम्य स० हे अर्यमन्' अर्यमणौ' अर्यमण ' णत्व सर्वत्र अट्कु० (१३८) सूत्र से ही होता है। यशस्विन् (यशस्वी = कीर्तिमान्) । [यशोऽस्यास्तीति -- यशस्वी, अस्माया- मेधास्रजो विनिः (११८४) इति मत्वर्थे विनिप्रत्यय ] । रूपमाला यथा- प्र० यशस्वी यशस्विनौ यशस्विन प० यशस्विन यशस्विभ्याम् यशस्विम्य द्वि० यशस्विनम् ,, ,, ष० ,, यशस्विनो यशस्विनाम् तृ० यशस्विना यशस्विभ्याम् यशस्विभि स० यशस्विनि ,, यशस्विषु च० यशस्विने ,, यशस्विम्य स० हे यशस्विन्' यशस्विनौ' यशस्विन ' नोट-यहाँ 'यशस्विन्' में विन्प्रत्यय होने से 'इन्' अनर्थक तथा शार्ङ्गिन्' म इनप्रत्यय होने से इन्' सार्थक है-समुदायो ह्यर्थवान् तदेकदेशोऽनर्थक । सार्थक और अनर्थक के मध्य सार्थक का ही ग्रहण किया जाता है, अत इस के अनुसार 'यशस्विन्' आदि शब्दो मे इनहन्० (२८४) तथा सौ च (२८५) सूत्र प्रवृत्त नही हो सकते थे । परन्तु इस विषय की-अनिन्स्मन्गहणान्यर्थवता चानर्थकन च तदन्तविधि प्रयोजयन्ति (जिन सूत्रो मे अन्, इन्, अस्, मन् का ग्रहण हो वे सूत्र इन के सार्थक अथवा अनर्थक होने पर भी एतदन्तो मे प्रवृत्त हो जाते हैं) । इस परिभाषा से १ परिभाषोदाहरणानि यथा -राज्ञ इत्यत्र अन् अर्थवान्, दाम्न इत्यत्र तु अनर्थक । शाङ्गों इत्यत्र इन् अर्थवान्, यशस्वी इत्यत्र तु अनर्थक । सुपया इत्यत्र अस् अर्थ- वान्, सुश्रोता इत्यत्र तु अनर्थक । अमन्तत्वाद् उभयत्र दीर्घ (३४३) । सुशर्मा इत्यत्र मन् अर्थवान्, सुप्रथिमा इत्यत्र तु अनर्थक । मन (४।१।१०) इति उभयत्र न ङीप् ।