लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८७ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२८७) हो हन्तेर्ञ्णिन्नेषु ।७।३।५४॥ ञिति णिति प्रत्यये नकारे च परे हन्तेर्हकारस्य कुत्वं स्यात्। वृत्रघ्नः। इत्यादि। एवं शार्ङ्गिन्, यशस्विन्, अर्यमन्, पूषन्॥ अर्थः—ञित् णित् प्रत्यय परे होने पर अथवा नकार परे होने पर हन् धातु के हकार को कवर्ग (घकार) आदेश हो जाता है। व्याख्या—हन्तेः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। हः ।६।१। ञ्णिन्नेषु ।७।३। कु ।१।१। (चजोः कु घिण्ण्यतोः से)। समासः—ञ् च् ण् च=ञ्णौ, इतरेतर- द्वन्द्वः। ञ्णौ इतौ ययोस्तौ=ञ्णितौ (अङ्गाधिकारत्वात्प्रत्ययौ), बहुव्रीहिसमासः। ञ्णितौ च नश्च=ञ्णिन्नास्तेषु=ञ्णिन्नेषु, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(ञ्णिन्नेषु) ञित् णित् प्रत्यय अथवा नकार परे होने पर (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (हन्तेः) हन् धातु के (हः) हकार के स्थान पर (कु) कवर्ग आदेश हो जाता है। हकार का—संवार, नाद, घोष तथा महाप्राण यत्न है; कवर्गों में तत्सदृश केवल घकार ही है, अतः हकार के स्थान पर आन्तरतम्य से घकार ही कवर्ग आदेश होगा।¹ 'वृत्रहन् + अस्' यहां नकार परे है अतः प्रकृतसूत्र से हकार को कवर्ग-घकार आदेश हो कर 'वृत्रघ्नः' रूप सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां उत्तरपद के एकाच् न रहने से पूर्वसूत्रद्वारा णत्व नहीं होता। इसी प्रकार आगे भसञ्ज्ञकों में जब अल्लो- पोऽनः (२४७) से अन् के अकार का लोप हो जाता है तब नकार परे होने से हकार को घकार हो जाता है। यथा—टा में—'वृत्रघ्ना'; ङे में—'वृत्रघ्ने'; ङसिं और ङस् में—'वृत्रघ्नः'; ओस् में 'वृत्रघ्नोः'; आम् में—'वृत्रघ्नाम्' रूप बनते हैं। ङि में विभाषा ङिश्योः (२४८) द्वारा अन् के अकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है अतः लोपपक्ष में नकार परे रहने से 'वृत्रघ्नि' और लोपाभाव में नकार परे न होने के कारण 'वृत्रहणि' रूप बनते हैं। रूपमाला यथा— प्र० वृत्रहा वृत्रहणौ वृत्रहणः | प० वृत्रघ्नः वृत्रहभ्याम् वृत्रहभ्यः द्वि० वृत्रहणम् ,, वृत्रघ्नः | ष० ,, वृत्रघ्नोः वृत्रघ्नाम् तृ० वृत्रघ्ना वृत्रहभ्याम् वृत्रहभिः | स० वृत्रघ्नि, वृत्रहणि ,, वृत्रहसु च० वृत्रघ्ने ,, वृत्रहभ्यः | सं० हे वृत्रहन्! हे वृत्रहणौ! हे वृत्रहणः! इसी प्रकार—ब्रह्महन्, भ्रूणहन् शब्दों के उच्चारण होते हैं। शार्ङ्गिन् (विष्णु)। शार्ङ्गम्=शृङ्गनिर्मितं धनुरस्यास्तीति शार्ङ्गी। अत इनिँठनौ (११८७) इतीनिँप्रत्ययः। रूपमाला यथा— प्र० शार्ङ्गी* शार्ङ्गिणौ शार्ङ्गिणः | प० शार्ङ्गिणः शार्ङ्गिभ्याम् शार्ङ्गिभ्यः द्वि० शार्ङ्गिणम् ,, ,, | ष० ,, शार्ङ्गिणोः शार्ङ्गिणाम् तृ० शार्ङ्गिणा शार्ङ्गिभ्याम् शार्ङ्गिभिः | स० शार्ङ्गिणि ,, शार्ङ्गिषु च० शार्ङ्गिणे ,, शार्ङ्गिभ्यः | सं० हे शार्ङ्गिन्! शार्ङ्गिणौ! शार्ङ्गिणः! १. ञित् के उदाहरण 'घातः' आदि तथा णित् के उदाहरण 'जघान' आदि आगे आयेंगे।